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एसपी की मृत्यु के बाद मैं ऐसा टूटा कि आज तक बिखरा हुआ हूं: निर्मलेंदु
जीवन में दो ही तरह के व्यक्ति असफल होते हैं। पहले वे जो सोचते हैं, पर करते नहीं, दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago
निर्मलेंदु
वरिष्ठ पत्रकार ।।
जीवन में दो ही तरह के व्यक्ति असफल होते हैं। पहले वे जो सोचते हैं, पर करते नहीं, दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं ।— श्रीराम शर्मा, आचार्य
जहां सुमति तंह सम्पति नाना, जहां कुमति तंह बिपति निधाना ।— गो. तुलसीदास
जी हां, एसपी सिंह जो सोचते थे, वही करते थे और शायद यही वजह है कि वे सफल ही नहीं, बेहद सफल हुए। 1977 की बात है। पीत पत्रकारिता ने धीरे-धीरे अपना पांव पूरी तरह से पसार लिया था। पत्रकार बदला, पत्रकारिता बदली, पत्रकारिता के स्वरूप और मायने भी शनै: शन: बदल गए, लेकिन जो नहीं बदला, वह है पत्रकारों की सोच और खबरों के पीछे भागना। केवल यही नहीं, सिद्धांत, भाषा, नैतिक मूल्यों का भी धीरे-धीरे पतन हो गया है। अब पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन बन गई है। इसका साक्षात् उदाहरण यह है कि हाल के वर्षों में जिस गति से कुछ धनकुबेर अपना हित साधने के लिए मीडिया के माध्यम से अपना व्यवसाय साध रहे हैं, उसे देखकर यही लगता है कि अब समय और देशकाल के सापेक्ष पत्रकारिता की दिशा और दशा बिल्कुल बदल गई है। और दरअसल, इसी वजह से संपादकों की एक नई फौज खड़ी हो गई है। सच तो यही है कि इस फौज को पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं, मतलब है, तो उन्हें सिर्फ अपनी ‘जेब’ से। इन्हें देश के लिए चिंता नहीं, चिंता है तो अपने व्यवसाय से, पैसे और ऐश-ओ-आराम से। एक कटु सत्य यही है कि धीरे-धीरे संपादक नामक 'संस्था’' का नाम लोप होता जा रहा है और इसीलिए संपादक के रूप में ब्रैंड मैनेजर का महिमा मंडन शोर शराबे के साथ हो रहा है।
यदि सत्तर के दशक को पत्रकारिता का ‘स्वर्णकाल’ माना जाए, तो ऐसी स्थिति में यदि यह कहें कि उस स्वर्णकाल के बाद धीरे-धीरे पत्रकारिता का क्षरण हुआ है, तो शायद गलत नहीं होगा। खासकर, न्यूज चैनल आने के बाद। दरअसल, कल और आज की पत्रकारिता में आसमान धरती का अंतर आ गया है। न केवल पत्रकारिता के बुनियादी तत्वों में बदलाव आये हैं, बल्कि पत्रकारिता के स्तर में भी लगातार बदलाव दिख रहे हैं। हालांकि यह भी एक सच है कि तकनीक और रंगीन पृष्ठों का विकास जरूर हुआ है, लेकिन दुख तो इस बात का है कि पत्रकारिता पर व्यवसायिकता पूरी तरह से हावी हो गई है। और, पत्रकारिता पर व्यवसाय के हावी होने के कारण ही बाजार में बिकने वाली आम सामग्री की तरह समाचार भी एक ‘सामग्री’ बन कर रह गया है। न केवल अखबार, बल्कि न्यूज चैनल भी अब दूसरों को प्रचार देने के बजाय खुद ही सर्वश्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं। ऐसे में यदि यह कहें कि बाजारवाद की दुहाई देकर न केवल पत्रकारिता धनाढ्य वर्ग की ‘रखैल’ बनकर रह गई है, बल्कि यह कहें कि ज्यादातर पत्रकार जी हुजूरी की भूमिका में जुट गये हैं, तो शायद गलत नहीं होगा। आश्चर्य की बात तो यह है कि दूसरों के लिए आवाज उठाने वाले यह तथाकथित पत्रकार आज अपने ही कर्मस्थल में शोषित और दमित हैं। चर्चा छिड़ते ही दबी जुबान में अपने बचाव में ये तथाकथित पत्रकार कहते हैं कि पापी पेट का सवाल है भई। दरअसल, पूंजीवादी व्यवस्था और भ्रष्टाचार के दीमक ने पत्रकारों को भी खोखला कर दिया है। शायद, इसीलिए इन पत्रकारों की न इज्जत है और न ही सम्मान। विडंबना तो यह है कि तथाकथित कुछ ‘बड़े’ पत्रकार भी भ्रष्टाचाररूपी इस दलदल में बुरी तरह फंस चुके हैं।
पत्रकार का मतलब होता है, एक आदर्शवान पुरुष और एक जानकार शिक्षक, एक भले मानुष। पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी, लेकिन अब पत्रकारिता एक नौकरी का रूप ले चुकी है। या तो संपादक गायब हो चुके हैं, या फिर उनमें संपादकीय शक्ति का क्षरण हुआ है। 70 या 80 के दशक में पत्रकार अपने हक की लड़ाई के लिए एकजुट होकर लड़ते थे, लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि आजकल के पत्रकार संस्था के आगे घुटने टेक देते हैं। अब तो खुलेआम पेड न्यूज खबरों को अपने हित में छपवाने और दिखाने के लिए पैसे भी लेते हैं कुछ तथाकथित पत्रकार। केवल यही नहीं, खबर को न छापने या दिखाने के लिए भी पैसे दिए और लिए जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मीडिया पर समाज अब भी बहुत भरोसा करता है, लेकिन साथ ही साथ समाज एक सवाल यह भी उठाता है कि क्या अब भी मीडिया पर भरोसा करना चाहिए?
