गूगल (Google) ने अपने Search प्लेटफॉर्म में बड़े AI अपग्रेड की घोषणा की है। नए फीचर्स में AI Mode, Search Agents, Agentic Coding और Personal Intelligence जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गूगल (Google) ने अपने Search प्लेटफॉर्म के लिए बड़े AI अपग्रेड की घोषणा की है। Google I/O इवेंट में पेश किए गए नए फीचर्स का उद्देश्य Search को अधिक बातचीत आधारित, पर्सनलाइज्ड और टास्क-ओरिएंटेड बनाना है। कंपनी के मुताबिक AI Mode अब हर महीने 1 अरब से ज्यादा यूजर्स तक पहुंच चुका है। गूगल ने बताया कि इसके लॉन्च के बाद AI आधारित सर्च क्वेरी हर तिमाही में दोगुनी से ज्यादा बढ़ रही हैं।
इस अपडेट के तहत गूगल (Google) ने Gemini 3.5 Flash को AI Mode का डिफॉल्ट मॉडल बना दिया है। कंपनी का दावा है कि यह मॉडल एजेंट और कोडिंग से जुड़े कार्यों में बेहतर प्रदर्शन करेगा। गूगल ने Search बॉक्स में पिछले 25 वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव भी पेश किया है। नया AI-पावर्ड Search बॉक्स टेक्स्ट, इमेज, वीडियो, फाइल्स और Chrome Tabs के जरिए जटिल सवालों को बेहतर तरीके से समझ सकेगा।
कंपनी ने “Search Agents” नाम के नए AI एजेंट्स भी लॉन्च किए हैं। ये एजेंट ब्लॉग, न्यूज साइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को स्कैन कर यूजर्स को फाइनेंस, शॉपिंग और स्पोर्ट्स जैसी कैटेगरी में लगातार अपडेट देंगे। इसके अलावा Search में Agentic Booking फीचर भी जोड़ा गया है, जिसके जरिए यूजर्स लोकल सर्विस और एक्टिविटी बुक कर सकेंगे। कुछ मामलों में गूगल खुद बिजनेस से संपर्क भी करेगा।
होर्डिंग और बिलबोर्ड को हम हमेशा से एक 'पुराना' विज्ञापन माध्यम मानते रहे हैं, जो हफ्तों या महीनों तक एक ही तस्वीर दिखाता रहता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
होर्डिंग और बिलबोर्ड को हम हमेशा से एक 'पुराना' विज्ञापन माध्यम मानते रहे हैं, जो हफ्तों या महीनों तक एक ही तस्वीर दिखाता रहता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), लोकेशन डेटा, मौसम के आंकड़े और ऑडियंस एनालिटिक्स की मदद से डिजिटल आउट-ऑफ-होम (DOOH) स्क्रीनें इतनी 'समझदार' हो गई हैं कि वे हर पल सही व्यक्ति को सही समय पर सही विज्ञापन दिखा सकती हैं। यह बदलाव न केवल विज्ञापन इंडस्ट्री को बल्कि हमारी सार्वजनिक जगहों की पूरी तस्वीर को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।
DOOH का ग्लोबल मार्केट 2026 में लगभग $20 से $22.5 अरब डॉलर के बीच आंका जा रहा है। Fortune Business Insights के अनुसार 2025 में यह मार्केट $20.17 अरब डॉलर था और 2026 में $22.51 अरब डॉलर तक पहुंचेगा, 2034 तक $56.1 अरब डॉलर होने का अनुमान है, 12.09% CAGR के साथ। Mordor Intelligence (जनवरी 2026) के मुताबिक 2026 में वैश्विक DOOH मार्केट $20.22 अरब डॉलर है और 2031 तक $32.98 अरब तक पहुंचेगा।
यह अंतर इसलिए है क्योंकि अलग-अलग रिसर्च कंपनियां अलग-अलग तरीके से आंकड़े तैयार करती हैं। लेकिन सभी की राय एक जैसी है कि यह मार्केट तेजी से बढ़ रहा है।
भारत की तस्वीर: MarkNtel Advisors के अनुसार भारत का DOOH मार्केट 2024 में लगभग $284 मिलियन (करीब ₹2,350 करोड़) था और 2030 तक $620 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, लगभग 14% CAGR पर। PwC की Global Entertainment & Media Outlook 2025–29 रिपोर्ट बताती है कि भारत का कुल OOH राजस्व 2024 में $568 मिलियन था, जो 13.4% की दर से बढ़ा और 2029 तक $798 मिलियन तक पहुंचेगा। Adonmo के इंडस्ट्री आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल OOH मार्केट (डिजिटल और पारंपरिक दोनों) 2025 में ₹6,500 करोड़ से ऊपर था।
प्रोग्रामेटिक DOOH: जब होर्डिंग बोलने लगे एल्गोरिद्म की भाषा
DOOH की इस क्रांति के केंद्र में है प्रोग्रामेटिक DOOH, यानी ऑटोमेटेड, डेटा-संचालित तरीके से विज्ञापन खरीदना और चलाना। पहले एक बिलबोर्ड बुक करने में 5-7 दिन लगते थे, मैनेजर को फोन, कॉन्ट्रैक्ट साइनिंग, इंतजार। अब प्रोग्रामेटिक DOOH के जरिए उसी जगह पर 24 घंटे से भी कम समय में कैंपेन लाइव हो सकती है।
VIOOH के द्वारा 2026 में किए अध्ययन (1,050 विज्ञापनदाताओं पर) के अनुसार हाल के प्रोग्रामेटिक DOOH खरीदारों में से, पिछले 18 महीनों में औसतन 34% कैंपेन में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा था और यह अगले 18 महीनों में 48% तक पहुंचने का अनुमान है। Google DV360 और The Trade Desk जैसे प्रमुख DSP प्लेटफॉर्म अब OOH इन्वेंटरी को डिजिटल चैनलों के साथ एक ही मीडिया प्लान में खरीदने की सुविधा दे रहे हैं।
भारत की तस्वीर बिल्कुल अलग है। PwC की रिपोर्ट और एक्सचेंज4मीडिया के इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार भारत में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा OOH खर्च का महज 1-2% है। PwC इसके पीछे इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, कॉस्ट-शेयरिंग की चिंताएं और ऐडवर्टाइजिंग Agencies Association of India (AAAI) की formal स्वीकृति का न मिलना बताता है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 में यह आंकड़ा 3-5% तक पहुंच सकता है और 2028 तक 15-20%।
मौसम, ट्रैफिक और वक्त के हिसाब से बदलते विज्ञापन
स्मार्ट DOOH की सबसे रोचक बात यह है कि ये स्क्रीनें आसपास के माहौल को 'पढ़' सकती हैं। इसके कई तरीके हैं:
मौसम आधारित विज्ञापन: जैसे ही तापमान एक तय सीमा से ऊपर जाता है, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम का विज्ञापन चल पड़ता है। बारिश होते ही छाते या रेनकोट की ब्रैंड दिखने लगती है। Aperol ने एक कैंपेन में यह तय किया कि उनका विज्ञापन केवल तभी दिखे जब तापमान 19°C से ऊपर हो, और वह भी गुरुवार से रविवार, दोपहर 1 बजे से रात 8 बजे के बीच। Rain-X ने कनाडा में बर्फ, बारिश और ओले के लिए अलग-अलग क्रिएटिव तैयार किए जो मौसम के हिसाब से अपने आप बदल जाते थे। Dulux पेंट ने मौसम-ट्रिगर कैंपेन के जरिए अपने स्टोर में 130% अधिक ट्रैफिक दर्ज किया।
ट्रैफिक और समय आधारित विज्ञापन: सुबह की भीड़ में कॉफी का विज्ञापन, दोपहर में फास्ट फूड स्पेशल, शाम को मनोरंजन। हाईवे पर ट्रैफिक जाम में प्रीमियम ब्रैंड विज्ञापन, मेट्रो स्टेशनों पर सुबह की सवारी में फिनटेक ऐप। EMARKETER के AI in OOH FAQ (मई 2026) के अनुसार AI अब स्पोर्ट्स स्कोर्स, लोकल इवेंट्स और ट्रैफिक कंडिशंस के आधार पर contextual creative selection करता है।
