यह बदलाव उस संतुलन को दर्शाता है जिसे YouTube अब हानिकारक कंटेंट को रोकने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के बीच साधने की कोशिश कर रहा है
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
'यूट्यूब' (YouTube) ने अपनी आंतरिक मॉडरेशन गाइडलाइंस में बड़ा बदलाव किया है। The New York Times की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब ऐसे वीडियो जो उसकी पॉलिसीज का कुछ हद तक उल्लंघन करते हैं, लेकिन सार्वजनिक समझ को बेहतर बनाने में मददगार माने जाते हैं, उन्हें प्लेटफॉर्म से हटाया नहीं जाएगा।
यह बदलाव उस संतुलन को दर्शाता है जिसे YouTube अब हानिकारक कंटेंट को रोकने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के बीच साधने की कोशिश कर रहा है, खासकर चुनाव, पहचान, लिंग, नस्ल, प्रवासन और सामाजिक विचारधाराओं जैसे संवेदनशील मुद्दों पर।
नई पॉलिसी के तहत, कंटेंट मॉडरेटर अब तब तक वीडियो हटाने से बचेंगे जब तक कि उसका 50% से ज्यादा हिस्सा YouTube की गाइडलाइंस का उल्लंघन न कर रहा हो। पहले यह सीमा 25% थी। इसके साथ ही अब मॉडरेटर्स से यह भी अपेक्षा की जा रही है कि वे यह आकलन करें कि क्या किसी वीडियो की फ्री स्पीच यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की संभावित उपयोगिता, उससे जुड़े जोखिमों से कहीं अधिक है। ऐसे मामलों में वीडियो को तुरंत हटाने की बजाय आगे की समीक्षा के लिए भेजने का निर्देश है। यह प्रक्रिया YouTube की EDSA (Education, Documentary, Science, Art) रूपरेखा के तहत आती है।
YouTube की प्रवक्ता निकोल बेल ने The Verge को बताया कि प्लेटफॉर्म के विकसित होते स्वरूप को देखते हुए उसकी कम्युनिटी गाइडलाइंस को नियमित रूप से अपडेट किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव वीडियो की एक सीमित श्रेणी को प्रभावित करेगा और इसका उद्देश्य पॉलिसी-प्रवर्तन में अतिरेक को रोकना है। उदाहरण के लिए, किसी लंबे न्यूज पॉडकास्ट को सिर्फ इसलिए नहीं हटाया जाएगा क्योंकि उसमें एक छोटा हिस्सा नियमों का उल्लंघन कर रहा हो।
यह अपडेट उस पॉलिसी का विस्तार है जिसमें YouTube ने चुनावी उम्मीदवारों द्वारा अपलोड किए गए ऐसे वीडियो को भी प्लेटफॉर्म पर रहने देने की अनुमति दी थी, जो नियमों का उल्लंघन करते हों, बशर्ते वे सार्वजनिक जागरूकता को बढ़ाते हों, विशेषकर 2024 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखते हुए।
यह बदलाव सिर्फ YouTube तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अब एक व्यापक ट्रेंड देखने को मिल रहा है। Meta ने भी हाल में गलत सूचना और घृणास्पद भाषण को लेकर अपने रुख में ढील दी है, उसने तीसरे पक्ष के फैक्ट-चेकिंग प्रोग्राम को बंद कर दिया है और अब यूजर्स आधारित सुधारों पर भरोसा कर रहा है। यही तरीका अब X (पहले Twitter) भी अपना रहा है।
Covid-19 महामारी और डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान YouTube ने बहुत सख्त कंटेंट मॉडरेशन लागू किया था यानी वीडियो हटाने या सेंसर करने के नियम काफी सख्त थे। अब जो नई पॉलिसी लागू की गई है, वह उस पुराने कड़े रुख से थोड़ा संतुलन बनाते हुए, उसे थोड़ा नरम या लचीला करने की कोशिश है।"
सरकार ने DigiLocker और CISCE के नाम पर चल रही फर्जी वेबसाइट को लेकर अलर्ट जारी किया है। MeitY ने लोगों को निजी जानकारी, आधार डिटेल और OTP साझा न करने की सख्त चेतावनी दी है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डिजिटल इंडिया के दौर में साइबर ठग अब सरकारी सेवाओं के नाम पर लोगों को निशाना बना रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने DigiLocker और CISCE के नाम पर चल रही एक फर्जी वेबसाइट को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया है। सरकार के मुताबिक http://digilocker.cisceboard.org नाम की एक फर्जी वेबसाइट इंटरनेट पर सक्रिय है। यह वेबसाइट देखने में बिल्कुल असली DigiLocker और CISCE पोर्टल जैसी लगती है, जिससे आम यूजर्स आसानी से धोखा खा सकते हैं।
MeitY ने नागरिकों को इस वेबसाइट से दूर रहने की सलाह दी है। मंत्रालय ने कहा है कि लोग इस पोर्टल पर अपना नाम, पता, जन्मतिथि, मोबाइल नंबर या आधार से जुड़ी कोई भी जानकारी साझा न करें। साथ ही किसी भी ओटीपी (OTP) को यहां दर्ज करने से बचें। सरकार ने चेतावनी दी है कि यह वेबसाइट शुल्क या किसी अन्य बहाने से ऑनलाइन भुगतान की मांग भी कर सकती है। ऐसे में किसी भी प्रकार का लेन-देन न करने की सलाह दी गई है।
मंत्रालय ने लोगों को याद दिलाया है कि भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइटों के अंत में आमतौर पर “.gov.in” या “.nic.in” लिखा होता है। इसके अलावा व्हाट्सएप, एसएमएस या ईमेल के जरिए मिलने वाले संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से भी बचने को कहा गया है। सरकार ने लोगों से इस जानकारी को परिवार और दोस्तों के साथ साझा करने की अपील की है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग साइबर ठगी से सुरक्षित रह सकें।
ब्रेकिंग न्यूज से लेकर लोकल अपडेट तक, सब कुछ वहीं पहुंच रहा है जहां लोग पहले से अपना समय बिता रहे हैं। न्यूज अब ऐप के अंदर नहीं, लोगों की रोजमर्रा की डिजिटल आदतों के बीच बह रही है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अब खबरें पढ़ने के लिए लोग किसी एक न्यूज ऐप पर नहीं जाते। सुबह की पहली अपडेट वॉट्सऐप फॉरवर्ड, इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब वीडियो या टेलीग्राम चैनलों से मिल जाती है। ब्रेकिंग न्यूज से लेकर लोकल अपडेट तक, सब कुछ वहीं पहुंच रहा है जहां लोग पहले से अपना समय बिता रहे हैं। न्यूज अब ऐप के अंदर नहीं, लोगों की रोजमर्रा की डिजिटल आदतों के बीच बह रही है।
यह सिर्फ एक आदत नहीं बदली- यह पूरे मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन का भूगोल बदल रहा है।
"डेस्टिनेशन इंटरनेट" से "डिस्ट्रीब्यूशन इंटरनेट" की इस यात्रा में भारत सबसे आगे है। और इस यात्रा के केंद्र में है एक सवाल जो मीडिया इंडस्ट्री की नींव हिला रहा है: क्या न्यूज ऐप्स अपना सबसे बड़ा युद्ध हार रहे हैं?
