भारत में खबरें देखने और समझने का तरीका तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक ज्यादातर लोग खबरों के लिए अखबार और टीवी न्यूज चैनलों पर निर्भर थे, लेकिन अब मोबाइल स्क्रीन उनकी पहली पसंद बनती जा रही है।
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Vikas Saxena
भारत में पत्रकारिता का तरीका तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक खबरों के लिए लोग अखबार और टीवी न्यूज चैनलों पर निर्भर रहते थे। बड़े-बड़े न्यूज स्टूडियो, तेज आवाज में बहस करते एंकर और “ब्रेकिंग न्यूज” की होड़ टीवी पत्रकारिता की पहचान बन चुके थे। लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है।
आज बड़ी संख्या में लोग मोबाइल पर खबरें देखना और समझना पसंद कर रहे हैं। बदलाव सिर्फ प्लेटफॉर्म का नहीं है, बल्कि खबर पेश करने के तरीके का भी है। अब दर्शक शोर-शराबे और लंबी बहसों की बजाय ऐसे लोगों को सुनना पसंद करते हैं जो सरल भाषा में, सीधे और तथ्यों के साथ अपनी बात रखें। वे ऐसे कंटेंट को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जो उन्हें जानकारी देने के साथ किसी विषय को आसानी से समझाए भी।
यहीं से “क्रिएटर जर्नलिज्म” यानी क्रिएटर आधारित पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ है। यह पत्रकारिता बड़े टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यूट्यूब चैनलों, पॉडकास्ट और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए लोगों तक पहुंच रही है।
भारत में यूट्यूब अब केवल मनोरंजन का मंच नहीं रह गया है। यह खबरों, विश्लेषण, एक्सप्लेनर वीडियो, इंटरव्यू और जनमत का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। यही वजह है कि आज पारंपरिक मीडिया संस्थानों और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के बीच दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने की सीधी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है।
भारत और यूट्यूब: दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल दर्शक वर्ग
भारत आज यूट्यूब का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। स्टैटिस्टा और गूगल ऐड्स के अनुमान के मुताबिक 2026 में भारत में यूट्यूब की विज्ञापन पहुंच करीब 51 से 52 करोड़ यूजर्स के आसपास है। यानी दुनिया में सबसे ज्यादा यूट्यूब दर्शक भारत में मौजूद हैं।
दुनियाभर में यूट्यूब के करीब 2.5 से 2.7 अरब मंथली एक्टिव यूजर्स माने जाते हैं। भारत का योगदान इसमें लगातार बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सस्ता मोबाइल इंटरनेट, किफायती स्मार्टफोन और क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट की तेज बढ़त।
कुछ साल पहले तक यूट्यूब को केवल गानों, कॉमेडी वीडियो या मनोरंजन मंच के तौर पर देखा जाता था। लेकिन अब लोग यहां न्यूज, राजनीति, करेंट अफेयर्स, वित्त, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर भी बड़ी संख्या में वीडियो देख रहे हैं।
भारत में डिजिटल ऑडियंस खास तौर पर “वीडियो-फर्स्ट” हो चुकी है। यानी लोग खबरें पढ़ने से ज्यादा देखना पसंद कर रहे हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट भी बताती है कि भारत समेत कई देशों में सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स न्यूज देखने का बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं।
यही वजह है कि आज यूट्यूब क्रिएटर्स का प्रभाव कई टीवी एंकरों के बराबर या कुछ मामलों में उससे भी ज्यादा दिखाई देता है।
क्रिएटर पत्रकारिता: नए दौर के डिजिटल पत्रकार