लोकेशन और इवेंट आधारित विज्ञापन: मैच वाले दिन स्टेडियम के आसपास लगी स्क्रीन पर स्पोर्ट्स ड्रिंक के विज्ञापन दिखने लगते हैं। वहीं मॉल के अंदर लगे डिजिटल कियोस्क लोगों को उसी समय चल रहे ऑफर्स और डील्स दिखाते हैं। Amazon जैसे ब्रांड भी अब रियल-टाइम ऑफर्स दिखाकर ग्राहकों को तुरंत खरीदारी के लिए आकर्षित कर रहे हैं।
Blindspot के मुताबिक, मौसम के हिसाब से बदलने वाले DOOH विज्ञापनों को लोग ज्यादा याद रखते हैं। कंपनी का दावा है कि ऐसे विज्ञापनों में ब्रैंड रिकॉल करीब 90% तक पहुंच जाता है, जबकि सामान्य स्थिर विज्ञापनों में यह करीब 65% रहता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि करीब 80% लोग उन विज्ञापनों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो उनके आसपास की स्थिति या माहौल से जुड़े होते हैं।
फेस डिटेक्शन और ऑडियंस एनालिटिक्स: होर्डिंग जो 'देखती' है
DOOH में अब AI आधारित ऑडियंस डिटेक्शन तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इसके जरिए डिजिटल स्क्रीन के आसपास मौजूद लोगों की अनुमानित उम्र, जेंडर या भीड़ के प्रकार को समझकर विज्ञापन बदले जाते हैं। इस तकनीक में आमतौर पर कैमरों और सेंसर की मदद ली जाती है, लेकिन कंपनियों का कहना है कि इसका मकसद किसी व्यक्ति की पहचान करना नहीं, बल्कि ऑडियंस पैटर्न को समझना होता है।
यह तकनीक फेशियल डिटेक्शन कहलाती है, जो फेशियल रिकग्निशन से अलग मानी जाती है। फेशियल रिकग्निशन किसी व्यक्ति की पहचान करने और डेटा सेव करने से जुड़ी होती है, जबकि फेशियल डिटेक्शन केवल सामने मौजूद लोगों की अनुमानित जनसांख्यिकीय जानकारी समझने की कोशिश करती है।
उदाहरण के तौर पर, कुछ कंपनियां टैबलेट स्क्रीन और डिजिटल डिस्प्ले के जरिए यह समझने की कोशिश करती हैं कि सामने किस तरह की ऑडियंस मौजूद है, ताकि उसी हिसाब से विज्ञापन दिखाए जा सकें।
इसके अलावा Affectiva और Hume AI जैसी कंपनियां अब इमोशन AI तकनीक पर भी काम कर रही हैं। यह तकनीक चेहरे के हावभाव के आधार पर लोगों की प्रतिक्रिया समझने में मदद करती है, ताकि विज्ञापनों को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।
MarketsandMarkets की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक इमोशन डिटेक्शन और रिकग्निशन मार्केट के 2026 तक 37.1 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। वहीं Fortune Business Insights के मुताबिक यह मार्केट 2025 में 42.83 अरब डॉलर का था और आने वाले वर्षों में इसके और तेजी से बढ़ने की संभावना है।
क्या DOOH अब डिजिटल जैसा Measurable हो गया?
DOOH की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा यह रही है कि इसे मापना मुश्किल था। ऑनलाइन विज्ञापन में क्लिक, इंप्रेशन, कन्वर्जन, सब कुछ सटीक आंका जा सकता है। होर्डिंग के साथ यह सुविधा नहीं थी।
IAB ने जुलाई 2025 में DOOH Measurement Guide जारी की थी, जिसका मकसद डिजिटल आउट-ऑफ-होम विज्ञापनों के लिए एक जैसे मापन मानक तय करना है। हालांकि, इसका इस्तेमाल अभी शुरुआती स्तर पर ही है।
Broadsign के एक सर्वे के मुताबिक, ज्यादातर विज्ञापनदाता उन DOOH प्लेटफॉर्म्स में ज्यादा निवेश करना चाहते हैं, जहां डायनेमिक और कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से विज्ञापन दिखाने की सुविधा हो।
भारत में भी OOH इंडस्ट्री तेजी से तकनीक अपना रही है। Indian Outdoor Advertising Association (IOAA) ने 2024 में GPS आधारित ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम शुरू किया था। इसका उद्देश्य देशभर में OOH विज्ञापनों की पहुंच और दर्शकों को बेहतर तरीके से मापना है।
हालांकि, इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी एक समान मापन प्रणाली की कमी है। अलग-अलग कंपनियां विज्ञापनों की पहुंच और प्रभाव को अलग-अलग तरीके से मापती हैं, जिससे पूरे बाजार के लिए एक कॉमन स्टैंडर्ड बनाना मुश्किल हो रहा है।
प्राइवेसी की चिंता: क्या 'स्मार्ट' होर्डिंग हमें देख रहे हैं?
जैसे-जैसे DOOH स्मार्ट होती जा रही है, सवाल उठ रहे हैं, क्या यह हमारी निजता का उल्लंघन है? यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है, और दुनिया भर की सरकारें इस पर कड़े नियम बना रही हैं।
चीन ने अप्रैल 2026 में Personal Information Protection Law के तहत सख्त नियमों का नया रोडमैप जारी किया। इसके तहत Cyberspace Administration of China (CAC), Ministry of Industry and Information Technology (MIIT) और Ministry of Public Security (MPS) ने मिलकर कई अभियान शुरू किए हैं। इनमें इंटरनेट विज्ञापनों और यूजर डेटा के इस्तेमाल पर खास फोकस किया गया है।
नए नियमों में यूजर्स को पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन बंद करने का आसान विकल्प देना और बिना फोन नंबर दिए बेसिक सेवाएं उपलब्ध कराना जरूरी किया गया है। इससे डिजिटल विज्ञापन इंडस्ट्री के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
अमेरिका में Illinois का Biometric Information Privacy Act (BIPA) सबसे सख्त कानूनों में माना जाता है। इसके उल्लंघन के मामलों में Facebook पर 650 मिलियन डॉलर और Google पर 100 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया जा चुका है। वहीं Connecticut में 2026 में एक नया बिल पास हुआ, जिसमें फेशियल रिकग्निशन सिस्टम और लोकेशन डेटा शेयरिंग पर सख्त नियम प्रस्तावित किए गए हैं।
हालांकि, DOOH इंडस्ट्री में ज्यादातर तकनीक फेशियल डिटेक्शन पर आधारित होती है, न कि फेशियल रिकग्निशन पर। कंपनियों का कहना है कि इसमें किसी व्यक्ति की पहचान या डेटा स्टोर नहीं किया जाता।
अब Edge Computing जैसी तकनीक भी तेजी से इस्तेमाल हो रही है। इसमें डेटा को क्लाउड पर भेजने के बजाय उसी डिवाइस पर प्रोसेस किया जाता है, जिससे निजता बेहतर तरीके से सुरक्षित रहती है।
भारत में DOOH: महानगरों से टियर-2 शहरों तक की यात्रा
भारत में DOOH अभी मुख्यतः शीर्ष 12 मेट्रो शहरों में केंद्रित है। Adonmo के अनुसार 2024 तक देश में करीब 1.5 लाख डिजिटल स्क्रीनें थीं, जिनमें से 75% इन्हीं 12 शहरों में थीं। Adonmo के इंडस्ट्री डेटा के अनुसार भारत में DOOH कुल OOH मार्केट का महज 12% है, जबकि अमेरिका में 40% और चीन में 90%।
Mordor Intelligence के अनुसार भारत के OOH इंडस्ट्री में static OOH का 2024 में 68% हिस्सा था, जबकि DOOH सालाना 7.2% की दर से बढ़ रहा है, जो कुल OOH मार्केट वृद्धि से दोगुना है। PwC के अनुसार DOOH भारत में 16.5% CAGR से बढ़ेगा, पारंपरिक OOH के 2% CAGR से आठ गुना तेज, और 2029 तक OOH का 44.1% हिस्सा होगा, जो 2024 में 28.8% था।
