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पत्रकार को सबसे पहले बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए: हितेश शंकर
वरिष्ठ पत्रकार और जानी-मानी साप्ताहिक राष्ट्रीय पत्रिका ‘पांचजन्य’ के संपादक हितेश शंकर ने मीडिया से जुड़े तमाम अहम पहलुओं को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।
पंकज शर्मा 3 years ago
वरिष्ठ पत्रकार और जानी-मानी साप्ताहिक राष्ट्रीय पत्रिका ‘पांचजन्य’ (PANCHJANYA) के संपादक हितेश शंकर ने मीडिया में हो रहे बदलाव, नई टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल, मीडिया की चुनौतियां और फेक न्यूज के बढ़ते खतरे समेत तमाम अहम पहलुओं को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश:
सबसे पहले आप अपने बारे में बताएं। यानी आपका प्रारंभिक जीवन कैसा रहा, पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई और मीडिया में कैसे आए?
मेरा जन्म दिल्ली में एक सामान्य परिवार में हुआ। मेरे पिताजी शिक्षक और माताजी होम्योपैथिक डॉक्टर थीं। दोनों ने अपना पूरी जीवन समाजसेवा को समर्पित कर रखा था और नि:शुल्क सेवा करते थे। वहीं के एक सरकारी विद्यालय में मेरी प्रारंभिक पढ़ाई हुई। हालांकि, पत्रकारिता में मेरी कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं रही, लेकिन पढ़ने-लिखने का शौक हमारे परिवार में सभी को रहा। पिताजी के पास एक पुस्तकालय की भी जिम्मेदारी थी। हमें शुरू से ही पढ़ाई का माहौल मिला, ऐसे में हम काफी किताबें पढ़ते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स करने के बाद लगा कि मुझे कुछ और नहीं, सिर्फ लिखने-पढ़ने का काम ही करना है। इसके बाद इस दिशा में गति मिलती गई और धीरे-धीरे मैं पत्रकारिता में आ गया।
मीडिया में अपने अपने अब तक के सफर के बारे में बताएं।
मैंने कम उम्र में ही लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया था। कॉलेज के दिनों में ही मैं स्वदेशी आंदोलन की एक पत्रिका के संपादक मंडल में शामिल हो गया था। हमारी छोटी सी टीम थी, जिसमें सभी लोग मिलकर काम करते थे। उस समय औपचारिक तौर पर तो मेरे पास डिग्री नहीं थी, लेकिन कला में मेरा रुझान था। मैं पोट्रेट और पेटिंग बनाता था, फिर मैं उसमें कार्टून्स बनाने लगा। इसके अलावा भी मैगजीन से जुड़े सभी काम जैसे-ट्रांसलेशन, रिपोर्टिंग आदि हम सब मिलकर करते थे। कह सकते हैं कि पत्रकारिता वहां से शुरू हुई, फिर ‘दैनिक जागरण’, ‘इंडिया टुडे’ और ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़ गया। छोटे समय में मुझे बड़े-बड़े संपादकों के साथ काम करने का मौका मिला और अब मैं ‘पांचजन्य’ में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं।
पहली नौकरी हमेशा खास होती है। पहली नौकरी के कुछ अनुभव जो आप हमसे शेयर करना चाहें?
