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मैं इस तरफ या उस तरफ का होता तो पत्रकार नहीं होता: अमिताभ अग्निहोत्री

पत्रकारिता में लंबे समय से सक्रि‍य अमिताभ अग्निहोत्री ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अमिताभ अग्निहोत्री की जीवन यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

पत्रकारिता में लंबे समय से सक्रि‍य अमिताभ अग्निहोत्री ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अमिताभ ने वर्ष 1989 में ‘आईआईएमसी’, दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद करियर की शुरुआत ‘दैनिक जागरण’ से की थी। अमिताभ अग्निहोत्री की जीवन यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

पत्रकारिता में आपका तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। मीडिया में कैसे आए? प्रारंभिक जीवन के बारे में बताएं?

मेरा जन्म यूपी के फर्रुखाबाद में हुआ है। जब बड़ा हुआ तो सामाजिक कार्यों में मन लगने लगा। मुझसे बड़े दो भाई-बहन काफी मेधावी थे लेकिन मेरा मन उतना पढ़ाई में लगता नहीं था। मेरी एक बहन है, जो आज आगरा में खुद का अस्पताल संचालित कर रही हैं।

कुल मिलाकर भाई-बहन विद्वान थे लेकिन मैं अपने आप को सदैव समाज से जोड़कर चलता था। मां को मेरी बहुत चिंता होती थी तो उनके कहने से बीकॉम करने चला गया, लेकिन वहां भी मन तो बस डिबेट में ही लगता था।

वो मेरी यात्रा ऐसी थी, जहां मैं छात्र जीवन के साथ-साथ एक सामाजिक जीवन भी जीने लगा था। उसी दौरान मैंने जिले के एसएसपी को चिट्ठी लिखी और जिले के हालात के बारे में बताया। कुछ दिन बाद कुछ लोग घर आए और मेरे बारे में पूछने लगे। मैं उनके साथ गया और बाद में एसएसपी से मित्रवत संबंध हो गए।

इसके बाद सामाजिक दायरा बढ़ा। मुझे आज भी याद है, जब इंदिराजी की हत्या हुई तो मैंने उनकी स्मृति में एक कार्य्रकम का आयोजन करवाया था और उस समय की राज्यमंत्री शीला दीक्षित जी भी उसमें शामिल हुई थीं।

उसके बाद मैंने एमकॉम किया और एमबीए के लिए लखनऊ से बुलावा भी आया, लेकिन मां को अपने मन की पीड़ा बताई और कहा कि मुझे तो मीडिया में जाना है। मां का आशीर्वाद मिला और आखिरकार जो बचपन से मेरी आत्मा मुझसे कह रही थी, मैंने उसकी आवाज सुनी। इसके बाद मैं आईआईएमसी दिल्ली गया और मेहनत का फल ऐसा हुआ कि मैंने वहां टॉप किया।

उसके बाद ऐसा लगा कि जैसे जीवन में कुछ अच्छा होगा और नौकरी की तलाश शुरू की। उसी दौरान ‘दैनिक जागरण‘ दिल्ली से भी शुरू हो रहा था और मुझे सबसे पहले वहां नौकरी मिली।

पहली नौकरी हमेशा से खास होती है। पहली नौकरी के कुछ अनुभव बताएं।

बिल्कुल, आपने सही कहा है। वो यादें खास हैं। वहां मैंने खूब मन लगाकर काम किया और एक महीने के बाद तो मेरा लिखा हुआ छपने भी लगा। ये आज भी मेरे लिए गर्व की बात है।

इसके बाद मुझे रिपोर्टिंग करने का भी मौका दिया गया। बाद में मुझे ब्यूरो भेजा गया और मेरी ग्राउंड रिपोर्टिंग की यात्रा शुरू हुई। ‘दैनिक जागरण‘ जैसे संस्थान के लिए ग्राउंड वर्क करना और वो भी उस दौर में जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था, वो समय मेरे लिए स्वर्णिम था।

इसके बाद मुझे बीजेपी और आरएसएस को कवर करने का जिम्मा मिला और साधु संत भी उसी में शामिल हो गए तो इस तरह से मेरी पहली नौकरी के अनुभव बड़े अच्छे रहे।

आपने प्रिंट और टीवी दोनों में काम किया है। आपकी टीवी में यात्रा कैसे शुरू हुई?

सच कहूं तो प्रिंट में काम करने का अपना एक अलग जलवा होता है। एक जगह बैठने का झंझट भी नहीं होता है। ‘दैनिक भास्कर‘ के समय में टीवी वालों से बढ़िया पहचान होने लगी। कई बार तो लोग मुझे टीवी का पत्रकार समझने लग जाते थे। वो एक ऐसा दौर था, जब टीवी आकार ले रहा था। कुछ बड़े चैनल्स में बात हुई, लेकिन मामला जमा नहीं।

जब मैं ‘देशबंधु‘ का संपादक था तो उसी समय ‘टोटल टीवी‘ से ऑफर आया और उनके मालिक से मेरी अच्छी मित्रता भी थी तो मना नहीं कर पाया और जुड़ गया। उसके बाद ‘समाचार प्लस‘ की शुरुआत हुई और सफलता के झंडे गाढ़े। करीब एक साल ‘के न्यूज‘ में भी रहा और एक बार उसे भी नंबर एक पर पहुंचा दिया। बाद में मैंने ‘एटीवी‘ और ‘नेटवर्क 18‘ के UP/UK चैनल्स का भी काम देखा।

कोरोना के कालखंड में एक छोटी सी पारी ‘R9‘ के साथ भी रही और मुझे संतोष इस बात का है कि हमने उस चैनल को एक पहचान दिलाई। इसके बाद ‘टीवी9‘ (डिजिटल) के साथ नई पारी शुरू की और आज आपके सामने हूं।

अगर आपसे ये पूछा जाए कि टीवी और प्रिंट दोनों में से किसमें अधिक मजा आया तो क्या कहेंगे? भविष्य में रीजनल चैनल्स की चुनौती क्या दिखाई देती है?

