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ऐतिहासिक जीत के बाद बीजेपी से वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता का ये बड़ा सवाल...

<p style="text-align: justify;">‘मोदी अब इंदिरा गांधी के बाद से सबसे लोकप्रिय जननेता बन गए हैं और यह सब उन्होंने किसी विरासत पर निर्मित करके अपने प्रयासों से कमाया है। दूसरी बात, उन्हें सत्तारूढ़ दल पर ऐसा नियंत्रण मिल गया है, जो इंदिरा गांधी के बाद से किसी को नहीं मिला, राजीव गांधी को भी नहीं।’ <strong>हिंदी अखबार 'दैनिक भास्कर' में छपे अपने आलेख क

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

‘मोदी अब इंदिरा गांधी के बाद से सबसे लोकप्रिय जननेता बन गए हैं और यह सब उन्होंने किसी विरासत पर निर्मित करके अपने प्रयासों से कमाया है। दूसरी बात, उन्हें सत्तारूढ़ दल पर ऐसा नियंत्रण मिल गया है, जो इंदिरा गांधी के बाद से किसी को नहीं मिला, राजीव गांधी को भी नहीं।’ हिंदी अखबार 'दैनिक भास्कर' में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

ऐतिहासिक जीत के बाद बड़ा सवाल, अब क्या?

टेक्टोनिक शिफ्ट जुमले का उपयोग सबसे पहले केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने किया। धरती की परतों में आने वाले बदलाव को लेकर इसका उपयोग किया जाता है। यह बहुत बड़े परिवर्तन का द्योतक है। नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में ऐसा सफाया किया, जो आपातकाल के पश्चात जनता लहर के बाद से किसी ने नहीं किया है। कांग्रेस की सिर्फ सात सीटें हैं, जबकि इसके उपाध्यक्ष ने ‘यूपी का लड़का’ बनकर प्रचार किया था। भाजपा ने उत्तराखंड में सफाया किया और मणिपुर में असली ताकत बनकर उभरी है, जहां इसका अस्तित्व ही नहीं था। निश्चित ही यह टेक्टोनिक शिफ्ट है। टेक्टोनिक शिफ्ट भी सत्ता के उस परिवर्तन के लिए बहुत हल्का जुमला है, जिसने सिर्फ भारत के राजनीतिक भूगोल को बल्कि इसके समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और वैचारिक प्रक्रियाओं को भी नया रूप दिया है।

मोदी अब इंदिरा गांधी के बाद से सबसे लोकप्रिय जननेता बन गए हैं और यह सब उन्होंने किसी विरासत पर निर्मित करके अपने प्रयासों से कमाया है। दूसरी बात, उन्हें सत्तारूढ़ दल पर ऐसा नियंत्रण मिल गया है, जो इंदिरा गांधी के बाद से किसी को नहीं मिला, राजीव गांधी को भी नहीं। भाजपा भी पहली बार एक ऐसी पार्टी के रूप में परिभाषित हुई, जिसमें एक सुप्रीमो, वोट खींचने वाला चमत्कारी नेता है। चुनावी फील्ड मार्शल अमित शाह भी 1960 के दशक के के. कामराज के बाद किसी राष्ट्रीय दल के सबसे शक्तिशाली अध्यक्ष बनकर उभरे हैं।

हिंदी हृदय प्रदेश के बाहर के मोदी पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने ऐसा कद हासिल किया है। वे स्वतंत्रता बाद के पहले हैं, उनके पहले महात्मा गांधी थे। यहां दोनों की कोई तुलना नहीं है, सिर्फ यही कि वे भी गुजरात के थे। जो मोदी से असहमत हैं, उनके खिलाफ वोट देते हैं, वे भी कहते हैं कि वे उनकी व्यक्तिगत निष्ठा अच्छे इरादों पर संदेह नहीं करते। नोटबंदी की तकलीफों के बाद भी उन्हें माफ करने की यही वजह है।

मोदी के सबसे वफादार समर्थक भी मानते हैं कि कार्यकाल के आधे सफर में अर्थव्यवस्था, सुधार, सामाजिक संदेश पर उनका रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं है। वे कहते हैं, ‘उनके दूसरे कार्यकाल का इंतजार कीजिए। गुजरात में उनके इतिहास से सीखिए।’ वहां पहला कार्यकाल विवादास्पद था। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अर्थव्यवस्था और आधारभूत ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया। फिर उसी को उन्हें राष्ट्रीय सत्ता का स्प्रिंग बोर्ड बनाया। आम आदमी पार्टी की पंजाब में हार और गोवा में विनाश से भी इस साल बाद में होने वाले गुजरात चुनाव में उनकी असुरक्षा कम हो जाएगी। उनकी पार्टी और आरएसएस उनकी कृतज्ञ है। उनके पास वह महानतम ब्रह्मास्त्र है, जो जननेता के पास होता है: वोट खींचने की क्षमता।

अब प्रश्न यह है कि वे इस सत्ता का कैसा उपयोग करेंगे। क्या वे आर्थिक बदलाव पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जैसा उन्होंने गुजरात में 2007 के बाद किया था? क्या वे अपनी विश्वसनीयता और लोगों को राजी करने के कौशल का उपयोग बदलाव के चुनौतीपूर्ण विचार लोगों के गले उतारने में करेंगे?