भारत में यूट्यूब आधारित पत्रकारिता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां दो तरह के लोग दिखाई देते हैं।
पहला वर्ग उन पत्रकारों का है जिन्होंने टीवी न्यूज छोड़कर स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किए। दूसरा वर्ग उन युवाओं का है जो कभी किसी न्यूज रूम का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उन्होंने रिसर्च आधारित कंटेंट और एक्सप्लेनर वीडियो के जरिए बड़ी ऑडियंस बना ली।
रवीश कुमार: टीवी से डिजिटल तक
पूर्व एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार इस बदलाव का बड़ा उदाहरण हैं। 2022 में एनडीटीवी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया। कुछ ही समय में उनका चैनल भारत के सबसे बड़े स्वतंत्र न्यूज प्लेटफॉर्म्स में शामिल हो गया।
डिजिटल ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक उनके चैनल के सब्सक्राइबर्स करोड़ों में हैं और उनके वीडियो अरबों बार देखे जा चुके हैं। रवीश कुमार की लोकप्रियता यह दिखाती है कि दर्शक सिर्फ बड़े मीडिया ब्रांड को नहीं, बल्कि भरोसेमंद चेहरों को भी फॉलो करते हैं।
अजीत अंजुम: ग्राउंड रिपोर्टिंग का डिजिटल चेहरा
वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम भी उन बड़े नामों में शामिल हैं जिन्होंने डिजिटल पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान बनाई है। लंबे समय तक टीवी न्यूज इंडस्ट्री में काम करने के बाद उन्होंने यूट्यूब को अपना मुख्य मंच बनाया।
अजीत अंजुम की खास पहचान उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग और चुनावी कवरेज मानी जाती है। वे अक्सर छोटे शहरों, गांवों और आम लोगों के बीच जाकर रिपोर्टिंग करते हैं। यही वजह है कि उनकी पत्रकारिता को “ग्राउंड कनेक्टेड जर्नलिज्म” कहा जाता है।
उनके यूट्यूब चैनल पर लाखों सब्सक्राइबर्स हैं और चुनाव, राजनीति, किसान आंदोलन, बेरोजगारी और सामाजिक मुद्दों पर उनके वीडियो को बड़ी संख्या में देखा जाता है।
डिजिटल दौर में अजीत अंजुम की सफलता यह दिखाती है कि दर्शक आज भी फील्ड रिपोर्टिंग और जमीनी पत्रकारिता को महत्व देते हैं। जहां टीवी न्यूज पर स्टूडियो बहसों का दबदबा बढ़ा है, वहीं यूट्यूब पर ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अलग पहचान मिल रही है।
पुण्य प्रसून बाजपेयी: टीवी के तेज तेवर से डिजिटल पत्रकारिता तक
वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी भी उन चर्चित चेहरों में शामिल हैं जिन्होंने टीवी न्यूज से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मजबूत उपस्थिति बनाई। लंबे समय तक विभिन्न न्यूज चैनलों में एंकरिंग और राजनीतिक विश्लेषण करने के बाद उन्होंने यूट्यूब और डिजिटल माध्यमों पर अपनी अलग पहचान बनाई।
पुण्य प्रसून बाजपेयी अपने तीखे राजनीतिक विश्लेषण, सत्ता से सवाल पूछने की शैली और गहरे मुद्दों पर आधारित कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने के बाद उन्होंने लंबे फॉर्मेट वाले वीडियो, विश्लेषण और समसामयिक मुद्दों पर आधारित कंटेंट के जरिए बड़ी ऑडियंस तैयार की।
उनके वीडियो खास तौर पर उन दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं जो टीवी की तेज बहसों की बजाय विस्तार से मुद्दों को समझना चाहते हैं।
पुण्य प्रसून बाजपेयी का उदाहरण यह भी दिखाता है कि डिजिटल पत्रकारिता ने अनुभवी टीवी पत्रकारों को एक नया मंच दिया है, जहां वे बिना समय की पाबंदी के अपनी बात रख सकते हैं और सीधे दर्शकों से जुड़ सकते हैं।
ध्रुव राठी: एक्सप्लेनर पत्रकारिता का बड़ा चेहरा
