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पत्रकारिता नौकरी नहीं है- पुण्य प्रसून, राम बहादुर राय
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो आज हम पत्रकारिता की बात करते है तो काफी आश्चर्य होता है कि देश का चौथा स्तंभ कहीं अपने उद्देश्यों से हटकर किसी और दिशा में जा रहा है। ऐसा लगता है कि आज पत्रकारिता की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आये दिन कितने न्यूज चैनल और अखबार देश में खोले जा रहे हैं, चैनल और अखबारों में पत्रकारों की चयन प्रक्रिया को लेकर न ही मीडिया
समाचार4मीडिया ब्यूरो 15 years ago
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो आज हम पत्रकारिता की बात करते है तो काफी आश्चर्य होता है कि देश का चौथा स्तंभ कहीं अपने उद्देश्यों से हटकर किसी और दिशा में जा रहा है। ऐसा लगता है कि आज पत्रकारिता की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आये दिन कितने न्यूज चैनल और अखबार देश में खोले जा रहे हैं, चैनल और अखबारों में पत्रकारों की चयन प्रक्रिया को लेकर न ही मीडिया हाउस सर्तक है और न ही सरकार। क्या है इस मसले की तह और हकीकत. समाचार4मीडिया के संवाददाता कन्हैया यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कुछ मीडिया महारथियों के साथ अनुराधा प्रसाद , मैनेजिंग डायरेक्टर, न्यूज 24 अगर मीडिया में पत्रकारों की भर्ती पर सरकार हस्तक्षेप करेगी, तो मीडिया देश का चौथा स्तंभ नहीं रह जायेगा, और वह सरकार के दबाब में काम करेगा। जहां तक पत्रकारों की भर्ती की बात है तो हमने अपना मीडिया स्कूल खोल रखा है, जहां बच्चों को पूरी तरह पत्रकारिता के गुण सिखाये जाते है। इस बाबत उन्होंने कहा कि छोटे चैनलों पर मीडिया संघ को निगरानी रखनी चाहिए। पुण्य प्रसून वाजपेयी , सलाहकार संपादक, ज़ी न्जूज मैं पत्रकारिता को नौकरी नहीं मानता। पत्रकारिता में आने वाले लोगों को समाज कल्याण हेतु ही आना चाहिए। इसका एक ही उद्देश्य होना चाहिए वो है सेवा। रामबहादुर राय , संपादक, प्रथम प्रवक्ता अगर पत्रकारों की भर्ती में सरकार का हस्तक्षेप हो जाये तो वह निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर पायेगी। मीडिया जनता की नैतिक प्रतिनिधि है। पत्रकारिता डिग्री और डिप्लोमा से नहीं चलती, पत्रकारिता बुद्धि, विवेक और अनुभव से चलता है। जो लोग डिग्री और डिप्लोमा लेकर इस क्षेत्र में आते है उन्हें आराम, सुरक्षित और पैसे वली जिदंगी चाहिए, जो कि पत्रकारिता में संभव नहीं। इस समस्या से निपटने के लिए प्रेस काउंसिल को आगे आना चाहिए लेकिन, आजकल वह काफी कमजोर हो चुका है। उक्त समस्या से निपटने के लिए मीडिया संघ को दखल देना चाहिए न कि सरकार को। यह काफी दिलचस्प बात है कि महात्मा गांधी को भी एक पत्रकार कहा गया है, और हमारे आज के पत्रकार। अगर इन पत्रकारों के साथ गांधी पत्रकार की तुलना की जाये तो यह काफी शर्म की बात होगी। मेरी इन पत्रकारों से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है, पेशे से मैं भी इसका एक छोटा सा अंग हूँ। हमारे आज के पत्रकार भाई भले ही किसी चैनल व न्यूज-पेपर का आई-कार्ड और हाथ में माइक लेकर अपने आप को पत्रकार कहते हों, लेकिन वास्तव में उनमें ऐसी ललक नहीं है जिससे उन्हें इतना बडा दायित्व दिया जा सके। आजकल के पत्रकार पत्रकारिता की गरिमा को भूलते जा रहे है। आजकल तो पत्रकार बनना इतना आसान हो गया है कि कोई अगर कुछ नहीं बन पाता तो चलो कम से कम पत्रकार तो बन ही जायेंगे। अपने चाचा जी इस चैनल/अखबार के संपादक है, अगर इससे काम नही चला तो किसी संस्था से पत्रकारिता में डिग्री लेकर तो पत्रकार बन ही जायेंगे। काफी शर्म की बात है यह कि पत्रकारिता को हमलोग इस नजरिया से देखते है। कहीं न कहीं सरकार को चैनलों और न्यूज-पेपर में पत्रकारों की भर्ती को लेकर कोई ठोस कदम उठाना चाहिए। रहा सवाल भारतीय पत्रकारिता के भविष्य का, उसका भविष्य तो भारत के भविष्य से ही जुड़ा हुआ है। भारत का भविष्य उज्ज्वल है तो भारतीय पत्रकारिता का भविष्य भी उज्ज्वल ही होगा। बस जरूरत है तो कुछ सुधार की। समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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