देश के प्रमुख मैगजीन पब्लिशर्स में शुमार ‘दिल्ली प्रेस’ (Delhi Press) के एग्जिक्यूटिव पब्लिशर और 'द कारवां' (The Caravan) मैगजीन के संपादक अनंत नाथ को पिछले कुछ समय में दो और बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। उन्हें देश में संपादकों की शीर्ष संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (Editors Guild Of India) और देश में पत्रिकाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख संगठन ‘द एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजींस’ (AIM) का प्रेजिडेंट चुना गया है। हाल ही में समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में अनंत नाथ ने मीडिया समेत तमाम अहम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
पिछले दिनों आपको देश में पत्रिकाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख संगठन ‘द एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजींस’ (AIM) का प्रेजिडेंट चुना गया है। बतौर प्रेजिडेंट अपने कार्यकाल में आप किन प्रमुख प्वॉइंट्स पर फोकस करेंगे?
‘द एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजींस’ का मुख्य फोकस मैगजींस के डिस्ट्रीब्यूशन को और बेहतर बनाने का रहा है। कोरोना काल के पहले भी मैगजींस का डिस्ट्रीब्यूशन काफी बुरी तरह प्रभावित था, क्योंकि पारंपरिक न्यूजस्टैंड चैनल काफी कमजोर हो रहा था। तमाम लोगों का ये मानना है कि लोग डिजिटल की तरफ ज्यादा चले गए इसलिए प्रिंट कम हो गया है। यह बात शायद अखबारों के लिए सच हो, क्योंकि अपने देश में अखबारों का सर्कुलेशन काफी ज्यादा है। ऐसे में हो सकता है कि वहां पर एक तरह से यह स्थिति आ गई हो कि तमाम लोग डिजिटल की ओर जा रहे हों और अखबार न पढ़ रहे हों, लेकिन मैगजींस का सर्कुलेशन अखबारों के मुकाबले कम रहा है और उसकी डिमांड अभी भी काफी है।
ऐसे में यदि कई लोग डिजिटल की ओर जा भी रहे हैं तो भी प्रिंट मैगजींस की डिमांड काफी है। हालांकि, डिस्ट्रीब्यूशन काफी कमजोर हो गया है, ऐसे में हमारा फोकस इस बात पर है कि कैसे हम डिस्ट्रीब्यूशन को बेहतर बनाएं और मजबूत स्थिति में लाएं। इसमें दो चीजें हैं। पहली तो ट्रेडिशनल न्यूजस्टैंड चैनल है और दूसरा है सबस्क्रिप्शन। हमारा ज्यादा फोकस इस बात पर रहा है कि सबस्क्रिप्शन चैनल को कैसे मजबूत करें क्योंकि भारत में मैगजींस का सबस्क्रिप्शन चैनल कई पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी कम है। यहां न्यूजस्टैंड चैनल तो अच्छी स्थिति में है लेकिन सबस्क्रिप्शन चैनल के मोर्चे पर काफी काम करने की और उसे मजबूत बनाने की जरूरत है।
इसके लिए हमने भारतीय डाक विभाग से मिलकर ‘मैगजीन पोस्ट’ नाम से एक सर्विस शुरू कराई थी, जिसमें मैगजींस के लिए स्पीड पोस्ट की सेवा काफी कम रेट पर उपलब्ध है और इसकी डिलीवरी भी सामान्य डाक सेवा से काफी अच्छी व तेज है। हम उसी एजेंडा को आगे लेकर जा रहे हैं कि कैसे हम मैगजींस के डिस्ट्रीब्यूशन को और बेहतर बना सकते हैं, ताकि पाठकों तक इनकी पहुंच आसान और सुनिश्चित हो सके। इसके लिए मैगजीन पोस्ट के अलावा ई-कॉमर्स डिस्ट्रीब्यूशन पार्टनर्स से भी हमारी बात चल रही है कि कैसे वे मैगजीन की एक कॉपी को भी आसानी से और कम समय में पाठकों तक उपलब्ध करा सकते हैं।
