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‘आउटलुक’ साहित्य को किसी खांचे में नहीं बांट रहा हैं - गीताश्री
<div><span style=font-size: small><strong>सुप्रिया अवस्थी </strong></span></div> <div><span style=fo
समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago
सुप्रिया अवस्थी
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‘आउटलुक’ (हिंदी) सर्वे के जरिए हर साल साहित्य विशेषांक निकालता रहा है। अभी तक ‘आउटलुक’ के सर्वे से जुड़े सारे विशेषांक हिट साबित हुए हैं और साहित्य जगत से इसको लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आती रही हैं। अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं। मगर चर्चा खूब रही। हरेक विशेषांक के विषय अलग रहे हैं, अब तक ‘आउटलुक’ ने कोई भी विषय दोहराया नहीं है। हर साल साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए ‘आउटलुक’ ने कुछ नया ही परोसा है। ‘आउटलुक’ हमेशा ऐसा विषय चुनता है, जो लीक से हटकर हो और समयानुकूल भी यानी वक्त के साथ चलते हुए, प्रासंगिक लगे। ‘आउटलुक’ पाठक सर्वे के अंतर्गत, लोकप्रिय ‘तीन महिला कथाकार’, ‘तीन महिला कवि’ चुनने के लिए, इस सर्वे की मजबूत कर्ताधर्ता और ‘आउटलुक’ की फीचर एडिटर, गीताश्री से सुप्रिया अवस्थी की बातचीत के कुछ अंश...
इस सर्वे में सिर्फ महिला कथाकार और महिला कवि पर ही फोकस करने की बात पर ‘आउटलुक’ की फीचर एडिटर और इस सर्वे में सक्रिय भूमिका निभाने वाली गीता श्री ने कहा कि महिला कथाकारों, कवियों पर सर्वे कराने का विचार इसलिए आया कि अब तक हमने कई विषयों पर विशेषांक निकाले थे, लेकिन महिला केंद्रित कोई अंक नहीं निकाला था। ऐसा करके हम कोई साहित्य को किसी खांचे में नहीं बांट रहे हैं। हमारा मकसद महिला साहित्यकारों की रचनात्मकता को अलग से चिन्हित करना था। आपको बता दें कि पिछले एक दशक से साहित्य में ‘स्त्री लेखन’ और ‘दलित साहित्य’ बेहद प्रमुख स्वर बन कर उभरा है। ये दोनों पक्ष आंदोलन की शक्ल में सामने आए हैं। इसमें साहित्यकार भाग लेते रहे, लेकिन पाठकों का मन किसी ने नहीं टटोला कि वे स्त्री लेखकों को लेकर कितने संजीदा हैं। वे क्या सोचते हैं, उनके बारे में कितना जानते हैं। उनकी महबूब लेखिका कौन है। साहित्यकार खुद अपनी पीठ चाहे जिनती थपथपा लें, महबूब तो उन्हें पाठक ही बनाते हैं। पाठक ही असली कसौटी हैं। पाठक से सीधा संवाद कराने का हम जरिया बन गए हैं। वे अपनी पसंद भी भेजते हैं और अपना तर्क भी देते हैं कि क्यों किसी को पसंद करते हैं। पाठकों की प्रतिक्रियाएं पढ़कर हम दंग रह जाते हैं। जितनी बारीकी से वे अपनी पसंदीदा कवि या कथाकार की रचनाओं पर बात करते हैं कि कोई प्रायोजित आलोचक भी नहीं कर पाएगा।
सर्वे की पारदर्शिता और मॉडल के बारे में बताते हुए, गीताश्री ने कहा कि हमारा सर्वे अलग है, इसलिए कि इसमें पाठकों से सीधा संवाद है, ना कि कोई एजेंसी हमें नाम चुन कर हम पर थोपेगी। सर्वे से यही आशा है कि इसमें अधिक से अधिक पाठक भाग लेंगे और पिछली बार की तरह ही कुछ जेनुइन और लोकप्रिय नाम चुने जायेंगे। हमने जो सूची बनाई है, उसका आधार वे कथाकार, कवि हैं, जो अभी जिंदा हैं, लेखन में सक्रिय हैं, और हमारे अनुसार प्रसिद्ध हैं। हो सकता है, कुछ महत्वपूर्ण नाम छूट गए हों, अब सबको शामिल करना तो संभव नहीं है ना। हम उन नामों का भी सम्मान करते हैं। हमारी जानकारी की भी एक सीमा होगी। पाठक उन्हें सामने ले आयेंगे।
अपनी बात पर विराम देते हुए गीता श्री ने कहा कि ‘आउटलुक’ सर्वे में महिलाओं को केंद्रित करना एक अच्छा प्रयास है, क्योंकि कुछ बातों और समाज की तरह साहित्य में भी पुरुषों का दखल है। उनके बीच साहित्य रचती हुई स्त्री कितनी जद्दोजहद झेलती है, कितनी दुश्वारियों से गुजरती है और फिर कैसे पुरुषवादियों के बीच अपनी जगह बनाती है, यहां भी राहें आसान नहीं। स्त्री विमर्श को ही मर्दवादी साहित्यकार अब तक स्वीकार नहीं पाए है और माखौल उड़ाते रहते हैं। महिला रचनाकारों को गंभीरता से नहीं लेने वाले साहित्कारों की अच्छी खासी जमात है, बावजूद इसके अखाड़े में बेखौफ डटी हुई स्त्री रचनाकारों को चिन्हित करना जरूरी लगा हमें। यौनिकता के प्रकटीकरण पर, स्त्री रचनाकारों को जिस दुनिया में गंदी गाली देकर कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उस दौर में स्त्री के रचना पक्ष पर हमारा विशेषांक निकालना एक जरुरी हस्तक्षेप की तरह है।
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