हालांकि 70 और 80 के दशक में मीडिया पर लोगों का भरोसा अटूट था और दरअसल, इसीलिए इसी दशक में मीडिया के एक यंग संपादक पर आम लोगों का भरोसा धीरे-धीरे बढ़ने लगा। वे ‘रविवार’ नामक पत्रिका के माध्यम से एक आम पत्रकार के रूप में उभरे। नवभारत टाइम्स से होते हुए जब वे शख्स खबरिया चैनल 'आजतक' में एक एंकर के रूप में दिखे, तो लोगों ने उन्हें खूब देखा और सराहा। जी हां, वह शख्स थे एस.पी.सिंह। सुरेंद्र प्रताप सिंह। प्यार से सभी उन्हें एसपी कहकर ही बुलाते। आश्चर्य की बात तो यह है कि बाइस साल गुजर जाने के बाद भी हिंदी पत्रकारों के बीच जिस इज्जत और आदर के साथ एसपी सिंह का नाम लिया जाता है, वह सचमुच सराहलीन है। दरअसल, यह एसपी का ही सरोकार है कि सत्तर के दशक में रविवार और नब्बे के दशक में आज तक को लोग आज भी याद करते हैं। आनंदबाजार पत्रिका समूह की रविवार पत्रिका तो एसपी के जीवनकाल में ही समाप्त हो गई, लेकिन उस पत्रिका की मिसाल आज भी गाहे-बगाहे जरूर दी जाती है, क्योंकि आज भी यदि कोई समूह और संपादक पत्रिका निकालना चाहते हैं, तो रविवार का जिक्र करना नहीं भूलते। ऐसा लगता है कि रविवार एक किंवदंती बन चुकी है।
यदि यह कहें कि वर्तमान दौर में एसपी जैसा कम ही लोग हैं, तो शायद गलत नहीं होगा। दरअसल, हिंदी पत्रकारिता में संपादकों की ‘श्रृषिकुल’ परंपरा को हम सब न केवल जानते, बल्कि मानते भी हैं कि राजेंद्र माथुर के बाद आखिरी प्रतिमान प्रभाष जोशी थे, तो ऐसी स्थिति में यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि उसी परंपरा से एसपी का भी वास्ता रहा है। दरअसल, हम आज भी उसी को संपादक के रूप में सम्मान और इज्जत देते हैं, जिसने पत्रकारों को न केवल लिखने की आजादी दी, बल्कि साथ ही सहूलियतें भी दीं और उनके अधिकार के लिए आवाजें भी उठार्इं। मेरा तो मानना यही है कि वही शख्स संपादक कहलाने के योग्य हैं, जिन्होंने गली मोहल्लों से सामाजिक सरोकार रखनेवालों को पत्रकारीय सरोकारों से जोड़ा और जिन्होंने न तो पत्रकार बनानेवाली संस्थाओं पर भरोसा किया और न ही किसी पैरवी को तरजीह दी। अब सवाल यह उठता है कि क्या आज हमारे देश के तथाकथित संपादकीय बिरादरी में ऐसा कोई संपादक बचा है, जिसका नाम शिद्दत और इज्जत से लिया जा सके? शायद नहीं। लेकिन एसपी सिंह का नाम इज्जत से हम आज भी उनकी मृत्यु के 22 साल बाद ले सकते हैं।
दरअसल, एसपी एक ऐसा नाम है, जो हमेशा पत्रकारों के हित में ही जीते रहे। टाइम्स में रहते वक्त उन्होंने अपनी नौकरी दांव पर लगी दी, लेकिन अपने साथी पत्रकारों पर आंच तक नहीं आने दी। सच तो यही है कि जिस समीर जैन, टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक के यहां नौकरी करने के लिए आज भी हजारों की तादाद में पत्रकार सपना संजोये रहते हैं, उस समूह को एसपी ने एक बार नहीं, दो-दो बार छोड़ा। एक सच तो यह भी है कि जब अरुण पुरी के साथ आज तक की प्लॉनिंग की, तब भी उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया। इसकी मिसाल आज भी उनके सहकर्मी होने का गौरव रखनेवाले कई वरिष्ठ पत्रकार एसपी की चर्चा चलते ही दे देते हैं। आज भी सैकड़ों न्यूज चैनलों की भीड़ में आज तक का नाम अदब से लिया जाता है। दरअसल, आज भी एसपी की लिखी और कही गई वे बातें ... ये थीं खबरें आज तक, इंतजार कीजिए कल तक’ महसूस की जाती हैं। ऐसा लगता है कि वे आज भी हमारे बीच कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में हैं, क्योंकि मुझे हमेशा यही महसूस होता है कि उनकी पैनी और पक्की दृष्टि हम सब पर है।