मैगजींस को फिर चाहे वह मैगजीन का करेंट इश्यू ही क्यों न हो, पाठकों तक पहुंचाने के लिए हम देश में ऐसा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तैयार करने की कोशिश में लगे हुए हैं, जिसमें डिजिटली ऑर्डर दिया जा सके और जल्द से जल्द उसकी डिलीवरी सुनिश्चित हो सके। हमने ‘ब्लिंकिट’ के साथ मिलकर इस तरह का प्रयास शुरू किया है, जिसमें आप वहां से मैगजीन ऑर्डर कर सकते हैं। फिलहाल दिल्ली से इसकी शुरुआत हुई है और इस सेवा को दिल्ली, पुणे व बेंगलुरु और कोलकाता समेत देश के तमाम हिस्सों से शुरू किया जा रहा है। एमेजॉन से भी हमारी बातचीत चल रही है, ताकि वहां पर मैगजींस की एक कैटेगरी दोबारा से बनाई जाए।
कुल मिलाकर हम डिस्ट्रीब्य़ूशन के मोर्चे पर काफी काम कर रहे हैं, ताकि इसे और मजबूत किया जा सके और देश भर में डिस्ट्रीब्य़ूशन आसान व जल्द सुनिश्चित किया जा सके। इसके लिए हम काफी समय से एक ऐप पर भी काम कर रहे हैं, ताकि सबस्क्रिप्शन बढ़ाने के लिए हम सुबह घरों में अखबार पहुंचाने वाले हॉकर्स को भी उसमें जोड़ सकें। क्योंकि इन हॉकर्स को पता रहता है कि किस घर में कौन सा अखबार जाता है, वहां किस तरह की रीडरशिप है और कौन सी मैगजीन वहां पढ़ी जा सकती है। इस ऐप के द्वारा हम इन हॉकर्स के माध्यम से मैगजींस का ऑर्डर और मैगजींस की डिलीवरी को और बेहतर बनाना चाहते हैं। उम्मीद है कि अगले साल इस ऐप का लॉन्च कर दिया जाएगा।
दूसरा प्रमुख फोकस हमारा विज्ञापन पर है। ब्रैंडेंड कंटेंट के लिए मैगजींस काफी प्रभावी माध्यम है। इसके लिए हमने कुछ समय पहले अपने कंटेंट मार्केटिंग स्टूडियो ‘दास्तान हब’ की शुरुआत की थी। हालांकि हम उसे अभी सही से लागू नहीं कर पाए हैं। अब हमारी कोशिश इसे प्रभावी ढंग से लागू करने की रहेगी कि तमाम पब्लिशर्स मिलकर अपनी मैगजींस, उनकी वेबसाइट्स आदि को मिलाकर एक कॉमन स्टूडियो बनाएं, ताकि ब्रैंडिंग कैंपेनिंग आदि के द्वारा बड़े ऐडवर्टाइजर्स को आकर्षित किया जा सके और अपने साथ जोड़ा जा सके।
कोरोना के कारण चार साल के लंबे समय बाद कुछ महीनों पहले ‘द एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजींस’ (AIM) के प्रमुख इवेंट ‘इंडियन मैगजीन कांग्रेस’ (IMC) का मंच एक बार फिर सजा था। इस बार इसे लेकर क्या तैयारियां हैं। यह कब आयोजित होने जा रहा है और इसकी क्या थीम रहेगी। इस बारे में कुछ बताएं?
इस बार ‘इंडियन मैगजीन कांग्रेस’ (IMC) को अप्रैल 2024 में मुंबई में आयोजित करने की योजना है। हर मैगजीन चाहे वह लाइफस्टाइल की हो, एंटरटेनमेंट की हो अथवा न्यूज की हो, प्रिंट के माध्यम से, डिजिटल के माध्यम से, सोशल मीडिया के माध्यम से और इवेंट्स के माध्यम से अपने आसपास एक कम्युनिटी बनाती है। कैसे हम उस कम्युनिटी को अपने साथ जोड़े रखें, कैसे हम उस कम्युनिटी से एक अच्छा बिजनेस मॉडल तैयार कर सकें, ताकि मैगजीन की पूरी निर्भरता सिर्फ विज्ञापन पर ही न रहे, बल्कि रीडर्स रेवेन्यू पर भी रहे।
क्योंकि सिर्फ विज्ञापन पर ही निर्भर रहना काफी रिस्की होता है, इसलिए आप देखेंगे कि पिछले तीन साल में तमाम पब्लिशर्स अपनी मैगजींस का कवर प्राइज लगातार बढ़ाते रहे हैं। हमारा प्रयास रहा है कि हम डीप और इंगेजिंग कंटेंट दें व कम्युनिटी को आगे बढ़ाएं और विज्ञापन के साथ-साथ रीडर्स से भी रेवेन्यू जुटाएं। इसी थीम पर हमारी यह कॉन्फ्रेंस होगी।
‘द एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजींस’ द्वारा सरकार से अखबारों/मैगजींस की प्रिंटिग और प्रॉडक्शन में जीएसटी से छूट देने, सरकारी विज्ञापन खर्च में मैगजींस को ज्यादा हिस्सेदारी देने और न्यूज प्रिंट के आयात पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी को समाप्त करने की मांग लंबे समय से की जा रही है। इनमें से कौन सी मांग पूरी हुई है अथवा सरकार की ओर से क्या किसी तरह का आश्वासन दिया गया है। इनके अलावा भी क्या ‘द एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजींस’ की सरकार से कुछ अन्य मांगें हैं?