भारत: वॉट्सऐप का सबसे बड़ा बाजार, न्यूज का नया अड्डा
आंकड़े बोलते हैं और जोर से बोलते हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट (Reuters Institute) के Digital News Report 2025 के अनुसार, भारत में 46% लोग वॉट्सऐप को न्यूज के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यूट्यूब (55%) के बाद वॉट्सऐप दूसरा सबसे बड़ा न्यूज प्लेटफॉर्म बन चुका है। इसके बाद इंस्टाग्राम (37%), फेसबुक (36%), और टेलीग्राम (22%) आते हैं।
तुलना के लिए देखें तो वैश्विक औसत में वॉट्सऐप का यह आंकड़ा महज 19% है। यानी भारत में वॉट्सऐप न्यूज खपत दुनिया के औसत से ढाई गुना ज्यादा है।
कई आंकड़ा स्रोतों के अनुसार भारत में वॉट्सऐप के करीब 535 मिलियन मंथसी एक्टिव यूजर्स हैं, जो दुनिया में किसी भी देश से सबसे ज्यादा है। दुनियाभर में वॉट्सऐप के 3 अरब मंथसी एक्टिव यूजर्स हैं, और उनमें से हर छठा भारतीय है। औसत वॉट्सऐप यूजर्स इस पर हर महीने 21 घंटे बिताता है।
इतने बड़े पारिस्थितिकी तंत्र में जब कोई न्यूज पब्लिशर अपना चैनल खोलता है, तो वह सिर्फ सामग्री नहीं डाल रहा, वह दर्शकों के उसी इनबॉक्स में घर बना रहा है जहां उसके परिवार, दोस्त और दफ्तर के लोग हैं।
वॉट्सऐप चैनल्स सितंबर 2023 में शुरू हुआ था और जून 2024 तक इसके 50 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स हो गए। किसी भी नए फीचर के लिए इतनी तेज ग्रोथ काफी बड़ी मानी जाती है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि Financial Times को टेलीग्राम पर 35 हजार फॉलोअर्स जुटाने में एक साल लगा, जबकि वॉट्सऐप पर उतने ही फॉलोअर्स सिर्फ दो हफ्तों में मिल गए।
न्यूज मीडिया अब वॉट्सऐप चैनल्स पर दूसरी सबसे बड़ी कैटेगरी बन चुकी है, स्पोर्टस के बाद। और इस कैटेगरी में भारतीय न्यूज चैनल वैश्विक स्तर पर सबसे आगे हैं।
न्यूज ऐप डाउनलोड तो हो रहे हैं, लेकिन अब एक बड़ा प्रश्न, क्या न्यूज ऐप्स वाकई संकट में हैं?
Appfigures के आंकड़ों के अनुसार 2025 में वैश्विक ऐप डाउनलोड लगातार पांचवें साल घटे, 106.9 अरब तक। AppTweak के विश्लेषण के अनुसार कुल ऐप डाउनलोड में साल-दर-साल 4.1% की गिरावट दर्ज हुई। Sensor Tower के अनुसार भारत उन कुछ देशों में से एक है जहां 2025 में डाउनलोड बढ़े, 24.6 अरब से 25.5 अरब। लेकिन इस वृद्धि का श्रेय मुख्यतः AI सहायक, क्विक कॉमर्स और सरकारी सेवा ऐप्स को जाता है।
मीडिया और सोशल मैसेंजर ऐप्स की कैटेगरी में? भारत में भी गिरावट।
इससे भी बड़ी समस्या रिटेंशन की है। एक बार डाउनलोड होने के बाद यूजर्स कितने दिन ऐप पर टिकता है? Statista के Android ऐप आंकड़ों (तीसरी तिमाही 2024) के अनुसार न्यूज ऐप्स का 30-दिन रिटेंशन रेट लगभग 10% है, यह सभी ऐप कैटेगरीज में सबसे अच्छा है, फिर भी इसका मतलब यह है कि 100 में से 90 लोग एक महीने बाद ऐप नियमित रूप से नहीं खोल रहे।
इसके साथ जोड़ें एक और आंकड़ा: एक भारतीय स्मार्टफोन में औसतन 80 से ज्यादा ऐप्स होते हैं, लेकिन उनमें से नियमित रूप से इस्तेमाल होते हैं बस मुट्ठीभर। एक अलग अध्ययन बताता है कि 22% यूजर्स खुद मानते हैं कि उनके फोन पर ऐप्स की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है। स्टोरेज कम नहीं होती, धैर्य पहले खत्म हो जाता है।
पुश नोटिफिकेशन का संकट: जब अलर्ट ही दुश्मन बन जाए
एक समय था जब न्यूज ऐप्स की सबसे बड़ी ताकत पुश नोटिफिकेशन मानी जाती थी। जैसे ही ब्रेकिंग न्यूज आती थी, फोन पर नोटिफिकेशन आता और लोग तुरंत ऐप खोल लेते थे। लेकिन अब यही तरीका लोगों को परेशान करने लगा है।
Batch की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, Android फोन में पुश नोटिफिकेशन स्वीकार करने वाले यूजर्स की संख्या एक साल में 85% से घटकर 67% रह गई। iPhone में यह पहले से ही करीब 56-58% के बीच थी। मीडिया और एंटरटेनमेंट कैटेगरी में यह आंकड़ा सबसे कम कैटेगरी में शामिल है।
भारत में भी हाल कुछ ऐसा ही है। यहां Android पर सिर्फ 40-60% और iPhone पर 30-45% लोग ही नोटिफिकेशन ऑन रखते हैं। अगर जरूरत से ज्यादा नोटिफिकेशन आने लगें, तो लोग तुरंत ऐप म्यूट कर देते हैं या फिर उसे फोन से हटा देते हैं।
असल में आज हर ऐप यूजर्स का ध्यान खींचना चाहता है। किसी ने सही कहा है कि भारतीय स्मार्टफोन की नोटिफिकेशन ट्रे अब “पूरी तरह भरी हुई जगह” बन चुकी है। हर तरफ सिर्फ अलर्ट ही अलर्ट हैं।
वॉट्सऐप यहां अलग नजर आता है। उसका नोटिफिकेशन लोगों को ज्यादा निजी और भरोसेमंद लगता है, क्योंकि वही जगह है जहां परिवार और दोस्तों के मैसेज भी आते हैं। इसलिए अगर कोई खबर वॉट्सऐप चैनल से आती है, तो वह यूजर्स को उतनी परेशान नहीं करती जितनी किसी न्यूज ऐप की नोटिफिकेशन करती है। यही वजह है कि लोग अब न्यूज ऐप्स से ज्यादा वॉट्सऐप पर खबरें देखना पसंद करने लगे हैं।
Social Media का घटता योगदान: Traffic का महाविनाश
रीजनल मीडिया की नई रणनीति: वॉट्सऐप ही है असली Homepage
भारत में यह बदलाव इसलिए भी खास है, क्योंकि यहां बड़े शहरों और छोटे शहरों के लोगों का इंटरनेट इस्तेमाल करने का तरीका काफी अलग है।