ध्रुव राठी भारत के सबसे चर्चित डिजिटल क्रिएटर्स में गिने जाते हैं। उनके वीडियो राजनीति, प्रशासन, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होते हैं। उन्होंने यूट्यूब पर “एक्सप्लेनर फॉर्मेट” को लोकप्रिय बनाया। यानी जटिल मुद्दों को आसान भाषा, ग्राफिक्स और रिसर्च के जरिए समझाना।
उनके अलग-अलग चैनलों और बहुभाषी ऑडियंस को मिलाकर करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके वीडियो पर अरबों व्यूज आ चुके हैं। ध्रुव राठी की सफलता ने यह साबित किया कि यूट्यूब पर लंबी और रिसर्च आधारित पत्रकारिता भी बड़े स्तर पर सफल हो सकती है।
नितीश राजपूत: हिंदी डिजिटल ऑडियंस की नई पसंद
नितीश राजपूत ने हिंदी ऑडियंस के बीच एक्सप्लेनर और करेंट अफेयर्स वीडियो के जरिए मजबूत पहचान बनाई है। उनके वीडियो खास तौर पर युवा दर्शकों में लोकप्रिय हैं क्योंकि वे कठिन विषयों को सरल हिंदी में समझाने की कोशिश करते हैं।
डिजिटल एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक उनके सब्सक्राइबर्स करोड़ों के करीब पहुंच चुके हैं और उनके वीडियो लगातार हाई एंगेजमेंट हासिल करते हैं।
बरखा दत्त और मोजो स्टोरी
टीवी पत्रकारिता का बड़ा नाम रही बरखा दत्त ने भी डिजिटल प्लेटफॉर्म “मोजो स्टोरी” शुरू किया। कोविड महामारी के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग और फील्ड पत्रकारिता की वजह से इस प्लेटफॉर्म को काफी पहचान मिली। यूट्यूब पर मोजो स्टोरी ने स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता का एक अलग मॉडल पेश किया।
फेय डिसूजा: शांत और तथ्य आधारित पत्रकारिता
मिरर नाउ की पूर्व एग्जिक्यूटिव एडिटर फेय डिसूजा भी डिजिटल पत्रकारिता की बड़ी आवाज बन चुकी हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि वे सनसनीखेज पत्रकारिता से दूर रहकर शांत और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करती हैं।
डिजिटल ऑडियंस के एक बड़े वर्ग को यह तरीका ज्यादा भरोसेमंद लगता है।
आखिर दर्शक टीवी न्यूज से दूर क्यों जा रहे हैं?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि लोग टीवी छोड़कर मोबाइल पर न्यूज देखने लगे?
इसकी कई वजहें हैं।
पिछले कुछ वर्षों में टीवी न्यूज पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वहां तथ्यों से ज्यादा चीख-पुकार दिखाई देती है। प्राइम टाइम बहसों में कई बार चर्चा से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। इससे दर्शकों का एक वर्ग धीरे-धीरे टीवी से दूर हुआ। इसके मुकाबले यूट्यूब क्रिएटर्स लंबे फॉर्मेट में बिना रुकावट अपनी बात रखते हैं।
भारत की नई डिजिटल पीढ़ी मोबाइल पर ही कंटेंट देखती है। आज बड़ी संख्या में युवा ऑडियंस टीवी नहीं देखती। उनके लिए यूट्यूब, इंस्टाग्राम और पॉडकास्ट ही सूचना के मुख्य स्रोत बन चुके हैं।
यूट्यूब एल्गोरिदम दर्शक की पसंद के हिसाब से कंटेंट दिखाता है। अगर कोई व्यक्ति राजनीति देखता है तो उसे उसी तरह के वीडियो ज्यादा दिखाई देते हैं। यही वजह है कि यूजर्स अपने पसंदीदा क्रिएटर्स से जुड़ाव महसूस करते हैं।
टीवी न्यूज में समय सीमित होता है। लेकिन यूट्यूब पर क्रिएटर्स 20 मिनट, 40 मिनट या एक घंटे तक किसी मुद्दे को विस्तार से समझा सकते हैं। यही वजह है कि एक्सप्लेनर पत्रकारिता तेजी से लोकप्रिय हुई है।
आईपीएल और डिजिटल बदलाव
भारत में मनोरंजन और खेल देखने का तरीका भी तेजी से बदल रहा है। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स और मीडिया ट्रैकिंग डेटा बताते हैं कि आईपीएल जैसे बड़े आयोजनों में डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पारंपरिक टीवी की वृद्धि धीमी पड़ रही है। जियोस्टार और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के मुताबिक आईपीएल के दौरान करोड़ों यूजर्स डिजिटल माध्यमों पर मैच देख रहे हैं।