बड़े ही खेद की बात है कि इनमें से हमारी एक भी मांग अभी तक पूरी नहीं हुई है। मैगजीन इंडस्ट्री के लिए एक तरह से अभी तक लेवल प्लेयिंग फील्ड भी नहीं है। जहां अखबारी कागज (न्यूजप्रिंट) पर पांच प्रतिशत जीएसटी लगता है, वहीं मैगजींस जो LWC (Light Weight Coated) कागज इस्तेमाल करती हैं, उन पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगता है। यानी हम सात प्रतिशत ज्यादा जीएसटी दे रहे हैं। रही बात कस्टम ड्यूटी की तो पहले तो यह न्यूजप्रिंट पर लगती ही नहीं थी। इसके बाद दस प्रतिशत कस्टम ड्यूटी लगाई गई और फिर बाद में घटाकर पांच प्रतिशत कर दी गई।
हमारी मांग कस्टम ड्यूटी को समाप्त करने की रही है, लेकिन इस दिशा में भी सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया है। तीसरी हमारी नई मांग अभी यह है कि कैसे हम डिजिटल सबस्क्रिप्शन पर जीएसटी को शून्य करें। जैसे- प्रिंट मैगजीन बेचने पर किसी तरह की जीएसटी नहीं है, लेकिन यदि हम डिजिटल पर कंटेंट बेचें तो किताबों पर 12 प्रतिशत और मैगजींस पर 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है। हमारी मांग है कि जीएसटी को यहां पर भी खत्म कर देना चाहिए। लेकिन, सरकार की ओर से इन सभी मांगों पर अभी तक हमें कोई सपोर्ट नहीं मिला है।
आपको इस साल देश में संपादकों की शीर्ष संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ का प्रेजिडेंट चुना गया है। अपने कार्यकाल में इसे पहले से ज्यादा प्रभावी, सक्रिय व विश्वसनीय बनाने के लिए आपका रोडमैप क्या है?
मैं पिछले तीन साल से इस प्रतिष्ठित संस्था का पदाधिकारी रहा हूं। पहले में ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ में कोषाध्यक्ष और जनरल सेक्रेट्री रहा हूं। पिछले तीन वर्षों में हम तीन-चार प्रमुख मुद्दों पर काफी काम किया है। एक तो यह है कि जब भी देश में प्रेस की स्वतंत्रता पर किसी तरह का हमला हो तो उसके खिलाफ तुरंत आवाज उठाना। इसमें कभी स्टेटमेंट के द्वारा अथवा कभी संस्था के पदाधिकारियों द्वारा संबंधित मंत्रालय से मिलना शामिल है।
हमेशा की तरह अभी भी प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ आवाज उठाना हमारा प्रमुख काम रहेगा। इसके अलावा लीगल मामलों-जैसे राष्ट्रदोह मामले में और पेगासस मामले में जांच को लेकर हमने दो-तीन याचिकाएं दाखिल की थीं। हमने अधिवक्ताओं का एक लीगल पैनल भी बनाया है, ताकि जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह/सहायता ली जा सके। पिछले दो साल में हमने कुछ कार्यक्रम भी किए थे। इन्हीं सब कामों को हमें आगे लेकर जाना है। इस साल के एजेंडे बात करें तो हमने कुछ और काम किए हैं। जैसे सरकार ने डिजिटल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए साल भर में करीब पांच नए बिल पेश किए हैं। इनका प्रभाव प्रिंट और टेलिविजन पर भी पड़ने वाला है।
चूंकि हमारा सारा कंटेंट जो प्रिंट में जा रहा है, वह टेलिविजन पर भी जा रहा है और वह डिजिटल पर भी जा रहा है। ऐसे में यदि आपने डिजिटल को कंट्रोल कर लिया तो आपने सारा मीडिया कंट्रोल कर लिया। डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन बिल और टेलिकॉम बिल पेश किया गया है। ब्रॉडकास्ट बिल पेश किया जा चुका है। डिजिटल इंडिया बिल अभी आ रहा है। पीआरबी बिल को रिप्लेस करने के लिए प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पीरियॉडिकल बिल बिल आया है। इसके अलावा आईटी रूल्स भी नोटिफाई किए गए हैं। इन सभी पर गिल्ड ने अपनी आवाज उठाई है।