मेट्रो शहरों में लोग शायद सीधे NDTV या TOI जैसे न्यूज ऐप खोलते हों। लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में लोगों तक खबर सबसे ज्यादा वॉट्सऐप ग्रुप्स के जरिए पहुंचती है। वहां परिवार या दोस्तों के ग्रुप में जो खबर फॉरवर्ड होती है, वही लोगों के लिए “हेडलाइन” बन जाती है।
Reuters Institute की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आधे से ज्यादा लोग कभी-कभी न्यूज से दूरी बनाते हैं। लेकिन वॉट्सऐप पर आने वाली खबरों को वे नजरअंदाज नहीं करते, क्योंकि वह उनके रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुकी हैं।
इसी बात को हिंदी और क्षेत्रीय मीडिया कंपनियां तेजी से समझ रही हैं। छोटे और मझोले डिजिटल पब्लिशर्स अब वॉट्सऐप चैनल्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। BloombergQuint India ने वॉट्सऐप पर फाइनेंशियल न्यूज भेजना शुरू किया और उसके 3.5 लाख से ज्यादा एक्टिव सब्सक्राइबर हो गए। कंपनी ने 90% डेली एंगेजमेंट का दावा भी किया, जो डिजिटल दुनिया में काफी बड़ा आंकड़ा माना जाता है। वहीं Newschecker जैसे फैक्ट-चेकिंग प्लेटफॉर्म वॉट्सऐप का इस्तेमाल फेक न्यूज रोकने के लिए कर रहे हैं।
यह पूरा ट्रेंड एक बड़ी बात दिखाता है। पहले मीडिया कंपनियां लोगों से कहती थीं कि “हमारी वेबसाइट पर आओ”, लेकिन अब उन्हें खुद वहां जाना पड़ रहा है जहां लोग पहले से मौजूद हैं।
न्यूज कंजप्शन का बदल गया पूरा नक्शा
Reuters Institute Digital News Report 2025 की रिपोर्ट बताती है कि लोगों के न्यूज देखने और पढ़ने का तरीका तेजी से बदल रहा है। सबसे बड़ा बदलाव वीडियो में दिख रहा है। 2020 में जहां 52% लोग सोशल वीडियो के जरिए न्यूज देखते थे, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 65% हो गया। भारत उन देशों में शामिल है जहां अब लोग न्यूज पढ़ने से ज्यादा वीडियो में देखना पसंद कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर लोग अब यूट्यूब, वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर न्यूज देख रहे हैं। वीडियो न्यूज का 61% हिस्सा इन प्लेटफॉर्म्स पर देखा जाता है, जबकि न्यूज कंपनियों की अपनी वेबसाइट्स पर सिर्फ 29% लोग पहुंचते हैं। इसका सीधा असर मीडिया कंपनियों की विज्ञापन कमाई और सब्सक्रिप्शन बिजनेस पर पड़ रहा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दुनिया भर में लोग अब न्यूज से दूरी बनाने लगे हैं। 2025 में करीब 40% लोगों ने माना कि वे कभी-कभी या अक्सर न्यूज देखना टालते हैं। 2017 में यह आंकड़ा 29% था। इसकी बड़ी वजह लगातार नकारात्मक खबरें और जरूरत से ज्यादा न्यूज का दबाव बताया गया है।
वहीं AI भी तेजी से न्यूज की दुनिया में जगह बना रहा है। भारत में 18% लोग हर हफ्ते न्यूज के लिए AI चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि ब्रिटेन में यह आंकड़ा सिर्फ 3% है। खास बात यह है कि 44% भारतीय AI से तैयार न्यूज को सहजता से स्वीकार कर रहे हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।
सबसे बड़ा खतरा: दूसरों के प्लेटफॉर्म पर बनी ऑडियंस
मीडिया कंपनियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी ऑडियंस आखिर उनकी अपनी है या किसी और प्लेटफॉर्म की।
सीधी भाषा में समझें तो:
न्यूज ऐप = अपनी ऑडियंस
वॉट्सऐप चैनल = किराए की ऑडियंस
मान लीजिए किसी मीडिया कंपनी के वॉट्सऐप चैनल पर 10 लाख सब्सक्राइबर हो जाते हैं। यह सुनने में बहुत बड़ा लगता है, लेकिन असली समस्या यह है कि उन लोगों का पूरा डेटा कंपनी के पास नहीं होता। वॉट्सऐप यह नहीं बताता कि सब्सक्राइबर कौन हैं, उनकी उम्र क्या है, वे कहां रहते हैं या उनकी पसंद क्या है। मीडिया कंपनी सीधे उन्हें ईमेल या नोटिफिकेशन भी नहीं भेज सकती।
सबसे बड़ा डर यह है कि Meta कभी भी अपने नियम बदल सकता है।
ऐसा पहले भी हो चुका है। कुछ साल पहले मीडिया कंपनियों ने फेसबुक पर बहुत भरोसा किया था। उन्होंने अपनी पूरी डिजिटल रणनीति फेसबुक के हिसाब से बना ली। लेकिन बाद में फेसबुक ने अपना एल्गोरिदम बदल दिया और न्यूज कंटेंट की पहुंच कम कर दी। इसका असर यह हुआ कि मीडिया वेबसाइट्स का ट्रैफिक तेजी से गिर गया। X (पहले Twitter) के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
अब वॉट्सऐप भी उसी रास्ते पर जाता दिख रहा है। Meta ने वॉट्सऐप चैनल्स पर पेड सब्सक्रिप्शन और प्रमोटेड चैनल्स शुरू करने की तैयारी कर ली है। यानी आने वाले समय में यहां भी पहुंच के लिए पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।
Reuters Institute की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, 77% मीडिया कंपनियां सोशल मीडिया से घटते ट्रैफिक की वजह से नए रास्ते खोज रही हैं। इसलिए वे वॉट्सऐप की तरफ जा रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वे एक प्लेटफॉर्म की निर्भरता छोड़कर दूसरे प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो रही हैं?
आगे का रास्ता क्या है?