देखिए, मजा तो दोनों में है लेकिन आपने प्रश्न ऐसा किया है तो मैं कहूंगा कि टीवी में अधिक मजा है, क्योंकि उसमें गति है। कोई भी घटना जब हो रही है तो टीवी के माध्यम से आप उसमें ‘हस्तक्षेप‘ कर सकते हैं, लेकिन अखबार में पूरा एक दिन उसमें लग जाएगा।

प्रभावी माध्यम दोनों हैं, लेकिन टीवी की गति उसे अधिक आकर्षक बना देती है। मुझे कई बार लोग पूछते हैं कि आप किस तरफ हैं तो मैं एक ही बात कहता हूं कि मैं इस तरफ या उस तरफ का होता तो पत्रकार नहीं होता।

पहले लोग नेताओं के बारे में कहते थे कि ये फलां पार्टी का है, लेकिन अब मीडिया वालों के लिए कह रहे हैं कि देखिए वो उस पार्टी का पत्रकार है। अगर बात करें रीजनल चैनल्स की तो उनका भविष्य अच्छा है पर उन्हें नेशनल चैनल्स को कॉपी करने से बचना होगा। कॉपी करने से पैसा कमाया जा सकता है लेकिन लंबे समय तक चैनल नहीं टिक सकता।

मैं तो आम आदमी का पत्रकार हूं और उनसे जुड़ी ही खबरें दिखाता हूं। अगर आप अखबार को देखें तो हर जिले का अलग अखबार निकलता है और इसलिए वो टॉप पर है। उसी तरह से रीजनल चैनल्स को भी हर गांव, कस्बे की खबर दिखानी होगी, तब जाकर वो आपसे जुड़ेगा। अगर आप उसे अफगानिस्तान की खबर दिखाएंगे तो वो आपको क्यों देखेगा? रीजनल चैनल्स का मतलब यही होता है कि दर्शक के गांव की खबर कुछ ही घंटों में टीवी पर आ जाए।

वर्तमान में आपके पास डिजिटल की जिम्मेदारी है। फेक न्यूज की चुनौती को कैसे देख रहे हैं?

टीवी और अखबार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन डिजिटल का कोई दायरा नहीं है। इसे आप एक समुद्र कह सकते हैं, जिसका अपना एक अलग आनंद है। मुझे ऐसा लगता है कि नियम कानून ठीक हैं, लेकिन पूरी तरह से इसे सरकारी नियंत्रण में लाने से इसका ‘सौंदर्य‘ नष्ट हो जाएगा।

इस मसले पर मुझे स्वर्गीय अटल जी की याद आती है, जिनकी मैंने एक बार आलोचना की थी और जब वो मुझसे मिले तो भरपूर स्नेह दिया। इसलिए मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए और मैं अधिक प्रतिबंधों के पक्ष में नहीं हूं। अब जहां तक बात है फेक न्यूज की तो कोई आम आदमी इन्हें तैयार नहीं करता। ये सब एजेंडे से प्रभावित होती हैं और एक आम आदमी तो बस फंस जाता है, इसलिए जागरूकता के पक्ष में हमेशा रहना चाहिए।

क्या आपने कभी किसी से प्रभावित होकर, भय में या लालच में कभी एजेंडा चलाया है?

ये आपने अच्छा सवाल किया। वर्तमान समय में तमाम आरोप मीडिया पर लगाए जा रहे हैं। जहां तक मेरी बात है तो मेरी सिर्फ एक विचारधारा है और वो है गरीब। लोग मुझे कहते हैं कि आप बहुत बोलते हो, लेकिन उसके बाद भी मुझे खतरा महसूस नहीं हुआ है। मुझे तो केंद्र सरकार तक से सुरक्षा लेने का ऑफर आया, लेकिन मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मुझे कौन मारेगा?

अब पत्रकार सुरक्षा मांगे तो बचकाना लगता है। मैं आपसे ईमानदारी से कहूंगा कि एक बार नहीं, कई बार ऐसे मौके आए जब सत्ता के सर्वोच्च व्यक्ति और मेरे बीच सीधा संवाद हुआ, लेकिन मैंने हमेशा एक बात कही है कि मैं आम आदमी का पत्रकार हूं और उसी की बात करूंगा।

मेरे मंच पर सबका स्वागत है और आपको जो कहना है, जनता से कहिए, मुझसे मत कहिए। मुझे ऐसा लगता है कि इस पेशे में किसी से लाभ नहीं लेना चाहिए और अगर ऐसा किया है तो फिर भगत सिंह बनने का ‘स्टंट’ मत कीजिए, वो हानिकारक हो जाएगा।

समाचार4मीडिया के साथ अमिताभ अग्निहोत्री की बातचीत के वीडियो आप यहां देख सकते हैं।


टैग्स अमिताभ अग्निहोत्री इंटरव्यू साक्षात्कार वरिष्ठ पत्रकार
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