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प्रो. के.जी सुरेश ने बताया, वर्तमान दौर की पत्रकारिता में किस तरह के बदलाव की है जरूरत

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' के कुलपति प्रो. के.जी सुरेश का कहना है कि टेक्नोलॉजी के प्रभाव से पत्रकारिता में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू शामिल हो गए हैं।

पंकज शर्मा 3 years ago

'माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय' (MCU) भोपाल के कुलपति, देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान 'भारतीय जनसंचार संस्थान' (IIMC) के पूर्व महानिदेशक और 'समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40अंडर40' की जूरी के सदस्य प्रो. के.जी सुरेश से हाल ही में समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा की दिल्ली स्थित उनके आवास पर भेंट हुई। इस दौरान तमाम अहम मुद्दों पर चर्चा की गई। प्रो. के.जी सुरेश के साथ हुई इस बातचीत के प्रमुख अंश आप यहां पढ़ सकते हैं-

वर्तमान दौर में जिस तरह की पत्रकारिता हो रही है, उसे लेकर आपका क्या मानना है? क्या आपको लगता है कि इसमें बदलाव की जरूरत है? यदि हां, तो कहां पर?

मैं समझता हूं कि इसमें काफी सुधार की जरूरत है, गुंजाइश है। इसे लेकर सरकार और उच्चतम न्यायालय समेत तमाम स्तरों पर चिंता जताई जा रही है। आज के दौर में फेक कंटेंट का मुद्दा सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए गंभीर चुनौती है। फैक्ट चेकिंग शब्द से मैं सहमत नहीं हूं, क्योंकि यदि कोई चीज फैक्ट है तो उसे क्यों चेक करना। मैं इसे फेक चेकिंग या इंफो चेकिंग कहूंगा। इसमें हमें नया कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस मीडिया के मूलभूत सिद्धांत यानी-चेकिंग, क्रॉस चेकिंग, वेरीफाइंग और सोर्सिंग जो हम पत्रकारिता में करते हैं, अगर वही हम नियमित तौर पर करने लग जाएं तो फेक कंटेंट पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। टीआरपी की रेस के चक्कर में, हेडलाइन से लोगों को आकर्षित करने के चक्कर में तमाम मीडिया संस्थान जिस तरह से लोगों को समाचारों में सनसनी देने लग गए हैं, इससे फेक कंटेंट बढ़ रहा है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के आने के बाद इसका प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। ये सबसे बड़ी चुनौती है।

दूसरा, मेरे विचार में आज के दौर में ग्राउंड रिपोर्टिंग से दूरी बढ़ती जा रही है और डेस्कटॉप रिपोर्टिंग बढ़ रही है। ऐसे में हमें जमीन पर वापस जाने यानी ग्राउंड रिपोर्टिंग करने की जरूरत है। जमीनी स्तर पर क्या हो रहा है, उस हकीकत से पब्लिक को रूबरू कराना है। हमें डेस्कटॉप पत्रकारिता यानी प्रेस विज्ञप्ति की पत्रकारिता को छोड़कर जमीनी स्तर की पत्रकारिता करने की जरूरत है। धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही मीडिया की विश्वसनीयता को यदि पुन:स्थापित करना है तो मैं समझता हूं कि हमें पत्रकारिता के मूल्यों को फिर से स्थापित करना होगा।

आज के दौर की पत्रकारिता की तुलना यदि पुराने समय की पत्रकारिता से करें तो आपकी नजर में इसमें कितना बदलाव आया है?

जैसा कि मैंने अभी कहा कि पत्रकारिता में सबसे बड़ा बदलाव तो टेक्नोलॉजी का आया है। पहले हम लोग टाइपराइटर पर काम करते थे, हाथ से लिखते थे, लेकिन अब मोबाइल/कंप्यूटर आ गया है। यानी टेक्नोलॉजी के स्तर पर काफी बड़ा परिवर्तन आया है। आज मैं बोलकर खबरें लिखवा सकता हूं। अपने प्लेटफॉर्म के माध्यम से हजारों लोगों तक पहुंच सकता हूं। लेकिन इस टेक्नोलॉजी ने हमें कंफर्ट जोन में भी डाल दिया है। अब हम रिसर्च की जगह इंटरनेट पर सर्च करने लगे हैं। ज्यादातर पत्रकार अपने घरों अथवा वातानुकूलित ऑफिस में बैठकर पत्रकारिता कर रहे हैं। मेरी नजर में इसे पत्रकारिता नहीं कहते हैं। पत्रकारिता के लिए आपको जमीन पर उतरना होगा यानी ग्राउंड रिपोर्टिंग पर जोर देना होगा। मैं एक हार्डकोर पत्रकार रहा हूं। मेरा मानना है कि जब तक आप ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं करेंगे, जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होंगे, तब तक आप सही मायने में सच्चाई को, तथ्यों को जनता तक नहीं पहुंचा पाएंगे। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप जमीनी स्तर पर पत्रकारिता करें। कहने का मतलब टेक्नोलॉजी के प्रभाव से पत्रकारिता में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू शामिल हो गए हैं। सकारात्मकता की बात करें तो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से चीजें काफी सुगम हो गई हैं। हम लाखों/करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं, वहीं नकारात्मकता की बात करें तो इस टेक्नोलॉजी ने कहीं न कहीं हमें जमीनी स्तर की पत्रकारिता से दूर भी कर दिया है। मेरे हिसाब से आज के दौर की पत्रकारिता के लिए यह बड़ी चुनौती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों फेक न्यूज के प्रति गंभीर चिंता जताते हुए फैक्ट चेकिंग पर जोर दिया है, इस बारे में आपकी क्या राय है?

