इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जाने-माने पत्रकार और अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) में एग्जिक्यूटिव एडिटर डॉ. अनिल सिंह ने मीडिया से जुड़े तमाम अहम पहलुओं को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। डॉ. अनिल सिंह के साथ हुई इस बातचीत के प्रमुख अंश आप यहां पढ़ सकते हैं:
सबसे पहले आप अपने बारे में बताएं। यानी आपका प्रारंभिक जीवन कैसा रहा, पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई और मीडिया में कैसे आए?
मैं मूलत: सिवान (बिहार) का रहने वाला हूं। शुरुआती पढ़ाई-लिखाई बिहार से करने के बाद मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में बीए (ऑनर्स), फिर एमए और एमफिल करने के बाद यहीं से पीएचडी की है। फिर मैंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की। इसके बाद नौकरी की तलाश शुरू की। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर उन दिनों ‘दूरदर्शन’ पर एक कार्यक्रम को होस्ट करते थे। ‘दूरदर्शन’ के लिए आधा घंटे का यह कार्यक्रम ‘एशिया पैसिफिक कम्युनिकेशन एसोसिएट’ कंपनी बनाती थी। मैंने इस कंपनी में करीब छह महीने काम किया और पत्रकारिता की बारीकियां सीखीं।
इसके बाद मुझे ‘जी न्यूज’ (Zee News) में काम करने का मौका मिला और यहीं से एक टीवी पत्रकार के रूप में मेरी पहचान बनी। इसके बाद जब ‘आजतक’ (AajTak) लॉन्च हुआ तो मैंने वहां भी काम किया। इसके बाद भारत में ‘स्टार न्यूज’ (अब एबीपी न्यूज) आया और उसकी नई टीम बनी, जिसका मैं भी हिस्सा बना और लंबे समय तक वहां अपनी जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद मैं वापस ‘आजतक’ में एडिटर बनकर आया और काफी काम किया।
फिर यहां से संपादक के रूप में मैं ‘न्यूज24’ (News24) आ गया और अब मैं ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एग्जिक्यूटिव एडिटर के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं। मैं अब तक करीब सात किताबें लिख चुका हूं। मैं देश के कई उच्च शिक्षण संस्थानों के बोर्ड ऑफ गवर्नर के रूप में भी जुड़ा रहा हूं। इन दिनों मैं ‘विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज’ (VIPS) के बोर्ड ऑफ गवर्नर में शामिल हूं, जिसे NAAC की मान्यता मिली हुई है और जिसमें हजारों विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
मीडिया में आप लंबे समय से हैं और आपने इसे काफी करीब से देखा है। तब से लेकर अब तक मीडिया में काफी बदलाव हुए हैं। इन बदलावों को आप किस रूप में देखते हैं?
पहले मीडिया की एक भूमिका हुआ करती थी, लेकिन आज के समय में यह भूमिका गुम सी गई है। मुझे याद है कि जब मैं कॉलेज में पढ़ता था, उस समय पत्रकारिता का एक दौर था। उस समय मीडिया में साहित्य नजर आता था। ऐसा लगता था कि साहित्य का बोलबाला है। उसके बाद न्यूज का एजेंडा बदल गया और साहित्यिक से राजनीतिक हो गया। काफी पुरानी बात है, जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी की रथयात्रा निकल रही थी, उस समय वरिष्ठ टीवी पत्रकार एसपी सिंह ने संपादकीय लिखा कि यह रथ कहीं को नहीं जाता है। उस संपादकीय पर काफी बवाल हुआ था। फ्रंट पेज की जो शैली थी, वह एसपी सिंह ने बदलकर रख दी।
