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सोशल मीडिया से नए पत्रकारों में कैसा आया है बदलाव, बताया वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने

समाचार4मीडिया’ व इसकी सहयोगी पार्टनर ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ओर से आयोजित....

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

समाचार4मीडिया’ व इसकी सहयोगी पार्टनर ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ओर से आयोजित ‘मीडिया एंड मीडिया एजुकेशन समिट’ (Media & Media Education Summit) में ‘Conflict between Mainstream Media & Social Media and it’s Impact on Media Education’ शीर्षक से आयोजित पैनल डिस्कशन के दौरान काफी देर तक सवाल-जवाब का दौर चला।

इस दौरान यह पूछे जाने पर कि क्या सोशल मीडिया वास्तव में पत्रकारिता है या ये सिर्फ एक डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म है? वरिष्ठ पत्रकार और ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ के पूर्व प्रेजिडेंट आलोक मेहता ने कहा कि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

उन्होंने कहा कि हमेशा ये परेशानी रही है। पहले लोग कहते थे कि यदि टीवी आएगा तो प्रिंट का क्या होगा? टीवी आ गया। इसके वाद जब वीसीआर आया तो लोगों ने कहा कि सिनेमा हॉल का क्या होगा? सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया आने के बाद अब टीवी के अस्तित्व पर सवाल उठने लगा है। मेरा मानना है कि ये एक-दूसरे को सप्लीमेंट करते हैं। हां, चुनौतियां जरूर हैं।


सोशल मीडिया पर गलत खबरों और फेक न्यूज के बारे में आलोक मेहता ने कहा, ‘1988 के दौर में मैं जब पटना में संपादक रहा तो उस दौरान भी बिहार ही नहीं, देश के कई भागों में ऐसे अखबार निकलते थे जो कुछ भी गैरजिम्मेदाराना ढंग से छाप देते थे। हालांकि उस दौर में मानहानि जैसा कुछ नहीं होता था।’ उनका कहना था कि सोशल मीडिया के दौर में फेक न्यूज का खतरा तो रहता है, लेकिन चाहे पेड न्यूज हो या फेक न्यूज, लोग धीरे-धीरे इसके बारे में समझ जाते हैं।

सोशल मीडिया के आने से एक बदलाव ये तो हुआ है कि जो नए पत्रकार इस पेशे में आ रहे हैं, उन्हें बैकग्राउंड की जानकारी नहीं मिल पाती है। उनके पास संपादकों के बारे में, न्यूज पेपर इंडस्ट्री के बारे में और नेताओं के बारे में बैकग्राउंड का अभाव होता है। वो सोशल मीडिया को ही सबकुछ मान लेते हैं और सोचते हैं कि जो भी जानकारी चाहिए, वे गूगल आदि पर मिल ही जाएगी। आजकल के छात्रों ने ये मान लिया है कि हमें सोशल मीडिया पर इंफॉर्मेशन मिल जाएगी, जिसे वे दूसरों के लिए आगे बढ़ा देंगे। ऐसे में वे स्टोरी में अपना नया कुछ नहीं कर पाते हैं। इस बारे में हमें सोचने की और उचित कदम उठाने की जरूरत है।

रही बात सोशल मीडिया पर आचार संहिता की तो सरकार भी इस दिशा में सोच रही है और हम भी इसके बारे में चर्चा करते हैं। मुझे लगता है कि कई मामलों में सोशल मीडिया फायदा करता है। उससे इंफॉर्मेशन मिलती है, जिसे फॉलोअप किया जाता है।

आलोक मेहता का यह भी कहना था, ‘आजकल के नए पत्रकारों के साथ ये भी बड़ी समस्या है कि वे तुरंत राजदीप सरदेसाई या बरखा दत्त बनना चाहते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि इसके लिए बहुत मेहनत की जरूरत होती है।’ इसके अलावा आलोक मेहता का यह भी कहना था कि पत्रकारों को यह भी सिखाना चाहिए कि यदि किसी ने अच्छा लिखा है तो उसे क्रेडिट दे दिया जाए।


मीडिया एजुकेशन समिट के बारे में उन्होंने कहा, ‘यह एक मिशन है। यह संगम तो है ही, मैं तो कहता हूं कि यह समुद्र मंथन भी है, जिसमें से अमृत भी निकलेगा और इस तरह के कार्यक्रमों को आगे भी जारी रहना चाहिए। इसे दूसरे शहरों में भी करना चाहिए।‘

वहीं, पत्रकारिता में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों के लिए आलोक मेहता ने सलाह दी, ‘पत्रकारिता प्रोफेशन नहीं, बल्कि मिशन हैं और जो भी छात्र इस पेशे में आना चाहते हैं, उन्हें घंटे देखकर काम नहीं करना चाहिए। उनका ध्यान खबर पर होना चाहिए, न कि समय पर। यदि आपको इस पेशे में आगे बढ़ना है तो आपको डॉक्टरों की तरह हमेशा इसके बारे में ही सोचना होगा और लगातार उसी में डूबे रहना होगा। जैसे कई अच्छे डॉक्टर सुबह सात बजे ऑपरेशन करने जाते हैं और रात को 10 बजे राउंड लगाकर घर पहुंचते हैं, इसी तरह से पत्रकारिता के छात्रों को भी 18-18 घंटे काम करना होगा।’

 


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