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प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर विशेष: क्यों भारत को आज भी मोदी की है जरूरत?

शुरुआत से ही जिसने मुझे प्रभावित किया, वह प्रधानमंत्री की सरलता थी। मुझे उनका उस समय का दिल्ली निवास याद है। वह एक सामान्य कमरे में रहते थे, जो किसी और के साथ साझा किया हुआ था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

अर्णब गोस्वामी, फाउंडर, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ।।

करियर की शुरुआत में, जब मैं कोलकाता से दिल्ली आया था और एनडीटीवी के लिए रिपोर्टिंग करता था, तब मैं भाजपा सहित कई बीट्स कवर करता था। यह 1990 के दशक के अंतिम सालों की बात है, उस समय प्रधानमंत्री पार्टी के महासचिव थे। मैं अक्सर अपनी रिपोर्टिंग से जुड़ी कहानियों के लिए उनसे साउंडबाइट्स लेने पहुंचता और नरेंद्र मोदी हमेशा अपनी सहज शालीनता के साथ सहयोग करते।

शुरुआत से ही जिसने मुझे प्रभावित किया, वह प्रधानमंत्री की सरलता थी। मुझे उनका उस समय का दिल्ली निवास याद है। वह एक सामान्य कमरे में रहते थे, जो किसी और के साथ साझा किया हुआ था। दो साधारण बिस्तर, बिना किसी दिखावे के। यह घर उस समय भाजपा कार्यालय, 11 अशोक रोड, के ठीक पीछे था। एक बार जब मैं एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट के लिए उनके घर गया था, तो बातचीत के दौरान वे बड़े ध्यान से अपने कपड़े खुद प्रेस कर रहे थे और यह बात साफ थी कि वे इस मामले में बहुत ही सतर्क और अनुशासित रहते थे। मुझे जो सबसे ज्यादा प्रभावित कर गया, वह यह था कि उनके पास बहुत ही कम निजी सामान और इच्छाएं थीं। कमरा लगभग खाली-सा था, जिसमें किसी भी तरह की अतिरिक्त सजावट या दिखावे का नामोनिशान नहीं था।

एक और मौके पर, मुझे प्राइम टाइम शो एंकर करने का अवसर मिला। यह मेरे लिए बड़ा क्षण था। शो का विषय था कश्मीर, जो उस समय अलगाववाद की चरम स्थिति से जूझ रहा था। मैंने नरेंद्र मोदी से इसमें शामिल होने का अनुरोध किया और उन्होंने तुरंत सहमति दी। शो के दौरान उन्होंने अलगाववादी मेहमानों के खिलाफ जिस तरह तीखे शब्दों, तर्क की मजबूती और स्पष्ट दृष्टि के साथ अपनी बात रखी, उसने गूंज पैदा की। यही वह प्रवृत्ति थी जिसने अंततः उनके प्रधानमंत्रित्व काल में कश्मीर घाटी के सफल एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।

उस समय से लेकर अब तक डेढ़ से दो दशक बीत चुके हैं। इन वर्षों में जीवन और करियर के अलग-अलग चरणों में मुझे उनसे कई बार संवाद करने का अवसर मिला। उन्होंने रिपब्लिक के हर वार्षिक शिखर सम्मेलन का निमंत्रण स्वीकार किया, जिसमें पहला सम्मेलन भी शामिल था जिसके लिए प्रधानमंत्री विशेष रूप से दिल्ली से मुंबई पहुंचे थे। सभी यादों को यहाँ दर्ज करना कठिन है, लेकिन 2014 के चुनाव अभियान का इंटरव्यू आज भी मेरे मन में ताजा है।

यह मई 2014 का दूसरा सप्ताह था। उस समय भारत का सबसे बड़ा चुनाव अभियान समाप्ति पर था। यूपीए का दशक खत्म होने की कगार पर था और भाजपा का चुनावी अभियान उस स्तर और पैमाने का था जो देश ने पहले कभी नहीं देखा था- 3D रैलियां, भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर फोकस, सोशल मीडिया और डिजिटल टूल्स का उपयोग और जमीनी स्तर पर जबरदस्त प्रचार। मुंबई स्थित हमारे न्यूजरूम से मैं गांधीनगर पहुंचा। मुझे आखिरी समय तक यह भरोसा नहीं था कि मुझे उस व्यक्ति का इंटरव्यू मिलेगा जिसे ऐतिहासिक जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। मुझे सुबह-सुबह का समय दिया गया और यह नरेंद्र मोदी के पूरे चुनाव अभियान का आखिरी इंटरव्यू था।