बदलाव आ रहा है:
भारत में DOOH की मार्केट साइज को लेकर इंडस्ट्री विशेषज्ञों में मतभेद हैं। Adgully की जनवरी 2026 की in-depth रिपोर्ट के अनुसार DOOH 2024 में कुल OOH खर्च का 28-30% था और 2026 तक 35% से अधिक होने का अनुमान है।
छोटे शहरों तक पहुंचने की चुनौती: एक DOOH face की स्थापना लागत $10,000 से $50,000 के बीच है और बिजली खर्च ऑपरेटिंग कॉस्ट का 20% तक हो सकता है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में बिजली की अनिश्चितता और connectivity की कमी बड़ी बाधा है। फिर भी LED panel की गिरती कीमतें और 5G का विस्तार इस रास्ते को धीरे-धीरे खोल रहे हैं।
AI Creatives: जब मशीन खुद बनाती है विज्ञापन
DOOH का अगला मोर्चा है, AI-generated creatives। अब विज्ञापन डिजाइन करने के लिए हफ्तों की जरूरत नहीं। AI प्लेटफॉर्म रिलय टाइम डेटा (मौसम, ट्रैफिक, स्पोर्ट्स स्कोर्स) के आधार पर खुद-ब-खुद अलग-अलग creative तैयार करते हैं।
डायनेमिक क्रिएटिव ऑप्टिमाइजेशन (DCO) की मदद से अब एक ही कैंपेन के कई अलग-अलग विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं। यानी अलग ऑडियंस, अलग जगह और अलग समय के हिसाब से विज्ञापन अपने आप बदल सकते हैं। JCDecaux ने फरवरी 2026 में एक नया प्लेटफॉर्म लॉन्च किया, जिसकी मदद से 80 देशों में प्रोग्रामेटिक DOOH विज्ञापनों को एक ही सिस्टम से मैनेज किया जा सकता है। इसमें रियल-टाइम बिडिंग, बदलते विज्ञापन और कार्बन रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।
वहीं Clear Channel Outdoor के EVP और CMO Dan Levi ने EMARKETER की जनवरी 2026 की रिपोर्ट में कहा कि जैसे-जैसे एजेंसियां अपने प्लानिंग टूल्स में एआई को शामिल कर रही हैं, वैसे-वैसे उन्हें तेजी से बेहतर और काम की जानकारियां मिल रही हैं।
OOH और डिजिटल का संगम: Omnichannel का नया युग
2026 में DOOH का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब यह अकेले काम नहीं करता। अब एक उपभोक्ता सुबह सड़क पर किसी ब्रैंड का होर्डिंग देखता है, फिर दोपहर में उसी ब्रैंड का विज्ञापन उसके मोबाइल पर दिखाई देता है और रात में वही संदेश किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर भी नजर आता है। यानी अब विज्ञापन हर प्लेटफॉर्म पर आपस में जुड़े हुए तरीके से दिखाए जा रहे हैं।
OAAA और Harris Poll की 2024 की एक स्टडी के मुताबिक, 73% लोगों ने कहा कि उन्हें DOOH विज्ञापन पसंद आते हैं। वहीं टीवी विज्ञापनों को पसंद करने वालों की संख्या 50% और ऑनलाइन विज्ञापनों के लिए सिर्फ 37% रही। इसी स्टडी में 76% लोगों ने माना कि OOH विज्ञापन देखने के बाद उन्होंने किसी न किसी तरह की प्रतिक्रिया दी।
चुनौतियां अभी भी बाकी हैं
स्मार्ट DOOH तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।
सबसे बड़ी समस्या मापन की है। अभी तक इंडस्ट्री में ऐसा कोई एक समान सिस्टम नहीं है, जिससे सभी कंपनियां विज्ञापनों का असर एक ही तरीके से माप सकें। भारत में यह समस्या और बड़ी है, क्योंकि यहां प्रोग्रामेटिक DOOH अभी शुरुआती दौर में है।
दूसरी चुनौती यह है कि अभी भी ज्यादातर आउटडोर विज्ञापन पारंपरिक होर्डिंग्स पर ही आधारित हैं। OAAA के मुताबिक, OOH बाजार का बड़ा हिस्सा अब भी स्टैटिक बिलबोर्ड्स का है। यानी एआई और स्मार्ट तकनीक का फायदा फिलहाल सिर्फ डिजिटल स्क्रीन तक सीमित है।
डेटा प्राइवेसी और नियम-कानून भी बड़ी चुनौती बन रहे हैं। चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में डेटा सुरक्षा को लेकर सख्त नियम बनाए जा रहे हैं, जिसका असर एआई आधारित विज्ञापनों पर पड़ सकता है।
भारत में एक और दिक्कत यह है कि OOH इंडस्ट्री काफी बंटी हुई है। यहां हजारों छोटे-छोटे वेंडर्स हैं, अलग-अलग शहरों के अलग नियम हैं और कोई एक केंद्रीय मानक नहीं है। इसी वजह से पूरे देश में एक जैसी तकनीक लागू करना आसान नहीं है।
अब होर्डिंग सिर्फ तस्वीर नहीं रहे
2026 तक आते-आते DOOH ने यह साफ कर दिया है कि अब होर्डिंग सिर्फ दीवार पर लगी तस्वीर नहीं रह गए हैं। अब वे मौसम, ट्रैफिक और आसपास के माहौल के हिसाब से विज्ञापन बदल सकते हैं और सही समय पर सही संदेश दिखा सकते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां स्मार्ट सिटी, मेट्रो और हाईवे तेजी से बढ़ रहे हैं, वहां स्मार्ट DOOH का बाजार भी तेजी से फैल रहा है। हालांकि प्राइवेसी, मापन और तकनीकी ढांचे जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं, लेकिन इंडस्ट्री जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उससे साफ है कि आने वाले समय में आउटडोर विज्ञापन पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और डेटा आधारित होने वाले हैं।
विश्व दूरसंचार दिवस पर दूरसंचार विभाग (DoT) ने बताया कि साइबर फ्रॉड रोकने के लिए 3.4 करोड़ मोबाइल नंबर बंद किए गए हैं। जल्द ही बायोमेट्रिक सिम वेरिफिकेशन अनिवार्य किया जाएगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर मुंबई में दूरसंचार विभाग (DoT) के अधिकारियों ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में देशभर में साइबर फ्रॉड से जुड़ी करीब 60 लाख शिकायतें दर्ज हुई हैं। इनमें से 3 हजार से अधिक मामलों का समाधान किया जा चुका है, जबकि साइबर अपराध में शामिल 6 बड़े गैंग्स को भी पकड़ा गया है।
अधिकारियों के अनुसार साइबर धोखाधड़ी पर लगाम लगाने और नेटवर्क सुरक्षा मजबूत करने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही नया टेलीकॉम एक्ट 2023 और टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी रूल्स 2024 लागू होने के बाद डिजिटल सुरक्षा ढांचे को और मजबूत किया गया है।
फर्जी सिम कार्ड के खिलाफ सरकार जल्द ही बायोमेट्रिक आइडेंटिटी वेरिफिकेशन सिस्टम ड्राफ्ट रूल्स 2025 लागू करने जा रही है। इसके तहत सिम लेने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य होगा। किसी और की पहचान का गलत इस्तेमाल कर सिम लेने पर 3 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
DoT ने बैंक, यूपीआई प्लेटफॉर्म और पुलिस एजेंसियों के साथ मिलकर बड़ी कार्रवाई भी की है। इसके तहत 3.4 करोड़ संदिग्ध मोबाइल नंबर स्थायी रूप से डिस्कनेक्ट किए गए हैं। वहीं साइबर फ्रॉड से जुड़े 16.97 लाख व्हाट्सएप अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाया गया है।
सरकार के ‘संचार साथी’ पोर्टल के जरिए करीब 10 लाख खोए या चोरी हुए मोबाइल फोनों को ट्रैक और ब्लॉक किया गया है। साथ ही देशभर के इंजीनियरिंग कॉलेजों में 100 से ज्यादा 5G लैब स्थापित की गई हैं।
एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (ENIL) ने FY26 की चौथी तिमाही में कमजोर प्रदर्शन दर्ज किया। कंपनी की आय और मुनाफे में गिरावट रही, जबकि डिजिटल कारोबार में 84% की मजबूत ग्रोथ देखने को मिली।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (Entertainment Network India Ltd-ENIL) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में दबाव वाला प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी की आय और मुनाफे दोनों में गिरावट देखने को मिली, हालांकि डिजिटल कारोबार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की।
31 मार्च 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी की कुल आय 153.48 करोड़ रुपये रही। यह पिछले क्वार्टर के मुकाबले 10.6% और पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 9.6% कम रही। कंपनी का शुद्ध मुनाफा चौथी तिमाही में 8.27 करोड़ रुपये रहा। हालांकि पिछली तिमाही में कंपनी को 6.31 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था, लेकिन सालाना आधार पर मुनाफा 32% से अधिक गिरा है। पिछले साल इसी अवधि में कंपनी ने 12.17 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था।
वहीं पूरे वित्त वर्ष FY26 की बात करें तो ENIL की कुल आय 597.89 करोड़ रुपये रही, जो FY25 की तुलना में 2.7% अधिक है। इसके बावजूद कंपनी पूरे साल में 7.39 करोड़ रुपये के घाटे में चली गई, जबकि पिछले वित्त वर्ष में उसे 11.95 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था।
कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यतीश मेहरिषी (Yatish Mehrishi) ने कहा कि FY26 मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। उन्होंने बताया कि डिजिटल कारोबार में 84% की ग्रोथ दर्ज हुई है और अब डिजिटल बिजनेस कंपनी के रेडियो रेवेन्यू का लगभग 50% तक पहुंच गया है।
IWMBuzz Media ने कोलकाता में ‘Bengal’s Most Stylish Season 3’ का भव्य आयोजन किया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
OpenAI पर अमेरिका में क्लास एक्शन मुकदमा दायर हुआ है। आरोप है कि ChatGPT यूजर्स का डेटा Google और Meta के साथ बिना उचित सहमति के साझा किया गया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
OpenAI एक नए कानूनी विवाद में घिर गया है। अमेरिका में कंपनी के खिलाफ क्लास एक्शन मुकदमा दायर किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ChatGPT यूजर्स का डेटा बिना उचित सहमति के Google और Meta के साथ साझा किया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट में दायर किया गया है। शिकायत में कहा गया है कि ChatGPT.com पर Meta Pixel और Google Analytics जैसे ट्रैकिंग टूल्स का इस्तेमाल किया गया, जिनकी मदद से यूजर्स की जानकारी थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच सकती थी।
मुकदमे में दावा किया गया है कि यूजर्स के सवाल, ईमेल एड्रेस और अन्य निजी जानकारी ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए प्रोसेस की गई हो सकती है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि लोग AI चैटबॉट्स को निजी और सुरक्षित बातचीत की जगह मानते हैं, जहां वे स्वास्थ्य, वित्तीय और कानूनी मुद्दों तक पर चर्चा करते हैं।
याचिका में कहा गया है कि ChatGPT, Claude, Gemini और Perplexity जैसे AI प्लेटफॉर्म्स इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को गोपनीयता की उचित उम्मीद थी, लेकिन वेबसाइट पर मौजूद एनालिटिक्स और विज्ञापन संबंधी कोड ने इस भरोसे को कमजोर किया।
आज 2026 में भारत में ऐप बैन एक "नया सामान्य" बन चुका है- राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर ऑनलाइन सट्टेबाजी, फर्जी लोन ऐप्स से लेकर डेटा चोरी तक, सरकार का डिजिटल हथौड़ा लगातार चल रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जून 2020 की एक शाम करोड़ों भारतीयों के मोबाइल से अचानक TikTok गायब हो गया। उसी रात भारत सरकार ने 59 चीनी ऐप्स पर बैन लगा दिया और इसके साथ ही देश की डिजिटल दुनिया में एक बड़े बदलाव की शुरुआत हुई। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। 2026 तक आते-आते भारत में ऐप बैन अब आम बात बन चुकी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर ऑनलाइन सट्टेबाजी, फर्जी लोन ऐप्स से लेकर डेटा चोरी तक, सरकार का डिजिटल हथौड़ा लगातार चल रहा है।
कितने ऐप्स बैन हुए?- एक चौंकाने वाला आंकड़ा
भारत सरकार ने जून 2020 से अब तक IT अधिनियम की धारा 69A के तहत हजारों ऐप्स और वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया है। पहली बड़ी कार्रवाई 29 जून 2020 को हुई जब गलवान घाटी संघर्ष के बाद 59 चीनी ऐप्स- जिनमें TikTok, UC Browser, SHAREit, CamScanner, WeChat शामिल थे, एक झटके में बैन कर दिए गए। इसके बाद जुलाई 2020 में 47 और सितंबर 2020 में 118 और नवंबर 2020 में 43 और ऐप्स बैन हुए। 2020 के अंत तक 267 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लग चुका था।
फरवरी 2022 में एक और बड़ी कार्रवाई हुई जब 54 और चीनी ऐप्स, जिनमें Garena Free Fire भी शामिल था, बैन हुए। MeitY ने तब स्पष्ट रूप से कहा था कि ये ऐप्स "कैमरे, माइक्रोफोन और GPS के जरिए जासूसी कर रहे थे और यूजर का डेटा विदेशी सर्वर पर भेज रहे थे।" इस तरह 2020 से फरवरी 2022 तक कुल 321 चीनी ऐप्स भारत में बैन हो चुके थे।
लेकिन 2025 में तो सारे रिकॉर्ड टूट गए। अप्रैल-मई 2025 के बीच- पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़े भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच- MeitY ने धारा 69A के तहत तीन अलग-अलग आदेशों में Google को 3,000 से अधिक ऐप्स हटाने के निर्देश दिए। इस सूची में VPN, इस्लामिक धार्मिक ऐप्स, AI टूल्स, कैलकुलेटर तक शामिल थे- और अधिकांश पाकिस्तानी डेवलपर्स से जुड़े पाए गए। इससे पहले फरवरी 2025 में 119 और ऐप्स बैन किए गए, जिनमें ज्यादातर चीन और हांगकांग से जुड़े वीडियो-वॉयस चैट प्लेटफॉर्म थे।
धारा 69A- IT अधिनियम की यह धारा ही सरकार का सबसे बड़ा डिजिटल हथियार है। इसके तहत "राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था" के नाम पर किसी भी ऐप या वेबसाइट को बिना न्यायिक समीक्षा के बंद किया जा सकता है। आदेश गोपनीय रखे जाते हैं- यानी न यूजर को पता, न डेवलपर को स्पष्टीकरण।
सरकार ऐप्स क्यों बंद करती है?