देखिए, अपनी पहली नौकरी को मैं नौकरी नहीं मानता और पत्रकारिता को मैं इसलिए भी नौकरी नहीं मानता, क्योंकि यह मेरे मन का काम था। मैंने कम्युनिकेशंस में मास्टर्स करने के अलावा एमबीए (एडवर्टाइजिंग) किया है। ऐसे में एडवर्टाइजिंग की दुनिया के भी कुछ अनुभव रहे। नि:संदेह, वहां पैसा, चमक और ग्लैमर था, लेकिन मैं वहां से छोड़कर पत्रकारिता में आ गया और ‘दैनिक जागरण’ जॉइन कर लिया। हालांकि, मेरे उस निर्णय पर घर-परिवार समेत कई लोगों ने तमाम तरह की बातें कीं, लेकिन मैंने पत्रकारिता में काम करने का ही मन बना लिया था। सवारी वाहनों की बात करें तो उस समय नोएडा आना-जाना आज की तरह इतना आसान नहीं होता था। रात को कई बार सवारी वाहन नहीं मिलता था तो ऐसे में हम वहीं रुक जाते थे और तड़के अखबार ले जाने वाली गाड़ी से घर निकलते थे। तमाम बार तो ऐसा होता था कि हम सुबह चार-पांच बजे घर पहुंचते थे और फिर दोपहर में तैयार होकर अखबार के दफ्तर के लिए निकल जाते थे। खबरों पर हमारी पूरी नजर रहती थी। ऐसे में न्यूज रूम के भी तमाम अनुभव हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में हम रोजाना तमाम तरह की घटनाओं से रूबरू होते हैं। इनमें कई घटनाएं ऐसी होती हैं, जो हमारे मन-मस्तिष्क में अंकित हो जाती हैं और जीवन भर याद रहती हैं, क्या इस तरह की कोई घटना आपको याद है?
ऐसी एक नहीं, कई घटनाएं हैं। जैसे-मुंबई में जब आतंकी हमला हुआ था, तब हमने और हमारी टीम ने दिन-रात लगातार कवरेज की थी। वह घटना बहुत बड़ी थी, जिसमें हमारी टीम ने काफी काम किया और लोगों तक लगातार उस घटना से जुड़ी खबरें पहुंचाईं। इसी तरह कल्पना चावला के साथ जब हादसा हुआ, उस रात को भी हम नहीं भूल सकते हैं। इसके अलावा पांचजन्य में भी हमारे कुछ ऐसे अनुभव रहे कि जब इसे पत्रिका के स्वरूप में लेकर आए तो यह काफी बड़ी चुनौती थी। एक साप्ताहिक को जब हम पत्रिका के स्वरूप में लाते हैं तो उसकी डमी, स्टाइल और इनपुट फ्लो यानी बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। यह पूरी टीम के लिए एक नया अनुभव था। फिर जब हमने बाबा साहेब पर अंक निकाला तो उस दौरान पांच दिन तक हमारी टीम कार्यालय में ही रही। उस अंक ने कीर्तिमान बनाया। गोवा में हुए इवेंट में भी हमारी टीम ने करीब 82 घंटे तक जिस तरह से काम किया, वह वाकई में काबिले तारीफ है।
जब आपने पत्रकारिता शुरू की थी और आज के दौर की पत्रकारिता की यदि तुलना करें तो आपकी नजर में इसमें कितना बदलाव आया है?
यदि हम बदलाव की बात करें तो एक पंक्ति का कथन है कि परिवर्तन अपरिवर्तनीय नियम है और आप इसे टाल नहीं सकते हैं। नहीं तो समय आपको रौंदते हुए निकल जाएगा। इसलिए पत्रकार को तो सबसे पहले बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि वह समय के साथ कदमताल करते हुए चलता है। दूसरों को सजग करते हुए और बताते हुए चलता है। पांचजन्य की ही बात करें तो इस पत्रिका के लिए तमाम बदलावों को आत्मसात करना और उनके साथ चलाना एक ज्यादा बड़ी चुनौती थी। हमने अपनी टीम को नए सॉफ्टवेयर के लिए तैयार किया और उन्हें नए सॉफ्टवेयर पर काम करने का प्रशिक्षण दिलाया। इसके अलावा भी तमाम तरह की चुनौतियां थीं, लेकिन अब काफी चीजें व्यवस्थित हो गई हैं। आजकल टेक्नोलॉजी का काफी विकास हो गया है, उसने भी पत्रकारिता को बहुत गति दी है।
आजकल फेक न्यूज काफी तेजी से आगे बढ़ रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फेक न्यूज के प्रति गंभीर चिंता जताते हुए फैक्ट चेकिंग पर जोर दिया था, इस बारे में आपका क्या कहना है?