प्रिंट मीडिया से मेरा ज्यादा संपर्क नहीं रहा है, सिर्फ मैंने सुना है। मैंने टीवी को बेहतर तरीके से देखा है और अनुभव किया है। समय के साथ टेलिविजन पत्रकारिता के स्वरूप भी बदलते रहे हैं। आज के संदर्भ में टीवी चैनल्स की खबरें सिर्फ एक धारा की तरफ जा रही हैं। दूसरे प्रवाह के लिए किसी भी न्यूज चैनल्स में जगह नहीं है। यदि आप एक धारा की दिशा में प्रवाहित हो रहे हैं तो आप बने रहेंगे और यदि आप उस धारा के विपरीत जा रहे हैं तो आपके ऊपर अंकुश लग सकता है। आज के दौर में टीवी इंडस्ट्री की स्थिति दो-तीन कारणों से दयनीय है। एक तो टेलिविजन की ‘गरीबी’ खबरों को लेकर है।
मुझे याद नहीं आ रहा है कि पिछले आठ वर्षों में किसी टीवी चैनल का संपादक कहे कि मैंने ये खबर ब्रेक की है। किसी के पास ब्रेक करने के लिए कोई खबर है ही नहीं। सारे चैनल्स रूटीन वर्क में वही चीज कर रहे हैं, जो उन्हें करने के लिए कहा जा रहा है। अपना जजमेंट, अपना वैल्यू एडिशन चैनल्स की खबरों में बिलकुल ही बंद हो गया है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि तमाम चैनल्स की आर्थिक स्थिति सोचनीय और दयनीय है। दरअसल, चैनल्स की आमदनी सिंगल विंडो यानी सिर्फ एडवर्टाइजमेंट पर आधारित है।
विज्ञापन के माध्यम से जो रेवेन्यू आ सकता है, वही रेवेन्यू चैनल की आमदनी है। करीब 90 प्रतिशत चैनल्स अपनी लागत को निकाल भी नहीं पाते हैं। सिर्फ दस प्रतिशत बड़े चैनल ही बड़ी मुश्किल से अपनी कॉस्ट को निकाल पा रहे हैं। इन दस प्रतिशत में भी चार-पांच चैनल्स ही ऐसे हैं, जो प्रॉफिट में हैं। बाकी सारे टीवी चैनल्स सीधे या अप्रत्यक्ष तरीके से घाटे में चल रहे हैं। अब घाटे में जो व्यक्ति बिजनेस कर रहा है, उसकी दशा क्या होगी, क्या वो कहीं खड़ा हो सकता है, वो क्या पत्रकारिता के साथ न्याय कर सकता है, क्या वह राज्य का चौथा स्तंभ बन सकता है? आज जो टेलिविजन की पत्रकारिता है, वह इसी दौर से गुजर रही है।
आज के दौर में फेक न्यूज काफी तेजी से फैल रही है। हालांकि, पीआईबी समेत तमाम मीडिया संस्थानों ने अपनी फैक्ट चेकिंग टीम भी बना रखी है। आप इसे किस रूप में देखते हैं और आपकी नजर में फेक न्यूज पर किस तरह लगाम लग सकती है?
देखिए, दो बातें हैं। ये जो दौर है, टेलिविजन के साथ-साथ एक नई परंपरा का जन्म हुआ है, जिसे हम वेब न्यूज कह रहे हैं या वेबसाइट न्यूज कह रहे हैं, इस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। टीवी चैनल्स के रिपोर्टर्स सीमित हैं और वह पढ़कर और प्रशिक्षण लेकर इसमें आ रहे हैं। उन्हें पता है कि खबर क्या है, लेकिन आज के दौर में सोशल मीडिया के माध्यम से लगभग हर व्यक्ति ‘रिपोर्टर’ है। व्यक्ति को जो लग रहा है, वह उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहा है। फिर चाहे वह खबर हो या न हो। दरअसल, सोशल मीडिया को जिस तरह से विस्तार हुआ है, वह फेक न्यूज का बड़ा कारण है। ये सिटीजन रिस्पॉन्सिबिलिटी का सवाल है।
मेरा अनुमान है कि सिर्फ एक प्रतिशत फेक न्यूज ही स्थापित चैनल्स द्वारा फैलाया जाता होगा, लेकिन 99 प्रतिशत फेक न्यूज सोशल मीडिया के माध्यम से समाज में फैलाया जा रहा है और जहर के रूप में चारों तरफ फैल रहा है। अब जब समाज ही ऐसी खबर को फैला रहा है तो कौन सी संस्था इसे नियंत्रित करेगी? इसे न पीआईबी और न पुलिस नियंत्रित कर सकती है। इसे सिर्फ शिक्षा ही नियंत्रित कर सकती है। अगर हमारा समाज शिक्षित हो रहा है और समाज में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ रहा है, तो लोग इस बात को तय करेंगे कि यह गलत हैं, ये फेक न्यूज हैं और इनसे दूर रहा जाए।
इस तरह के आरोप भी लगते हैं कि तमाम फैक्ट चेकिंग टीम की भी कई खबरें गलत होती हैं, तो वह फैक्ट चेक क्या करेंगी। इस बारे में आप क्या कहेंगे?
