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मेरा मानना है कि इंसान को हमेशा सीखते रहना चाहिए: कमर वहीद नकवी

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई यादों को साझा किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई यादों को साझा किया है। पेश हैं इस वार्ता के प्रमुख अंश-

अपने बचपन के बारे में कुछ बताएं, पत्रकार कैसे बनना हुआ?

मैं बनारस में पैदा हुआ हूं और पढ़ाई वहीं से की है। मेरे चचेरे नाना उर्दू का अखबार निकालते थे और सगे नाना शायर थे तो पढ़ने-लिखने का माहौल बचपन से ही मिला। दस साल की उम्र तक आते-आते मैं पत्रिका और उर्दू अखबार पढ़ने-समझने लगा था। इसके बाद बाल पत्रिका में भी रुचि होने लगी और बनारस के अखबारों में जो बच्चों का पेज होता था, उसमें मेरी कविताएं छपने लगीं। इसके बाद मेरी रुचि लेखन में होने लगी और 15 साल का जब हुआ तो संपादक के नाम पत्र छपने लगे। साल 1971 में जब बांग्लादेश की मुक्ति का आंदोलन हुआ तो मेरी कविता ‘आज‘ अखबार में छापी गई। इसके बाद एक और अखबार ‘सन्मार्ग‘ में स्पोर्ट्स पर मेरे लेख आने लगे।

इसके बाद एक जानकार वकील ने अपना अखबार शुरू किया और मैं उस जगह काम करने लगा। एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वहां के संपादक ने काम छोड़ दिया, उसके बाद मैंने उस जिम्मेदारी को निभाया और सिर्फ 19 साल की उम्र में तीन साल तक संपादक की हैसियत से उस अखबार को निकालता रहा। जहां तक बात पत्रकार बनने की है तो मैं साफ इस बात को कहता हूं कि मुझसे सरकारी अफसरी नहीं हो सकती थी, इसलिए या तो मैं शिक्षक बनता या मैं पत्रकार बनता। उन दिनों मैं अखबारों में नौकरी भी ढूंढ रहा था और बच्चों को पढ़ाता भी था। एक दिन मेरे एक शिष्य विजय ने जो होजरी की दुकान करता था, मुझे एक विज्ञापन के बारे में बताया जो टाइम्स ग्रुप का था। उसके बाद 30 पैसे के एक लिफाफे के अंदर मैंने 1000 शब्दों का एक लेख भेज दिया। इसके बाद मुझे दिल्ली बुलाया गया और मैं पहली बार उसी सिलसिले में दिल्ली आया। फाइनल इंटरव्यू मुंबई में हुआ और इस तरह मेरी ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ यात्रा शुरू हुई और इसका पूरा श्रेय उस होजरी वाले मेरे शिष्य विजय को देता हूं।

नौकरी के दौरान आपके अनुभव कैसे रहे? ‘चौथी दुनिया‘ की नींव कैसे पड़ी?

आज जिस तरह मीडिया संस्थान मोटी फीस लेते हैं, वैसा ‘टाइम्स ग्रुप‘ का नहीं था। मुझे साल 1980 में पहली नौकरी ट्रेनी के तौर पर मिली और उस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा। मैंने अपने दस साल उन्हें दिए। अगर वो प्रोग्राम नहीं होता तो मेरे जैसा बनारस के साधारण परिवार का लड़का आज यहां नहीं पहुंच सकता था। ‘चौथी दुनिया‘ की भूमिका ‘रविवार‘  में काम करते हुए बनी थी। उस समय मैं ‘रविवार‘ में था तो संतोष भारतीय जी भी वहीं विशेष संवाददाता की भूमिका में थे। उसी समय उन्होंने मुझे और राम कृपाल जी को इस अखबार की योजना के बारे में बताया। दरअसल, उस समय तक मेरी और राम कृपाल की जोड़ी प्रसिद्ध हो चुकी थी। राजेंद्र माथुर जी ने भी मुझे और रामकृपाल को साथ ही लखनऊ ‘एनबीटी‘ का काम देखने भेजा था। एसपी सिंह ने जब ‘रविवार‘ छोड़ दिया, तब उदयन जी को उसकी जिम्मेदारी दी गई थी। उसी दौरान संतोष जी ने हम दोनों को उदयन जी से मिलवाया। हम साथ काम करने लगे। उसी दौरान ‘चौथी दुनिया‘ की नींव पड़ी और हमने उसे सफलतापूर्वक लॉन्च किया। राम कृपाल जी न्यूज एडिटर थे और मैं अखबार की डिजाइन देख रहा था। बहुत कम समय में ही ‘चौथी दुनिया‘ लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गया।

आपको एक बार फिर लखनऊ और फिर जयपुर भेजा गया। उसके बारे में कुछ बताइए। 

जैसा कि मैंने आपको बताया कि ‘चौथी दुनिया‘ हमने लॉन्च किया और करीब तीन साल तक मैं वहां जुड़ा रहा। उसी समय लखनऊ ‘नवभारत टाइम्स‘ में कुछ दिक्कत आ रही थी। अखबार ठीक से चल नहीं रहा था वहीं प्रतियां बिकनी भी कम हो गई थीं। संस्थान उस अखबार को बंद करने की तैयारी में था और उसी कारण माथुर जी ने मुझे और राम कृपाल दोनों को लखनऊ भेजा। जब मैंने उनसे कहा कि आप हम दोनों को कैसे न्यूज एडिटर बनाएंगे तो उन्होंने कहा कि मैं राम कृपाल और नकवी को अलग मानता ही नहीं हूं। मेरे लिए आप दोनों एक हैं और आप दोनों साथ ही काम करेंगे। उसके बाद हम दोनों ने मिलकर वहां अखबार की गुणवत्ता सुधारी और इसके बाद मैं डेढ़ साल के करीब जयपुर रहा और राम कृपाल जी दिल्ली आ गए।