मुझे लगता है कि यह मीडिया का सबसे बड़ा प्रश्न है। मैं इसमें तीन तरह के वर्गीकरण देखता हूं। एक मिसइंफॉर्मेशन (Misinformation), दूसरा डिसइंफॉर्मेशन (Disinformation) और तीसरा मैलइंफॉर्मेशन (Malinformation) है। मिसइंफॉर्मेशन में आपकी सूचना गलत हो सकती है, लेकिन मंशा गलत नहीं हो सकती। डिसइंफॉर्मेशन में सूचना को तोड़-मरोड़ दिया जाता है, क्योंकि इसमें मंशा गलत रहती है। मैलइंफॉर्मेशन में ये है कि संदर्भ से अलग किसी चीज को रखा जाता है, क्योंकि इसमें मंशा गलत होती है। खबर सही होती है, लेकिन मंशा गलत होती है। मुझे जो सबसे महत्वपूर्ण बात लगती है, वह यह है कि एक तो तकनीक बढ़ने से तमाम तरह के तथाकथित पत्रकार भी सामने आ गए हैं। ऐसे में पत्रकार कौन होगा, मीडिया संस्थान किसे कहेंगे, इसे आज के दौर में परिभाषित करने की बड़ी चुनौती है। मैं ये नहीं कह रहा कि खराब काम हो रहा है अथवा अच्छा काम हो रहा है, लेकिन पत्रकार और पत्रकारिता को प्रमाणित करना बड़ी चुनौती है।
आपकी नजर में फेक न्यूज की रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?
मेरा मानना है कि किसी भी खबर पर आगे बढ़ने से पहले एक फैक्ट चेक शीट बनानी चाहिए। इसके आधार पर आप रेडियो की कॉपी भी लिख सकते हैं, डिजिटल के लिए भी कर सकते हैं। प्रिंट के लिए भी फाइल कर सकते हैं और इंटरव्यू की भी तैयारी कर सकते हैं। कहने का मतलब है कि सबसे पहले तथ्य दुरुस्त रखने चाहिए।
आज के दौर में मीडिया की क्रेडिबिलिटी भी सवालों के घेरे में है। क्या आपको लगता है कि मीडिया की क्रेडिबिलिटी कम हुई है? यदि हां, तो इसके पीछे क्या कारण है और इस क्रेडिबिलिटी को फिर से बनाने अथवा बरकरार रखने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए?
देखिए, मैं मानता हूं कि मीडिया और शिक्षा दोनों की क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में है। मेरा मानना है कि यदि मीडिया आत्मचिंतन नहीं करता और खुद को तैयार नहीं करता तो साख का ये संकट गहराएगा। आने वाली पीढ़ी को तथ्य के लिए आग्रह, सत्य के लिए आग्रह और देश के लिए आग्रह करना पड़ेगा और इस दिशा में कदम उठाने पड़ेंगे।
तमाम अखबारों-मैगजींस में एडिटोरियल पर मार्केटिंग व विज्ञापन का काफी दबाव रहता है। चूंकि आप भी एक जानी-मानी मैगजीन के संपादक हैं, ऐसे में आपकी नजर में एक संपादक इस तरह के दबावों से किस तरह मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से संपादकीय कार्यों का निर्वहन कर सकता है?