जैसा मैंने अभी कहा कि सरकार या पीआईबी इस दिशा में सिर्फ खानापूर्ति करती हैं। हालांकि, सरकार अपनी तरफ से मॉनीटरिंग की व्यवस्था करती है, लेकिन फेक न्यूज सोशल मीडिया के माध्यम से आ रही हैं। अब आप ये मत समझिए कि सोशल मीडिया सिर्फ एक दूसरे से जुड़ने या दोस्ती का फोरम है, उसमें काफी खराब चीजें आ रही हैं। उसमें तमाम लोग अपना बिजनेस भी चला रहे हैं। यानी, उसमें हर तरह की गतिविधियां हो रही हैं। ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रही फेक न्यूज पर लगाम लगाना काफी मुश्किल है।
सरकार ने नए आईटी नियमों में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया है। इन प्रस्तावों में कहा गया है कि यदि पीआईबी की फैक्ट चेक टीम किसी खबर को फेक न्यूज पाती है, तो सोशल मीडिया कंपनी को वह न्यूज अपने प्लेटफॉर्म से हटानी होगी। इस प्रस्ताव का तमाम स्तर पर विरोध हो रहा है। कहा जा रहा है कि इस तरह मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित होगी, इस पर आपका क्या कहना है?
सरकार जो भी नियम बना रही है, उसे सशक्तीकरण के साथ लागू करना होगा। इस तरह की न्यूज को नियंत्रित करने के लिए पहले भी कानून बने हैं। चूंकि, इन नियमों का कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं हो पा रहा, इसलिए दूसरे नियम की आवश्यकता पड़ी। जो नए नियम बने हैं, उन्हें भी यदि ठीक ढंग से लागू नहीं किया गया तो यह समस्या जारी रहेगी। यदि पहले और अब के कानून को सही ढंग से कार्यान्वित किया जाए तो चेक एंड बैलेंस की बात सोची जा सकती है।
मीडिया की क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में है। तमाम चैनल्स पर पक्षपातपूर्ण होने अथवा खबरों को सनसनीखेज बनाकर पेश करने के आरोप लगते रहते हैं, उस पर क्या कहेंगे?
जैसा कि मैंने थोड़ी देर पहले कहा कि करीब 90 प्रतिशत चैनल्स घाटे में चल रहे हैं। अब ऐसे चैनल्स के मालिकों में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह किसी के सामने मजबूती से खड़े हो सकें, क्योंकि उनका धंधा ही घाटे में चल रहा है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि वह दबाव में आएंगे ही। यहां मैं राजनीतिक दबाव की बात कर रहा हूं। ऐसे में वह कहां से निष्पक्ष खबरें दिखाएंगे। आप देखिए कि अगर कोई चैनल आज प्रॉफिट में है, तो उस पर सरकार अथवा किसी संस्था का दबाव बहुत कम हो पाता है। वे किसी की गैरजरूरी बात नहीं सुनते हैं। अगर वह स्वयं ही भक्ति में लीन हो जाएं तो और बात है, नहीं तो दबाव के कारण ऐसे चैनल्स, जो प्रॉफिट में हैं, वह किसी के पिछलग्गू नहीं हो सकते हैं।
आप तमाम चैनल्स में प्रमुख पदों पर रहे हैं और वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ में एग्जिक्यूटिव एडिटर के पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। क्या आपको लगता है कि न्यूजरूम्स दबावों से मुक्त रह पाते हैं अथवा उन्हें किसी न किसी रूप में, जैसे-किसी खबर को चलवाने अथवा रुकवाने में दबाव का सामना करना पड़ता है?
