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बदलाव समय की मांग है, आजादी के समय की पत्रकारिता आज के दौर में मुश्किल: डॉ. विजय दर्डा

‘लोकमत मीडिया ग्रुप’ के चेयरमैन डॉ. विजय दर्डा ने समाचार4मीडिया से बातचीत में अपनी नई किताब-रिंगसाइड: अप, क्लोज एंड पर्सनल ऑन इंडिया एंड बियॉन्ड समेत मीडिया से जुड़े अहम पहलुओं पर अपनी राय रखी है।

पंकज शर्मा 2 years ago

‘लोकमत मीडिया ग्रुप’ के चेयरमैन व राज्यसभा के पूर्व सदस्य डॉ. विजय दर्डा की किताब 'रिंगसाइड: अप, क्लोज एंड पर्सनल ऑन इंडिया एंड बियॉन्ड' (RINGSIDE: Up, Close and Personal on India and Beyond) ने मार्केट में दस्तक दे दी है। ‘दिल्ली स्थित कॉन्स्टीयूशन क्लब ऑफ इंडिया’ में तमाम राजनेताओं, नौकरशाहों और वरिष्ठ पत्रकारों की मौजूदगी में 30 मई को इस किताब की लॉन्चिंग हुई। इस मौके पर विजय दर्डा ने अपनी किताब के साथ-साथ मीडिया से जुड़े तमाम पहलुओं पर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

सबसे पहले अपनी इस नई किताब ‘रिंगसाइड-अप, क्लोज एंड पर्सनल ऑन इंडिया एंड बियॉन्ड’ के बारे में हमें बताएं कि आखिर इसमें क्या खास है और यह किस बारे में है। पाठकों को यह किस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी?

यह किताब मेरे साप्ताहिक लेखों का एक संकलन है, जो वर्ष 2011 और 2016 के बीच लोकमत मीडिया समूह के समाचार पत्रों और देश के अन्य प्रमुख राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दैनिक अखबारों में प्रकाशित हुए थे। इसमें विज्ञान, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, सामाजिक विकास, खेल, कला, संस्कृति, विदेश नीति और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े शोधपूर्ण आलेख शामिल हैं। इसके अलावा इस किताब में प्रख्यात व्यक्तित्वों के बारे में टिप्पणियां भी शामिल हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रही बात इस किताब की उपलब्धता की तो यह हमसे प्राप्त की जा सकती है, अथवा इसे एमेजॉन पर भी ऑर्डर किया जा सकता है।

आप मीडिया में लंबे समय से हैं। इतने लंबे कार्यकाल के दौरान आपने पत्रकारिता को काफी बारीकी से देखा है। वर्तमान दौर में मीडिया की दशा और दिशा को लेकर क्या कहेंगे?

देखिए, बदलाव समय की मांग है। समय-समय पर बदलाव आते रहते हैं। आजादी की पत्रकारिता आज के दौर में नहीं हो सकती है। आज के दौर की पत्रकारिता यदि आजादी के समय में होती तो उसे जस्टिस नहीं दे पाती। कहने का मतलब है कि समय के साथ बदलाव होते रहते हैं और समय के साथ में लोग भी बदलते रहते हैं।  

आज का दौर डिजिटल मीडिया का दौर कहलाता है। या यूं कहें कि डिजिटल मीडिया काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम माध्यमों से लोगों को जरूरी सूचनाएं तुरंत ही मिल जाती है, जबकि अखबार अगले दिन आता है। ऐसे में प्रिंट मीडिया खासकर अखबारों के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?

आज भी लोगों की सबसे ज्यादा विश्वसनीयता अखबार पर है। डिजिटल अथवा अन्य तमाम मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।  

लंबे समय से इस तरह की तमाम खबरें सुनने को मिलती हैं कि टीवी और अब डिजिटल के तेजी से बढ़ने के बाद प्रिंट का दौर जल्द ही खत्म हो जाएगा। लेकिन कुछ समय पहले जब दिल्ली में ‘विश्व पुस्तक मेले’ का आयोजन हुआ था, उसमें इतने ज्यादा लोग पहुंचे थे कि पांव रखने तक की जगह नहीं थी। इसे किस रूप में देखते हैं और इस बारे में क्या कहेंगे?