एसपी का बाल्यकाल कोलकाता से 40 किलोमीटर दूर श्यामनगर के गारुलिया में बीता था। 80-90 हजार की आबादी गारुलिया में है। एसपी की मृत्यु की खबर पहुंचते ही वहां की सारी की सारी दुकानें स्वत: बंद हो गईं। यह एक अनहोनी सी बात लगी, क्योंकि अब दुकानें स्वत: बंद नहीं होतीं, वह भय से ही बंद होती हैं। कोई समाजशास्त्री दुकानों के बंद होने के पीछे एक स्थानीय व्यक्ति के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने की बात कहेगा। वह शायद गलत भी नहीं कह रहा हो, बल्कि अर्धसत्य जरूर कह रहा होगा। दरअसल, इस मामले में अर्धसत्य ही निहित है। गारुलिया के लोगों के शोक को भले ही एसपी की ख्याति से जोड़ना कुछ अंशों में सही क्यों न हो, अन्यायपूर्ण लगता है। हम जिनका रौब मानते हैं, जिनकी दिल से इज्जत नहीं करते, लेकिन गारुलिया के लोगों का मामला दिल से जुड़ा हुआ था। और सच तो यही है कि प्रकारांतर से यह हिंदीभाषी समाज के दिल का मामला था।
दरअसल, हर चीज के विकल्प होते हैं और उन्हें मौजूदा व्यवस्था में ही ढूंढना पड़ता है। किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता, जैसे किसी लेखक के लिए सबसे बड़ी प्रतिबद्धता उनके अपने लेखन से है, वैसे ही किसी पत्रकार के लिए प्रतिबद्धता पत्रकारिता से होना बहुत ही स्वाभाविक है। अपने पेशे से प्रतिबद्धता न रखना एक डॉक्टर और एक शिक्षक को ही नहीं, बल्कि एक व्यापारी तक को समाज के प्रति दायित्वहीन बना सकता है। अपने पेशे के प्रति अगर पत्रकार प्रतिबद्ध हों, तो कितने ही समीर जैन और विवेक गोयनका जन्म ले लें, तो भी पत्रकारिता बची ही रहेगी।
यूं तो दिल की सेहत जानने की एकमात्र जगह अस्पताल है, क्योंकि यहीं पर दिल की गड़बड़ियों की पहचान संभव है। वे किस्मत वाले होते हैं, जिनके दिल को डॉक्टरों के छूने भर से राहत मिल जाती है, लेकिन जिनका हृदय बड़ी दुर्घटनाओं के कारण टूट गये हों, एक ऐसी दुर्घटना, जो बड़े बड़े दायित्वों को निबाहते निबाहते घटी, तो उस गम को आत्मसात करना बहुत मुश्किल हो जाता है। वर्तमान तो चंचल इंद्रजाल है, हरेक अपने भूतकाल से जुड़ा हुआ है। समय का प्रत्येक टुकड़ा अपने से पहले वाले कालखंड में तब्दील हो जाता है। वाकई जीवन कुछ भी नहीं है, लेकिन एक याद है और समय धीरे धीरे बीतता जाता है, एक वृत्त की तरह। समय के बारे में शास्त्रों में लिखा है, जिसे दो गज लंबी छड़ी से नापा जा सकता है। शुक्रवार का वह दिन। बेहद डरावना माहौल था। एक असहाय करने वाला दुख कि हमारे प्यारे एसपी सिंह नहीं रहे। उस दिन उन्होंने अपने सभी दोस्तों से अंतिम विदाई ले ली। मैं ऐसा टूटा कि आज तक बिखरा हुआ हूं।
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