मीडिया इंडस्ट्री के सामने अब तीन बड़े रास्ते हैं।
पहला रास्ता: App और वॉट्सऐप दोनों साथ
मीडिया कंपनियां वॉट्सऐप का इस्तेमाल लोगों तक पहुंचने के लिए करें और फिर उन्हें अपने ऐप या वेबसाइट तक लाएं। यानी वॉट्सऐप सिर्फ दरवाजा बने, पूरा घर नहीं।
दूसरा रास्ता: अपनी ऑडियंस खुद बनाना
ईमेल न्यूज़लेटर, पेड सब्सक्रिप्शन और ऐप engagement पर ज्यादा ध्यान दिया जाए, ताकि ऑडियंस पर कंपनी का सीधा नियंत्रण बना रहे।
तीसरा रास्ता: AI आधारित न्यूज
अब लोग AI चैटबॉट्स से भी न्यूज लेने लगे हैं। आने वाले समय में AI आधारित personal news feeds और chatbots एक बड़ा प्लेटफॉर्म बन सकते हैं। लेकिन वहां भी मीडिया कंपनियों का सीधा कंट्रोल सीमित रहेगा।
न्यूज ऐप खत्म नहीं हो रहे, उनकी भूमिका बदल रही है
न्यूज ऐप पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, लेकिन अब उनका काम बदल रहा है। पहले ऐप्स का मकसद ज्यादा से ज्यादा नए यूजर्स लाना था। अब वे उन लोगों के लिए प्लेटफॉर्म बनते जा रहे हैं जो पहले से लॉयल रीडर्स हैं और गहराई से कंटेंट पढ़ना चाहते हैं। अब नई ऑडियंस वॉट्सऐप, YouTube, Instagram और Telegram जैसे प्लेटफॉर्म्स से आ रही है।
एक तरह से देखें तो अब वॉट्सऐप Groups नए जमाने के डिजिटल अखबार स्टॉल बन चुके हैं। पहले लोग चाय की दुकान पर अखबार पढ़ते थे, अब वही काम वॉट्सऐप ग्रुप में फॉरवर्ड हुई खबरें कर रही हैं। यह बदलाव मीडिया इंडस्ट्री के लिए खतरा नहीं, बल्कि नया सच है। जो मीडिया कंपनी लोगों तक उनकी पसंद के प्लेटफॉर्म पर पहुंचेगी, वही आगे बढ़ेगी।
लेकिन सावधानी जरूरी है। किसी दूसरे प्लेटफॉर्म पर ऑडियंस बनाना आसान है, लेकिन अगर वह प्लेटफॉर्म अपने नियम बदल दे, तो पूरी रणनीति बिगड़ सकती है। यानी न्यूज ऐप्स का दौर खत्म नहीं हो रहा, लेकिन अब लोगों तक पहुंचने का सबसे बड़ा रास्ता app stores नहीं, बल्कि मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स बनते जा रहे हैं।
गूगल (Google) ने अपने AI Pro प्लान में बड़े बदलाव किए हैं। अब डेली प्रॉम्प्ट लिमिट हटाकर कंप्यूट-बेस्ड सिस्टम लागू किया गया है, जबकि Jio के फ्री यूजर्स को YouTube Premium Lite का लाभ नहीं मिलेगा।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गूगल (Google) ने अपने AI Pro प्लान में कई अहम बदलाव किए हैं। कंपनी ने जहां एक तरफ YouTube Premium Lite जैसे नए फायदे जोड़े हैं, वहीं दूसरी ओर AI उपयोग की लिमिट तय करने का तरीका भी बदल दिया है।
अब गूगल (Google) डेली प्रॉम्प्ट लिमिट की जगह “कंप्यूट-बेस्ड सिस्टम” लागू कर रहा है। यानी यूजर कितनी AI क्षमता इस्तेमाल कर सकता है, यह उसकी चैट की लंबाई, फीचर्स के उपयोग और रिक्वेस्ट की जटिलता पर निर्भर करेगा।
कंपनी ने 5 घंटे की “रोलिंग विंडो” व्यवस्था भी शुरू की है। इसके तहत लिमिट खत्म होने पर यूजर्स को अगला कोटा रिफ्रेश होने तक इंतजार करना होगा। इस बीच गूगल (Google) और रिलायंस जियो (Reliance Jio) के 18 महीने वाले फ्री AI Pro ऑफर को लेकर भी नई जानकारी सामने आई है। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि इस ट्रायल प्लान में YouTube Premium Lite की सुविधा शामिल नहीं होगी।
जेमिनी एआई (Gemini AI) के प्रोडक्ट लीड विकास कंसल (Vikas Kansal) ने एक्स (X) पर बताया कि YouTube Premium Lite केवल पेड AI Pro सब्सक्राइबर्स को मिलेगा। यानी Jio के जरिए मुफ्त AI Pro इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को यह सुविधा ट्रायल खत्म होने के बाद पेड प्लान लेने पर ही मिलेगी।
YouTube Premium Lite एक बेसिक प्रीमियम प्लान है, जिसमें अधिकांश वीडियो विज्ञापन-मुक्त देखे जा सकते हैं। हालांकि इसमें YouTube Music Premium, बैकग्राउंड प्ले, ऑफलाइन डाउनलोड और हाई-क्वालिटी ऑडियो जैसे फीचर्स शामिल नहीं हैं।
इससे पहले वह ‘HT Digital Streams’ में हेड (वीडियो ग्रोथ) के पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश के प्रमुख मीडिया नेटवर्क्स में शुमार ‘नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड’ में वरिष्ठ डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल निखिल राठौर की वापसी हुई है। उन्होंने इस समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘कड़क’ (Kadak) के एडिटर के रूप में जॉइन किया है।
निखिल राठौर ने खुद अपने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए इस नई पारी की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि वर्षों तक स्टोरीटेलिंग, टीम बिल्डिंग और प्रभावशाली पत्रकारिता पर काम करने के बाद अब वह इस नई चुनौती को लेकर उत्साहित हैं और निर्भीक व प्रभावशाली कंटेंट तैयार करने में योगदान देना चाहते हैं।
इससे पहले वह ‘HT Digital Streams’ में हेड (वीडियो ग्रोथ) के पद पर कार्यरत थे। वहां उन्होंने ‘No Intervals’, ‘Alert News’ और ‘DesiMartini Podcast’ जैसे कई डिजिटल प्रॉपर्टीज और ब्रांड्स की लॉन्चिंग और री-लॉन्चिंग में अहम भूमिका निभाई।
निखिल राठौर को मीडिया और डिजिटल इंडस्ट्री में काम करने का करीब 18 वर्षों का अनुभव है। इससे पहले वह नेटवर्क18 में ही ‘हेड, ऑफ प्लेटफॉर्म- News18 India, SportsNext और News18 Hindi’ की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इस दौरान उन्होंने न्यूज18 हिंदी के सोशल मीडिया और वीडियो/यूट्यूब ऑपरेशंस का नेतृत्व किया।
उन्होंने नेटवर्क18 में ‘लीड-वीडियो स्ट्रैटेजी एंड ऑपरेशंस’ और ‘न्यूज एडिटर, वीडियो सिनर्जी’ जैसी भूमिकाओं में भी काम किया है। इसके अलावा वह सीएनएन-न्यूज18, इंडिया टुडे, न्यूजएक्स, एनडीटीवी और होमशॉप18 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से भी जुड़े रहे हैं।
डिजिटल वीडियो, सोशल मीडिया स्ट्रैटेजी, ऑर्गेनिक ग्रोथ, यूट्यूब ऑपरेशंस और AI आधारित कंटेंट निर्माण के क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। समाचार4मीडिया की ओर से निखिल राठौर को उनकी नई पारी के लिए ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।