यह बड़ा माइक्रोलेवल का सवाल है कि किस तरह के दबाव आते हैं। मेरा मानना है कि दबाव किसी खबर को रोकने अथवा चलाने के लिए नहीं आता है। एक नैतिक दबाव भी होता है कि अगर हम ये खबर दिखाएंगे या नहीं दिखाएंगे तो लोग क्या कहेंगे। कहने का मतलब है कि कई बार खबरों के साथ इस डर की वजह से न्याय नहीं हो पाता है। मेरा मानना है कि सरकार कभी नहीं कहती कि हमारी भक्ति कीजिए, तमाम चैनल्स अपनी लॉयल्टी सिद्ध करने के लिए खुद भक्त बनकर अपने आप को प्रदर्शित करने के लिए उतावले हो जाते हैं।
टीवी चैनल्स की टीआरपी को लेकर विवाद उठता रहता है। कई चैनल्स ने तो टीआरपी मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं और तमाम चैनल्स ने इससे हटने की बात कही है, इसे रूप में देखते हैं?
टीआरपी इस समय का ऐसा मैकेनिज्म है, जो एडवर्टाइजिंग में एक रेगुलेटर की भूमिका निभाता है। किस चैनल को कितना विज्ञापन देना चाहिए, यह विज्ञापन एजेंसियों इसी टीआरपी के आधार पर देती हैं। यानी टीआरपी उनके लिए एक पैमाना होता है कि इस आधार पर किस चैनल को कितना विज्ञापन देना है। यानी विज्ञापन लेने के लिए टीआरपी एक माध्यम बना हुआ है।
आपने देश के सामाजिक, राजनीतिक और रक्षा संबंधी मुद्दों पर सात किताबें लिखी हैं। क्या फिलहाल किसी नई किताब पर काम कर रहे हैं या यूं कहें कि क्या पाठकों को जल्द ही आपकी कोई नई किताब पढ़ने को मिलेगी?
मेरा लेखन तो हमेशा जारी रहता है। मैंने जो भी लिखा है, वह अपने दिमाग और दिल की आवाज पर लिखा है। कहीं से देखी हुई अथवा कहीं से कंटेंट उठाकर लिखी हुई किताबें नहीं हैं। जैसे मैंने एक किताब 'Military and Media' लिखी है, ऐसी किताब दूसरी आपको कहीं पढ़ने को नहीं मिलेगी। वहीं, प्रधानमंत्री के ऊपर एक किताब लिखी है। यह प्रधानमंत्री के ऊपर लिखी गई पहली किताब थी। देश में इससे पहले प्रधानमंत्री के ऊपर कोई किताब नहीं लिखी गई थी।
भारत में जो राजनीतिक उथल-पुथल हुई है और राजनीति का जो स्वरूप बदला है, उसे लेकर दिमाग में काफी कुछ चल रहा है। नई परिसीमन आई हैं, मैं उन चीजों को देख रहा हूं, समझ रहा हूं और नए परिप्रेक्ष्य में कुछ करने की कोशिश हो रही है, ताकि कोई नई चीज दी जाए। नई किताब आने में कुछ समय लगेगा, मैं चाह रहा हूं कि 2024 का चुनाव देख लूं, उसके बाद नई किताब लिखूं।
डिजिटल आजकल काफी तेजी से पैर पसार रहा है। ऐसे माहौल में टीवी चैनल्स को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने और दर्शकों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने की जरूरत है?
