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जानिए, दर्शक बढ़ने के बाद भी टीवी चैनल क्यों हैं नाखुश

आजकल क्षेत्रीय भाषा के टेलिविजन चैनलों की बहुत चर्चा हो रही...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

सोनम सैनी ।।

आजकल क्षेत्रीय भाषा के टीवी चैनलों की बहुत चर्चा हो रही है। आखिर हो भी क्यों न, जिस तेजी से मार्केट में इनकी मौजूदगी बढ़ रही है, उसे देखकर यही माना जा रहा है कि आने वाले समय में टीवी की ग्रोथ में इनकी बहुत ज्यादा भूमिका रहेगी।

हालांकि एक तरफ तो क्षेत्रीय चैनल काफी आगे बढ़ रहे हैं और ब्रॉडकास्टर्स व ऐडवर्टाईजर्स के लिए नए अवसर भी उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन एक तरफ यह भी माना जा रहा है कि जिस तरह इनकी ग्रोथ हो रही है, उस हिसाब से इनकी विज्ञापन दरें नहीं बढ़ रही हैं।    

इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि व्युअरशिप बढ़ने से विज्ञापनों में तो निश्चित रूप से इजाफा हुआ है, लेकिन विज्ञापन की दरों को यूं ही छोड़ दिया गया है और वे जस की तस बनी हुई हैं।

‘ Viacom18’ (Regional Entertainment) के हेड रवीश कुमार का कहना है कि क्षेत्रीय टीवी चैनल अच्छे संकेत दिखा रहे हैं और मार्केट के हिसाब से चैनल की विज्ञापन दरें भी बढ़ रही हैं। रवीश कुमार का कहना है, ‘क्षेत्रीय टीवी चैनल निश्चित रूप से आगे बढ़ेंगे। यदि लोगों के सामने कुछ विकल्प रखे जाएं तो वे अपनी भाषा के क्वालिटी कंटेंट को प्राथमिकता देंगे।’

कुमार का कहना है, ‘ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ऑफ इंडिया (BARC) का होना भी अच्छी बात है, क्योंकि इससे ऐडवर्टाईजर्स को आकर्षित करने में मदद मिलती है। लेकिन मुद्रीकरण (monetization) को लेकर ऐडवर्टाइजर्स, ब्रॉडकास्टर्स और एजेंसियों के बीच हमेशा कड़ा मुकाबला रहता है और यह लड़ाई कभी खत्म होने वाली नहीं है।’ हालांकि रेटिंग के साथ कीमतें भी बढ़ती है। इसलिए साल दर साल व्युअरशिप में बढ़ोतरी और मार्केट के अनुसार विज्ञापन दरें भी बढ़ रही हैं।  

क्षेत्रीय हिंदी भाषी मार्केट (RHSM), ZEEL के क्लस्टर हेड अमित शाह का मानना है कि यदि ब़ॉडकास्टर्स अपने व्युअर्स अथवा ऐडवर्टाइजर्स पर विशेष ध्यान दें और अपने वादों पर खरे उतरें तो विज्ञापन दरें बढ़नी शुरू हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषी मार्केट में हमारे पास सात चैनल हैं और वे सभी अच्छा कर रहे हैं।    

इस बारे में ‘Spatial Access’ के सीईओ विनीत सोधानी का कहना है कि एक तरफ विज्ञापनों में तो 20 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन विज्ञापन की दरों में मुश्किल से 10-12 प्रतिशत का ही इजाफा हुआ है। उनका कहना है, ‘लोगों को न सिर्फ क्षेत्रीय भाषा के जनरल ऐंटरटेनमेंट चैनल पसंद आ रहे हैं, वहीं क्षेत्रीय भाषा की फिल्में और म्यूजिक भी काफी आकर्षित कर रहे हैं। इसके साथ ही इन चैनलों को मिलने वाले विज्ञापन भी काफी बढ़ गए हैं। इसके बावजूद इस हिसाब से विज्ञापन की दरें नहीं बढ़ रही हैं।’