होर्डिंग और बिलबोर्ड को हम हमेशा से एक 'पुराना' विज्ञापन माध्यम मानते रहे हैं, जो हफ्तों या महीनों तक एक ही तस्वीर दिखाता रहता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
होर्डिंग और बिलबोर्ड को हम हमेशा से एक 'पुराना' विज्ञापन माध्यम मानते रहे हैं, जो हफ्तों या महीनों तक एक ही तस्वीर दिखाता रहता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), लोकेशन डेटा, मौसम के आंकड़े और ऑडियंस एनालिटिक्स की मदद से डिजिटल आउट-ऑफ-होम (DOOH) स्क्रीनें इतनी 'समझदार' हो गई हैं कि वे हर पल सही व्यक्ति को सही समय पर सही विज्ञापन दिखा सकती हैं। यह बदलाव न केवल विज्ञापन इंडस्ट्री को बल्कि हमारी सार्वजनिक जगहों की पूरी तस्वीर को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।
DOOH का ग्लोबल मार्केट 2026 में लगभग $20 से $22.5 अरब डॉलर के बीच आंका जा रहा है। Fortune Business Insights के अनुसार 2025 में यह मार्केट $20.17 अरब डॉलर था और 2026 में $22.51 अरब डॉलर तक पहुंचेगा, 2034 तक $56.1 अरब डॉलर होने का अनुमान है, 12.09% CAGR के साथ। Mordor Intelligence (जनवरी 2026) के मुताबिक 2026 में वैश्विक DOOH मार्केट $20.22 अरब डॉलर है और 2031 तक $32.98 अरब तक पहुंचेगा।
यह अंतर इसलिए है क्योंकि अलग-अलग रिसर्च कंपनियां अलग-अलग तरीके से आंकड़े तैयार करती हैं। लेकिन सभी की राय एक जैसी है कि यह मार्केट तेजी से बढ़ रहा है।
भारत की तस्वीर: MarkNtel Advisors के अनुसार भारत का DOOH मार्केट 2024 में लगभग $284 मिलियन (करीब ₹2,350 करोड़) था और 2030 तक $620 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, लगभग 14% CAGR पर। PwC की Global Entertainment & Media Outlook 2025–29 रिपोर्ट बताती है कि भारत का कुल OOH राजस्व 2024 में $568 मिलियन था, जो 13.4% की दर से बढ़ा और 2029 तक $798 मिलियन तक पहुंचेगा। Adonmo के इंडस्ट्री आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल OOH मार्केट (डिजिटल और पारंपरिक दोनों) 2025 में ₹6,500 करोड़ से ऊपर था।
प्रोग्रामेटिक DOOH: जब होर्डिंग बोलने लगे एल्गोरिद्म की भाषा
DOOH की इस क्रांति के केंद्र में है प्रोग्रामेटिक DOOH, यानी ऑटोमेटेड, डेटा-संचालित तरीके से विज्ञापन खरीदना और चलाना। पहले एक बिलबोर्ड बुक करने में 5-7 दिन लगते थे, मैनेजर को फोन, कॉन्ट्रैक्ट साइनिंग, इंतजार। अब प्रोग्रामेटिक DOOH के जरिए उसी जगह पर 24 घंटे से भी कम समय में कैंपेन लाइव हो सकती है।
VIOOH के द्वारा 2026 में किए अध्ययन (1,050 विज्ञापनदाताओं पर) के अनुसार हाल के प्रोग्रामेटिक DOOH खरीदारों में से, पिछले 18 महीनों में औसतन 34% कैंपेन में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा था और यह अगले 18 महीनों में 48% तक पहुंचने का अनुमान है। Google DV360 और The Trade Desk जैसे प्रमुख DSP प्लेटफॉर्म अब OOH इन्वेंटरी को डिजिटल चैनलों के साथ एक ही मीडिया प्लान में खरीदने की सुविधा दे रहे हैं।
भारत की तस्वीर बिल्कुल अलग है। PwC की रिपोर्ट और एक्सचेंज4मीडिया के इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार भारत में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा OOH खर्च का महज 1-2% है। PwC इसके पीछे इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, कॉस्ट-शेयरिंग की चिंताएं और ऐडवर्टाइजिंग Agencies Association of India (AAAI) की formal स्वीकृति का न मिलना बताता है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 में यह आंकड़ा 3-5% तक पहुंच सकता है और 2028 तक 15-20%।
मौसम, ट्रैफिक और वक्त के हिसाब से बदलते विज्ञापन
स्मार्ट DOOH की सबसे रोचक बात यह है कि ये स्क्रीनें आसपास के माहौल को 'पढ़' सकती हैं। इसके कई तरीके हैं:
मौसम आधारित विज्ञापन: जैसे ही तापमान एक तय सीमा से ऊपर जाता है, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम का विज्ञापन चल पड़ता है। बारिश होते ही छाते या रेनकोट की ब्रैंड दिखने लगती है। Aperol ने एक कैंपेन में यह तय किया कि उनका विज्ञापन केवल तभी दिखे जब तापमान 19°C से ऊपर हो, और वह भी गुरुवार से रविवार, दोपहर 1 बजे से रात 8 बजे के बीच। Rain-X ने कनाडा में बर्फ, बारिश और ओले के लिए अलग-अलग क्रिएटिव तैयार किए जो मौसम के हिसाब से अपने आप बदल जाते थे। Dulux पेंट ने मौसम-ट्रिगर कैंपेन के जरिए अपने स्टोर में 130% अधिक ट्रैफिक दर्ज किया।
ट्रैफिक और समय आधारित विज्ञापन: सुबह की भीड़ में कॉफी का विज्ञापन, दोपहर में फास्ट फूड स्पेशल, शाम को मनोरंजन। हाईवे पर ट्रैफिक जाम में प्रीमियम ब्रैंड विज्ञापन, मेट्रो स्टेशनों पर सुबह की सवारी में फिनटेक ऐप। EMARKETER के AI in OOH FAQ (मई 2026) के अनुसार AI अब स्पोर्ट्स स्कोर्स, लोकल इवेंट्स और ट्रैफिक कंडिशंस के आधार पर contextual creative selection करता है।
लोकेशन और इवेंट आधारित विज्ञापन: मैच वाले दिन स्टेडियम के आसपास लगी स्क्रीन पर स्पोर्ट्स ड्रिंक के विज्ञापन दिखने लगते हैं। वहीं मॉल के अंदर लगे डिजिटल कियोस्क लोगों को उसी समय चल रहे ऑफर्स और डील्स दिखाते हैं। Amazon जैसे ब्रांड भी अब रियल-टाइम ऑफर्स दिखाकर ग्राहकों को तुरंत खरीदारी के लिए आकर्षित कर रहे हैं।
Blindspot के मुताबिक, मौसम के हिसाब से बदलने वाले DOOH विज्ञापनों को लोग ज्यादा याद रखते हैं। कंपनी का दावा है कि ऐसे विज्ञापनों में ब्रैंड रिकॉल करीब 90% तक पहुंच जाता है, जबकि सामान्य स्थिर विज्ञापनों में यह करीब 65% रहता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि करीब 80% लोग उन विज्ञापनों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो उनके आसपास की स्थिति या माहौल से जुड़े होते हैं।