TikTok बैन शायद भारत के डिजिटल इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। बैन के समय भारत में TikTok के 20 करोड़ से अधिक एक्टिव यूजर्स थे- चीन के बाहर यह दुनिया का सबसे बड़ा TikTok मार्केट था। एक झटके में इन 20 करोड़ लोगों के पास कोई प्लेटफॉर्म नहीं रहा। छोटे शहरों और गांवों के लाखों क्रिएटर्स- जो TikTok पर अपनी आवाज और आजीविका ढूंढ रहे थे- रातोरात बेरोजगार हो गए।
लेकिन इस खाली जगह को भरने की होड़ मच गई। मेटा ने एक हफ्ते के भीतर Instagram Reels लॉन्च किया। Google ने YouTube Shorts उतारा। भारतीय ऐप्स- Moj, Josh, Chingari, Roposo- अरबों की फंडिंग के साथ मैदान में आए।
आंकड़े बताते हैं कि Moj ने दो साल से भी कम समय में 16 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स हासिल कर लिए। Josh के 17.9 करोड़ यूजर्स हो गए। Instagram Reels में 2021-22 के बीच 171% की वृद्धि हुई और 2.2 अरब इंटरेक्शन दर्ज हुए। YouTube Shorts 2022 में भारत में 3,940% बढ़ा और 1.5 अरब एंगेजमेंट तक पहुंचा। लेकिन 2023 आते-आते तस्वीर साफ हो गई- भारतीय ऐप्स पिछड़ गए और असली फायदा Meta और Google को हुआ। आज 2026 में भारत YouTube का सबसे बड़ा मार्केट है (लगभग 50 करोड़ मंथली यूजर्स) और Instagram के 48 करोड़ से अधिक यूजर्स यहां हैं।
TikTok 2026 में भी बैन है। 2025 में एक बार वेबसाइट कुछ यूजर्स को खुलती दिखी तो सोशल मीडिया पर "TikTok वापस आ गया" ट्रेंड हो गया- लेकिन MeitY ने तुरंत स्पष्ट किया: "कोई अनब्लॉकिंग ऑर्डर जारी नहीं हुआ है। ऐसी खबरें गलत और भ्रामक हैं।"
बेटिंग ऐप्स- अरबों का अंडरवर्ल्ड
अगर चीनी ऐप्स का बैन सुर्खियों में रहा, तो बेटिंग ऐप्स के खिलाफ कार्रवाई की असली कहानी और भी चौंकाने वाली है।
Mahadev Online Book मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ED की जांच में सामने आया कि यह ऐप दुबई से चलाए जाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजी सिंडिकेट का हिस्सा था- Tiger Exchange, Gold365 और Laser247 जैसे कई डोमेन इसी नेटवर्क से जुड़े थे। ED की chargesheet के अनुसार सिंडिकेट की मासिक कमाई करीब 450 करोड़ रुपये आंकी गई। 2023 में ED ने पहली बड़ी कार्रवाई में 417 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की। नवंबर 2023 में MeitY ने Mahadev समेत 22 अवैध बेटिंग ऐप्स को बैन किया।
मार्च 2026 में ED ने ताजा कार्रवाई में मुख्य प्रमोटर सौरभ चंद्राकर की दुबई स्थित संपत्तियां- जिनमें Burj Khalifa के फ्लैट भी शामिल हैं- कुर्क कीं, जिनकी कीमत करीब 1,700 करोड़ रुपये है। इस मामले में अब तक कुल जब्ती, सीज़र और फ्रीजिंग मिलाकर 4,336 करोड़ रुपये हो चुके हैं।
बड़े बदलाव की बात करें तो PROGA- Promotion and Regulation of Online Gaming Act, 2025 ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया। यह कानून अगस्त 2025 में संसद के दोनों सदनों से पास हुआ और राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। इसके तहत भारत में सभी रियल-मनी ऑनलाइन गेमिंग- चाहे स्किल आधारित हो या भाग्य आधारित पर प्रतिबंध है। हालांकि ई-स्पोर्ट्स और नॉन-मॉनेटरी सामाजिक गेम्स इससे अलग लीगल कैटेगरी में हैं। Betway, 1xBet, Parimatch, MELBET जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म अब भारत में अवैध हैं। 2026 की शुरुआत तक अधिकारियों ने 7,800 से अधिक अवैध बेटिंग और जुए की वेबसाइट्स ब्लॉक की हैं- एक ही कार्रवाई में 242 साइट्स एक साथ ब्लॉक की गईं। IPL और क्रिकेट मैचों के दौरान बेटिंग ऐप्स के surrogate विज्ञापनों पर भी सख्त रोक लगाई गई है।
फर्जी लोन ऐप्स- जब कर्ज बना जाल
फर्जी लोन ऐप्स का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा है। ये ऐप्स पहले लोगों को तुरंत लोन देने का लालच देते थे। इसके बाद मोबाइल की कॉन्टैक्ट लिस्ट, फोटो गैलरी और दूसरे डेटा तक पहुंच मांग लेते थे। फिर शुरू होता था लोगों को डराने-धमकाने और ब्लैकमेल करने का खेल।
तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में ऐसे कई मामले सामने आए, जहां लोगों को इतना परेशान किया गया कि कुछ ने आत्महत्या तक कर ली।
जांच में पता चला कि इन फर्जी ऐप्स के पीछे कई शेल कंपनियां थीं, जिनका संबंध चीन से जुड़ा बताया गया। ये कंपनियां एक ही सिस्टम से कई नकली लोन ऐप्स चला रही थीं। ED ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार भी किया।
सरकार ने सख्ती दिखाते हुए एक अभियान में 94 फर्जी लोन ऐप्स को एक साथ बंद किया। वहीं Google ने भी अपनी नीति बदल दी। पिछले दो साल में Play Store से 4,700 से ज्यादा अवैध लोन ऐप्स हटाए गए। अब सिर्फ RBI से जुड़े या रजिस्टर्ड संस्थानों के ऐप्स को ही Play Store पर रहने की अनुमति है।
दिसंबर 2025 में सिर्फ एक महीने के भीतर 87 अवैध लोन ऐप्स बंद किए गए। वहीं मार्च 2026 में RBI ने 47 और फर्जी ऐप्स हटवाए।
RBI ने जुलाई 2025 से Digital Lending Directory को जरूरी कर दिया है। इसके तहत हर वैध लोन ऐप का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। हालांकि, फर्जी ऐप्स नए नाम से फिर लौट आते हैं। इसी वजह से Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) लगातार इन ऐप्स पर नजर रखता है।
ऐड इंडस्ट्री पर असर- बजट का नया ठिकाना
ऐप बैन ने भारत के डिजिटल ऐड इंडस्ट्री की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
TikTok बैन से पहले ब्रांड्स के पास short-form video पर खर्च करने का एक सस्ता और viral माध्यम था। TikTok के जाने के बाद वह पूरा बजट Instagram Reels और YouTube Shorts की तरफ शिफ्ट हो गया- और Meta व Google और ताकतवर हो गए।
Dentsu-e4m के Digital Advertising Report 2026 के अनुसार, 2025 में भारत का डिजिटल विज्ञापन मार्केट ₹71,621 करोड़ का था- जो 19% की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है। 2026 में यह ₹84,977 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। डिजिटल विज्ञापन अब कुल भारतीय विज्ञापन मार्केट का 59% हिस्सा बन चुका है- 2016 में यह महज 12% था।
इंफ्लुएंसर मार्केटिंग भी एक बड़ा सेक्टर बन चुकी है। 2025 में यह इंडस्ट्री 3,000-3,500 करोड़ रुपये का था और 22% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है। 2027 तक यह 4,500-5,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। EY की रिपोर्ट के अनुसार influencer marketing का वैश्विक मार्केट 2026 में लगभग 40 करोड़ डॉलर हो सकता है।
बेटिंग ऐप्स पर क्रैकडाउन ने surrogate advertising को भी झटका दिया। IPL जैसे क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान फैंटेसी गेमिंग और बेटिंग ऐप्स करोड़ों का विज्ञापन खर्च करते थे- अब यह दरवाजा बंद हो चुका है।
डिजिटल स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा- यह बहस खत्म नहीं हुई
ऐप बैन के मुद्दे पर दो पक्ष हमेशा से आमने-सामने रहे हैं।
सरकार का पक्ष: राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा संप्रभुता और नागरिक संरक्षण सर्वोपरि है। जब विदेशी सर्वर पर करोड़ों भारतीयों का डेटा जा रहा हो, जब ऐप्स आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग में इस्तेमाल हों, तो कार्रवाई अनिवार्य है।
आलोचकों का पक्ष: धारा 69A की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है। बैन के आदेश गोपनीय रखे जाते हैं। यूजर्स और डेवलपर्स को कोई स्पष्टीकरण नहीं मिलता। 3,000 ऐप्स को एक साथ बैन करना और उसकी वजह न बताना- यह चिंताजनक है। Access Now जैसी डिजिटल अधिकार संस्थाओं ने चेताया है कि TikTok बैन ने भारत में सरकारी सेंसरशिप को बढ़ावा दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने Shreya Singhal मामले में धारा 69A को वैध माना था लेकिन गोपनीयता की आलोचना भी की थी। Shein जैसे ऐप्स को Reliance के साथ साझेदारी में वापसी की इजाजत मिली, लेकिन हजारों छोटे ऐप्स बिना स्पष्टीकरण बंद पड़े हैं- यह असमानता भी सवाल उठाती है।
भारतीय ऐप इकोसिस्टम- जीत या हार?