इस प्रश्न को हमेशा अधूरे तरीके से देखा जाता है। जैसा मैंने बताया कि मैंने पत्रकारिता के साथ-साथ विज्ञापन और मार्केटिंग की पढ़ाई भी की है। आपकी खबर यदि रोचक होगी, रुचिपूर्ण होगी और उसे पढ़ने-देखने वाले होंगे तो सबके लिए एक रेवेन्यू मॉडल बनता है। पत्रकारिता यदि सभी रेवेन्यू मॉडल को ध्वस्त करके कहे कि आपको हमारा खर्चा चलाना है तो ऐसे पत्रकारिता नहीं चलती है। समाज की अपेक्षाओं के साथ उसकी रुचि की पत्रकारिता करते हुए भी मुनाफे के साथ चल सकते हैं। यह समय का आग्रह है। मैं समझता हूं कि ये विज्ञापन का दबाव नहीं है, यदि जनअभिरुचियों का दबाव संपादकीय विभाग समझता है और उसके साथ चलता है तो समाज का जो प्रतिसाद है, वह पत्रकारिता को जीवित रखता है और उसे ठीक रखता है।
तमाम पत्रकारों पर आजकल एजेंडा चलाने के आरोप लगते हैं। क्या कभी आपको भय, लालच अथवा अन्य किसी भी प्रकार द्वारा एजेंडा चलाने के लिए दबाव का सामना करना पड़ा है?
अभी मैं पांचजन्य में हूं और इससे पहले भी संस्थानों में रहा हूं और सभी मुख्यधारा के संस्थान रहे हैं। मैं ये मानता हूं कि आज भी कुछ पोर्टल्स और एकाध मीडिया घरानों को छोड़ दें, जिनका वित्तपोषण इस दृष्टि से ही किया गया है, उन्हें छोड़ दें तो बाकी सभी जगह न्यूजरूम्स अभी भी दबावों से मुक्त हैं। वहां पर वो पत्रकार है जो अपनी बात कहता है। यदि प्राइम टाइम में नहीं कहेगा तो सोशल मीडिया अथवा किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर कह देगा। मैं ये मानता हूं कि अपनी समझ, रुचि, प्रेरणा और अपनी क्षमता के हिसाब से लोग स्टैंड लेते हैं। जैसे ट्विटर पर ट्रेंडिंग आती है और थोड़ी देर में ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है कि कौन गलत जगह पर खड़ा हुआ है। अब ऐसा नहीं है कि आप कुछ भी बोलेंगे और निकल जाएंगे, समाज आईना दिखा देता है। इसलिए एजेंडा किसी का चलता नहीं है।
कोरोनाकाल में तमाम प्रिंट पब्लिकेशंस को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सर्कुलेशन काफी प्रभावित हुआ, लोगों ने घरों पर मैगजींस/अखबार मंगाने बंद कर दिए थे। अब जबकि कोविड लगभग खत्म हो चुका है। ऐसे में अखबारों/मैगजींस के नजरिये से वर्तमान दौर को आप किस रूप में देखते हैं। क्या प्रिंट पब्लिकेशंस कोविड से पहले के दौर की तरह अपनी पहुंच फिर बनाने में और टीवी व डिजिटल को टक्कर देने में कामयाब रहेंगे?
