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दो देशों के बीच संबंधों को और मजबूत बनाते हैं इस तरह के कदम: डॉ. रमाकांत द्विवेदी
जाने-माने लेखक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट डॉ. रमाकांत द्विवेदी की नई किताब ‘INDO-KYRGYZ RELATIONS CHALLENGES & OPPORTUNITIES’ ने हाल ही में मार्केट में ‘दस्तक’ दी है।
पंकज शर्मा 2 years ago
जाने-माने लेखक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट डॉ. रमाकांत द्विवेदी की नई किताब ‘INDO-KYRGYZ RELATIONS CHALLENGES & OPPORTUNITIES’ ने हाल ही में मार्केट में ‘दस्तक’ दी है। भारत-किर्गिस्तान गणराज्य के संबंधों को लेकर लिखी गई इस किताब को पिछले दिनों दिल्ली स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ में आयोजित एक कार्यक्रम में लॉन्च किया गया। इस किताब से जुड़े तमाम पहलुओं को लेकर डॉ. रमाकांत द्विवेदी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
सबसे पहले तो आप अपने बारे में बताएं कि आपका अब तक का सफर क्या व कैसा रहा है?
मैंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मध्य एशिया पर पीएचडी की है। पीएचडी के दौरान ही मुझे तीनमूर्ति हाउस के द्वारा नेहरू फेलोशिप प्रदान की गई। इसके फलस्वरूप मुझे करीब तीन साल तक उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में रहने का अवसर मिला। मैं ‘इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस’ (IDSA) में फेलो रहा हूं। इसके साथ ही ‘एकेडमी ऑफ साइंसेज‘ के इंस्टीट्यूट ‘अल बरूनी इंस्टीट्यूट ऑफ ओरियंटल स्टडीज’ (Al Beruni Instiute of Oriental Studies) में सीनियर रिसर्च फेलो रहा हूं। उस प्रवास के दौरान मुझे मध्य एशिया के तमाम प्रमुख शैक्षिक और रिसर्च संस्थानों में जाने और बातचीत करने का मौका मिला। इस तरह वहां के समाज, संस्कृति, साहित्य, राजनीति और अर्थव्यवस्था को जानने-समझने का अवसर मिला। इसके साथ ही मेरा पुस्तक लेखन का कार्य जारी है। यह मेरी आठवीं पुस्तक है, जो मैंने मध्य एशिया के देश किर्गिस्तान रिपब्लिक पर लिखी है।
अब अपनी इस किताब के बारे में हमें बताएं कि आखिर इसमें क्या खास है, कितने पेज हैं, पब्लिशर कौन है और कितने चैप्टर अथवा खंड हैं?
इस किताब को ‘पेंटागॉन प्रेस’ (Pentagon Press) ने पब्लिश किया है। मूल रूप से इस किताब में हमने तीन विषयों पर ज्यादा फोकस रखा है। एक सेक्शन भारत और किर्गिस्तान के बीच दिपक्षीय संबंधों (सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक आदि) पर है कि वर्तमान स्थिति क्या है और उसे कैसे विस्तृत रूप दिया जा सकता है। दूसरा सेक्शन मध्य एशिया की जियो पॉलिटिक्स पर है। खासकर, तालिबान द्वारा काबुल पर कब्जे के बाद वहां एक नई दिशा और नई दिशा बन रही है। उससे भारत के हितों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है। तमाम बड़े देश जैसे-चीन, रूस आदि किस तरह से अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इनका भी हमारे देश के हितों पर क्या पड़ रहा है और उन हितों की रक्षा के लिए हमें कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए, किताब में इसकी भी चर्चा है।
पुस्तक के तीसरे सेक्शन की बात करें तो इसमें नॉन ट्रेडिशनल सिक्योरिटी फैक्ट्स यानी अलकायदा, आईएसआईएस और आईएसकेपी जैसे आतंकी संगठनों की फाइनेंसियल सप्लाई लाइन क्या है, उनके विस्तार का क्षेत्र कौन सा है, जैसे तमाम प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है। उन उपायों पर भी चर्चा की गई है ताकि वे क्षेत्र की शांति को भंग न कर सकें और क्षेत्र के आर्थिक विकास में बाधा न बन सकें।
मध्य एशिया में कई देश हैं। खासकर पांच देशों- कजाखिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान की गिनती हमेशा होती है। ऐसे में आपने अपनी किताब के लिए किर्गिस्तान को ही क्यों चुना, इसके पीछे कोई खास वजह?
