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रोज-रोज अख़बार पढ़ना कोई बहुत सुखद अनुभव नहीं है, बोले वरिष्ठ पत्रकार विष्णु नागर

विष्णु नागर वरिष्ठ पत्रकार ।। क्या कुछ ख़बरों से दूर रहें? यह बिल्कुल सही है कि रोज-रोज अख़बार पढ़ना कोई बहुत सुखद अनुभव नहीं है। बहुत बार यह हताश और परेशान

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

विष्णु नागर

वरिष्ठ पत्रकार ।।

क्या कुछ ख़बरों से दूर रहें?

यह बिल्कुल सही है कि रोज-रोज अख़बार पढ़ना कोई बहुत सुखद अनुभव नहीं है। बहुत बार यह हताश और परेशान करने वाला अनुभव है। मैं चूंकि कुछ-कुछ, फ़ेसबुक पर भी सक्रिय हूं, इसलिए कई बार एक दिन में एक साथ इतनी खबरें विचलित करती हैं कि सबकुछ फ़ेसबुक पर शेयर करने को मन होता है, जो करना  असंभव है और दूसरों के लिए झेलना भी असंभव। शेयर न करो तो भी अपराधबोध सा होता है। शेयर करो तो लोग आपकी चिंताओं से जुड़ते भी हैं और कई आलोचना तो करते ही हैं-जो उनका  हक़ है। मगर बहुत से भद्दी-भद्दी गालियां भी अब देने लगे हैं, मुझे ही नहीं, अपने से असहमत तमाम लोगों को।

जिस दिन की ख़बरों के आधार पर यह लिख रहा हूं, उसमें कई राजनीतिक ख़बरें हैं जो विचलित करती हैं। यह सही है कि आपको क्या कितना विचलित करता है या बिल्कुल ही नहीं करता, यह व्यक्ति-व्यक्ति के नज़रिये पर निर्भर करता है मगर कुछ होता ज़रूर है, जो सबको विचलित करता होगा, इसलिए तो कई लोग यह शिकायत करते हैं कि अख़बार में होता क्या है, सिवाय हत्या और बलात्कार की ख़बरें, हम तो अख़बार ही नहीं पढ़ते या मुख्य-मुख्य ख़बरें देख लेते हैं, बस।

मान लें कि उनकी यही धारणा सही है तो क्या करें? मान लो हम अख़बार नहीं पढ़ते हैं तो क्या इससे ऐसी घटनाएं होना रुक जायेंगी? हम जानते हैं कि नहीं रुकेंगी। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में तो आंखों के सामने भी ऐसा कुछ होता है तो भी लोग चुपचाप बचकर निकल जाते हैं। यह सही है कि यह  दुनिया न मेरे-आपके ख़बरें पढ़ने से और उस पर विचलित होने से तत्काल बदलेगी, न अपने विचलित होने को साझा करने से और न अपने सामने घट रही ऐसी घटनाओं को देखकर भी अनदेखा करने से। इन सब पर कविता-कहानी लिखने से भी दुनिया नहीं बदलनेवाली। जो बहुत जल्दी में हैं, उन्हें तो कुछ भी बदलता नहीं दिखेगा तो क्या करें?

अपने मन को शांत रखें, उसे दुश्चिताओं से दूर रखें? लेकिन कब तक? इस दुनिया में रहकर ऐसी परम शांति क्या स्थायी रूप से मिल सकती है? कुछ दिन, किसी ख़ास समय, उम्र के किसी मोड़ पर,बीमारी, शोक, किसी और तरह की परेशानी या ख़ुशी के समय  ऐसा हो भी सकता है, जब हमें दुनिया की फ़िक्र छोड़ देनी पड़े।

कई बार शरीर और मन की स्थितियां स्थायी रूप से इतनी गड़बड़ हो जाती हैं कि इस दुनिया से हम अपनेआप परे चले जाते हैं। हम, हम नहीं रहते। लेकिन क्या स्वास्थ्य  और अस्वास्थ्य, परेशानियों और सामान्य सुखी जीवन के बीच क्या हम चाहकर भी इस सबसे दूर रह सकते हैं? क्या ये दुनिया हमें इस तरह रहने देगी? क्या आज जो हमारे साथ नहीं हुआ है, इस बात की गारंटी देता है कि आगे भी कभी यह नहीं होगा? ठीक है हम गरीब वर्ग से नहीं हैं तो उन सब हालातों से बचे हुए हैं और मोटे तौर पर बचे भी रहते हैं जिन्हें गरीब वर्ग अनेक स्तरों पर रोज बल्कि पल-पल झेलता है। जितनी अनिश्चितताओं में वे जीते हैं, शायद हम रोज-रोज नहीं जीते। लेकिन क्या सामाजिक -आर्थिक असमानताओं की यह गहरी खाई न चाहकर भी हमें प्रभावित नहीं करती? क्या कोई ऐसी स्थिति कभी आती ही नहीं?