कुछ समय पूर्व ही गिल्ड ने ब्रॉडकास्टिंग बिल पर सूचना प्रसारण मंत्रालय के सामने अपनी बात रखी है। हमारा काम रहेगा कि इन सभी बिलों पर हम पब्लिक कंसल्टेशन करें, इनको लेकर अपनी आवाज उठाएं, जनमोर्चा निकालें और लोगों को बताएं कि इन बिलों के कुछ प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं, जिनके खिलाफ हम अपनी आवाज उठा रहे हैं। हमारा प्रयास है कि हम सभी प्रमुख प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बात रखें। इसके अलावा पत्रकारों के खिलाफ विभिन्न मामलों को लेकर आए दिन बिना उचित जांच के एफआईआर दर्ज करने के मामले सामने आते रहते हैं। इस दिशा में भी हमें काम करना है कि कैसे पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को कुछ ऐसी सुरक्षा मिले, ताकि उनके खिलाफ बिना उचित जांच के एफआईआर न दर्ज कर दी जाए।
कुछ समय पूर्व मणिपुर मामले को लेकर ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ काफी चर्चाओं में रही थी। अब चूंकि आप इसके प्रेजिडेंट हैं तो इस शीर्ष संस्था से जुड़ी इस तरह की घटनाओं को लेकर आपका क्या मानना है? भविष्य में इस तरह की असहज स्थिति न आने पाए, इसे सुनिश्चित करने के लिए आपकी नजर में किस तरह के ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है?
देखिए, मणिपुर में जो हुआ, वह हर उस चीज का एक यूनिक उदाहरण है, जो आज के दौर में प्रेस की फ्रीडम के मामले में गलत चल रहा है। एडिटर्स गिल्ड ने एक रिपोर्ट निकाली कि मणिपुर में किस तरह की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग हुई। उसमें थोड़ी बहुत तथ्यात्मक त्रुटि हुई भी तो गिल्ड ने उसे सही कर दिया। यदि आप (राज्य सरकार) इस रिपोर्ट से खुश नहीं है तो रिपोर्ट पर अपनी आपत्ति की जा सकती है या उसके खिलाफ एक और रिपोर्ट दाखिल की जा सकती है या उस रिपोर्ट में करेक्शन कर सकते हैं, लेकिन इस रिपोर्ट के बाद जिस तरह का विवाद हुआ और रिपोर्ट सामने आने के अगले दिन ही दो-तीन शिकायतें दर्ज कर एफआईआर की मांग तक कर दी गई।
सामान्यत: शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने के लिए कुछ जांच वगैराह होती हैं, लेकिन इस मामले में शिकायतों के आधार पर तुरंत एफआईआर भी दर्ज कर ली गईं। उसके अगले दिन ही मुख्यमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कह दिया कि वह एडिटर्स गिल्ड के खिलाफ कार्रवाई करेंगे। यानी बिना जांच के पहले ही मान लिया गया कि एडिटर्स गिल्ड ने गलत किया है और साफ-साफ चेतावनी दे दी गई कि गिल्ड के खिलाफ कार्रवाई होगी। गिल्ड पर उस दौरान तमाम तरह के आरोप लगाए गए। हमें उस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा, जहां से गिल्ड को राहत मिली और वहां की राज्य सरकार की मंशा सबके सामने आ गई।
मीडिया की दुनिया काफी तेजी से बदल रही है। प्रिंट, टीवी और डिजिटल से होती हुई यह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और चैटजीपीटी तक जा पहुंची है। इससे अवसरों के साथ तमाम चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। तेजी से बदलते दौर में आपकी नजर में मैगजींस के बिजनेस को प्रासंगिक बने रहने के लिए किस तरह के कदम उठाने की जरूरत है?
