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मार्केट से कदमताल बिठाने के लिए कई अखबार उठा रहे यह कदम...

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।। आजकल विभिन्‍न अखबारों में ऐडवर्टाइजिंग रेट में बढ़ोतरी का मुद्दा चारों ओर छाया हुआ है। पिछले हफ्ते की ही बात है जब बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) ने अपने स्‍वामित्‍व वाले अखबारों में विज्ञापनों के र

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

आजकल विभिन्‍न अखबारों में ऐडवर्टाइजिंग रेट में बढ़ोतरी का मुद्दा चारों ओर छाया हुआ है। पिछले हफ्ते की ही बात है जब बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) ने अपने स्‍वामित्‍व वाले अखबारों में विज्ञापनों के रेट आठ से 10 प्रतिशत बढ़ाने की घोषणा की थी, वहीं अब अन्य अखबारों ने भी कुछ इसी तरह के संकेत दिए हैं।

विज्ञापन रेट  में बढ़ोत्तरी को लेकर BCCL का कहना था कि हमने अपने कंटेंट, कॉपी, डिस्‍ट्रीब्‍यूशन नेटवर्क और टेक्‍नोलॉजी आदि में काफी निवेश किया है ताकि पाठकों को एक बेहतर आउटपुट दिया जा सके। इसी कारण हम अपने विज्ञापन रेटों में आठ से दस प्रतिशत की मामूली वृद्धि कर रहे हैं।

‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ और ‘इकनॉमिक टाइम्‍स’ जैसे बड़े अंग्रेजी अखबारों के अलावा BCCL हिन्‍दी दैनिक अखबार ‘नवभारत टाइम्‍स’ का प्रकाशन भी करता है। ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS)2014 के अनुसार इस अखबार की पाठक संख्‍या 27,36,000 है। इसके अलावा स्‍टडी में बताया गया था कि टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रीडरशिप  75,90,000 और इकनॉमिक टाइम्‍स की रीडरशिप 8,34,000 है।’

सिर्फ टाइम्‍स ग्रुप ही अकेला नहीं है जिसने नए वित्‍तीय वर्ष में अपने विज्ञापनों की दरों में इजाफा किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्‍सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से बातचीत में कई अखबारों ने अपनी विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी के संकेत दिए हैं।

पि‍छले दिनों नोटबंदी (demonetisation) का झटका झेल चुकी प्रिंट मीडिया अब अपने विज्ञापन के रेट बढ़ाकर ताकतवर भूमिका में उभरने लगी है। पिच मैडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2017 के अनुसार, चालू वर्ष (current year) में इंडियन प्रिंट ऐडवर्टाइजिंग मार्केट में 9.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होगी और यह करीब 20,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाएगा।

 इस बारे में विभिन्‍न मार्केट लीडर्स का क्‍या कहना है, आइए जानते हैं उन्‍हीं की भाषा में...

‘दैनिक भास्‍कर ग्रुप’ देश के बड़े प्रिंट मीडिया प्‍लेयर्स में से एक है और 60 से ज्‍यादा एडिशंस के साथ इसके सात अखबार निकलते हैं। दैनिक भास्‍कर के प्रमोटर डायरेक्‍टर गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘नोटबंदी के कारण दिसंबर से फरवरी तक बिजनेस काफी प्रभावित रहा।’ मार्च में औसत परफार्मेंस के बाद उन्‍होंने उम्‍मीद जताई है कि यह वित्‍तीय वर्ष काफी अच्‍छा रहेगा।

अग्रवाल ने कहा, ‘हम सामान्‍यत: अपने रेट आठ से दस प्रतिशत बढ़ाते हैं। इस साल चूंकि नोटबंदी रही है, इसलिए हम लगभग पांच प्रतिशत रेट बढ़ा सकते हैं।’ ऐडवर्टाइजिंग कैटेगरी में अधिकतर सेल्‍स ग्रोथ टीयर टू (tier 2) और टीयर थ्री (tier 3) शहरों से आ रही है, ऐसे में उन्‍होंने मार्केटर्स से मेट्रो सिटी से अलग हटकर अन्‍य शहरों पर भी ध्‍यान देने को कहा है।‘ Ernst & Young report’ का हवाला देते हुए अग्रवाल ने कहा कि देश में 8 मेट्रो शहरों के अलावा 40 मेगा सिटी में भी ग्रोथ बढ़ेगी। ऐसे में हमारे लिए काफी बड़ा अवसर है। इन 40 शहरों में 23 शहरों में हम काफी अच्‍छा करते हैं।