जब-जब चीनी ऐप्स बैन हुए, "Atmanirbhar App Ecosystem" का नारा बुलंद हुआ। लेकिन हकीकत क्या है?
भारतीय ऐप्स की कहानी मिली-जुली रही। Moj और Josh ने तेज शुरुआत की लेकिन लंबे समय में Instagram और YouTube के आगे टिक नहीं पाए। Koo- जिसे Twitter का भारतीय विकल्प कहा जाता था- 2023 में बंद हो गया। Chingari, Roposo जैसे ऐप्स हाशिए पर हैं।
दूसरी तरफ, सरकारी ऐप्स ने जरूर अच्छा प्रदर्शन किया- DigiLocker, BHIM, CoWIN, ONDC जैसे प्लेटफॉर्म ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत को मजबूत किया।
असली सवाल यह है: TikTok के बैन से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ? Meta और Google को- दोनों अमेरिकी कंपनियां भारत में और बड़ी हो गईं। "Atmanirbhar" के नाम पर खाली जगह भरी एक और विदेशी Big Tech ने।
क्या भारत डिजिटल संप्रभुता का नया मॉडल बना रहा है?
2020 से 2026 के बीच भारत ने जो डिजिटल नीति अपनाई है, वह दुनिया में अपनी तरह का मॉडल है। चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध, फर्जी लोन ऐप्स के खिलाफ कार्रवाई, बेटिंग इंडस्ट्री को कानून से बांधना, भू-राजनीतिक तनाव के जवाब में हजारों ऐप्स ब्लॉक करना- यह सब मिलकर एक ऐसे भारत की तस्वीर बनाते हैं जो अपने डिजिटल स्पेस को भी संप्रभु क्षेत्र मानता है।
लेकिन इस मॉडल की सफलता के लिए जरूरी है पारदर्शिता- कि बैन क्यों हुआ, किसके कहने पर हुआ, और इसे कैसे चुनौती दी जा सकती है। बिना इसके, "डिजिटल सार्वभौमिता" और "डिजिटल सेंसरशिप" के बीच की रेखा धुंधली पड़ती रहेगी।
भारत का डिजिटल मार्केट 102 करोड़ इंटरनेट यूजर्स का है (सितंबर 2025 तक)। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ऑनलाइन मार्केट है। इसकी सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसकी आजादी भी।
दो दशक से अधिक के पत्रकारिता अनुभव वाले अनिल पांडेय की प्रिंट और डिजिटल मीडिया दोनों क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जागरण समूह की डिजिटल कंपनी 'दैनिक जागरण डिजिटल' (Jagran New Media) ने वरिष्ठ पत्रकार अनिल पांडेय को हाल ही में प्रमोशन का तोहफा देते हुए मैनेजिंग एडिटर के पद पर पदोन्नत किया है। इससे पहले वे एग्जिक्यूटिव एडिटर के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।
दो दशक से अधिक के पत्रकारिता अनुभव वाले अनिल पांडेय की प्रिंट और डिजिटल मीडिया दोनों क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है। डिजिटल न्यूजरूम मैनेजमेंट, कंटेंट स्ट्रैटेजी, ऑडियंस ग्रोथ, ऑडियो-विजुअल स्ट्रैटेजी, टीम बिल्डिंग और प्लेटफॉर्म डेवलपमेंट में उन्हें खास विशेषज्ञता हासिल है।
वर्तमान में वह नेटवर्क के फ्लैगशिप डिजिटल प्लेटफॉर्म jagran.com के साथ-साथ naidunia.com, punjabijagran.com, inextlive.com, thedailyjagran.com, gujaratijagran.com, marathijagran.com, onlymyhealth.com, herzindagi.com और जागरण समूह के यूट्यूब चैनल्स जैसे विभिन्न लैंग्वेज और नॉन-न्यूज वर्टिकल्स का नेतृत्व कर रहे हैं।
अनिल पांडेय ‘जागरण न्यू मीडिया’ के साथ नवंबर 2021 से जुड़े हुए हैं। दैनिक जागरण से पहले वे ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ के पोर्टल ‘जनसत्ता‘, और अमर उजाला डिजिटल में लंबे समय तक कार्य कर चुके हैं। यहां उन्होंने पूरी वेबसाइट के साथ-साथ डिजिटल हाइपरलोकल नेटवर्क को नए सिरे से स्ट्रक्चर एवं अलाइन किया था।
डिजिटल मीडिया में लगभग दो दशक से कार्यरत अनिल पांडेय ‘अमर उजाला‘ डिजिटल से पहले ‘जागरण न्यू मीडिया‘ की वेबसाइट ‘नईदुनिया डॉट कॉम‘ में कार्यरत थे। उनके नेतृत्व में ही इस वेबसाइट को बनाया गया था। इससे पहले वह ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ डिजिटल, ‘दैनिक भास्कर अखबार और डिजिटल‘ एवं ‘वेबदुनिया डॉट कॉम‘ में भी रह चुके हैं।
अनिल पांडेय को बड़ी जिम्मेदारी मिलने पर समाचार4मीडिया की ओर से ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।
YouTube ने Brandcast 2026 में नए विज्ञापन टूल्स लॉन्च किए हैं। इनमें AI आधारित Sponsorships, Connected TV Shopping और Affiliate Partnerships शामिल हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
YouTube ने Brandcast 2026 इवेंट में विज्ञापनदाताओं के लिए कई नए AI और कॉमर्स आधारित एड प्रोडक्ट्स लॉन्च किए हैं। कंपनी का कहना है कि अब ब्रांड्स को ब्रांड बिल्डिंग और परफॉर्मेंस मार्केटिंग के बीच चुनाव करने की जरूरत नहीं होगी। सबसे बड़ा ऐलान “Buy with Google Pay” फीचर का रहा। इसके जरिए Connected TV पर विज्ञापन देखते समय यूजर्स सिर्फ दो क्लिक में सीधे खरीदारी कर सकेंगे।
YouTube का उद्देश्य टीवी विज्ञापनों को केवल जागरूकता तक सीमित रखने के बजाय उन्हें शॉपिंग आधारित अनुभव में बदलना है। कंपनी ने “Custom Sponsorships” नामक AI आधारित टूल भी पेश किया है। यह फीचर ब्रांड्स के लिए ट्रेंडिंग और सांस्कृतिक पलों से जुड़े वीडियो को ऑटोमैटिक तरीके से सामने लाएगा। इसके अलावा YouTube ने Affiliate Partnerships Boost लॉन्च किया है, जिससे ब्रांड्स उन क्रिएटर्स के ऑर्गेनिक कंटेंट को प्रमोट कर सकेंगे, जहां उनके प्रोडक्ट पहले से टैग हैं।
क्रिएटर्स YouTube Shopping affiliate links के जरिए कमाई भी कर पाएंगे। वीडियो विज्ञापन निर्माण को आसान बनाने के लिए कंपनी ने Multimodal Video Creation टूल पेश किया है। यह Gemini, Veo और Nano Banana जैसे Google AI मॉडल्स की मदद से कुछ टेक्स्ट प्रॉम्प्ट्स के जरिए पूरा वीडियो तैयार करेगा।
दिल्ली हाई कोर्ट ने यूट्यूब चैनल “4PM” को बड़ी राहत देते हुए उसके चैनल को अस्थायी तौर पर फिर से बहाल करने का आदेश दिया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
दिल्ली हाई कोर्ट ने यूट्यूब चैनल “4PM” को बड़ी राहत देते हुए उसके चैनल को अस्थायी तौर पर फिर से बहाल करने का आदेश दिया है। करीब दो महीने पहले केंद्र सरकार ने इस चैनल को “राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था” से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए ब्लॉक कर दिया था।
यह आदेश दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने 5 मई को सुनवाई के दौरान दिया। यह याचिका संजय शर्मा और एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से केंद्र सरकार और यूट्यूब के खिलाफ दायर की गई थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि सरकार ने न तो चैनल ब्लॉक करने के कारण साफ तौर पर बताए और न ही ब्लॉकिंग ऑर्डर की कॉपी उपलब्ध कराई। साथ ही इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) के अंतिम आदेश की जानकारी भी नहीं दी गई। याचिकाकर्ताओं ने IDC की कार्यवाही को भी पारदर्शी नहीं बताया।