प्रिंट कभी खत्म नहीं होगा। मैं यही कहूंगा कि यदि आपके संस्कार पक्के हैं तो कुछ खत्म नहीं होता। इसलिए यह कहना बेमानी है कि प्रिंट का दौर खत्म हो जाएगा। मेरे हिसाब से ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।  

आजकल एक और शब्द फेक न्यूज की काफी चर्चा होती है। पीआईबी समेत तमाम संस्थानों ने अपनी फैक्ट चेक टीम बना रखी है। क्या फेक न्यूज पर लगाम लगाने के लिए वर्तमान में उठाए जा रहे कदम पूरी तरह कारगर हैं। आपकी नजर में इसकी रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?

बिलकुल, फेक न्यूज पर लगाम लगाने का सीधा सा फंडा यही है कि अगर आप (मीडिया) ईमानदारी से काम करेंगे तो फेक न्यूज नहीं आएगी। 

तमाम अखबारों ने अब सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है, यानी बिना सबस्क्राइब किए पाठक अब उन अखबारों को इंटरनेट पर नहीं पढ़ सकते हैं। इस मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? क्या आपको नहीं लगता कि इससे रीडरशिप प्रभावित होती है। क्योंकि डिजिटल रूप से समृद्ध पाठकों के पास आज सूचना प्राप्त करने के तमाम स्रोत हैं। ऐसे में वे पैसा देकर ऑनलाइन अखबार क्यों पढ़ना चाहेंगे? इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?

इस बारे में मैं यही कहूंगा कि यदि मान लीजिए कि आपकी कोई दुकान है और मुझे उसमें से सामान लेना है तो मुझे पैसा तो देना पड़ेगा। जो लोग पैसा देकर अखबार नहीं पढ़ना चाहते हैं, वो लाइब्रेरी अथवा संग्रहालय में जाकर इसे पढ़ सकते हैं। रही बात ऑनलाइन अखबार पढ़ने की तो यदि कुछ संस्थानों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है यानी सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है तो आपको उसे पढ़ने के लिए सबस्क्राइब तो करना ही पड़ेगा।   

देश में टीवी न्यूज की दुनिया में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एंकर्स की एंट्री भी हो चुकी है। एक मीडिया संस्थान ने तो बाकायदा इनसे खबरें पढ़वाना भी शुरू कर दिया है। इसे आप चुनौती अथवा अवसर किस रूप में देखते हैं?  

इसे मैं किसी तरह की चुनौती के रूप में नहीं देखता हूं। जीवन के अंदर कोई चुनौती नहीं है, सवाल यह है कि आपका लक्ष्य क्या है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ गया है, लेकिन दुनिया में सबसे पहले लोकमत ग्रुप ने ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो अपनी खबरों का दर्जा बताता है कि वह एक स्टार है, दो स्टार है, तीन स्टार है अथवा पांच स्टार है। तमाम टॉप कंपनियां हमसे उसे मांग रही हैं। मेरा मानना है कि आपको पाठकों को अच्छा और विश्वसनीय कंटेंट उपलब्ध कराना होगा।

इतनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए आप काफी व्यस्त रहते हैं। ऐसे में परिवार के लिए किस तरह समय निकाल पाते हैं?

ऐसा करना कुछ मुश्किल काम नहीं है। बस, टाइम मैनेजमेंट से सारी चीजें बैलेंस हो जाती हैं।

खाली समय में आपको क्या करना पसंद है?

दिक्कत यही है कि मेरे पास बिल्कुल भी खाली समय नहीं है। मैं देर रात तक काम करता हूं। मेरी कई कविताएं इधर-उधर हो रखी हैं, मुझे उन्हें समेटना है और किताब की शक्ल देनी है, लेकिन इसके लिए भी समय नहीं मिल पा रहा है।

आप अभी तक कई किताबें लिख चुके हैं। हाल ही में आपकी यह किताब आई है। क्या आप निकट भविष्य में कोई नई किताब लिखने की योजना बना रहे हैं।

बिलकुल, मेरी नई किताब अगले महीने आने वाली है। ‘The Churn’ नाम से यह किताब पार्लियामेंट के बारे में है। 


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