इस बारे में यदि ‘एचटी मीडिया’ की बात करें तो कंपनी हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, हिन्‍दुस्‍तान और मिंट दैनिक अखबारों का प्रकाशन करती है। रही बात विज्ञापनों की तो एचटी मीडिया और बीसीसीएल में रेटों को लेकर काफी अंतर दिखाई देता है। एचटी इंग्लिश के सीईओ राजीव बेओत्रा ने कहा, ‘रेट को लेकर अब पहले जैसी कोई बात नहीं रह गई है। इंडिस्‍ट्री में कई मीडिया कंपनी लगातार रेट बढा रही है। डिजिटल समेत एचटी मीडिया भी सभी प्रॉडक्‍ट की कीमतें बढ़ाने जा रही हैं। ’

हालांकि दैनिक भास्‍कर और एचटी मीडिया ने अपनी स्थिति स्‍पष्‍ट कर दी है, वहीं दैनिक जागरण इस मामले में कुछ भी कहने से परहेज कर रहा है। कई ईमेल और टेक्‍स्‍ट मैसेज करने के बाद भी दैनिक जागरण के वरिष्‍ठ एग्जिक्‍यूटिव ने इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी है।

एचटी मीडिया की तरह जागरण प्रकाशन लिमिटेड भी सूचीवद्ध (listed) कंपनी है। इस प्रकाशन लिमिटेड के तहत हिन्‍दी दैनिक अखबार ‘दैनिक जागरण’ का प्रकाश होता है। IRS2014 की रिपोर्ट के अनुसार इस अखबार की रीडरशिप 1,66,31,000  थी।

हालांकि दैनिक जागरण के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि यह संस्‍थान हर वित्‍तीय वर्ष की शुरुआत में अपने विज्ञापनों के रेट को संशोधित करता है। लेकिन अभी नहीं पता कि कंपनी इस बारे में क्‍या सोच रही है। हालांकि सूत्र ने यह भी बताया कि प्रबंधन की बैठक के बाद 20 अप्रैल तक इस बारे में कोई निर्णय हो सकता है।

प्रादेशिक अखबार (Regional giants)

चूंकि हमारा देश बहुत बड़ा है और इसमें कई प्रादेशिक अखबार भी निकलते हैं। कई जगह तो ये प्रादेशिक अखबार राष्‍ट्रीय अखबारों तक को टक्‍कर देने में पीछे नहीं हैं। ऐसी ही एक जगह है केरल, जिसे देश में सबसे ज्‍यादा शिक्षित राज्‍य माना जाता है। यहां दैनिक अखबार मलयालम मनोरमा सबसे ज्‍यादा पढ़ा जाता है। इस साल एक अप्रैल को मलयालम डेली ने अपने 11 एडिशंस में विज्ञापनों के रेट 10 प्रतिशत तक बढ़ा दिए हैं।

रेट में बढ़ोतरी के निर्णय को सही ठहराते हुए ‘मलयालम मनोरमा’  के वाइस प्रेजिडेंट वर्गीस चंडी ने कहा, ‘दुनिया में हर चीज में बढ़ोतरी हो रही है लेकिन प्रत्‍येक व्‍यक्ति चाहता है कि अखबार उसी कीमत पर मिले जिस पर दस साल पहले मिलता था।’ उन्‍होंने कहा कि पिछले साल मनोरमा की 100000 कॉपी बढ़ी हैं और इसके पाठकों की संख्‍या 2.5 मिलियन पहुंच गई है। चांडी ने कहा, ‘देश भर में अन्‍य अखबारों के मुकाबले हम अपने ऐडवर्टाइजर्स से सही कीमत लेते हैं, इसलिए रेट बढ़ाने का निर्णय सही है।’

एक और प्रसिद्ध अखबार ‘राजस्‍थान पत्रिका’ ने करीब तीन महीने पहले यही किया था। अखबार ने अपने 21 एडिशंस में एक जनवरी से विज्ञापनों के रेट लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ा दिए थे। फरबरी में पत्रिका टीवी लॉन्‍च करने के साथ ही अखबार ने मल्‍टीमीडिया अप्रोच शुरू कर दी थी और अब यह रेडियो स्‍टेशन भी चला रहा है।

