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टेलीविजन आज भी सबसे ज्यादा विज्ञापन लाता है : उदय शंकर
<p>समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो</p> <div>मीडिया के बड़े नामों में कुछ ने गोआफेस्ट 2010 में पैनल चर्चा मे
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
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मीडिया के बड़े नामों में कुछ ने गोआफेस्ट 2010 में पैनल चर्चा में भाग लिया। इनमें लोडेस्टार यूनीवर्स के शशि सिन्हा, टाइम्स समूह के भास्कर दास, स्टार इंडिया के उदय शंकर और यूटीवी के रोनी स्क्रीवाला ने भाग लिया। चर्चा का विषय ‘एडवरटाइजिंग रेवन्यू में कैसे वृद्धि की जाए।
सिन्हा ने आंकड़ों की मदद से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “विश्व में मीडिया पर औसत खर्च सकल घरेलू उद्योग का 0.8 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह केवल 0.4 प्रतिशत है। टेलीविजन और मैगजीन जैसे कोर मीडिया में यह असर साफ झलकता है। इंटरनेट और रेडियो के उपयोग के मुकाबले टेलीविजन के उपयोग में एक बड़ा अंतर है। जबकि, विज्ञापन में वर्ष 2009 में 29 फीसदी वृद्धि हुई, फिर भी हम इसे रेवन्यू में नहीं बदल सके। साथ ही उन्होंने कहा कि मीडिया में प्रति हजार लागत पर ध्यान देने से काफी फायदा होगा। वर्तमान में भारत में प्रति हजार लागत मूल्य अन्य देशों की अपेक्षा काफी कम है।”
भास्कर दास ने मैग्ना स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि प्रिंट इंडस्ट्री अगले छह वर्षों में 13 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। उन्होंने कहा, “हम लोग काफी अच्छा कर रहे हैं। उद्योग को पिछले साल लागत में वृद्धि और मांग में कमी से समस्या का सामना करना पड़ा, और उसके बाद महानगरों से द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में हमने ध्यान केंद्रित किया। लेकिन अब, फिर से इस क्षेत्र में वृद्धि शुरू हो गई है। उन्होंने आगे कहा कि इंडस्ट्री के ग्रोथ के लिए हमें नए सिरे से सोचने की जरूरत है।”
स्टार इंडिया के उदय शंकर ने कहा, “ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री, मीडिया और इंटरटेनमेंट में विज्ञापन का सबसे बड़ा स्रोत है। टेलीविजन से प्रिंट की अपेक्षा राजस्व पिछले साल 45 प्रतिशत ज्यादा मिला। उन्होंने कहा, टेलीविजन की पहुंच 52 करोड़ लोगों के पास है, जबकि, प्रिंट 17.5 करोड़ लोगों के पास पहुंचता है और मोबाइल 39 करोड़ लोगों के पास पहुंच रहा है यानी टेलीविजन की पहुंच काफी ज्यादा है।”
रोनी स्क्रीवाला उदय शंकर की ज्यादातर बातों से सहमत थे। उन्होंने कहा, “मूल्य में वृद्धि के कारण नए ग्रोथ की संभावना कम हो गई है। मांग और पूर्ति में बड़ा अंतर है। इंडस्ट्री के लोगों को इसके लिए आगे आना होगा।”
परिचर्चा में इस बात पर लगभग सबकी सहमति बनी कि भारत में विज्ञापन लागत पर ध्यान देने की जरुरत है ।
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