पत्रकारिता की अपनी पूरी यात्रा और साथ में तकनीक को बढ़ते हुए देखकर मेरा मानना था कि भारत में प्रिंट की यात्रा कम से कम 2040 तक रहनी चाहिए। उसमें भी भाषाई पत्रकारिता या वैचारिक पत्रकारिता, उसकी भी जड़ें गहरी हैं या जो वांशिक सदस्यता के मॉडल पर चलते हैं, उनके लिए संभावनाएं अच्छी हैं क्योंकि उनका एक रेवेन्यू मॉडल रहता है। लेकिन, कोविड के बाद में यह समय शायद थोड़ा और पांच-सात साल घट गया होगा। ऐसा नहीं है कि तकनीक के इस दौर में प्रिंट उसी तरह से लहलहाएगा। एक चीज और है कि बाकी दुनिया में मीडिया की जो स्थिति है, भारत की उससे अलग है। ऐसा इसलिए भी कि दुनिया के कई देशों के मुकाबले भारत में साक्षरता की दिशा में बड़े कदम काफी देरी से उठाए गए, इसलिए यहां मीडिया भी देरी से पनपा और फैला। खबरों के लेकर तकनीक ने चीजें काफी बदल दी हैं। अब आप खबर को सिर्फ पढ़ नहीं सकते, उसे देख सकते हैं, सुन सकते हैं और उस पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। यह प्रिंट के लिए बड़ी चुनौती है। भारत में प्रिंट के ज्यादा बढ़ने की संभावनाएं तो अभी मैं नहीं देखता हूं। मगर, उसकी सिनर्जी अवश्य आगे बढ़ेगी। क्योंकि प्रिंट के जो बड़े पत्रकार हैं, जिनकी भाषा अच्छी है, जिनके तथ्य ठीक हैं, जिन्हें खबर की समझ है, वो भविष्य की पत्रकारिता के लिए रीढ़ साबित होने वाले हैं।
आपको ‘पांचजन्य’ को आधुनिक बनाने, पृष्ठ सज्जा व कंटेंट के मामले में दूसरे मीडिया संस्थानों को टक्कर देने और आज के पाठकों के लिए प्रासंगिक बनाए रखने के लिए तमाम प्रयोग करने का श्रेय दिया जाता है। जैसे-आपने इसकी डिजिटल मौजूदगी को आगे बढ़ाया है, मैगजीन को भी नया रूप दिया है। अभी और किस तरह के बदलाव हमें इसमें देखने को मिलेंगे?
मैं सभी तकनीकी बदलावों का खुलासा नहीं करूंगा, लेकिन बता दूं कि इसके लिए सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि मेरी पूरी टीम मेहनत करती है। हम डिजाइनिंग और कलर सलेक्शन समेत तमाम अन्य पहलुओं पर अपनी टीम के साथ बैठकर चीजें फाइनल करते हैं। हमारी टीम के सभी सदस्य परिवार की तरह मिलकर काम करते हैं और आप कह सकते हैं कि यह परिवार की प्रगति है, विचार की प्रगति है।
‘पांचजन्य’ पर तमाम लोग इस तरह के आरोप लगाते हैं कि ‘आरएसएस’ की विचारधारा से प्रेरित होने के कारण यह हिंदुत्ववादी सोच को ही प्रमुखता देती है औऱ सिर्फ उसी को विचारों को आगे बढ़ाती है। इन आरोपों के बारे में आपका क्या कहना है?
आपको बता दूं कि संघ की विचारधारा को इस देश की विचारधारा मैं इसलिए कहता हूं कि संघ की प्रार्थना में आपको हिंदू शब्द भी मिलता है, भारत शब्द भी मिलता है और भारत माता की जय करते हुए वह प्रार्थना पूरी होती है। तो मैं नहीं मानता कि संघ का विचार भारत विरोधी विचार है और भारत विरोधी विचार की पत्रकारिता करनी है, ऐसा भी मैं बिल्कुल नहीं मानता। दूसरी बात कि यह संघ की पत्रिका है, ऐसा आप तकनीकी तौर पर नहीं कह सकते हैं। ‘भारत प्रकाशन दिल्ली लिमिटेड’ एक कंपनी है और अपने हिसाब से चलती है। यहां पर ये नहीं है कि संघ चयन करता हो या किसी चीज का भुगतान करता हो। ऐसा भी नहीं है कि वेतन भुगतान अथवा नियुक्तियां संघ से होती हैं। एक राष्ट्रीय विचार है, जिसकी पत्रकारिता हम करते हैं। यह सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता है, इसमें मुझे नहीं लगता कि आरोप जैसी कोई बात है।