डिजिटल का फैलाव काफी बढ़ रहा है और इसलिए बढ़ रहा है कि अब वो दस साल पहले वाला माहौल नहीं रहा कि घर में आप टीवी देखेंगे। आज के दौर में लगभग हर जेब में ‘टीवी’ है। मोबाइल के माध्यम से आप कहीं पर भी टीवी देख सकते हैं। डिजिटल की वजह से व्यक्ति खबरों को हर समय कहीं पर भी एक्सेस कर पा रहा है। घर में जब आप टीवी देखते हैं तो उसके लिए मल्टीसिस्टम ऑपरेटर्स या केबल टीवी के लिए भुगतान करना पड़ता है, लेकिन मोबाइल में ऐसा नहीं है। अब ये सवाल है कि डिजिटल पर खबर कहां से आ रही है तो टीवी चैनल्स पर जो चल रहा है, उसी को कस्टमाइज करके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिया जा रहा है। और डिजिटल प्लेटफॉर्म खबरों को आम आदमी तक पहुंचा रहा है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच पर टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि हेट स्पीच फैला रहे न्यूज चैनल्स और न्यूज एंकर्स के खिलाफ भी कदम उठाए जाने चाहिए, इस बारे में आपका क्या कहना है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान होना चाहिए। यदि सुप्रीम कोर्ट किसी चीज का संज्ञान ले रहा है, तो वह इस पर अधिसूचना भी जारी कर सकता है। सरकार अथवा संबंधित नोडल एजेंसी को कार्रवाई करने के लिए निर्देश दे सकता है। ये जुडिशियरी का नैतिक कर्तव्य बनता है कि वह सिर्फ कहे नहीं, बल्कि उस पर एक्शन भी ले।
कोरोना के दौर में जब तमाम लोग घरों में ‘बंद’ थे, उस दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ गई थी। अब जबकि कोरोना जा चुका है, हालांकि खतरा अभी भी है, लेकिन आपको क्या लगता है कि टीवी व्युअरशिप का वह आंकड़ा फिर छू पाएगा, जो उसने कोरोना काल में छुआ था?
कोरोना के दौर में तमाम लोग घरों में थे और उनके पास टीवी के अलावा एंटरटेनमेंट और सूचनाएं प्राप्त करने का कोई और विकल्प नहीं था। उस समय जाहिर सी बात है कि लोग टीवी देख रहे थे और उस वजह से टीआरपी बढ़ी। लेकिन अब लोग घरों से बाहर निकले हैं और इनमें टीवी के वह दर्शक भी शामिल हैं और वे मोबाइल लेकर निकल रहे हैं। ऐसे में वह खबरें अथवा एंटरटेनमेंट के लिए मोबाइल का सहारा ले रहे हैं, जिससे टीवी देखने के समय की हिस्सेदारी बंट रही है।
पत्रकारिता में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं अथवा नवोदित पत्रकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे, सफलता का कोई ‘मूलमंत्र’ जो आप देना चाहें?
आजकल पत्रकारिता में जो युवा आ रहे हैं, वह पुराने लोगों से कई मायनों में ज्यादा सक्षम हैं। उन पर देश का भविष्य टिका हुआ है और उनसे काफी उम्मीदें हैं। मुझे लग रहा है कि हमारी पीढ़ी से ज्यादा तीव्रता से नई पीढ़ी काम कर रही है। चीजों को सीख रहे हैं और अपना करियर बना रहे हैं औऱ देश को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं। हालांकि, कुछ कमी रहती है, तो वे उसे दूर भी कर रहे हैं।
अब ट्रेडिशनल जर्नलिज्म का दौर खत्म हो चुका है, ये इंस्टैंट जर्नलिज्म का दौर है। एक समय था जब 200 शब्दों में स्टोरी लिखनी होती थी। फिर वह 200 शब्द सिमटकर 20 शब्दों पर आ गया, जिसे अब एंकर कहा जाता है। अब वह 20 शब्द भी घटकर एक वाक्य में आ गया है। यानी अब आपको ऐसी हेडलाइन देनी है, जिसे पढ़ते ही लोग समझ जाएं कि खबर क्या है, इसलिए यह इंस्टैंट जर्नलिज्म का दौर है।