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अंग्रेजी पत्रकारिता के आगे लाचार है हिंदी पत्रकारिता
आज तीस मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। दिवस खैर आता है और चला जाता है...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago
कुमार पंकज
वरिष्ठ पत्रकार ।।
आज तीस मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। दिवस खैर आता है और चला जाता है इसके साथ ही हम थोड़ी बहुत इस पर चर्चा भी कर लेते हैं कि चलो हिंदी पत्रकारिता किस मोड़ पर है। लेकिन मुझे लगता है कि इस चर्चा के कोई मायने अब रह नहीं गए हैं। केवल दिवस के बारे में सोचकर यह जरूर खुश हो जाते हैं कि इसी बहाने हिंदी पत्रकारिता पर चर्चा तो हो जाती है। लेकिन हिंदी पत्रकारिता अब कहां रह गई है इस पर विचार करने की जरूरत है।
आज हिंदी और अंग्रेजी में बड़ा फर्क आ गया है। दिल्ली में पत्रकारिता करते हुए मुझे 16 साल हो गए और इस दौरान बहुत बड़े बदलाव हो गए हैं। आज दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ इस बात के लिए रह गई है कि खबरें लिखते जाओ इसका कोई असर होने वाला नहीं है। लेकिन अगर वहीं खबर अंग्रेजी अखबार में छपती है तो इसका मतलब यह हुआ कि उस पर गौर किया जाता है और कार्यवाही होती है।
मुझे याद है कि 2005 में जब मैं एक हिंदी अखबार में काम कर रहा था तब मुझे किसी पुलिस अधिकारी से किसी खबर हो लेकर बात करनी थी लेकिन वह अधिकारी बात करने से मना कर रहा था जब मैंने अपने वरिष्ठ को यह बात बताई तब उन्होंने हमारे दूसरे सहयोगी से कहा कि तुम बात कर लो तो उसने उसी अधिकारी से अंग्रेजी के एक बड़े समाचार पत्र का नाम लेकर बात की और उस अधिकारी ने भी बड़े मजे से उसे अपनी बात बताई। कहने का तात्पर्य यह है कि अधिकारी भी अंग्रेजी के अखबार में खबर छपने को अपना महत्व समझता है हिंदी तो उसके लिए दोयम दर्जे की चीज हो गई।
ऐसी कई घटनाएं है जिनका जिक्र किया जा सकता है लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह की घटनाओं का जिक्र करके कोई ठोस उपाय नहीं निकल सकता। हिंदी और अंग्रेजी के बड़े फर्क को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि आज हिंदी में काम करने वाला पत्रकार अपने वेतन से जहां अपने को नीचा दिखाता है वहीं अंग्रेजी का पत्रकार बढ़िया वेतनमान मिलने से चेहरे पर खुशी का भाव लिए काम करता है। यह फर्क हिंदी और अंग्रेजी को लेकर हो सकता है। लेकिन इस फर्क को हिंदी के लोगों ने ही पैदा किया जो कि पत्रकारिता को मिशन बताकर हिंदी को दोयम दर्जे का साबित करने में लगे रहे।
अगर पत्रकारिता के इतिहास पर नजर दौड़ाए तो देखने में आया है कि हिंदी पत्रकारिता ने हर समय अपनी भूमिका निभाई चाहे, वह आजादी के पहले हो या फिर आजादी के बाद। लेकिन पत्रकारिता के बड़े मठाधीशों ने हिंदी के नाम पर केवल पत्रकारों को ठगा।
मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन कुछ बड़े पत्रकारों के अनुभवों ने इस बात पर सोचने के लिए मजबूर किया कि हिंदी की पत्रकारिता के लिए ऐसे लोग ही जिम्मेवार हैं जो पत्रकारिता को मिशन बताकर नए पत्रकार पैदा किए और उनसे केवल काम लेते रहे। इस बात की चिंता नहीं की उसका घर परिवार कैसे चलेगा, वह समाज में इज्जत के साथ कैसे रहेगा। बस प्रतिष्ठा इस बात की थी कि चलो पत्रकार हैं बड़े लोगों के साथ उठने बैठने का मौका मिल जाएगा।
आज जब हिंदी पत्रकारिता के कई बड़े पत्रकार उपेक्षित हो रहे हैं तब उन्हें लग रहा है कि कहीं न कहीं गल्तियां हुई हैं। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। पत्रकारिता अब मिशन न होकर व्यवसाय बन गया है और इसका फायदा मीडिया संस्थान के मालिक उठा रहे है।
बीते साल हिंदी पत्रकारिता को लेकर एक शोध हुआ था जिसमें इस बात पर चिंता व्यक्त की गई थी कि हिंदी मीडिया संस्थानों में अगर सबसे कम वेतनमान किसी का है तो वह हिंदी पत्रकारों का है। जबकि उसी संस्थान के अन्य विभागों में काम करने वाले कर्मचारी पत्रकारों से कहीं ज्यादा वेतन उठा रहे है। इसका मतलब यह हुआ कि हिंदी पत्रकारिता के नाम पर केवल दिखावा भर है। कई ऐसे संस्थान हैं जो वेतनमान तो दे नहीं रहे है बल्कि पत्रकारिता करने के नाम पर संस्थान का एक आईकार्ड दे देते हैं और यह अपेक्षा रखते हैं कि पत्रकार उनके संस्थान के लिए आर्थिक संसाधन मुहैया कराएगा चाहे वह विज्ञापन के तौर पर हो या फिर पेड न्यूज के तौर पर। यह दुखद समय है हिंदी पत्रकारिता के लिए। जहां के पत्रकार लाचार और बेवश है संस्थानों के रवैये से।
मजीठिया वेतनमान की सिफारिशें पत्रकारों के लिए लागू की गई। लेकिन एक भी हिंदी का मीडिया संस्थान ऐसा नहीं है जो कि इन सिफारिशों पर अमल करे। कहने को तो एक-एक संस्थान कई-कई संस्करण निकालकर अपने को देश का सर्वेश्रेष्ठ समाचार पत्र साबित करने में लगा है लेकिन उस संस्थान के अंदरुनी हालात क्या हैं यह तो वह काम करने वाले पत्रकारों से जाना जा सकता है। पत्रकार की भी अपनी मजबूरी है। बेरोजगारी के इस दौर में उसे लगता है कि जहां वह काम कर रहा है भले ही कम वेतनमान मिल रहा है उसी से गुजारा चलाए क्योंकि अगर नौकरी चली गई तो उसे फिर कहीं नौकरी मिलने वाली नहीं है। इसके अलावा और भी कई मजबूरियां हैं जो हिंदी के पत्रकारों को लाचार करती हैं। लेकिन इन मजबूरियों का अब रोना रोने से कोई फायदा होने वाला नहीं है।
आज भी देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार वाले सर्वाधिक अखबार हैं। हिंदी की फिल्में देश-दुनिया में नाम कमा रही है। हिंदी के समाचार चैनल टीआरपी में नंबर एक हैं। लेकिन व्यवसायिक प्रोफेशन की अगर बात की जाए तो हिंदी का नंबर काफी पीछे चला गया है। अब हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हम चर्चा कर लें। अखबारों में कॉलम पढ़ ले या फिर इसका कितना भी विश्लेषण कर लें कोई खास फायदा दिख नहीं रहा है।
मुझे उम्मींद की एक किरण यह दिखाई दे रही है कि अगर सरकार और पत्रकार थोड़ा सा इच्छाशक्ति दिखाएं तो हिंदी के पत्रकारों के सुनहरे दिन आ सकते हैं साथ ही हिंदी पत्रकारिता की भी स्थिति सुधर सकती है।
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