फेस डिटेक्शन और ऑडियंस एनालिटिक्स: होर्डिंग जो 'देखती' है
DOOH में अब AI आधारित ऑडियंस डिटेक्शन तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इसके जरिए डिजिटल स्क्रीन के आसपास मौजूद लोगों की अनुमानित उम्र, जेंडर या भीड़ के प्रकार को समझकर विज्ञापन बदले जाते हैं। इस तकनीक में आमतौर पर कैमरों और सेंसर की मदद ली जाती है, लेकिन कंपनियों का कहना है कि इसका मकसद किसी व्यक्ति की पहचान करना नहीं, बल्कि ऑडियंस पैटर्न को समझना होता है।
यह तकनीक फेशियल डिटेक्शन कहलाती है, जो फेशियल रिकग्निशन से अलग मानी जाती है। फेशियल रिकग्निशन किसी व्यक्ति की पहचान करने और डेटा सेव करने से जुड़ी होती है, जबकि फेशियल डिटेक्शन केवल सामने मौजूद लोगों की अनुमानित जनसांख्यिकीय जानकारी समझने की कोशिश करती है।
उदाहरण के तौर पर, कुछ कंपनियां टैबलेट स्क्रीन और डिजिटल डिस्प्ले के जरिए यह समझने की कोशिश करती हैं कि सामने किस तरह की ऑडियंस मौजूद है, ताकि उसी हिसाब से विज्ञापन दिखाए जा सकें।
इसके अलावा Affectiva और Hume AI जैसी कंपनियां अब इमोशन AI तकनीक पर भी काम कर रही हैं। यह तकनीक चेहरे के हावभाव के आधार पर लोगों की प्रतिक्रिया समझने में मदद करती है, ताकि विज्ञापनों को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।
MarketsandMarkets की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक इमोशन डिटेक्शन और रिकग्निशन मार्केट के 2026 तक 37.1 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। वहीं Fortune Business Insights के मुताबिक यह मार्केट 2025 में 42.83 अरब डॉलर का था और आने वाले वर्षों में इसके और तेजी से बढ़ने की संभावना है।
क्या DOOH अब डिजिटल जैसा Measurable हो गया?
DOOH की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा यह रही है कि इसे मापना मुश्किल था। ऑनलाइन विज्ञापन में क्लिक, इंप्रेशन, कन्वर्जन, सब कुछ सटीक आंका जा सकता है। होर्डिंग के साथ यह सुविधा नहीं थी।
IAB ने जुलाई 2025 में DOOH Measurement Guide जारी की थी, जिसका मकसद डिजिटल आउट-ऑफ-होम विज्ञापनों के लिए एक जैसे मापन मानक तय करना है। हालांकि, इसका इस्तेमाल अभी शुरुआती स्तर पर ही है।
Broadsign के एक सर्वे के मुताबिक, ज्यादातर विज्ञापनदाता उन DOOH प्लेटफॉर्म्स में ज्यादा निवेश करना चाहते हैं, जहां डायनेमिक और कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से विज्ञापन दिखाने की सुविधा हो।
भारत में भी OOH इंडस्ट्री तेजी से तकनीक अपना रही है। Indian Outdoor Advertising Association (IOAA) ने 2024 में GPS आधारित ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम शुरू किया था। इसका उद्देश्य देशभर में OOH विज्ञापनों की पहुंच और दर्शकों को बेहतर तरीके से मापना है।
हालांकि, इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी एक समान मापन प्रणाली की कमी है। अलग-अलग कंपनियां विज्ञापनों की पहुंच और प्रभाव को अलग-अलग तरीके से मापती हैं, जिससे पूरे बाजार के लिए एक कॉमन स्टैंडर्ड बनाना मुश्किल हो रहा है।
प्राइवेसी की चिंता: क्या 'स्मार्ट' होर्डिंग हमें देख रहे हैं?
जैसे-जैसे DOOH स्मार्ट होती जा रही है, सवाल उठ रहे हैं, क्या यह हमारी निजता का उल्लंघन है? यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है, और दुनिया भर की सरकारें इस पर कड़े नियम बना रही हैं।
चीन ने अप्रैल 2026 में Personal Information Protection Law के तहत सख्त नियमों का नया रोडमैप जारी किया। इसके तहत Cyberspace Administration of China (CAC), Ministry of Industry and Information Technology (MIIT) और Ministry of Public Security (MPS) ने मिलकर कई अभियान शुरू किए हैं। इनमें इंटरनेट विज्ञापनों और यूजर डेटा के इस्तेमाल पर खास फोकस किया गया है।
नए नियमों में यूजर्स को पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन बंद करने का आसान विकल्प देना और बिना फोन नंबर दिए बेसिक सेवाएं उपलब्ध कराना जरूरी किया गया है। इससे डिजिटल विज्ञापन इंडस्ट्री के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
अमेरिका में Illinois का Biometric Information Privacy Act (BIPA) सबसे सख्त कानूनों में माना जाता है। इसके उल्लंघन के मामलों में Facebook पर 650 मिलियन डॉलर और Google पर 100 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया जा चुका है। वहीं Connecticut में 2026 में एक नया बिल पास हुआ, जिसमें फेशियल रिकग्निशन सिस्टम और लोकेशन डेटा शेयरिंग पर सख्त नियम प्रस्तावित किए गए हैं।
हालांकि, DOOH इंडस्ट्री में ज्यादातर तकनीक फेशियल डिटेक्शन पर आधारित होती है, न कि फेशियल रिकग्निशन पर। कंपनियों का कहना है कि इसमें किसी व्यक्ति की पहचान या डेटा स्टोर नहीं किया जाता।
अब Edge Computing जैसी तकनीक भी तेजी से इस्तेमाल हो रही है। इसमें डेटा को क्लाउड पर भेजने के बजाय उसी डिवाइस पर प्रोसेस किया जाता है, जिससे निजता बेहतर तरीके से सुरक्षित रहती है।
भारत में DOOH: महानगरों से टियर-2 शहरों तक की यात्रा
भारत में DOOH अभी मुख्यतः शीर्ष 12 मेट्रो शहरों में केंद्रित है। Adonmo के अनुसार 2024 तक देश में करीब 1.5 लाख डिजिटल स्क्रीनें थीं, जिनमें से 75% इन्हीं 12 शहरों में थीं। Adonmo के इंडस्ट्री डेटा के अनुसार भारत में DOOH कुल OOH मार्केट का महज 12% है, जबकि अमेरिका में 40% और चीन में 90%।
Mordor Intelligence के अनुसार भारत के OOH इंडस्ट्री में static OOH का 2024 में 68% हिस्सा था, जबकि DOOH सालाना 7.2% की दर से बढ़ रहा है, जो कुल OOH मार्केट वृद्धि से दोगुना है। PwC के अनुसार DOOH भारत में 16.5% CAGR से बढ़ेगा, पारंपरिक OOH के 2% CAGR से आठ गुना तेज, और 2029 तक OOH का 44.1% हिस्सा होगा, जो 2024 में 28.8% था।
बदलाव आ रहा है:
