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दूसरे विश्व युद्ध की ब्रेकिंग न्यूज देने वाली पत्रकार को कुछ यूं किया गया याद...

ब्रिटिश जर्नलिस्ट क्लेयर हॉलिंगवर्थ की 105 साल की उम्र में 10 जनवरी को निधन हो गया। उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में ब्रेक्रिंग न्यूज दिए जाने का श्रेय दिया जाता है। हिंदी दैनिक ‘नया इंडिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए हॉलिंगवर्थ को वरिष्ठ पत्रकार विवेक सक्सेना ने कुछ यूं याद किया-

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

ब्रिटिश जर्नलिस्ट क्लेयर हॉलिंगवर्थ की 105 साल की उम्र में 10 जनवरी को निधन हो गया। उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में ब्रेक्रिंग न्यूज दिए जाने का श्रेय दिया जाता है। हिंदी दैनिक ‘नया इंडिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए हॉलिंगवर्थ को वरिष्ठ पत्रकार विवेक सक्सेना ने कुछ यूं याद किया-

महिला पत्रकार, जिसने रचा इतिहास!

दस जनवरी का दिन पत्रकारिता के क्षेत्र में हमेशा के लिए याद किया जाएगा क्योंकि इस दिन हमने उस महिला पत्रकार को खो दिया जिसने 77 साल पहले द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने का ‘स्कूप’ देकर पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया था। वह दुनिया की पहली ऐसी महिला युद्ध संवाददाता थी जिन्होंने पत्रकारिता में आने के महज तीन दिन के अंदर ही इतिहास रच दिया।

क्लेयर हॉलिंगवर्थ 10 अक्तूबर 1911 को लीसेस्टर में जन्मी थी। जब प्रथम विश्व युद्ध हुआ तो वे बहुत छोटी थी और बड़े लोगों से ही उन्होंने इस युद्ध के बारे में सुना था। उनकी मां पत्रकारों के बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखती थी, न ही उनका पत्रकारिता के प्रति कोई लगाव था। उनमें सेवा भाव था इसलिए वह सेवा कार्य से जुड़ गई और पोलैंड में रूसी ज्यादतियों का शिकार होने वाले लोगों के पुनर्वास का काम करने लगी। कुछ समय बाद ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एम-16 ने उनके बारे में अपनी सरकार को यह खबर भेजी कि वे ऐसे जर्मन, यहूदी व वामपंथी लोगों को ब्रिटेन का वीजा दिलवा रही हैं जो कि देश के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।

उन्हें वहां से लंदन आने को कहा गया और वे 1939 में वापस आ गईं। मगर उनका मन तो पोलैंड में लगा हुआ था इसलिए उन्होंने वहां जाने का एक तरीका सोचा वे ‘डेली टेलीग्राफ’ अखबार के दफ्तर गई और उसके संपादक से कहा कि वे उन्हें पोलैंड में अपना रिपोर्टर नियुक्त कर दें। उन्होंने उसे अपना स्ट्रिंगर नियुक्त कर दिया। तब तक जर्मनी और पोलैंड की सीमा पर तनाव काफी बढ़ चुका था। वे पोलैंड के सीमावर्ती काटोवाइस शहर पहुंची। दोनों देशों की सीमाएं सील की जा चुकी थीं। उन्हें पार कर पाना असंभव था। उन्होंने पोलैंड स्थित ब्रिटिश राजदूत से उनकी कार मांगी ताकि वे रिपोर्टिंग कर सके।

राजदूत ने उन्हें अपनी कार दे दी। इस पर ब्रिटिश यूनियन जैक लहरा रहा था इसलिए वह बिना किसी दिक्कत के जर्मनी में प्रवेश कर गईं। उन्होंने वहां अपने सारे पैसे, वाइन, टार्च व कैमरे की फिल्में खरीदने पर खर्च कर दिए। जब वे वापस लौट रही थीं तो पोलैंड की सीमा से कुछ पहले उन्हें जर्मनी के अंदर रेक्सीन के परदे लगे नजर आए ताकि कोई सड़क के उस पार न देख सके। अचानक उन्होंने देखा कि तेज हवा के कारण रैक्सीन का कुछ हिस्सा उड़ गया। उसके पीछे टैंक, बख्तरबंद गड़ियां और सेना का साजो सामान तैयार था।

वे समझ गईं कि युद्ध की तैयारी हो गई है। उन्होंने वापस आते ही अपनी रिपोर्ट भेजी कि 1000 टैंक हमला करने के लिए तैयार खड़े हैं। खबर तो छप गई पर उस पर किसी ने विश्वास नहीं किया। तीन दिन बाद जब वे अपने होटल के कमरे में बैठी थी तो उन्होंने जर्मन टैंकों को शहर में प्रवेश करते हुए देखा। उन्होंने तुरंत ब्रिटिश राजदूत को फोन पर बताया कि युद्ध की शुरुआत हो चुकी हैं। उन्हें यह बात असंभव लगी। उन्होंने कहा कि यह कैसे हो सकता है? अभी तो दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही है। जवाब में क्लेयर ने अपने फोन का रिसीवर होटल की खिड़की के बाहर लटका दिया ताकि वे टैंको के गुजरने की गड़गड़ाहट व ऊपर जा रहे हवाई जहाजों की आवाज सुन सकें।