इसका मतलब साफ है- दर्शक गए नहीं, बल्कि मंच बदल गया है। जहां पहले पूरा परिवार टीवी के सामने बैठता था, अब हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर अलग-अलग कंटेंट देख रहा है।
OpenAI ने नया GPT-6 Astra मॉडल लॉन्च किया है। कंपनी के मुताबिक, यह कंप्यूटर इस्तेमाल, ब्राउजिंग, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और साइंस जैसे प्रोफेशनल काम में बेहतर प्रदर्शन करेगा।
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Samachar4media Bureau
ओपनएआई (OpenAI) ने अपना नया एआई मॉडल जीपीटी-6 एस्ट्रा (GPT-6 Astra) लॉन्च किया है। कंपनी का दावा है कि यह उसका अब तक का सबसे इंटेलिजेंट और अलाइन्ड (Aligned) मॉडल है। ओपनएआई के मुताबिक, इस मॉडल को तैयार करने में कई साल की ट्रेनिंग (Training), रीइन्फोर्समेंट लर्निंग (Reinforcement Learning) और अलाइनमेंट रिसर्च (Alignment Research) का इस्तेमाल किया गया है।
कंपनी का कहना है कि जीपीटी-6 एस्ट्रा कंप्यूटर इस्तेमाल, वेब ब्राउजिंग (Web Browsing), सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग (Software Engineering), साइबर सिक्योरिटी (Cyber Security) और साइंस जैसे कामों में पहले के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करता है।
ओपनएआई के अनुसार, मॉडल ने फ्रंटियरमैथ टियर 4 (FrontierMath Tier 4) में 98 फीसदी स्कोर हासिल किया है। वहीं एआरसी-एजीआई-3 (ARC-AGI-3) में इसका स्कोर 99.9 फीसदी और एक्सप्लॉइटबेंच (ExploitBench) में 100 फीसदी रहा है।
कंपनी ने बताया कि जीपीटी-6 एस्ट्रा कंप्यूटर और ब्राउजर (Browser) पर ज्यादा स्मार्ट तरीके से काम कर सकता है। प्रोफेशनल टास्क (Professional Tasks) में भी यह तेज और सटीक रिजल्ट देने के लिए तैयार किया गया है। ओपनएआई के मुताबिक, पिछले मॉडल की तुलना में इसमें गलत जवाब देने की संभावना भी कम हुई है।
फिलहाल जीपीटी-6 एस्ट्रा का एक्सेस कुछ चुनिंदा यूजर्स को दिया गया है। आने वाले समय में इसे चैटजीपीटी गो (ChatGPT Go), चैटजीपीटी प्लस (ChatGPT Plus), प्रो (Pro), बिजनेस (Business) और एंटरप्राइज (Enterprise) प्लान वाले यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा ओपनएआई एपीआई (OpenAI API), माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर (Microsoft Azure) और एडब्ल्यूएस बेडरॉक (AWS Bedrock) पर भी इसे उपलब्ध कराने की तैयारी है।
वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros. Discovery) ने भारत में अपने स्टैंडअलोन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म discovery+ को बंद करने का फैसला किया है।
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Samachar4media Bureau
वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros. Discovery) ने भारत में अपने स्टैंडअलोन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म discovery+ को बंद करने का फैसला किया है। कंपनी की ओर से जारी अपडेट के मुताबिक, भारत में discovery+ की नई सब्सक्रिप्शन अब 3 सितंबर 2026 से खरीदी नहीं जा सकेगी। वहीं, मौजूदा यूजर्स के लिए discovery+ ऐप की सेवा 3 नवंबर 2026 से पूरी तरह बंद कर दी जाएगी।
इस फैसले के साथ भारत में discovery+ का स्टैंडअलोन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के तौर पर सफर खत्म हो जाएगा। हालांकि, कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि discovery+ पर उपलब्ध कंटेंट को प्लेटफॉर्म बंद होने के बाद भारत में किस तरह और किस स्ट्रीमिंग सर्विस के जरिए उपलब्ध कराया जाएगा।
मौजूदा सब्सक्राइबर्स का क्या होगा?