कांग्रेस के लिए सबक यह कि उसके परिवार का वक्त बहुत पहले ही गुजर चुका है, जब वह अपने वोट हासिल कर सकता था। हालांकि, 2004 की सांयोगिक सफलता से उन्हें भ्रम पैदा हो गया कि पार्टी की वापसी हो गई है। दो, राहुल जननेता नहीं हैं। वे पार्टी को एकजुट तो रख सकते हैं लेकिन, वे इसे यदि होल्डिंग कंपनी की तरह नहीं चलाते, जिसमें अधिकार संपन्न सीईओ हों, तो उनका कोई भविष्य नहीं है।

उन्हें समझना चाहिए कि अमरिंदर (जिन्हें वे पसंद नहीं करते) ने पंजाब में सफाया किया, जबकि उत्तर प्रदेश में उनका सफाया हो गया। मणिपुर में मजबूत स्थानीय नेतृत्व अपने बूते डटा रहा। उत्तराखंड में हरीश रावत बुरी तरह हारे लेकिन, याद रहे कि वे लोकप्रिय स्थानीय नेता हैं, जिन्हें 2016 तक दरकिनार करके रखा गया। राहुल को असम में उनके कभी वफादार साथी रहे हिमांता बिश्व शर्मा के शब्दों पर गौर करना चाहिए कि वे ‘ब्ल्यू ब्लड’ (विशिष्ट वर्ग) वालों या वंशवादियों से ही वास्ता रख पाते हैं। युवा भारतीय वंशाधिकार से ज्यादा किसी और चीज से नफरत नहीं करता। उन्हें अपने वंश के रिकॉर्ड से प्रभावित करने की कोशिश करें। अपनी बात करें।

उत्तर प्रदेश की जाति आधारित पार्टियों के लिए नई शुरुआत का वक्त है वरना संन्यास लेना ठीक होगा। तीन दशकों तक हिंदी हृदय प्रदेश में भाजपा की रणनीति रही कि जाति ने जो विभाजित किया है उसे धर्म (हिंदुत्व) से जोड़ दिया जाए, कि यदि उच्च, मध्यम निम्न वर्ग की बजाय हिंदू एकजुट होकर वोट दें तो भाजपा अपराजेय होगी। लालकृष्ण आडवाणी एक बार मंदिर आंदोलन में सफल रहे थे लेकिन, वह अल्पकालीन था। मोदी और अमित शाह ने अब इसे कुशलता से एक नए बहुसंख्यकवादी भारतीय राष्ट्रवाद में बुन दिया है। अखिलेश यादव का भविष्य इसी में है कि वे किस तरह जातियों के परे सभी के नेता के रूप में खुद को ढालते हैं (वे उम्र में केजरीवाल राहुल से छोटे हैं)। मायावती को सामने उनका राजनीतिक अंत दिख रहा है। अब मुस्लिम वोटर भविष्य पर विचार करेगा। मोदी-शाह की रणनीति ने उसे अलग-थलग कर उसके अप्रासंगिकता को सिद्ध कर दिया है। यदि हमें मुस्लिम कट्‌टरवंथी दलों का उदय, कई लीग और फिर और लामबंदी नहीं देखना चाहते तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों को अपनी राजनीति को पूरी तरह नया रूप देना होगा।

और आखिर में : अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने पंजाब में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। यह यदि नाकामी लगती है तो सिर्फ इसलिए कि पंजाब गोवा में सफाया करने के अपने ही मिथ्या प्रचार पर पार्टी ने विश्वास कर लिया। लेकिन परम्परागत गठबंधन के सामने किसी अपरिचित प्रदेश में दूसरे क्रम पर रहना एक उपलब्धि है। सब कुछ जीत लेने की शेखी ने चोट पहुंचाई है। ‘आप’ को हाथ में लिए काम पर ध्यान देना होगा। आलोचकों को धमकाना छोड़कर दिल्ली में अब भी कायम प्रभुत्व को मजबूत करना चाहिए। कटु होकर भी यह कहने का सटीक तरीका है, इसलिए कहता हूं, ‘आप’ की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का गुब्बारा फूट गया है। अब इसे विनम्रता से म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की, खासतौर दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनाव देखते हुए, चिंताओं पर ध्यान देना चाहिए।

(साभार: दैनिक भास्कर)

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