इसके बाद उन्होंने अपने संपादक को फोन पर खबर लिखवाई। अगले दिन वे दुनिया की पहली संवाददाता वह भी महिला रिपोर्टर बन चुकी थी जिसने सबसे पहले द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने का स्कूप दिया था। बाद में उन्होंने कहा कि मैं वहां यह सोच कर गई थी कि जर्मनी और रूस के अत्याचार के शिकार घायलों, अंधों, गूंगों, बहरों की सेवा करूंगी, पर मैं अचानक रिपोर्टिंग करने लगी। वे कहती थी कि युद्ध के दौरान भी अपने जूते व पासपोर्ट हमेशा पलंग के साथ रख कर सोती थी ताकि चंद मिनटों के नोटिस पर रिपोर्टिंग करने के लिए निकल सकूं।

उन्होने पत्रकारिता के अपने जीवन में तमाम झंडे गाड़े। जब वे युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए वियतनाम गई तो उन्होंने स्थानीय लोगों से भी खुल कर बातचीत की। उनकी राजनीति का अध्ययन किया। उसके बाद उन्होंने जो रिपोर्ट भेजी उसका लब्बोलुआब यह था कि इस युद्ध से अमेरिका को कुछ हासिल होने वाला नहीं है, उनका यह आकलन बाद में एकदम सच साबित हुआ। ईरान के शाह रजा पहलवी का मात्र 21 साल की उम्र में साक्षात्कार करने वाली वे दुनिया की पहली पत्रकार बनी। शाह का फरवरी 1979 में तख्ता पलट दिया गया। हालांकि उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेगिन के बारे में इतनी बुरी राय कायम की कि उनसे यह कहते हुए हाथ मिलाने से इंकार कर दिया कि वे खून से रंगे हुए हैं।

हुआ यह कि 1961 में तेल अबीब के जिस किंग डेविड होटल में वे और उनके पति ठहरे हुए थे उस पर इजरायल ने हमला किया जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए। जिस समय यह हमला हुआ वे दोनों उससे महज 300 गज की दूरी पर थे। इस घटना के बाद बेगिन के प्रति उनका दिल नफरत से भर गया। हालांकि बाद में बेगिन न केवल इजरायल के प्रधानमंत्री बने बल्कि उन्हें शांति के लिए नोबल प्राइज भी प्रदान किया गया।

एक महिला होने के नाते उन्हें कई बार भेदभाव का शिकार बनना पड़ा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड की सरकार ने उन्हें महिला होने के कारण पत्रकार के रूप में सरकारी मान्यता नहीं दी। मिस्र में ब्रिटिश जगूल मोंटगुमरी को यह पसंद नहीं था कि कोई महिला रिपोर्टिंग करे इसलिए उन्होंने ब्रिटिश अखबारों पर दबाव बना कर उनकी छुट्टी करवा दी। जवाब में उन्होंने अमेरिकी अखबार ‘द टाइम्स’ के लिए रिपोर्टिंग करनी शुरू कर दी। खोजी व साहसिक पत्रकारिता के क्षेत्र में झंडे गाड़ने वाली इस महिला को तब बहुत ठेस पहुंची जब डबल एजेंट किम फिल्बी ने रूस भाग जाने की खबर को उनके अखबार गार्जियन ने तीन माह तक नहीं छापा। इसकी वजह उसके संपादक का यह डर था कि कहीं वह उन पर मानहानि का मुकदमा न कर दे। किम फिल्बी ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एम-16 व रूस की केजीबी दोनों के लिए काम कर रहा था। वह कैब्रिज-5 मास्टर स्पाई गुट का संपादक था। जब उन्होंने उसके रूस भाग जाने की खबर भेजी तो उससे कुछ दिन पहले ही ब्रिटिश सरकार ने उसके डबल एजेंट होने के आरोप का खंडन किया था।

अततः गार्जियन ने तीन माह बाद यह खबर छापी। फिल्बी का रूस के लिए कितना महत्व था इसका अनुमान तो इससे लगाया जा सकता है उसे रूस के सर्वोच्च सम्मान आर्डर आफ लेनिन से सम्मानित किया गया और वह केजीबी का जनरल बना। उसका 1988 में निधन हो गया। दुनिया के तमाम देशों में रिपोर्टिंग करने के बाद वे 1973 में टेलीग्राफ की बीजिंग संवाददाता नियुक्त हुईं। इससे पहले वहां इस अखबार का कोई संवाददाता ही नहीं था। उन्होंने कई दशकों तक चीन में रहने के बाद 1981 में नौकरी से रिटायरमेंट ले लिया और वे हांगकांग में बस गई। वह वहां के फॉरन कोर्सपॉनडेंट क्लब (विदेशी पत्रकार क्लब) की सबसे बुजुर्ग संपादक थी। वहां के एक कोने की मेज उनके लिए आरक्षित रहती थी। वे वहां नियमित जाती थी और लोगों से बहुत कम बात करती थी।

उन्हें कई बार दिल के दौरे पड़े। वह बढ़ती आयु की बीमारी डिमेंशिया की भी शिकार हो चली थी। उन्होंने दो शादियां की हालांकि वे बच्चे पैदा करने के पक्ष में नहीं रहीं। वह अपना टाइप राइटर और ट्रूथ ब्रश हमेशा तैयार रखती थी ताकि बहुत कम समय में कहीं भी जाने के लिए तैयार हो सकें। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि अगर उन्हें मौका मिले तो वे कहां जाना चाहेगी। उन्होंने जवाब दिया कि दुनिया की सबसे खतरनाक जगह क्योंकि वहां ही अच्छी स्टोरी मिलती है।

(साभार: नया इंडिया)

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