वहीं अमर उजाला में ऐडवर्टाइजिंग रेट को लेकर अभी चर्चाएं चल रही हैं और इस बारे में अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। हालांकि अमर उजाला के एक अधिकारी ने कीमत रिवाइज्‍ड करने की वकालत की है। इस अधिकारी का मानना है कि टाइम्‍स ऑफ इंडिया की तरह अमर उजाला को भी विज्ञापनों के रेट बढ़ाने चाहिए क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश जैसे मार्केट में इसकी दमदार मौजूदगी है। यदि इस अधिकारी की बात पर यकीन करें तो ऐडवर्टाइजिंग रेट को लेकर अमर उजाला हफ्ता-दस दिन में कोई निर्णय ले सकता है।

मझोले अखबार (Medium-sized players)

पूर्वी भारत में लोकप्रिय अखबार ‘द स्‍टेट्समैन’ उत्‍तरी भारत में भी अपनी मजबूत पकड़ बनाने का प्रयास कर रहा है। यह पंजाब, हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में जल्‍दी के एडिशन पर फोकस कर रहा है लेकिन अब समय बदल चुका है।

इस बारे में ‘द स्‍टेट्समैन’ लिमिटेड के नेशनल सेल्‍स हेड राकेश शर्मा का कहना है, आज मार्केट का जो हाल है उसमें प्रिंट को ऐड रेवेन्‍यू ज्‍यादा नहीं मिल रहा है। इसके पीछे उनका कहना है कि विज्ञापन अब डिजिटल की ओर भी जा रहा है, जिसकी वजह से भी प्रिंट को नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि बिजनेस में बने रहने के लिए अखबारों को या तो अपने ऐडवर्टाइजिंग रेट बढ़ाने होंगे अथवा विज्ञापनों की संख्‍या में इजाफा करना होगा। राकेश शर्मा का कहना है कि उनके अखबार ने पहला वाला विकल्‍प चुना है और ऐडवर्टाइजिंग रेट में 15-20 प्रतिशत बढ़ोतरी की गई है।

वहीं ‘द मिलेनियम पोस्‍ट’ के एडिटर-इन-चीफ दरबार गांगुली का मानना है कि उनके और ‘द इंडियन एक्‍सप्रेस’ जैसे अखबारों के लिए अभी तक रेट सीमित थे। गांगुली ने कहा, ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया जैसे अखबार जो काफी अच्‍छी स्थिति में हैं, वही इस तरह का निर्णय ले सकते हैं लेकिन मध्‍यम आकार के अथवा मझोले अखबारों के लिए स्‍कोप सीमित है।’ गांगुली के अनुसार, जब ऐडवर्टाइजिंग वॉल्‍यूम कम होता है तो ऐडवर्टाइजर्स उन अखबारों से परे नहीं देखते हैं जो पहले अथवा दूसरे स्‍थान पर हैं। अवसरों की कमी के बावजूद गांगुली ने माना कि आने वाले समय में वह भी रेट रिवाइज करेंगे।

गांगुली के अनुसार, पहले साल में उनके साथ ऐडवर्टाइजर्स की बड़ी संख्‍या थी लेकिन दूसरे वित्‍तीय वर्ष में वे सब गायब हो गए। ऐसे में अन्‍य विकल्‍पों पर विचार करने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा, ‘हम ऐडवर्टाइजर्स को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।’

वहीं मीडिया जगत की बड़ी हस्‍ती और द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस’ के एडिटोरियल डायरेक्‍टर प्रभु चावला ऐडवर्टाइजिंग रेट को लेकर हो रही बहस को संपादकीय नजरिये से देखते हैं। उन्‍होंने समाचार पत्रों से उन उदाहरणों का पालन करने का आग्रह किया है,  जिन्‍होंने अपनी कीमतें बढ़ा दी हैं। उन्‍होंने तर्क दिया कि वर्तमान में कंज्‍यूमर्स के लिए न्‍यूज को सब्सिडाइज किया जा रहा है। उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि ऐडवर्टाइजर्स और कंज्‍यूमर्स दोनों को इसका भुगतान करना पड़ेगा। प्रभु चावला ने कहा, ‘नीचे की पंक्ति (bottom line) को इंप्रूव करने के लिए समाचार पत्र मा‍लिकों और संपादकों द्वारा कई तरह के समझौते किए जा रहे हैं।’

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