यही वह इंटरव्यू था जिसमें प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान पर अपनी नीति बेहद स्पष्टता से रखी। उन्होंने कहा था, “बम, बंदूक और पिस्तौल की आवाज में बातचीत नहीं हो सकती।” दिल्ली में उनके कार्यकाल के दौरान और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी जब-जब प्रधानमंत्री ने इस विषय पर बोला, उनकी पाकिस्तान पर नीति उतनी ही दृढ़ और सुसंगत रही। उस इंटरव्यू के अंत में मैंने प्रधानमंत्री से कैमरा बंद होने के बाद पूछा कि मुझे उनके चुनाव अभियान के बिल्कुल अंत में स्लॉट क्यों दिया गया। उन्होंने जवाब दिया, “आपका 2014 का चुनाव कवरेज एक विशेष नेता के इंटरव्यू से शुरू हुआ था और मैंने सोचा कि यह मेरे इंटरव्यू के साथ समाप्त होना चाहिए।” उस क्षण ने मुझे प्रधानमंत्री की गहरी राजनीतिक और रणनीतिक सोच का बोध कराया।

पिछले कुछ दिनों से रिपब्लिक ने राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया है- #IndiaNeedsModi। यह अभियान मुझे गर्व से भरता है, क्योंकि जब भारत $4 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था से $10 ट्रिलियन की ओर बढ़ेगा, तो रास्ते में चुनौतियां आएंगी। नए प्रकार की चुनौतियां, नई ताकतें, कभी दोस्त रहे लोग अवरोध बन सकते हैं और भारत की विकासगाथा में रुकावट डालने के प्रयास हो सकते हैं। ऐसे समय में भारत को वह नेतृत्व चाहिए जो उसे मार्गदर्शन दे और उसे उसका सही स्थान दिलाए।

कल अपने शो की शुरुआत में मैंने सवाल पूछा: देश कैसा होता यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक कदम, निरंतर सुधार और विकास-उन्मुख शासन पिछले 11 वर्षों में न होते? हमें, एक राष्ट्र के रूप में, चाहे हमारी विचारधारा कुछ भी हो, इस पर अवश्य ठहरकर सोचना चाहिए। हमें यह भी सोचना चाहिए कि बिना दृढ़ नेतृत्व के क्या काले धन पर सख्त प्रहार और नोटबंदी संभव होती? क्या यूपीआई जैसे कदमों से डिजिटल अर्थव्यवस्था में परिवर्तन आता? क्या डीबीटी और रक्षा उत्पादन जैसी पहलों पर हमें गर्व होता? क्या सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट या ऑपरेशन सिंदूर जैसे निर्णय लिए जा सकते थे? सामूहिक आत्ममंथन से हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत की इस विकास यात्रा को हमें हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इसकी जड़ में शुद्ध नेतृत्व है।

आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है ऐसा दृढ़ नेतृत्व, जो भारत के हितों पर कोई समझौता न करे। पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री ने निर्णायक फैसले लिए, भारत को वैश्विक मंच पर अपने शर्तों पर मजबूती से खड़ा किया और हर स्थिति में राष्ट्र प्रथम रखने के लिए सब कुछ दांव पर लगाने की अद्भुत क्षमता और इच्छाशक्ति दिखाई।

और सबसे उल्लेखनीय यह है कि हर कठिन परिस्थिति में- चाहे कोविड-19 की पीड़ा हो, अनुच्छेद 370 हटाने के बाद के विरोधी हों या हर चुनाव से पहले झूठी खबरों के अभियान- प्रधानमंत्री अपने फैसलों पर अडिग रहे और आलोचकों को गलत साबित किया। उन्होंने अपने शासन की आस्था और निर्णयों की मजबूती को बनाए रखा। यही वह नेतृत्व है जो न केवल वादा करता है बल्कि सुनिश्चित करता है कि भारत हर परिस्थिति में आगे बढ़े।

जैसे ही प्रधानमंत्री अपने 75वें जन्मदिन का उत्सव मना रहे हैं और विश्व के सबसे बड़े नेताओं में से एक के रूप में सम्मानित हो रहे हैं, मैं उनके लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना करता हूं। 


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