किर्गिस्तान रिपब्लिक मध्य एशिया का एक प्रमुख देश है। भारत के इस देश के साथ काफी अच्छे सांस्कृतिक संबंध हैं। वहां का प्रमुख ग्रंथ ‘मनास’ हमारे ग्रंथों के लगभग समान है। चीन से लगा हुआ देश है। यह एक इत्तेफाक है कि हमारी शुरुआत किर्गिस्तान से हुई है, जबकि हम मध्य एशिया के अन्य देशों पर भी किताब लिखना चाहते हैं। जल्द ही हम इन देशों पर भी किताब लेकर आएंगे। करीब 17 साल पहले हमने पूरे मध्य एशिया पर फोकस करती किताब लिखी थी। बदलती हुई सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों की लगातार समीक्षा करने के लिए आवश्यक है कि हम एक नियमित अंतराल पर अध्ययन करें, समीक्षा करें और हमारे हितों को वो कैसे प्रभावित कर रहे हैं, उसका विश्लेषण करें।
क्या आपको लगता है कि इस किताब से दोनों देशों के संबंधों में और मधुरता आएगी और ये पहले के मुकाबले ज्यादा प्रगाढ़ होंगे?
हमने ईमानदारी से यही प्रयास किया है। हमारे इस देश के साथ पहले से जो बेहतर संबंध हैं, उन संबंधों की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समीक्षा करते हुए वर्तमान में कौन-कौन सी चुनौतियां हैं और बदलती परिस्थितियों में हमें और क्या करने की आवश्यकता है, यह इस किताब में बताया गया है। हम अपने प्रयास में कितने सफल रहे हैं, यह हमारे पाठक बताएंगे। एक रिसर्चर के तौर पर मेरा मानना है कि दो-चार साल में हमें नियमित रूप से बदलती हुई परिस्थितियों का अध्ययन, मूल्यांकन और विश्लेषण करने के बाद फिर उसी के अनुसार आवश्यक कदम उठाने चाहिए। मेरा मानना है कि इस किताब से भारत और किर्गिस्तान के बीच संबंधों में और प्रगाढ़ता आएगी।
आपकी नजर में किताब के अलावा दो देशों के बीच संबंधों की मजबूती में और कौन-कौन से कारक अहम भूमिका निभा सकते हैं, क्या हमें उन कारकों के बारे में सोचकर अथवा उन्हें तलाशकर उन पर भी काम नहीं करना चाहिए?
मेरा मानना है कि नियमित रूप से मिलना-जुलना होता रहना चाहिए। सरकारी स्तर पर संपर्कों के अलावा सेमिनार, टूरिज्म, राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस आदि होते रहने चाहिए। इससे दोनों देशों को आपस में और अच्छे तरीके से जानने-समझने का अवसर मिलता है। इसलिए इस दिशा में लगातार काम होते रहना चाहिए।
आप अभी तक कई किताबें लिख चुके हैं। हाल ही में आपकी यह किताब आई है। क्या आप निकट भविष्य में कोई नई किताब लिखने की योजना बना रहे हैं। यदि हां तो वह किस बारे में होगी, क्या वह भी किसी अन्य देश से भारत के संबंधों को लेकर होगी?
हमारी अगली पुस्तक भारत और उज्बेकिस्तान के संबंधों पर होगी। उज्बेकिस्तान मध्य एशिया का बहुत ही महत्वपूर्ण देश है। पांचों देशों को देखेंगे तो यह सेंटर में आता है। इन सभी देशों से इसकी सीमाएं भी मिलती हैं। ऐसे में मैं अगली किताब भारत और उज्बेकिस्तान को लेकर लिखूंगा।
समाचार4मीडिया के साथ डॉ. रमाकांत द्विवेदी की इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।
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