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मीडिया को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने कही ये बात
‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ विशेष बातचीत में पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री और लोकसभा सदस्य मनीष तिवारी ने मीडिया पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मीडिया सरकार के इशारे पर काम कर रही है। ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में न्यूज चैनल्स पर बरसते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि मीडिया अब लोक हितैषी नहीं रह गई है।
पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान मनीष तिवारी का यह भी कहना था, ‘समय के साथ मीडिया सरकार के इशारे पर काम करने वाली बनती जा रही है और भारत में प्रेस की स्वतंत्रता एक मिथक है।’
कुछ आंकड़ों का हवाला देते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि देश में लगभग 950 मिलियन लोगों के यहां घरों पर टीवी है। इनमें से लगभग 93 प्रतिशत न्यूज चैनल्स नहीं देखते हैं, केवल सात प्रतिशत ही न्यूज और करेंट अफेयर्स चैनल्स देखते हैं और मौजूदा करीब 391 न्यूज व करेंट अफेयर्स चैनल्स उसी सात प्रतिशत से पैसा कमाने की कोशिश कर रहे हैं।
इसके साथ ही मनीष तिवारी का यह भी कहना था कि मीडिया को अपने रेवेन्यू मॉडल्स को दोबारा से देखने की जरूरत है और यह पूरी तरह से विज्ञापन संचालित मॉडल नहीं हो सकता है। यह पूछे जाने पर कि क्या रेवेन्यू मॉडल को पॉलिसी से रेगुलेट किया जा सकता है, तिवारी ने कहा कि जब वे सूचना-प्रसारण मंत्री थे तो उन्होंने टीआरपी को लेकर पॉलिसी फ्रेमवर्क के जरिये साफ किया था कि टीआरपी बनाने वाली कंपनियों को किस तरह रेगुलेट किए जाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, ‘यदि आप अपना रेवेन्यू मॉडल सही करना चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग अखबार व टीवी चैनल के सबस्क्रिप्शन के लिए ज्यादा पैसा दें तो आपको उन्हें बेहतर कंटेंट पेश करना होगा। आपको अपने प्रॉडक्ट का उचित मूल्य निर्धारण शुरू करना होगा और लोगों को भुगतान करने की आदत डालनी होगी, लेकिन जब आप विज्ञापन पर निर्भर रहते हैं, तब यह फेक करेंसी से मापा जाएगा, जिसे टीआरपी कहते हैं।’
पूर्व मंत्री का कहना था कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह सोशल मीडिया भी समान रूप से खराब है। उन्होंने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह सोशल मीडिया भी पूरी तरह से विज्ञापन पर आधारित मॉडल है। विज्ञापन पर आधारित मॉडल की वजह से आमतौर पर क्वालिटी कंटेंट तैयार नहीं हो पाता है।
पेड न्यूज के मुद्दे पर पूर्व मंत्री ने कहा कि जब वह प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 1867 में संशोधन करने की कोशिश कर रहे थे और विशेष रूप से पेड न्यूज और दंड प्रावधानों को धाराओं के तहत लाने की कोशिश कर रहे थे, तब मीडिया इंडस्ट्री ने इसे इतना पीछे धकेल दिया कि यह बिल आज तक अस्तित्व में नहीं आ सका है। उनका कहना था, ‘न्यूज और करेंट अफेयर्स मीडिया का काम लोगों को शिक्षित व जागरूक करना है। इसका काम तथ्यों को सही रूप मं पेश करना व जनहित को देखते हुए गंभीरता लाना है।’
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