तो हम इस दुनिया से बच नहीं सकते और न चाहकर भी इसमें शामिल होना ही पड़ता हैं। तो क्यों न हम जानें कि आख़िर हमारे आसपास दरअसल हो क्या रहा है? क्या सब उसी तरह हो रहा है, जिस तरह हम समझते हैं कि हो रहा है? हम पाते हैं कि ऐसा नहीं है।

मैं अपना ही उदाहरण लूं। मेरी अपनी समझ तो थी ही और अख़बारों तथा टीवी पर तमाम रिपोर्टें देखकर भी यह समझ बनी थी कि नोटबंदी से साधारणजन बहुत परेशान हुआ है और इस बार वह उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा को किसी भी हालत में सबक़ सिखायेगा मगर ऐसा नहीं हुआ। तमाम तरह के राजनीतिक प्रचार आदि ने बताया कि लोगों को कुछ और तरह से भी निर्णय करने को बाध्य किया जा सकता है या शायद लोग जल्दी किसी सरकार से उम्मीद नहीं छोडते या जो भी कारण रहे हों, उन कारणों को समझने-जानने की जिज्ञासा बनी रही। कुछ दिनों तक यह सोचकर ख़ुश रहा कि ईवीएम में गड़बड़ी करने से ये नतीजे आए हैं लेकिन अभी तक यह सिद्ध नहीं हो सका है, इसलिए जब तक मेरी और दूसरों की अगर यह धारणा भ्रांत है तो इसके सही सिद्ध होने तक, मुझे अपने ज़मीनी राजनीतिक यथार्थ के ज्ञान पर सोचते रहना होगा।

यह सही है कि आज जो सत्ता पर क़ाबिज़ हैं, उन्हें ऐसे लोग पसंद नहीं जो सोचते हों लेकिन क्या इससे नागरिकों को अपनी सीमा में सोचते रहने से बचना चाहिए? क्या न सोचना-देखना-सुनना हमारे आसपास घट रहे से हमें बचा लेगा? और नहीं तो अख़बार-टीवी कितनी ही बुरी ख़बर लायें, बुरी ख़बरों को ही ख़बर बनायें तो भी उनसे गुज़रना होगा। उनका असली स्त्रोत अखबार नहीं, हमारा समय, समाज और राजनीति है। कुछ अख़बार सकारात्मक ख़बरें छापने को इसका विकल्प मानते हैं लेकिन इस तरह का इरादा करके जो ख़बरें छापते हैं, उनमे से बहुत सी नक़ली क़िस्म की होती हैं। मसलन किसने कितनी दौलत कितने कम समय में कमा ली, यह ऐसी कोई सकारात्मकता नहीं है जिसके पीछे लोगों को भागना चाहिए और भागकर भी सबको क्या वही मिल जायेगा, जो कुछ लोगों को मिल चुका है?

इससे इनकार नहीं कि सहज ही जीवन में ऐसा बहुत कुछ होता रहता है जो जीने का हौसला जाने-अनजाने हमें रोज देता रहता है, उसकी भी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए लेकिन कोई नकारात्मकता पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं होती।

दशकों पहले की यह ख़बर आज भी मुझे याद है कि किसी युवा ने किसी कारण से ख़ुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली लेकिन जब तक जितना होश उसे रहा, उसने अपनी आंखें न जलने दीं ताकि वे किसी के काम आ सकें। कई बार लोग किसी दुर्घटना में किसी को बचाने जाते हैं और उसे बचा लेते हैं मगर उस क्रम में ख़ुद मर जाते हैं। यह सब नकारात्मक के बीच सकारात्मक है। कितने ही लोग आशा करते-करते अंतत: थककर, सब तरफ़ से हारकर आत्महत्या करते हैं यानी वे भी बहुत समय तक सकारात्मकता में जीते हैं और आत्महत्या करना उनकी ही नहीं हमारी भी कमज़ोरी है। यह मानना भी गलतफहमी है कि सिर्फ सकारात्मक खबरें देने से लोग सकारात्मक हो जायेंगे। यह दरअसल हमारे आसपस की सच्चाई से लोगों का ध्यान बांटने का महीन तरीका है। जरूरी है कि हम अपने और दूसरे के अनुभवों को, दुखों को, उनके जीवन की तथाकथित नकारात्मकताओं को देखते -जांचते रहें, यही असली सकारात्मकता है।

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