आपने ‘आजतक‘  के साथ भी काम किया है। अरुण पुरी जी से पहली मुलाकात के बारे में कुछ बताएं।

दरअसल, उस समय ‘डीडी मेट्रो‘ ने ये विचार किया था कि कुछ निजी समाचार एजेंसियों को समाचार प्रसारण का मौका दिया जाए। उस समय तक प्रणव राय ‘दूरदर्शन‘ के लिए एक कार्यक्रम कर चुके थे और चुनावी कवरेज भी वो अच्छी करते थे। विनोद दुआ जी उस समय ‘परख‘ निकाल रहे थे और उसी दिशा में हिंदी में न्यूज बुलेटिन की बात निकलकर सामने आई। उसी समय ‘टीवी टुडे‘ को हिंदी का बुलेटिन मिला और अरुण पुरी जी को हिंदी की चिंता था कि वो कैसी हिंदी हो जो दर्शकों को पसंद आए! वो सहज और सरल हिंदी चाहते थे और उसी दौरान एसपी सिंह का मुझे कॉल आया, जब मैं जयपुर था। फिर मैं अरुण जी से मिला और उन्होंने शेखर गुप्ता जी से कहकर मुझसे एक अंग्रेजी पैराग्राफ का अनुवाद करवाया। उस समय शेखर जी ‘इंडिया टुडे‘ हिंदी के संपादक थे। शेखर जी ने मेरे अनुवाद को पसंद किया और इस तरह मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला और मुझे उस बुलेटिन की भाषा की जिम्मेदारी दी गई। उसी समय बुलेटिन के नाम को लेकर काफी विमर्श हुआ और जयपुर जाते समय बस में मुझे ‘आजतक‘ नाम सूझा और मैंने उसी समय नामकरण कर दिया।

आपने ‘आजतक‘ को आगे बढ़ते हुए देखा है। कुछ यादें हैं, जो आपके जहन में आती हैं?

देखिए, आज के समय में अगर ‘आजतक‘ नंबर वन बना है तो उसकी नींव एसपी सिंह ने रखी थी। उनके असमय निधन ने हम सबको घोर पीड़ा दी लेकिन जैसा कि वो कहते थे कि काम करते रहो। बाद में राहुल देव जी और उसके बाद मैं संपादक हुआ। एसपी सिंह ने ‘आजतक‘ को लोकप्रिय किया। बाद में कई लोगों ने उन्हें कॉपी करने की कोशिश की है। वो एक दिन में 17 से अधिक अखबार पढ़ लेते थे। छोटी से छोटी खबर उनको पता रहती थी। चुनावों को लेकर जो उनकी समझ थी, वो अच्छे-अच्छे बुद्धिमान लोगों को चकित कर देती थी। वो जो भी खबर पढ़ते थे, उनको पूरी समझ रहती थी कि मैं क्या पढ़ रहा हूं! उन्होंने हमे सिखाया कि व्यक्ति को समाज के हर पहलू की समझ होनी चाहिए। उसी नक्शेकदम पर चलते हुए जब मैं न्यूज डायरेक्टर बना तो मैंने वर्कशॉप का आयोजन करना शुरू किया। पत्रकार से लेकर कॉपी राइटर तक को हमने ट्रेनिंग देने का काम किया। मेरा मानना है कि इंसान को हमेशा सीखते रहना चाहिए। आज मैं डिजिटल को समझ रहा हूं और अपना काम कर रहा हूं। फोटोग्राफी सीखने का फायदा भी मुझे अखबार में मिला।

आपने एसपी सिंह और राहुल देव जैसे लोगों के साथ काम किया है। क्या आपको वर्तमान में भाषा की समृद्धि को लेकर कोई शिकायत है?

भाषा को लेकर मेरे विचार थोड़े अलग हैं। शुद्ध बोलने वालों की बजाय अशुद्ध बोलने वाले भाषा का विस्तार अधिक करते हैं। अगर शुद्धता पर अटके होते तो आज 100 साल पहले की हिंदी हम बोल रहे होते। जैसे कि ‘खुलासा‘,  इस शब्द का अर्थ एक्सपोज करना नहीं है, बल्कि किसी चीज का निचोड़ है लेकिन आज इस शब्द का अर्थ बदला चुका है। इसी तरह से भाषा बढ़ती भी है और बदलती है। हम किसी भी भाषा को खूंटा बांधकर नहीं रख सकते हैं। हिंदी आज जो है, वो कल नहीं रहेगी। जहां तक बात टीवी की है तो सोशल मीडिया ने थोड़ा उसका आकर्षण कम कर दिया है। टीवी डिबेट में जो हो रहा है, वो समय की मांग है लेकिन आज नहीं तो कल ये चीज बदल जाएगी। आपको टीवी को जीवित रखने के लिए कुछ अच्छा करना पड़ेगा।

आपकी रुचि क्या है? भविष्य में क्या योजनाएं हैं?

मेरी रुचि तो आती-जाती रहती है। पढ़ना, लिखना और फोटोग्राफी तो हमेशा से शौक रहा है। इसके अलावा ज्योतिष में भी रुचि जागी है। स्टॉक मार्केट की भी समझ आ गई है। डिजिटल मीडिया की कई चीजें आजकल मैं सीख रहा हूं। भविष्य का कुछ सोचना नहीं है, बस जो करना है अच्छा करना है और पहले से बेहतर करना है।

समाचार4मीडिया के साथ कमर वहीद नकवी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।


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