खुले विचारों वाले निष्पक्ष पत्रकार के रूप में आपकी गिनती होती है। ऐसे में मीडिया में करियर बनाने के इच्छुक अथवा इसमें आने वाले नवोदित पत्रकारों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे, सफलता का कोई ‘मूलमंत्र’ जो आप उन्हें देना चाहें।
आपका यह प्रश्न आने वाली पीढ़ी के लिए काफी महत्वपूर्ण है। क्योंकि मैं कई जगह रहा हूं और अभी पांचजन्य में हूं। यह वैचारिक पत्रकारिता है। आप जिसे मुख्यधारा कहते हैं, यह मुख्यधारा में होते हुए भी वैचारिक पत्रकारिता है। मीडिया में आने वाले युवाओं को मैं यही कहूंगा कि वैचारिक पत्रकारिता की ओर बढ़ने से पहले अपना वैचारिक आधार मजबूत कर लें। आपका वैचारिक आधार कुछ भी हो सकता है। अगर आपको अपने वैचारिक आधार की समझ है और उसके लिए अगर आप बढ़ सकते हैं, लड़ सकते हैं, न्यूजरूम में झगड़ सकते हैं तो आप उस विचार का भला करेंगे अन्यथा किसी पक्ष में कहीं पर भी खड़े रहेंगे तो मेरा कहना है कि पत्रकारिता पर बोझ मत बनो। क्योंकि, विचार को समझिए, उसके प्रति आपकी निष्ठा है और समर्पण है तो आपकी पत्रकारिता में वह दिखाई देगा। अन्यथा, पत्रकारिता की आपकी यात्रा के बीच में तमाम चुनौतियां आएंगी और वह यात्रा बीच में ठिठक सकती है।
सुना है कि आपने कई फिल्में भी डायरेक्ट की हैं। उनके बारे में कुछ बताएं। क्या निकट भविष्य में भी किसी फिल्म के डायरेक्शन की योजना है?
आपने सही सुना है। आप कह सकते हैं कि यह मेरी रुचि का विषय रहा है। मीडिया में आने पर हम उसके अलग-अलग माध्यमों में काम करते रहे हैं। वर्ष 2003 में हम लोगों ने ‘Ropes In Their Hand’ नाम से एक फिल्म तैयार की थी। इस फिल्म में दिखाया गया था कि बाल मजदूरों के साथ तमाम सर्कस में किस तरह का शोषण होता है। मैं इस फिल्म का क्रिएटिव डायरेक्टर था। यह फिल्म न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत भी हुई थी।
इसके बाद वन्यजीवों पर काम करने वाले प्रतिष्ठित नाम नरेश बेदी जी और राजेश बेदी जी के साथ मिलकर 13 भागों की एक सीरीज ‘Wild Adventures Ballooning With Bedi Brothers’ की स्क्रिप्टिंग और क्रिएटिव्स का काम भी मैंने किया है। कुछ दूरदर्शन के शो भी किए हैं। करीब चार साल से पांचजन्य की टीम एक विषय पर काम कर रही थी कि विभाजन के समय जो लोग यहां आए, उनकी आपबीती उन्हीं से सुनना और समाज के सामने रखना। पिछले साल हम इस काम में तेजी लाए और इस शोध के बाद हमने एक पुस्तक तैयार की और फिर उसके आधार पर एक फिल्म का निर्माण भी किया।
हमने तो इसे यूट्यूब के लिए बनाया था, लेकिन जब एंट्री भेजी तो यह इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए भी चुनी गई। इसके बाद हमने गोवा को मुक्ति संग्राम पर एक फिल्म है, उसका शोध किया है। इस फिल्म का पहला कट अभी हमने रिलीज किया था। पांचजन्य इस देश के लिए काम करने की प्रेरणा है और हम कभी डिजिटल में तो कभी फिल्मों में तरह-तरह के काम करते रहते हैं। जैसा कि मैंने अभी कहा कि कंटेंट में अगर सच है तो लोग उसे देखते हैं।
समाचार4मीडिया के साथ हितेश शंकर की इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।
टैग्स पत्रकार मीडिया पत्रकारिता जर्नलिस्ट समाचार4मीडिया पांचजन्य इंटरव्यू साक्षात्कार हितेश शंकर