भारत में DOOH की मार्केट साइज को लेकर इंडस्ट्री विशेषज्ञों में मतभेद हैं। Adgully की जनवरी 2026 की in-depth रिपोर्ट के अनुसार DOOH 2024 में कुल OOH खर्च का 28-30% था और 2026 तक 35% से अधिक होने का अनुमान है।
छोटे शहरों तक पहुंचने की चुनौती: एक DOOH face की स्थापना लागत $10,000 से $50,000 के बीच है और बिजली खर्च ऑपरेटिंग कॉस्ट का 20% तक हो सकता है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में बिजली की अनिश्चितता और connectivity की कमी बड़ी बाधा है। फिर भी LED panel की गिरती कीमतें और 5G का विस्तार इस रास्ते को धीरे-धीरे खोल रहे हैं।
AI Creatives: जब मशीन खुद बनाती है विज्ञापन
DOOH का अगला मोर्चा है, AI-generated creatives। अब विज्ञापन डिजाइन करने के लिए हफ्तों की जरूरत नहीं। AI प्लेटफॉर्म रिलय टाइम डेटा (मौसम, ट्रैफिक, स्पोर्ट्स स्कोर्स) के आधार पर खुद-ब-खुद अलग-अलग creative तैयार करते हैं।
डायनेमिक क्रिएटिव ऑप्टिमाइजेशन (DCO) की मदद से अब एक ही कैंपेन के कई अलग-अलग विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं। यानी अलग ऑडियंस, अलग जगह और अलग समय के हिसाब से विज्ञापन अपने आप बदल सकते हैं। JCDecaux ने फरवरी 2026 में एक नया प्लेटफॉर्म लॉन्च किया, जिसकी मदद से 80 देशों में प्रोग्रामेटिक DOOH विज्ञापनों को एक ही सिस्टम से मैनेज किया जा सकता है। इसमें रियल-टाइम बिडिंग, बदलते विज्ञापन और कार्बन रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।
वहीं Clear Channel Outdoor के EVP और CMO Dan Levi ने EMARKETER की जनवरी 2026 की रिपोर्ट में कहा कि जैसे-जैसे एजेंसियां अपने प्लानिंग टूल्स में एआई को शामिल कर रही हैं, वैसे-वैसे उन्हें तेजी से बेहतर और काम की जानकारियां मिल रही हैं।
OOH और डिजिटल का संगम: Omnichannel का नया युग
2026 में DOOH का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब यह अकेले काम नहीं करता। अब एक उपभोक्ता सुबह सड़क पर किसी ब्रैंड का होर्डिंग देखता है, फिर दोपहर में उसी ब्रैंड का विज्ञापन उसके मोबाइल पर दिखाई देता है और रात में वही संदेश किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर भी नजर आता है। यानी अब विज्ञापन हर प्लेटफॉर्म पर आपस में जुड़े हुए तरीके से दिखाए जा रहे हैं।
OAAA और Harris Poll की 2024 की एक स्टडी के मुताबिक, 73% लोगों ने कहा कि उन्हें DOOH विज्ञापन पसंद आते हैं। वहीं टीवी विज्ञापनों को पसंद करने वालों की संख्या 50% और ऑनलाइन विज्ञापनों के लिए सिर्फ 37% रही। इसी स्टडी में 76% लोगों ने माना कि OOH विज्ञापन देखने के बाद उन्होंने किसी न किसी तरह की प्रतिक्रिया दी।
चुनौतियां अभी भी बाकी हैं
स्मार्ट DOOH तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।
सबसे बड़ी समस्या मापन की है। अभी तक इंडस्ट्री में ऐसा कोई एक समान सिस्टम नहीं है, जिससे सभी कंपनियां विज्ञापनों का असर एक ही तरीके से माप सकें। भारत में यह समस्या और बड़ी है, क्योंकि यहां प्रोग्रामेटिक DOOH अभी शुरुआती दौर में है।
दूसरी चुनौती यह है कि अभी भी ज्यादातर आउटडोर विज्ञापन पारंपरिक होर्डिंग्स पर ही आधारित हैं। OAAA के मुताबिक, OOH बाजार का बड़ा हिस्सा अब भी स्टैटिक बिलबोर्ड्स का है। यानी एआई और स्मार्ट तकनीक का फायदा फिलहाल सिर्फ डिजिटल स्क्रीन तक सीमित है।
डेटा प्राइवेसी और नियम-कानून भी बड़ी चुनौती बन रहे हैं। चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में डेटा सुरक्षा को लेकर सख्त नियम बनाए जा रहे हैं, जिसका असर एआई आधारित विज्ञापनों पर पड़ सकता है।
भारत में एक और दिक्कत यह है कि OOH इंडस्ट्री काफी बंटी हुई है। यहां हजारों छोटे-छोटे वेंडर्स हैं, अलग-अलग शहरों के अलग नियम हैं और कोई एक केंद्रीय मानक नहीं है। इसी वजह से पूरे देश में एक जैसी तकनीक लागू करना आसान नहीं है।
अब होर्डिंग सिर्फ तस्वीर नहीं रहे
2026 तक आते-आते DOOH ने यह साफ कर दिया है कि अब होर्डिंग सिर्फ दीवार पर लगी तस्वीर नहीं रह गए हैं। अब वे मौसम, ट्रैफिक और आसपास के माहौल के हिसाब से विज्ञापन बदल सकते हैं और सही समय पर सही संदेश दिखा सकते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां स्मार्ट सिटी, मेट्रो और हाईवे तेजी से बढ़ रहे हैं, वहां स्मार्ट DOOH का बाजार भी तेजी से फैल रहा है। हालांकि प्राइवेसी, मापन और तकनीकी ढांचे जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं, लेकिन इंडस्ट्री जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उससे साफ है कि आने वाले समय में आउटडोर विज्ञापन पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और डेटा आधारित होने वाले हैं।
गूगल (Google) ने अपने Search प्लेटफॉर्म में बड़े AI अपग्रेड की घोषणा की है। नए फीचर्स में AI Mode, Search Agents, Agentic Coding और Personal Intelligence जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गूगल (Google) ने अपने Search प्लेटफॉर्म के लिए बड़े AI अपग्रेड की घोषणा की है। Google I/O इवेंट में पेश किए गए नए फीचर्स का उद्देश्य Search को अधिक बातचीत आधारित, पर्सनलाइज्ड और टास्क-ओरिएंटेड बनाना है। कंपनी के मुताबिक AI Mode अब हर महीने 1 अरब से ज्यादा यूजर्स तक पहुंच चुका है। गूगल ने बताया कि इसके लॉन्च के बाद AI आधारित सर्च क्वेरी हर तिमाही में दोगुनी से ज्यादा बढ़ रही हैं।
इस अपडेट के तहत गूगल (Google) ने Gemini 3.5 Flash को AI Mode का डिफॉल्ट मॉडल बना दिया है। कंपनी का दावा है कि यह मॉडल एजेंट और कोडिंग से जुड़े कार्यों में बेहतर प्रदर्शन करेगा। गूगल ने Search बॉक्स में पिछले 25 वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव भी पेश किया है। नया AI-पावर्ड Search बॉक्स टेक्स्ट, इमेज, वीडियो, फाइल्स और Chrome Tabs के जरिए जटिल सवालों को बेहतर तरीके से समझ सकेगा।