हालांकि अदालत ने चैनल को राहत देते हुए यह भी कहा कि 26 ऐसे वीडियो, जिन्हें सरकार ने “आपत्तिजनक” बताया है, फिलहाल ब्लॉक ही रहेंगे।
कोर्ट ने मामले में नई IDC सुनवाई कराने का निर्देश भी दिया है। अदालत ने कहा कि कमेटी साफ तौर पर बताए कि चैनल पर कौन-सा कंटेंट आपत्तिजनक माना जा रहा है। साथ ही यदि याचिकाकर्ता अपने कंटेंट का पक्ष रखना चाहते हैं तो उन्हें पर्याप्त समय दिया जाए।
दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह छूट भी दी कि वह चैनल की निगरानी जारी रख सकता है और भविष्य में किसी भी कथित आपत्तिजनक सामग्री पर कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि IDC की सिफारिशें और मंत्रालय के अंतिम फैसले की जानकारी याचिकाकर्ताओं को दी जाए।
केंद्र सरकार ने अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि 4PM चैनल को आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत ब्लॉक किया गया था। सरकार के मुताबिक इस प्रक्रिया की शुरुआत Ministry of External Affairs और एक सुरक्षा एजेंसी के समन्वय से हुई थी, जिसके बाद इलेक्ट्रॉनि एवं सूचना प्रौद्योगिक मंत्रालय ने ब्लॉकिंग निर्देश जारी किए।
सरकार का आरोप है कि चैनल “डिजिटल लॉबिंग” के जरिए ऑनलाइन कंटेंट के माध्यम से जनमत और नीति से जुड़े मुद्दों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था। केंद्र ने यह भी कहा कि चैनल ने पहलगाम आतंकी हमले, मणिपुर की स्थिति और भारत की विदेश नीति व सैन्य कार्रवाई को लेकर भ्रामक और साजिश जैसे नैरेटिव फैलाए।
सरकार ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि यूट्यूब का विज्ञापन और रिकमेंडेशन सिस्टम ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देता है जो लोगों को अलग-अलग विचारधाराओं के “इको चैंबर” में ले जाता है और इससे संगठित प्रभाव अभियान चलाने में मदद मिल सकती है।
वहीं 4PM के एडिटर-इन-चीफ संजय शर्मा ने पहले भी आरोप लगाया था कि उनकी संस्था को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा था कि उन पर आपराधिक मानहानि के केस, इनकम टैक्स विभाग, आर्थिक अपराध शाखा और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियों की जांच हुई, यहां तक कि उनके दफ्तर पर हमला भी किया गया।
संजय शर्मा ने यह भी दावा किया कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनका यूट्यूब चैनल कुछ समय के लिए हटाया गया था, लेकिन बाद में उसे बहाल कर दिया गया। पहलगाम हमले के बाद सरकार ने फिर चैनल ब्लॉक करने का आदेश दिया था और उन्हें “एंटी-नेशनल” बताया गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसके बाद सरकार ने अपना आदेश वापस ले लिया।
भारत में पत्रकारिता का तरीका तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक खबरों का मतलब था सुबह अखबार और शाम को टीवी न्यूज।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारत में पत्रकारिता का तरीका तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक खबरों का मतलब था सुबह अखबार और शाम को टीवी न्यूज। बड़े न्यूज स्टूडियो, तेज आवाज में बोलते एंकर और “ब्रेकिंग न्यूज” की होड़ ही टीवी पत्रकारिता की पहचान बन चुकी थी, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
आज बड़ी संख्या में लोग मोबाइल स्क्रीन पर खबरें देख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना नहीं है कि प्लेटफॉर्म बदल गया है, बल्कि खबर पेश करने का तरीका भी बदल गया है। अब दर्शक लंबी बहस और शोर-शराबे से ज्यादा ऐसे लोगों को सुनना पसंद कर रहे हैं जो सीधे कैमरे में देखकर सरल भाषा में बात करें, तथ्यों के साथ समझाएं और दर्शकों को सिर्फ “व्युअर” नहीं बल्कि अपनी ऑडियंस समझें।
यहीं से शुरू हुआ “क्रिएटर जर्नलिज्म” यानी क्रिएटर पत्रकारिता का दौर। यह ऐसी पत्रकारिता है जो बड़े टीवी स्टूडियो से नहीं, बल्कि यूट्यूब चैनलों, पॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से निकल रही है।
भारत में यूट्यूब अब सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है। यह न्यूज, विश्लेषण, एक्सप्लेनर, इंटरव्यू और जनमत का बड़ा मंच बन चुका है। यही वजह है कि आज पारंपरिक मीडिया और स्वतंत्र क्रिएटर्स के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है।
भारत और यूट्यूब: दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल दर्शक वर्ग
भारत आज यूट्यूब का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। स्टैटिस्टा और गूगल ऐड्स के अनुमान के मुताबिक 2026 में भारत में यूट्यूब की विज्ञापन पहुंच करीब 51 से 52 करोड़ यूजर्स के आसपास है। यानी दुनिया में सबसे ज्यादा यूट्यूब दर्शक भारत में मौजूद हैं।
दुनियाभर में यूट्यूब के करीब 2.5 से 2.7 अरब मंथली एक्टिव यूजर्स माने जाते हैं। भारत का योगदान इसमें लगातार बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सस्ता मोबाइल इंटरनेट, किफायती स्मार्टफोन और क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट की तेज बढ़त।
कुछ साल पहले तक यूट्यूब को केवल गानों, कॉमेडी वीडियो या मनोरंजन मंच के तौर पर देखा जाता था। लेकिन अब लोग यहां न्यूज, राजनीति, करेंट अफेयर्स, वित्त, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर भी बड़ी संख्या में वीडियो देख रहे हैं।
भारत में डिजिटल ऑडियंस खास तौर पर “वीडियो-फर्स्ट” हो चुकी है। यानी लोग खबरें पढ़ने से ज्यादा देखना पसंद कर रहे हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट भी बताती है कि भारत समेत कई देशों में सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स न्यूज देखने का बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं।
यही वजह है कि आज यूट्यूब क्रिएटर्स का प्रभाव कई टीवी एंकरों के बराबर या कुछ मामलों में उससे भी ज्यादा दिखाई देता है।
क्रिएटर पत्रकारिता: नए दौर के डिजिटल पत्रकार
भारत में यूट्यूब आधारित पत्रकारिता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां दो तरह के लोग दिखाई देते हैं।
पहला वर्ग उन पत्रकारों का है जिन्होंने टीवी न्यूज छोड़कर स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किए। दूसरा वर्ग उन युवाओं का है जो कभी किसी न्यूज रूम का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उन्होंने रिसर्च आधारित कंटेंट और एक्सप्लेनर वीडियो के जरिए बड़ी ऑडियंस बना ली।
रवीश कुमार: टीवी से डिजिटल तक
पूर्व एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार इस बदलाव का बड़ा उदाहरण हैं। 2022 में एनडीटीवी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया। कुछ ही समय में उनका चैनल भारत के सबसे बड़े स्वतंत्र न्यूज प्लेटफॉर्म्स में शामिल हो गया।