फेक न्यूज का मुद्दा हर जगह चिंता का विषय बना हुआ है। मोदी जी ही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने भी इस पर चिंता जताई है। आम पाठक के दिल में भी अक्सर यह सवाल रहता है कि वह जो कंटेंट पढ़/देख रहा है, वह सच है या फर्जी है। तो विश्वसनीयता को लेकर ये जो चुनौती है, वह स्थापित मीडिया घरानों के लिए तो खासतौर पर बहुत बड़ी चुनौती है। लोगों को यह विश्वास दिलाना बहुत बहुत जरूरी है कि उन्हें मिलने वाला कंटेंट फैक्ट की दृष्टि से पूरी तरह सही है। मेरे लिए ये चिंताएं पूरी तरह जायज हैं और इन चिंताओं को दूर करने के लिए हमें एक्टिविस्ट की नहीं फैक्टिविस्ट की जरूरत है। यानी तथ्यों पर फोकस करने और उन्हें स्थापित करने की बहुत जरूरत है।

नए दौर में पत्रकारिता की तमाम नई विधाएं शुरू हो रही हैं। आपकी यूनिवर्सिटी ने ही फिल्म पत्रकारिता समेत कई नए कोर्स शुरू किए हैं। इसके बारे में कुछ बताएं।

हमने फिल्म पत्रकारिता, ग्रामीण पत्रकारिता, मोबाइल पत्रकारिता और सोशल मीडिया मैनेजमेंट समेत कई नए पत्रकारिता पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। ग्रामीण पत्रकारिता पाठ्यक्रम शुरू करने का मकसद यह है कि आज अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों के साथ समझौता हो चुका है। वहां पत्रकारिता के प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है। इसलिए उनकी सुविधा के लिए यह कोर्स शुरू किया गया है। दूसरा, मोबाइल पत्रकारिता की बात करें तो तमाम लोगों को लगता है कि आज के दौर में यदि उनके पास मोबाइल है, तो वे पत्रकार बन सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए हमने मोबाइल पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू किया है। भोपाल परिसर में उन्हें हफ्ते में पांच दिन शाम के समय दो घंटे की क्लास में मोबाइल पत्रकारिता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों से वाकिफ हो सकें। इसे पार्टटाइम कोर्स की तरह किया जा सकता है। मेरा मानना है कि पत्रकारिता में प्रशिक्षण बहुत आवश्यक है। इसी उद्देश्य के साथ इन पाठ्यक्रमों को शुरू किया गया है। 

समय के साथ टेक्नोलॉजी समेत बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। ऐसे में समय के साथ कदमताल मिलाने के लिए आपके विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में किस प्रकार के बदलाव किए गए हैं, जिससे विद्यार्थी आज के दौर की पत्रकारिता के लिए खुद को पूरी तरह तैयार कर सकें?

हमने आठ नए पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। पिछले साल ही हमने विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ सिनेमा स्टजीज यानी सिनेमा अध्ययन विभाग का गठन किया है। इससे ओटीटी जैसी टेक्नोलॉजी के बारे में पढ़ाया जा रहा है। अब हमारे पास न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी का भी डिपार्टमेंट है। वहां हम एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स, वर्चुअल रियलिटी, ऑगमेंटेड रियलिटी (ऑगमेंटेड रियलिटी वर्चुअल रियलिटी का ही दूसरा रूप है, इस तकनीक में आपके आसपास के वातावरण से मेल खाता हुआ एक कंप्यूटर जनित वातावरण तैयार किया जा सकता है।) पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा ग्राफिक्स और एनिमेशन का हमारा बहुत ही लोकप्रिय पाठ्यक्रम जो बंद हो गया था, उसे मैंने फिर शुरू करवाया है। मेरा मानना है कि इस तरह के कोर्स एक तो नई टेक्नोलॉजी के बारे में अवगत कराते हैं, दूसरा रोजगार के विकल्पों में भी इजाफा करते हैं। अब हम पारंपरिक मीडिया के साथ मीडिया के बदलते आयामों यानी इंडस्ट्री की जरूरतों को देखते हुए उसके हिसाब से विद्यार्थियों को तैयार कर रहे हैं।