सवाल न सिर्फ मैगजींस का बल्कि अखबारों और टेलिविजन का भी है। इसमें हमें एक चीज ध्यान रखनी होगी कि नए टूल्स आते हैं, नई टेक्नोलॉजी आती है। सोशल मीडिया आया, वॉट्सऐप आया, फेसबुक आया। उस पर कंटेंट बनाने वाले लोगों की एक पूरी इंडस्ट्री बन गई। फेक न्यूज बनाने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई। तमाम ऐसे लोग भी हैं, जो फेक न्यूज बनाना नहीं चाहते लेकिन, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बढ़ाने के लिए वे रिसर्च किए बिना कंटेंट तैयार कर देते हैं। तो आज के दौर में इतना ज्यादा कंटेंट बन रहा है कि जनरल कंटेंट वालों की संख्या काफी कम हो गई है।
अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आ गया है, जहां आप बिना किसी परेशानी के कंटेंट तैयार कर सकते हैं। ऐसे में सोचने वाली बात है कि जो सही कंटेंट बनाते हैं, उनकी क्या अहमियत रह गई है। लेकिन यहीं पर इस बात का जवाब भी है कि समय के साथ यूजर पहले से ज्यादा सचेत हो रहा है। वह हर चीज जानना चाहता है कि यह किस सोर्स से हुई है। हालांकि, शुरुआत में सभी चीजों पर विश्वास कर लिया जाता था, लेकिन आज यूजर्स ज्यादा सचेत हो गए हैं। तमाम लोग मानते हैं और कहते नजर आते हैं कि सोशल मीडिया पर जो कंटेंट आ रहा है, जब तक वह किसी विश्वसनीय सोर्स से नहीं आ रहा है, उस पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए।
कहने का मतलब है कि समय के साथ लोगों में जागरूकता आ रही है कि आप जो कंटेंट देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं और शेयर कर रहे हैं, उसके पीछे की क्या प्रक्रिया रही है। मेरा मानना है कि आने वाले समय में विश्वसनीय न्यूज संस्थानों की अहमियत ज्यादा रहेगी, क्योंकि सूचनाओं के अथाह सागर में लोग आज भी विश्वसनीय सूचना पाना चाहते हैं। तमाम मीडिया संस्थानों की एक पहचान है कि वह अच्छी तरह से जांच परखकर ही सूचना आगे बढ़ाते हैं और उनकी सूचना आंकड़ों व तथ्यों पर आधारित होती है, ऐसे में आने वाले समय में भी इनके कंटेंट की अहमियत रहेगी। हो सकता है कि इसमें थोड़ा समय लगे, लेकिन मैगजींस बिजनेस का भविष्य बेहतर है, क्योंकि सभी जानते हैं कि यहां पर जो कंटेंट दिया जाता है, वह उसे तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़े तमाम लोगों से होकर गुजरता है और विश्वसनीय होता है।
आजकल ‘डीपफेक’ की भी काफी चर्चा हो रही है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुरुपयोग कर व्यक्ति के एडिटेड फोटो व वीडियो बनाकर उन्हें वायरल कर दिया जाता है। कुछ समय पूर्व पीएम नरेंद्र मोदी का भी इस तरह का फेक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह गरबा खेलते हुए नजर आ रहे थे। हालांकि, पीएम ने इस वीडियो को गलत और एडिटेड बताया था। आपकी नजर में इस तरह की हरकतों पर किस तरह अंकुश लगाया जा सकता है?
यह टेक्नोलॉजी से जुड़ा बड़ा सवाल है कि आखिर कैसे डीपफेक पर रोक लग सकती है, लेकिन मेरा मानना है कि टेक्नोलॉजी का तोड़ टेक्नोलॉजी से ही निकलेगा। जिस तरह से डीपफेक को तैयार करने के लिए टेक्नोलॉजी आई है, उसी तरह से कोई ऐसी टेक्नोलॉजी भी आ ही जाएगी, जो डीप फेक को पहचान लेगी। हो सकता है कि इसमें कुछ समय लगे, यह समय ज्यादा भी हो सकता है लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि कहीं न कहीं ऐसी प्रक्रिया आ ही जाएगी, जो फेक न्यूज और मिसइंफॉर्मेशन को चेक करेगी।
कोविड के दौरान कई मैगजींस बंद हो गईं और तमाम मैगजींस का सर्कुलेशन व ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्य भी घट गया। अब क्या स्थिति है? क्या मैगजीन बिजनेस का सर्कुलेशन पहले की तरह वापस आ गया है?