एक वरिष्ठ मीडिया प्लानर का कहना है कि विज्ञापन की दरों में जो 10-12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है, वह भी सभी के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ चुनिंदा टॉप चैनलों के लिए ही है। उनका कहना है, ‘क्षेत्रीय मार्केट में विज्ञापन की दरें वास्तव में नहीं बढ़ रही हैं। हालांकि कई जगह विज्ञापन दरें 10-15 प्रतिशत बढ़ी हैं, लेकिन इसका फायदा भी सिर्फ टॉप प्लेयर्स ही उठा रहे हैं।’

दरअसल, विज्ञापन की दरें सिर्फ एजेंसियां, ऐडवर्टाइजर्स अथवा ब्रॉडकास्टर तय नहीं करते हैं, इसके पीछे कई फैक्टर जिम्मेदार होते हैं। दरअसल, विज्ञापन की दरें कुछ खास चीजें जैसे-CPRPs (cost per rating points), ERs (effective rates) अथवा मार्केट के कंप्टीशन से तय होती हैं।

इस बारे में ‘Dentsu Aegis Network’ की मीडिया एजेंसी ‘Carat India’ की एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट सुजाता द्विवेदी का कहना है, ‘मार्केट में कई चैनल होते हैं, लेकिन विज्ञापन की दरें एजेंसियां अथवा ऐडवर्टाइजर्स तय नहीं करते हैं। इसके लिए कई बेंचमार्क जैसे- CPRPs (cost per rating points), ERs (effective rates) अथवा मार्केट के कंप्टीशन आदि जिम्मेदार होते हैं। इसके अलावा इसमेंGRPs (gross rating points) जैसे फैक्टर्स भी अहम भूमिका निभाते हैं।’

द्विवेदी का मानना है कि चूंकि विज्ञापन की दरों के लिए कई फैक्टर्स जिम्मेदार होते हैं, ऐसे में नए लॉन्च हुए चैनल के लिए पहले से चल रहे चैनल की रेटिंग को पछाड़ने और ज्यादा विज्ञापन दरें रखने की गुंजाइश कम होती है।

उनका कहना है, ‘ऐसी स्थिति में नए चैनल को शुरुआत में दूसरों के मुकाबले विज्ञापन दरें थोड़ी कम रखनी चाहिए। एक बार मार्केट में पकड़ बनाने के बाद वे विज्ञापन की दरों में इजाफा कर सकते हैं।’

इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि हालांकि बेंचमार्क तय होने के बाद चैनल के लिए ज्यादा की मांग करना बहुत मुश्किल होता है। हालांकि कंटेंट को देखकर ऑडियंस खुश हो सकते हैं, लेकिन एजेंसियां और ऐडवर्टाइजर्स इन बेंचमार्क को तोड़ने में विश्वास नहीं रखते हैं। इस पर नए चैनलों को खुद को मार्केट में जमने के लिए पूरे चक्र से गुजरना होता है। इसलिए शुरुआत में ही उनके लिए ज्यादा विज्ञापन दरें तय करना काफी मुश्किल होता है।   

इसके बावजूद किसी भी नए चैनल के लिए औसत विज्ञापन दरों से ज्यादा की मांग करना पूरी तरह असंभव भी नहीं है। ‘Madison World’ के सीओओ (Buying) नील कमल शर्मा के मुताबिक, यदि किसी नए चैनल पर आने वाले प्रोग्राम मार्केट के टॉप शो में शामिल हो जाते हैं तो हो सकता है कि चैनल को विज्ञापन की अच्छी दरें मिल जाएं।  

जैसा कि रवीश कुमार का कहना है कि यदि लोगों को विकल्प मिले तो वे अपनी भाषा में क्वालिटी कंटेंट देखना पसंद करेंगे। इसके अलावा देश में टीवी की पहुंच काफी ज्यादा है और CPT (cost per thousands) के हिसाब से देखें तो यह सबसे सस्ता मीडिया है। यही कारण है कि ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स क्षेत्रीय चैनलों को महत्व देते हैं और इसी को देखते हुए मार्केट में सोनी मराठी, जी मलयालम और कलर्स कन्नड़ जैसे कई नए चैनल लॉन्च हुए हैं।     

नए चैनलों की लॉन्चिंग और कई रियलिटी शो की वजह से वर्ष 2017 में क्षेत्रीय भाषा की व्युअरशिप में 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। जून 2017 में ‘स्टार टीवी नेटवर्क’ ने ‘स्टार मां’ को नई ब्रैंडिंग और शो के साथ दोबारा लान्च किया था।