कोविड के बाद दुनिया में काफी चीजें बदल गई हैं। अब जब कोविड का इतना खतरा नहीं रहा है, तो क्या आपका विश्वविद्यालय कोविड पूर्व के ढर्रे पर लौट आया है? इसके अलावा कोविड के दौर से सीख लेते हुए आपने अपने विश्वविद्यालय में किस तरह की नई व्यवस्थाएं की हैं?

कोविड के बाद बहुत सारी नई बातें आ गई हैं। राष्ट्रीय शिक्षानीति को अमलीजामा पहनाने वाले पहले विश्वविद्यालयों में हम हैं। नए-नए तमाम पाठ्यक्रम कोविड के बाद ही शुरू हुए हैं। कोविड के बाद स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर मीडिया पहले से ज्यादा जागरूक हो गई है, ऐसे में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी समाजोन्मुखी पत्रकारिता की दिशा में हम बहुत ज्यादा काम कर रहे हैं। हम विद्यार्थियों को नई टेक्नोलॉजी से तैयार कर रहे हैं। काफी सारा कंटेंट हम उन्हें ऑनलाइन माध्यम से भी उपलब्ध करा रहे हैं। बहुत सारे कोर्सेज करवा रहे हैं। हमने जेनरिक इलेक्टिव कोर्स शुरू किया है, जिसमें विद्यार्थी सिर्फ पत्रकारिता की पढ़ाई ही नहीं करता, बल्कि उसके साथ-साथ पर्सनालिटी डेवलपमेंट और साइकोलॉजी समेत बहुत सारे विषयों पर जोर दिया जाता है। ताकि पठन-पाठन के साथ विद्यार्थियों का व्यक्तित्व विकास भी बेहतर हो सके। अब हमने एनसीसी को भी कोर्स का हिस्सा बना दिया है। हम बाकायदा इसके नंबर भी विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम में शामिल करते हैं। हम जमीन से जोड़कर, समाज से जोड़कर नई पीढ़ी के पत्रकारों को तैयार कर रहे हैं।

विभिन्न पत्रकारिता विश्वविद्यालयों से निकल रहे नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे? उन्हें कामयाबी का क्या मूलमंत्र देंगे?

मैं यही कहूंगा कि उन्हें मल्टीटास्कर बनना होगा। यदि आज के समय में कोई यह सोचे कि मैं प्रिंट का पत्रकार बनूंगा, अथवा टीवी का पत्रकार बनूंगा, तो मुझे लगता है कि वह अपने आपको पत्रकारिता के लिए पूरी तरह तैयार नहीं कर पा रहा है। हमें मल्टीटास्किंग पर फोकस करना होगा। यानी हमें लिखने की क्षमता पर भी काम करना है, बोलने की क्षमता पर भी काम करना है। सोशल और डिजिटल मीडिया पर प्रभावी रूप से काम करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी। इसके अलावा अध्ययनशीलता और स्टोरीटेलिंग पर खास ध्यान देना होगा। आज के दौर में विज्ञापनों में भी स्टोरीटेलिंग पर काफी जोर दिया जा रहा है। यानी आप एक अच्छी खबर को अच्छी कहानी की तरह किस तरीके से चित्रों के माध्यम से यानी विजुअल तरीके से पाठकों/श्रोताओं/दर्शकों को आकर्षित कर सकते हैं, यह काफी जरूरी बन गया है। इसके लिए भाषा पर अच्छी पकड़ होना बहुत जरूरी है। साहित्य का अध्ययन बहुत जरूरी है।

इन सबके अलावा मेहनत बहुत जरूरी है। ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलना-जुलना और मेहनत करना बहुत जरूरी है। मेरी नजर में पत्रकारिता वातानुकूलित कमरे में बैठकर करने वाला अथवा दस से छह बजे वाला जॉब नहीं है। इस तरह की मानसिकता हर विद्यार्थी को तैयार करनी पड़ेगी, तभी वह अच्छा पत्रकार बन पाएगा।


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