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हम सम्मान की नहीं, सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं

एक बार फिर हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाने की तैयारी में हैं। स्मरण कर लेते हैं कि कैसे संकट भरे दिनों में भारत में हिंदी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था तो आज यह...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार ।। 

एक बार फिर हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाने की तैयारी में हैं। स्मरण कर लेते हैं कि कैसे संकट भरे दिनों में भारत में हिंदी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था तो आज यह विश्लेषण भी कर लेते हैं कि कैसे हम सम्मान को दरकिनार रखकर सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं। 1826 से लेकर 2017 तक के समूचे परिदृश्य की मीमांसा करते हैं तो सारी बातें साफ हो जाती हैं कि कहां से चले थे और कहां पहुंच गए हैं हम। इस पूरी यात्रा में पत्रकारिता मीडिया और पत्रकार मीडियाकर्मी बन गए। इन दो शब्दों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि हम सम्मान की नहीं, सहारे की पत्रकारिता कर रहे हैं। जब हम सहारे की पत्रकारिता करेंगे तो इस बात का ध्यान रखना होगा कि सहारा देने वाले के हितों पर चोट तो करें लेकिन उसका हित करने में थोड़ा लचीला बर्ताव करें।

मीडिया का यह व्यवहार आप दिल्ली से देहात तक की पत्रकारिता में देख सकते हैं। शुचिता की चर्चा भी गाहे-बगाहे होती रहती है वह भी पत्रकारिता में। मीडिया में शुचिता और ईमानदारी की चर्चा तो शायद ही कभी हुई हो। इसका अर्थ यह है कि पत्रकारिता का स्वरूप भले ही मीडिया हो गया हो लेकिन आज भी भरोसा पत्रकारिता पर है। फिर ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता का लोप होता चला जा रहा है? इस पर विवेचन की जरूरत है क्योंकि एक समय वह भी था जब पत्रकारिता में आने वाले साथियों को डिग्री-डिप्लोमा की जरूरत नहीं होती थी। जमीनी अनुभव और समाज की चिंता उनकी लेखनी का आधार होती थी। आज टेक्नोलॉजी के इस दौर में डिग्री-डिप्लोमा का होना जरूरी है।

पत्रकारिता कभी जीवनयापन का साधन नहीं रही लेकिन आज भी पत्रकारिता में नौकरी नहीं, मीडिया में नौकरी मिलती है जहां हम मीडियाकर्मी कहलाते हैं। एक सांसद महोदय को इस बात से ऐतराज है कि मीडियाकर्मियों को जितनी तनख्वाह मिलती है, वह सांसदों से अधिक है और इस आधार पर वे सांसदों का वेतन बढ़ाने की मांग करते हैं। मुझे याद नहीं कि आज से दस-बीस साल पहले तक कभी इस तरह की तुलना होती हो। हां, ऐेसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जब पत्रकारों ने ऐसी खैरात को लात मार दी है और ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है लेकिन आज भी खत्म नहीं।

पत्रकारिता देश एवं समाज हित के लिए स्वस्फूर्त चिंतन है। पत्रकार के पास पहनने, ओढऩे-बिछाने और जीने के लिए पत्रकारिता ही होती है। उसकी भाषा समृद्ध होती है और जब वह लिखता है तो नश्तर की तरह लोगों के दिल में उतर जाती है। हालांकि मीडिया के इस बढ़ते युग में आज पेड न्यूजका आरोप लगता है तो बवाल मच जाता है। जांच बिठायी जाती है और निष्कर्ष वही ढाक के तीन पांत होता है। लेकिन कभी किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि इम्पेक्ट फीचर के नाम पर चार और छह पन्ने के विज्ञापन दिए जाते हैं जिसे अखबार सहर्ष प्रकाशित करते हैं। यह जानते हुए भी कि इसमें जो तथ्य और आंकड़े दिए गए हैं, वे बेबुनियाद हैं तथा बहुत हद तक काल्पनिक लेकिन हम इसकी पड़ताल नहीं करते हैं क्योंकि इन्हीं के सहारे प्रकाशन संभव हो पा रहा है।

आधुनिक मशीनें और आगे निकल जाने की होड़ में खर्चों की पूर्ति करने का यही सहारा है। यह भी मान लिया जाए तो क्या इसके आगे विज्ञापनों के रूप में छपे तथ्यों की पड़ताल कर खबर नहीं छापना चाहिए? इस पर एक वरिष्ठ से चर्चा हुई तो ऐसा करने को उन्होंने नैतिकता के खिलाफ बताया। उनका तर्क था कि जिस चीज का आप मूल्य ले चुके हैं, उसकी पड़ताल नैतिक मूल्यों के खिलाफ होगा। मैं हैरान था कि सहारे की मीडिया के दौर में नैतिक मूल्यों की चिंता। संभव है कि उनकी बात वाजिब हो लेकिन इस बदलते दौर में हमें पत्रकारिता की भाषा, शैली एवं उसकी प्रस्तुति पर चिंतन कर लेना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम कुछ दे सकें और नहीं तो हर वर्ष हम यही बताते रहेंगे कि 30 मई को भारत का पहला हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ था।

(लेखक समागमपत्रिका के संपादक हैं)   

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