क्षेत्रीय कंटेंट की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वर्ष 2018 में स्टार ने आईपीएल की रीजनल फीड को टेलिकास्ट करने का निर्णय लिया। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2018 में क्षेत्रीय मार्केट में आईपीएल की व्युअरशिप में 22 प्रतिशत का इजाफा हो गया।

‘बार्क इंडिया’ के डाटा के अनुसार, पिछले दो वर्षों में क्षेत्रीय भाषा की व्युअरशिप काफी बढ़ी है। इसमें भोजपुरी भाषा की व्युअरशिप 134 प्रतिशत बढ़ी है। इसके बाद 125 प्रतिशत के बढ़ोतरी के साथ असमिया भाषा का नंबर है। उड़िया की व्युअरशिप में 89 प्रतिशत, गुजराती में 81 प्रतिशत, मराठी में 68 प्रतिशत, बंगाली में 55 प्रतिशत, कन्नड़ में 52 प्रतिशत, पंजाबी में 34 प्रतिशत, हिंदी में 23 प्रतिशत, तेलुगु में 18 प्रतिशत और तमिल भाषा की व्युअरशिप में 17 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।

यही नहीं, पिछले वर्ष की तुलना में क्षेत्रीय भाषा के चैनलों की ऐडवर्टाइजिंग में भी बढ़ोतरी हुई है। इनमें भोजपुरी चैनलों पर 54 प्रतिशत, बंगाली भाषा में 39 प्रतिशत और तमिल चैनलों में 22 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिला है।  

फरवरी 2018 में ‘Viacom 18’ ने ‘Colors Tamil’  के साथ तमिल के जनरल ऐंटरटेनमेंट चैनल (GEC) मार्केट में प्रवेश किया था। लॉन्चिंग के समय यह चैनल तमिलनाडु के 11 मिलियन घरों में उपलब्ध था और इसके पास हर हफ्ते 22 घंटे का ऑरिजिनल कंटेंट होता था। इसके बाद नेटवर्क ने कन्नड़ मार्केट के लिए एक मूवी चैनल लॉन्च करने की घोषणा भी की थी।    

वित्तीय वर्ष (FY) 2018 में विज्ञापन पर खर्च मामले में हिंदी के जनरल एंटरटेनमेंट चैनलों का जलवा बरकरार रहा। हालांकि adex रिपोर्ट की बात करें तो वित्तीय वर्ष 2018 में क्षेत्रीय भाषा के चैनलों में 5.4 प्रतिशत की ग्रोथ के मुकाबले हिंदी के जनरल एंटरटेनमेंट चैनलों में नौ प्रतिशत की गिरावट हुई है।

‘Dishum Broadcasting Pvt Ltd’ के सीओओ पार्थ डे का कहना है, ‘विज्ञापन की दरों में इजाफा हो रहा है। बिहार और झारखंड जैसे मार्केट में विज्ञापन दरें लगातार बढ़ रही हैं। इसके अलावा यदि आप नेशनल ब्रॉडकास्टर हैं और टॉप के चैनलों में शुमार हैं तो आप ऐडवर्टाइजर्स से ज्यादा दरें मांग सकते हैं।’

वहीं, ‘Kerala Vision’ के कंसल्टेंट कृष्ण कुमार का कहना है, ‘विज्ञापन दरें तय करने में कई फैक्टर्स जैसे- चैनल का कंटेंट कैसा है, मार्केट में उसकी क्या पोजीशन है, आदि पर निर्भर करती हैं। अलग-अलग मार्केट खासकर दक्षिण भारत में विज्ञापन दरें अलग होती हैं। लेकिन किसी भी चैनल के लिए नेशनल मार्केट से मिलने वाला रेवेन्यू उसकी पहुंच, प्रोग्राम परफॉर्मेंस आदि पर ज्यादा निर्भर करता है।’

उनका यह भी कहना है, ‘यदि चैनल और उसकी प्रोग्राम परफॉर्मेंस के साथ ही चैनल के बारे में लोगों की राय अच्छी है तो विज्ञापन की दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है।’


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