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आ सकता है विज्ञापन रहित खबरों का दौर! बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपनाई ये स्ट्रैटजी...
सैफ अहमद खां ।। पिछले साल जून में बिजनेस स्टैंडर्ड ने कुछ
समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago
सैफ अहमद खां ।।
पिछले साल जून में बिजनेस स्टैंडर्ड ने कुछ अलग करने की सोची। यह सोच थी खबरों को पढ़ने के लिए पाठक से पैसे लेने की यानी ‘पे वाल’ की। यह बदलाव वेबसाइट पर करने का सोचा गया। भारत में करीब 99,660 अखबार रजिस्टर्ड हैं, इनमें से सिर्फ बिजनेस स्टैंडर्ड ने ‘पे वॉल’ (Pay Wall) के साथ जाने की सोची। 'पे वॉल' के जरिए पाठक को खबरों के बदले थोड़ा का भुगतान करना पड़ता है, पर वे खबरों के बीच आने वाले विज्ञापनों से बच जाता है।
बिजनेस स्टैंडर्ड के डिजिटल बिजनेस हेड शेलैंद्र कालेलकर ने कहा, ‘हमने एक जून 2016 को ‘पे वाल’ को शुरू किया था तब से लगातार यह बढ़ता ही जा रहा है। हाल ही में हमने अपने ई-पेपर को ‘पे वाल’ पर कर दिया है। फिलहाल हमारी एक्सक्लूसिव स्टोरीज ‘पे वाल’ प्रोटेक्टेड हैं, वहीं न्यूज एजेंसीज की न्यूज स्टोरीज फ्री में पढ़ी जा सकती हैं।’
पिछले कुछ समय से दुनियाभर के डिजिटल पब्लिशर्स खबरों के बदले भुगतान को लेकर सक्रिय है और अपनी इस रणनीति को लेकर आशावान भी हैं। इसी वजह से बिजनेस स्टैंडर्ड मैनेजमेंट ने ‘पे वाल’ के साथ जाने की सोची। यह पहल चौतरफा सराही गई जिसमें एडिटर्स और कंटेंट क्रिएटर्स की सोच भी शामिल थी।
कालेलकर के अनुसार, ‘बिजनेस स्टैंडर्ड हमेशा से ही अपने कंटेंट के लिए जाना जाता है और हम समझते हैं कि हमारे कंज्यूमर्स इसके लिए छोटा सा भुगतान करने के लिए तैयार होंगे। ‘पे वाल’ को लाने के पीछे मेन आइडिया हमारे प्राइमरी स्टेकहोल्डर्स यानी रीडर्स को बेहतर प्रोडक्ट देना का है।’
‘पे वाल’ के शुरुआती रिस्पॉन्स से बिजनेस स्टैंडर्ड का हौंसला बढ़ा है। हालांकि प्रतिस्पर्धा और दूसरे कारणों की वजह से कालेलकर ने यह बताने से मना कर दिया कि ‘पे वाल’ के शुरू करने के बाद उनके रेवेन्यु में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई, लेकिन उन्होंने यह साफ कर दिया कि परिणाम सराहनीय हैं। वे आगे कहते हैं कि ’फिलहाल हम अभी इसमें नए हैं और इसलिए हम इस पर ज्यादा बात करने के लिए स्थिति में भी नहीं है लेकिन परिणाम हमें प्रोडक्ट की बेहतरी के लिए ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।’
सब्सक्राइबर्स तक एक्सक्लूसिव कंटेट पहुंचाने के साथ ही बिजनेस स्टैंडर्ड कंटेंट के विविधिकरण पर भी प्रयोग कर रहा है। वे प्रीमियम सब्सक्राइबर्स के लिए ऑडियंस एंगेजमेंट प्रोग्राम पर फोकस कर रहे हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें प्रीमियम मेंबर्स के लिए आयोजित पोस्ट बजट इवेंट की सफलता से मिली है।
दूसरे मीडिया घरानों की तरह ही बिजनेस स्टैंडर्ड की सोच भी यही है कि डिजिटल जर्नलिज्म के आने के बाद भी प्रिंट तो रहेगा ही। ’जहां कस्टमर्स कई प्लेटफॉर्म्स से कंटेट का सक्रिय रूप से उपभोग कर रहे हैं, वहीं भारत में प्रिंट कुछ और समय तक प्रासंगिक रहने वाला है। बिजनेस स्टैंडर्ड में हम समझते हैं कि प्रिंट और डिजिटल एक दूसरे के पूरक बनकर सामने आएंगे, यह कहना है कालेलकर का। फर्जी खबरों के दौर में विश्वसनीय मीडिया ब्रैंड्स को लगातार चुनौतियां मिल रही हैं ऐसे में बिजनेस स्टैंडर्ड ने एडिटर्स को महत्व देते हुए उनके द्वारा रीडर्स के लिए प्रासंगिक खबरों के चुनाव के महत्व को समझा।
बिजनेस स्टैंडर्ड इस बात से वाकिफ है कि जो रास्ता उसने चुना है वह दूसरे प्रतिद्वंदी अखबारों के गले नहीं उतरेगा। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘यह मीडिया हाउस पर निर्भर करता है कि उनकी रणनीति क्या रहेगी। इस दिशा में उठाया गया कदम इंडस्ट्री को और भी बेहतर बनाएगा।’
बिजनेस स्टैंडर्ड की तरह ही अभिनंदन सेकरी के डिजिटल न्यूज वेंचर ने नए साल से अपने सबसे पॉपुलर आर्टिकल्स को ‘पे वाल’ के अंतर्गत रखा। भारतीय मीडिया में ‘पे वाल’ की व्यवहार्यता पर एक्चेंज4मीडिया से पहले बात करते हुए सेकरी की सोच भी कालेलकर से मिलती जुलती थी। न्यूजलॉन्ड्री के को-फाउंडर और सीईओ सेकरी ने आगे कहा, ’यह आपके प्रोडक्ट और मॉडल पर डिपेंड करेगा। ऐसी कोई एक विशेष चीज नहीं है जो काम करेगी या करनी चाहिए।’
मैगजीन सेक्शन में आउटलुक ने तब ‘पे वाल’ की तरफ संकेत दिए जब उसने जनवरी से वेबसाइट पर ऐड फ्री एक्सपीरियंस के लिए रोज पासेज देने शुरू कर दिए। प्रिंट इंडस्ट्री में बिजनेस स्टैंडर्ड और आउटलुक की तरह कुछ ही पब्लिकेशंस ऑनलाइन में एडवरटाइजमेंट का विकल्प देख रहे हैं। इनकी सफलता सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि उनका कंटेंट कितना अनोखा है बल्कि यह बात भी मायने रखेगी कि कंज्यूमर्स पे वार्ल्ड न्यूज कंटेट और जानकारियों को कितना स्वीकार करते हैं, जो अन्यथा फ्री में उपलब्ध है।
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