कंपनी ने “Search Agents” नाम के नए AI एजेंट्स भी लॉन्च किए हैं। ये एजेंट ब्लॉग, न्यूज साइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को स्कैन कर यूजर्स को फाइनेंस, शॉपिंग और स्पोर्ट्स जैसी कैटेगरी में लगातार अपडेट देंगे। इसके अलावा Search में Agentic Booking फीचर भी जोड़ा गया है, जिसके जरिए यूजर्स लोकल सर्विस और एक्टिविटी बुक कर सकेंगे। कुछ मामलों में गूगल खुद बिजनेस से संपर्क भी करेगा।
विश्व दूरसंचार दिवस पर दूरसंचार विभाग (DoT) ने बताया कि साइबर फ्रॉड रोकने के लिए 3.4 करोड़ मोबाइल नंबर बंद किए गए हैं। जल्द ही बायोमेट्रिक सिम वेरिफिकेशन अनिवार्य किया जाएगा।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर मुंबई में दूरसंचार विभाग (DoT) के अधिकारियों ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में देशभर में साइबर फ्रॉड से जुड़ी करीब 60 लाख शिकायतें दर्ज हुई हैं। इनमें से 3 हजार से अधिक मामलों का समाधान किया जा चुका है, जबकि साइबर अपराध में शामिल 6 बड़े गैंग्स को भी पकड़ा गया है।
अधिकारियों के अनुसार साइबर धोखाधड़ी पर लगाम लगाने और नेटवर्क सुरक्षा मजबूत करने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही नया टेलीकॉम एक्ट 2023 और टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी रूल्स 2024 लागू होने के बाद डिजिटल सुरक्षा ढांचे को और मजबूत किया गया है।
फर्जी सिम कार्ड के खिलाफ सरकार जल्द ही बायोमेट्रिक आइडेंटिटी वेरिफिकेशन सिस्टम ड्राफ्ट रूल्स 2025 लागू करने जा रही है। इसके तहत सिम लेने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य होगा। किसी और की पहचान का गलत इस्तेमाल कर सिम लेने पर 3 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
DoT ने बैंक, यूपीआई प्लेटफॉर्म और पुलिस एजेंसियों के साथ मिलकर बड़ी कार्रवाई भी की है। इसके तहत 3.4 करोड़ संदिग्ध मोबाइल नंबर स्थायी रूप से डिस्कनेक्ट किए गए हैं। वहीं साइबर फ्रॉड से जुड़े 16.97 लाख व्हाट्सएप अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाया गया है।
सरकार के ‘संचार साथी’ पोर्टल के जरिए करीब 10 लाख खोए या चोरी हुए मोबाइल फोनों को ट्रैक और ब्लॉक किया गया है। साथ ही देशभर के इंजीनियरिंग कॉलेजों में 100 से ज्यादा 5G लैब स्थापित की गई हैं।
एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (ENIL) ने FY26 की चौथी तिमाही में कमजोर प्रदर्शन दर्ज किया। कंपनी की आय और मुनाफे में गिरावट रही, जबकि डिजिटल कारोबार में 84% की मजबूत ग्रोथ देखने को मिली।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (Entertainment Network India Ltd-ENIL) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में दबाव वाला प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी की आय और मुनाफे दोनों में गिरावट देखने को मिली, हालांकि डिजिटल कारोबार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की।
31 मार्च 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी की कुल आय 153.48 करोड़ रुपये रही। यह पिछले क्वार्टर के मुकाबले 10.6% और पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 9.6% कम रही। कंपनी का शुद्ध मुनाफा चौथी तिमाही में 8.27 करोड़ रुपये रहा। हालांकि पिछली तिमाही में कंपनी को 6.31 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था, लेकिन सालाना आधार पर मुनाफा 32% से अधिक गिरा है। पिछले साल इसी अवधि में कंपनी ने 12.17 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था।
वहीं पूरे वित्त वर्ष FY26 की बात करें तो ENIL की कुल आय 597.89 करोड़ रुपये रही, जो FY25 की तुलना में 2.7% अधिक है। इसके बावजूद कंपनी पूरे साल में 7.39 करोड़ रुपये के घाटे में चली गई, जबकि पिछले वित्त वर्ष में उसे 11.95 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था।
कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यतीश मेहरिषी (Yatish Mehrishi) ने कहा कि FY26 मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। उन्होंने बताया कि डिजिटल कारोबार में 84% की ग्रोथ दर्ज हुई है और अब डिजिटल बिजनेस कंपनी के रेडियो रेवेन्यू का लगभग 50% तक पहुंच गया है।
IWMBuzz Media ने कोलकाता में ‘Bengal’s Most Stylish Season 3’ का भव्य आयोजन किया।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
OpenAI पर अमेरिका में क्लास एक्शन मुकदमा दायर हुआ है। आरोप है कि ChatGPT यूजर्स का डेटा Google और Meta के साथ बिना उचित सहमति के साझा किया गया।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
OpenAI एक नए कानूनी विवाद में घिर गया है। अमेरिका में कंपनी के खिलाफ क्लास एक्शन मुकदमा दायर किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ChatGPT यूजर्स का डेटा बिना उचित सहमति के Google और Meta के साथ साझा किया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट में दायर किया गया है। शिकायत में कहा गया है कि ChatGPT.com पर Meta Pixel और Google Analytics जैसे ट्रैकिंग टूल्स का इस्तेमाल किया गया, जिनकी मदद से यूजर्स की जानकारी थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच सकती थी।
मुकदमे में दावा किया गया है कि यूजर्स के सवाल, ईमेल एड्रेस और अन्य निजी जानकारी ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए प्रोसेस की गई हो सकती है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि लोग AI चैटबॉट्स को निजी और सुरक्षित बातचीत की जगह मानते हैं, जहां वे स्वास्थ्य, वित्तीय और कानूनी मुद्दों तक पर चर्चा करते हैं।
याचिका में कहा गया है कि ChatGPT, Claude, Gemini और Perplexity जैसे AI प्लेटफॉर्म्स इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को गोपनीयता की उचित उम्मीद थी, लेकिन वेबसाइट पर मौजूद एनालिटिक्स और विज्ञापन संबंधी कोड ने इस भरोसे को कमजोर किया।