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CNBC-आवाज पर आलोक जोशी का पैनल तो जोरदार था, पर चर्चा रोचक नहीं हुई...
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। कभी कभी बेहतर आइडिया होते हुए भी उसका प्री-प्रोडक्शन या शो के एक्जीक्यूशन की प्लानिंग पर ज्यादा जोर ना देने से शोज मात भी खा सकते हैं, कम से कम एक लेवल पर ऑडियंस के बीच एक्साइटमेंट तो खो ही देते हैं। पिछले दिनों हिंदी न्यूज चैनल्स पर आए दो
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कभी कभी बेहतर आइडिया होते हुए भी उसका प्री-प्रोडक्शन या शो के एक्जीक्यूशन की प्लानिंग पर ज्यादा जोर ना देने से शोज मात भी खा सकते हैं, कम से कम एक लेवल पर ऑडियंस के बीच एक्साइटमेंट तो खो ही देते हैं। पिछले दिनों हिंदी न्यूज चैनल्स पर आए दो शोज में ऐसा ही हुआ। आइडिया थोड़ा अलग था, तो शुरू में कइयों को लगा कि कुछ अलग होगा, लेकिन देखते देखते लगा कि अगर कुछ बातों पर ध्यान दिया जाता तो शो और बेहतर हो सकता था। इनमें से एक शो था सीएनबीसी आवाज का ‘आईवाज अड्डा’ और दूसरा एबीपी का चुनावी शो।
एबीपी ने इस मामले में शुरुआत की, यूपी चुनाव के लिए बनाए अपने शो में यूपी के कई शहरों में अपने स्ट्रिंगर्स को वहां के बड़े पत्रकारों का इंटरव्यू करने भेजा कि उनका क्या सोचना है, किसके पक्ष में चुनवी समीकरण है और कौन किसका और कैसे गणित बिगाड़ सकता है। आइडिया अच्छा था, पहले भी चैनल्स लोकल पत्रकारों की राय मंगाते रहे हैं। लेकिन शायद स्ट्रिंगर्स को इंटरव्यू के लिए पत्रकार चुनने की इजाजत दे दी गई थी, देखकर लगा कि उन्होंने चुनने में योग्यता के बजाय अपने सम्बन्धों को तरजीह दी। अब जैसे वाराणसी में जो स्ट्रिंगर लाइव कुछ लोगों के साथ खड़ा था, वो सारे लोग अखिलेश यादव की ही सरकार बनाने की बात कर रहे थे, जैसे भाड़े पर या सपा के ऑफिस से ही फोन करके बुलाए गए हों। प्री-प्लानिंग होती तो इस बात की भी होती कि एक ही पार्टी के लोग लाइव पर ना आ जाएं कहीं। लेकिन ये हुआ, पत्रकार चुनने के मामले में हुआ।
ऐसे ही सीएनबीसी आवाज पर मैनेजिंग एडिटर आलोक जोशी का एक शो रात आठ बजे आता है ‘आवाज अड्डा’। उसमें दो तीन दिन पहले डिस्कशन के लिए एक टॉपिक लिया गया राहुल और अखिलेश का गठबंधन। आम तौर पर अलग अलग विचार की पार्टियों के लोग होते हैं, जो एक दूसरे का विरोध करते हैं और बहस रोचक बन जाती है। लेकिन आलोक जोशी ने इस बहस में केवल पत्रकारों को रखा, अब पत्रकारों के नाम सुनिए, पंकज पचौरी, विनोद शर्मा, अभय दुबे, प्रभु चावला, यूपी के अम्बरीश कुमार और एक सीसीडीएस के हिलाल अहमद।
पंकज पचौरी, विनोद शर्मा और अभय दुबे आमतौर पर बीजेपी के हक में नहीं बोलते हैं, अम्बरीश कुमार भी अखिलेश फैन थे और हिलाल अहमद भी। लगा कि प्रभु चावला इन सबका विरोध करेंगे तो बहस मे रोचकता आएगी, लेकिन प्रभु चावला ने भी वो रोल प्ले नहीं किया बल्कि पूरी डिबेट में पैनल के सभी वक्ताओं का एक ही मत था कि ये गठबंधन कमाल दिखा सकता है और सभी एक सुर में उसके पक्ष में तर्क देते दिखे। अब सोचना ये है कि बहस तो हुई नहीं, वाद विवाद या एक दूसरे की बात पर ऐतराज तो हुआ नहीं, एंकर ने भी कोई खास नेगेटिव क्वश्चन नहीं पूछा तो फिर शो को कोई क्यों देखे? सिवाय कांग्रेस और सपा फैंस को छोड़कर।
ऐसे में टीवी पत्रकारों को ये ध्यान देने की जरूरत है कि शो में अंत तक रोचकता कैसे बनी रहे, निष्पक्षता और सभी तरह के विचारों की जगह कैसे बनी रहे। अगर कुछ ना भी बना रहे तो भी टीआरपी लाने के लिए रोचकता तो जरूरी है ही, जब सब एक ही सुर में अलापेंगे तो आधे ही सही ऑडियंस तो मूव करेगा ही और इसे करने के लिए बस प्री-प्लानिंग की थोड़ी जरूरत है।
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