कोविड के दौर के बाद से मैगजींस का सर्कुलेशन बढ़ रहा है। हम अपनी बात करें तो हमारे प्रयासों की बदौलत हमारा सर्कुलेशन और डिस्ट्रीब्यूशन कोविड से पहले की तुलना में और बेहतर हो गया है। विज्ञापन में रफ्तार जरूर थोड़ी धीमी है। इस मामले में हम अभी भी कोविड के दौर से पीछे हैं। उम्मीद है कि जिस तरह से रीडर्स ने हमारे ऊपर भरोसा रखा है, ऐडवर्टाइजर्स भी ऐसा ही भरोसा रखेंगे।
चूंकि अब वर्ष 2023 समाप्त होने वाला है और नए साल का आगाज होने वाला है। ऐसे में यदि प्रिंट मीडिया खासकर मैगजींस की बात करें तो आपके नजरिये से वर्ष 2023 कैसा रहा और नए साल पर इस सेगमेंट में आपकी क्या उम्मीदें हैं?
सर्कुलेशन और रीडर रेवेन्यू के मामले में यह साल मैगजीन बिजनेस के लिए अच्छा ही रहा है। अपनी बात करें तो हमने तो ग्रोथ देखी है। विज्ञापन के मामले में थोड़ा स्लो रहा है। सर्कुलेशन रेवेन्यू अपने आप काफी नहीं रहता, क्योंकि सर्कुलेशन कॉस्ट होती है, मैगजीन की कॉस्ट होती है, डिलीवरी की कॉस्ट होती है। ऐसे में यदि विज्ञापन ढंग से न मिले तो पब्लिशर्स के लिए रेवेन्यू जुटाना काफी मुश्किल होता है।
नए साल की बात करें तो हम चाहते हैं कि विज्ञापनदाता हमारे प्रयासों को समझें, क्योंकि यदि हमारी रीडरशिप बढ़ रही है, इसका मतलब है कि रीडर्स हमारा प्रॉडक्ट खरीद रहे हैं और उन्हें अपना मनपसंद कंटेंट मिल रहा है, फिर उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैगजीन की कॉस्ट कितनी है। ऐसे में विज्ञापनदाताओं को यह समझना चाहिए कि रीडरशिप चाहे पहले से कम है, लेकिन अभी भी यह बनी हुई है और पाठक मैगजींस से जुड़े हुए हैं तो उसका वे फायदा उठाएं। नए साल पर सबस्क्रिप्शन बढ़ाने पर हमारा फोकस रहेगा। हमारी एसोसिशन का मानना है कि आप सिर्फ रीडर्स जोड़िए, बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा।
एक बार रीडर्स आपके साथ जुड़ जाएंगे तो विज्ञापनदाता अपने आप आ जाएंगे। यानी हम सभी का मानना है कि सारा फोकस रीडर्स पर रखिए। उन्हें बेहतरीन कंटेंट दीजिए। मैगजींस खरीदने की प्रक्रिया आसान रखिए, ताकि रीडर्स आसानी से मैगजींस खरीद सकें। उन तक मैगजींस की उपलब्धता को सहज बनाइए। कुल मिलाकर रीडर को प्राथमिकता पर रखिए, बाकी सभी चीजें अपने आप ठीक हो जाएंगी।
आप कई प्रतिष्ठित संस्थाओं में अहम पदों पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे में तमाम व्यस्तताओं के बीच कैसे इन सभी जिम्मेदारियों में आपस में तालमेल बिठा पाते हैं और परिवार व अपने लिए कैसे समय निकाल पाते हैं?
मेरा मानना है कि यदि समय को सही ढंग से व्यवस्थित और सदुपयोग करें तो दिक्कत नहीं आती है। रोजाना थोड़ा-थोड़ा समय हर जिम्मेदारी के लिए निकालें। आप थोड़ा-थोड़ा काम रोजाना करते हैं तो सभी कामों के लिए समय निकल आता है। यह एक मिथ है कि समय नहीं है। आप समय निकाल सकते हैं, बस उसे सही से समायोजित करने की जरूरत है और लगातार काम करना पड़ता है, फिर उससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप ऑफिस में हैं अथवा कहीं बाहर।