डिजिटल ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक उनके चैनल के सब्सक्राइबर्स करोड़ों में हैं और उनके वीडियो अरबों बार देखे जा चुके हैं। रवीश कुमार की लोकप्रियता यह दिखाती है कि दर्शक सिर्फ बड़े मीडिया ब्रांड को नहीं, बल्कि भरोसेमंद चेहरों को भी फॉलो करते हैं।
अजीत अंजुम: ग्राउंड रिपोर्टिंग का डिजिटल चेहरा
वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम भी उन बड़े नामों में शामिल हैं जिन्होंने डिजिटल पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई है। लंबे समय तक टीवी न्यूज इंडस्ट्री में काम करने के बाद उन्होंने यूट्यूब को अपना मुख्य मंच बनाया।
अजीत अंजुम की खास पहचान उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग और चुनावी कवरेज मानी जाती है। वे अक्सर छोटे शहरों, गांवों और आम लोगों के बीच जाकर रिपोर्टिंग करते हैं। यही वजह है कि उनकी पत्रकारिता को “ग्राउंड कनेक्टेड जर्नलिज्म” कहा जाता है।
उनके यूट्यूब चैनल पर लाखों सब्सक्राइबर्स हैं और चुनाव, राजनीति, किसान आंदोलन, बेरोजगारी और सामाजिक मुद्दों पर उनके वीडियो को बड़ी संख्या में देखा जाता है।
डिजिटल दौर में अजीत अंजुम की सफलता यह दिखाती है कि दर्शक आज भी फील्ड रिपोर्टिंग और जमीनी पत्रकारिता को महत्व देते हैं। जहां टीवी न्यूज पर स्टूडियो बहसों का दबदबा बढ़ा है, वहीं यूट्यूब पर ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अलग पहचान मिल रही है।
पुण्य प्रसून बाजपेयी: टीवी के तेज तेवर से डिजिटल पत्रकारिता तक
वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी भी उन चर्चित चेहरों में शामिल हैं जिन्होंने टीवी न्यूज से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मजबूत उपस्थिति बनाई। लंबे समय तक विभिन्न न्यूज चैनलों में एंकरिंग और राजनीतिक विश्लेषण करने के बाद उन्होंने यूट्यूब और डिजिटल माध्यमों पर अपनी अलग पहचान बनाई।
पुण्य प्रसून बाजपेयी अपने तीखे राजनीतिक विश्लेषण, सत्ता से सवाल पूछने की शैली और गहरे मुद्दों पर आधारित कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने के बाद उन्होंने लंबे फॉर्मेट वाले वीडियो, विश्लेषण और समसामयिक मुद्दों पर आधारित कंटेंट के जरिए बड़ी ऑडियंस तैयार की।
उनके वीडियो खास तौर पर उन दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं जो टीवी की तेज बहसों की बजाय विस्तार से मुद्दों को समझना चाहते हैं।
पुण्य प्रसून बाजपेयी का उदाहरण यह भी दिखाता है कि डिजिटल पत्रकारिता ने अनुभवी टीवी पत्रकारों को एक नया मंच दिया है, जहां वे बिना समय की पाबंदी के अपनी बात रख सकते हैं और सीधे दर्शकों से जुड़ सकते हैं।
ध्रुव राठी: एक्सप्लेनर पत्रकारिता का बड़ा चेहरा
ध्रुव राठी भारत के सबसे चर्चित डिजिटल क्रिएटर्स में गिने जाते हैं। उनके वीडियो राजनीति, प्रशासन, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होते हैं। उन्होंने यूट्यूब पर “एक्सप्लेनर फॉर्मेट” को लोकप्रिय बनाया। यानी जटिल मुद्दों को आसान भाषा, ग्राफिक्स और रिसर्च के जरिए समझाना।
उनके अलग-अलग चैनलों और बहुभाषी ऑडियंस को मिलाकर करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके वीडियो पर अरबों व्यूज आ चुके हैं। ध्रुव राठी की सफलता ने यह साबित किया कि यूट्यूब पर लंबी और रिसर्च आधारित पत्रकारिता भी बड़े स्तर पर सफल हो सकती है।
नितीश राजपूत: हिंदी डिजिटल ऑडियंस की नई पसंद
नितीश राजपूत ने हिंदी ऑडियंस के बीच एक्सप्लेनर और करेंट अफेयर्स वीडियो के जरिए मजबूत पहचान बनाई है। उनके वीडियो खास तौर पर युवा दर्शकों में लोकप्रिय हैं क्योंकि वे कठिन विषयों को सरल हिंदी में समझाने की कोशिश करते हैं।
डिजिटल एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक उनके सब्सक्राइबर्स करोड़ों के करीब पहुंच चुके हैं और उनके वीडियो लगातार हाई एंगेजमेंट हासिल करते हैं।
बरखा दत्त और मोजो स्टोरी
टीवी पत्रकारिता का बड़ा नाम रही बरखा दत्त ने भी डिजिटल प्लेटफॉर्म “मोजो स्टोरी” शुरू किया। कोविड महामारी के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग और फील्ड पत्रकारिता की वजह से इस प्लेटफॉर्म को काफी पहचान मिली। यूट्यूब पर मोजो स्टोरी ने स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता का एक अलग मॉडल पेश किया।
फेय डिसूजा: शांत और तथ्य आधारित पत्रकारिता
मिरर नाउ की पूर्व एग्जिक्यूटिव एडिटर फेय डिसूजा भी डिजिटल पत्रकारिता की बड़ी आवाज बन चुकी हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि वे सनसनीखेज पत्रकारिता से दूर रहकर शांत और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करती हैं।
डिजिटल ऑडियंस के एक बड़े वर्ग को यह तरीका ज्यादा भरोसेमंद लगता है।
आखिर दर्शक टीवी न्यूज से दूर क्यों जा रहे हैं?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि लोग टीवी छोड़कर मोबाइल पर न्यूज देखने लगे?
इसकी कई वजहें हैं।
पिछले कुछ वर्षों में टीवी न्यूज पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वहां तथ्यों से ज्यादा चीख-पुकार दिखाई देती है। प्राइम टाइम बहसों में कई बार चर्चा से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। इससे दर्शकों का एक वर्ग धीरे-धीरे टीवी से दूर हुआ। इसके मुकाबले यूट्यूब क्रिएटर्स लंबे फॉर्मेट में बिना रुकावट अपनी बात रखते हैं।
भारत की नई डिजिटल पीढ़ी मोबाइल पर ही कंटेंट देखती है। आज बड़ी संख्या में युवा ऑडियंस टीवी नहीं देखती। उनके लिए यूट्यूब, इंस्टाग्राम और पॉडकास्ट ही सूचना के मुख्य स्रोत बन चुके हैं।
यूट्यूब एल्गोरिदम दर्शक की पसंद के हिसाब से कंटेंट दिखाता है। अगर कोई व्यक्ति राजनीति देखता है तो उसे उसी तरह के वीडियो ज्यादा दिखाई देते हैं। यही वजह है कि यूजर्स अपने पसंदीदा क्रिएटर्स से जुड़ाव महसूस करते हैं।
टीवी न्यूज में समय सीमित होता है। लेकिन यूट्यूब पर क्रिएटर्स 20 मिनट, 40 मिनट या एक घंटे तक किसी मुद्दे को विस्तार से समझा सकते हैं। यही वजह है कि एक्सप्लेनर पत्रकारिता तेजी से लोकप्रिय हुई है।
आईपीएल और डिजिटल बदलाव
भारत में मनोरंजन और खेल देखने का तरीका भी तेजी से बदल रहा है। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स और मीडिया ट्रैकिंग डेटा बताते हैं कि आईपीएल जैसे बड़े आयोजनों में डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पारंपरिक टीवी की वृद्धि धीमी पड़ रही है। जियोस्टार और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक आईपीएल के दौरान करोड़ों यूजर्स डिजिटल माध्यमों पर मैच देख रहे हैं।
इसका मतलब साफ है- दर्शक गए नहीं, बल्कि मंच बदल गया है। जहां पहले पूरा परिवार टीवी के सामने बैठता था, अब हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर अलग-अलग कंटेंट देख रहा है।