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'28 वर्षों की मेहनत और बदलाव की दिल छू लेने वाली दास्तान है The Midwife’s Confession’
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ पाराशर और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ (BBC World Service) की इन्वेस्टिगेटिव यूनिट ‘बीबीसी आई’ (BBC Eye) ने मिलकर ‘The Midwife’s Confession’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है।
पंकज शर्मा 1 year ago
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ पाराशर और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ (BBC World Service) की इन्वेस्टिगेटिव यूनिट ‘बीबीसी आई’ (BBC Eye) ने मिलकर ‘The Midwife’s Confession’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है। यह डॉक्यूमेंट्री बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में नवजात बच्चियों की हत्या (infanticide) जैसी सामाजिक बुराई को उजागर करती है।
इस डॉक्यूमेंट्री में अमिताभ पाराशर ने ऐसी कई दाइयों के जीवन को भी दिखाया है, जो पहले नवजात बच्चियों की हत्या करती थीं, लेकिन बाद में उन्होंने ऐसी बच्चियों को बचाना शुरू किया। यह डॉक्यूमेंट्री लगभग तीन दशकों की कहानी है, जिसमें इन दाइयों की सोच और जीवन में आए परिवर्तन को दिखाया गया है।
हाल ही में ‘ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन’ (BBC) के दिल्ली स्थित ब्यूरो में इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रखी गई थी। इस दौरान समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में अमिताभ पाराशर ने इस डॉक्यूमेंट्री के पीछे की प्रेरणा, इसके निर्माण के दौरान आईं चुनौतियां और उन दाइयों के अनुभवों को शेयर किया। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
इस तरह के सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाने की प्रेरणा कहां से मिली और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
मैं बिहार के एक गांव का रहने वाला हूं। मेरी शुरुआती शिक्षा भी गांव के स्कूल में हुई। मैंने अपने आसपास समाज में बहुत सी विसंगतियां देखीं जैसे-जात-पात और लड़कियों के प्रति दुर्भावना आदि। चूंकि मेरे माता-पिता शिक्षित और जागरूक थे, इस वजह से मुझे इन सामाजिक समस्याओं का अहसास हुआ। शायद यही चीजें मेरे भीतर कहीं गहराई तक छुपी थीं, जो बाद में बाहर आईं। पत्रकार होने के नाते मेरे अंदर सच को जानने की गहरी इच्छा थी। इन कारणों से ही मैंने इस संवेदनशील मुद्दे पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया।
इस तरह के संवेदनशील सामाजिक मुद्दे पर डॉक्यूमेंट्री बनाते समय आपको किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
मेरे सामने चुनौतियां बहुत थीं। सबसे बड़ी चुनौती विषय की गंभीरता और हृदय विदारक घटनाएं थीं। जब मैं खुद पिता बना और अपने बच्चे को गोद में लिया तो मैं बहुत भावुक हो गया। उसी समय मैंने इस मुद्दे की गहराई को महसूस किया। यह जानना कि कैसे लोग मासूम बच्चियों की हत्या कर देते हैं, मेरे लिए झकझोर देने वाला अनुभव था। दूसरा चैलेंज था सीमित संसाधनों में काम करना। इस प्रोजेक्ट को मैंने और मेरी पत्नी ने पूरी तरह से अपने पैसे से आगे बढ़ाया। तीसरी चुनौती यह थी कि कहानी को सही तरीके से गढ़ा जाए ताकि यह केवल मुद्दा न लगे, बल्कि एक स्टोरी की तरह सामने आए।
फिल्म निर्माण के दौरान कोई ऐसी खास घटना, जिसने आपको झकझोरा हो?
ऐसी कई घटनाएं थीं, लेकिन एक घटना विशेष रूप से मुझे आज भी याद है। बिहार में एक महिला को सिर्फ इसलिए बाथरूम में तीन साल तक बंद करके रखा गया था, क्योंकि उसने बेटी को जन्म दिया था। उसकी हालत इतनी बुरी हो गई थी कि उसकी खुद की बेटी भी उसे पहचानने से इनकार कर रही थी। इस तरह की घटनाएं आपको अंदर तक झकझोर देती हैं और महसूस कराती हैं कि इस मुद्दे पर काम करना कितना जरूरी है।
डॉक्यूमेंट्री के दौरान क्या आपको लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव देखने को मिला?
तुरंत बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल है, लेकिन बीबीसी के साथ काम करने से हमें विश्वास मिला कि हमारा काम सही दिशा में है। शुरू में, सिर्फ मैं और मेरी पत्नी ही इस प्रोजेक्ट पर विश्वास करते थे। जब बीबीसी साथ आया, तो चीजों ने रफ्तार पकड़ी। अब लोग इस मुद्दे पर बात करने लगे हैं और कुछ लोग दहेज न लेने की शपथ भी ले रहे हैं। इससे हमें उम्मीद है कि समाज में धीरे-धीरे बदलाव आएगा।
इस फिल्म से समाज में लड़कियों के प्रति सोच बदलने की कितनी उम्मीद है?
मुझे पूरी उम्मीद है कि फिल्म देखने के बाद लोग सोच में बदलाव लाएंगे। हमने देखा है कि अब लोग बेटियों को बचाने और पढ़ाने के अभियान की जरूरत को समझने लगे हैं। हालांकि, यह सच है कि समाज में अभी भी भेदभाव मौजूद है, जिसे बदलने के लिए हमें अपनी मानसिकता में बड़ा बदलाव लाना होगा।
’बीबीसी’ तक पहुंचने की कहानी क्या रही?
मेरी एक परिचित ’बीबीसी’ में काम करती हैं। उन्होंने हमारी फुटेज को देखा और अपनी टीम से संपर्क किया। जब बीबीसी की टीम ने यह प्रोजेक्ट देखा तो वे लोग तुरंत उत्साहित हो गए और हमारा साथ देने के लिए तैयार हो गए।
क्या भविष्य में इसी तरह के किसी अन्य सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाने की योजना है?
जी, हम भविष्य में भी सामाजिक मुद्दों पर काम करना चाहते हैं। समाज में मुद्दों की कोई कमी नहीं है और हम उन्हें उजागर करने के लिए तत्पर हैं।
इस फिल्म को बनने में कितना समय लगा और यह लोगों को कहां देखने को मिलेगी?
इस फिल्म को बनने में लगभग 28 साल लगे। फिल्म 63 मिनट लंबी है और इसमें 28-30 साल पुराने मामलों को भी शामिल किया गया है। यह फिल्म यूट्यूब पर और ‘बीबीसी’ की वेबसाइट पर देखने को मिलेगी।
फिल्म में कई दाइयों ने नवजात बच्चियों को मारने की बात कबूली है। आपने इन दाइयों को कैमरे के सामने आने और स्वीकारोक्ति के लिए किस तरह तैयार किया?
यह बहुत मुश्किल काम था, लेकिन धीरे-धीरे उनके साथ विश्वास बनाकर यह संभव हुआ। पहली बार में वे कैमरे के सामने आने से हिचकिचा रही थीं, लेकिन जब उन्होंने हमारी टीम के ऊपर भरोसा किया तो उन्होंने खुलकर अपने अनुभव साझा किए।
इस डॉक्यूमेंट्री को आप इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।
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