कंपनी के मुताबिक, मौजूदा सब्सक्राइबर्स की सेवा उनके सब्सक्रिप्शन के Billing Cycle के हिसाब से जारी रहेगी। यानी ऐप बंद होने की घोषणा का मतलब यह नहीं है कि सभी यूजर्स की सेवा तुरंत बंद हो जाएगी।
मंथली सब्सक्राइबर्स के लिए 3 अक्टूबर 2026 से Auto-Renewal बंद हो जाएगा। यूजर्स अपने मौजूदा Billing Cycle के खत्म होने तक discovery+ का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके बाद उनका एक्सेस खत्म हो जाएगा।
वहीं, सालाना सब्सक्रिप्शन लेने वाले उन यूजर्स को, जिनकी मौजूदा Billing Period 3 अक्टूबर से 3 नवंबर 2026 के बीच खत्म हो रही है, उनकी मौजूदा अवधि पूरी होने तक सेवा मिलती रहेगी। हालांकि, इन सब्सक्रिप्शन को आगे Renew नहीं किया जाएगा।
जिन Annual Subscribers की Billing Period 3 नवंबर 2026 के बाद तक चल रही है, उन्हें उनकी बची हुई सब्सक्रिप्शन अवधि के लिए Pro-Rata Refund दिया जाएगा। यानी जितने समय की सेवा का इस्तेमाल नहीं हो पाएगा, उसके हिसाब से रकम वापस की जाएगी।
भारत में Discovery+ का स्टैंडअलोन सफर खत्म
Discovery+ को भारत में वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी के प्रमुख स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के तौर पर पेश किया गया था। इस पर Discovery के अलावा अलग-अलग तरह के Documentary, Reality, Lifestyle, Food, Travel और Entertainment कंटेंट उपलब्ध रहे हैं।
अब कंपनी द्वारा स्टैंडअलोन ऐप और वेबसाइट को बंद करने का फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर की बड़ी मीडिया कंपनियां अपनी Streaming Strategies पर दोबारा विचार कर रही हैं। कंपनियां कंटेंट को अलग-अलग ऐप पर उपलब्ध कराने के बजाय बड़े और Consolidated Streaming Platforms पर लाने के विकल्पों पर भी काम कर रही हैं।
Paramount Skydance डील के बीच बड़ा फैसला
Discovery+ को बंद करने का फैसला वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी के लिए चल रही बड़ी Corporate हलचल के बीच आया है। कंपनी की Paramount Skydance को करीब 110 अरब डॉलर में बिक्री का प्रस्ताव चर्चा में है। इस संभावित डील के कारण वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी की Streaming Strategy को लेकर भी काफी बदलाव की संभावना बनी हुई है।
Paramount Skydance के CEO David Ellison के मुताबिक, डील पूरी होने की स्थिति में Paramount+ और HBO Max को एक ही Streaming Offering के तहत लाने की योजना हो सकती है। ऐसे में आने वाले समय में वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी के Streaming Business का स्वरूप काफी अलग दिखाई दे सकता है।
फिलहाल भारत में discovery+ के स्टैंडअलोन प्लेटफॉर्म को बंद करने का फैसला इसी बड़े बदलाव का एक हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, भारत में discovery+ के मौजूदा कंटेंट का भविष्य क्या होगा और क्या इसे किसी दूसरे OTT प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट किया जाएगा, इस बारे में कंपनी ने अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है।
अभिषेक मेहता को डाबर में डीजीएम-डिजिटल मार्केटिंग पद पर प्रमोट किया गया है। वह पिछले दो वर्षों से कंपनी से जुड़े हैं और इससे पहले बागरीज़ में मार्केटिंग हेड थे।
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अभिषेक मेहता (Abhishek Mehta) को डाबर (Dabur) में DGM - Digital Marketing के पद पर प्रमोट किया गया है। मेहता पिछले दो वर्षों से कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं।
डाबर में अपनी पिछली भूमिका में वह Digital Marketing Lead के तौर पर काम कर रहे थे। इस जिम्मेदारी के तहत वह कंपनी के हेल्थ केयर और फूड्स एंड बेवरेजेज वर्टिकल्स का डिजिटल मार्केटिंग नेतृत्व संभाल रहे थे।
डाबर से पहले मेहता बागरीज़ (Bagrry's) में Head of Marketing की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इससे पहले वह जुबिलेंट फूडवर्क्स (Jubilant FoodWorks) में Head of Digital Marketing के पद पर थे।
भारत के बड़े शहरों में अब डिजिटल होर्डिंग सिर्फ विज्ञापन दिखाने का काम नहीं कर रहे, बल्कि हालात के हिसाब से खुद को बदल भी रहे हैं।
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Vikas Saxena
DOOH का ग्लोबल मार्केट 2026 में लगभग $20 से $22.5 अरब डॉलर के बीच आंका जा रहा है। Fortune Business Insights के अनुसार 2025 में यह मार्केट $20.17 अरब डॉलर था और 2026 में $22.51 अरब डॉलर तक पहुंचेगा, 2034 तक $56.1 अरब डॉलर होने का अनुमान है, 12.09% CAGR के साथ। Mordor Intelligence (जनवरी 2026) के मुताबिक 2026 में वैश्विक DOOH मार्केट $20.22 अरब डॉलर है और 2031 तक $32.98 अरब तक पहुंचेगा।
यह अंतर इसलिए है क्योंकि अलग-अलग रिसर्च कंपनियां अलग-अलग तरीके से आंकड़े तैयार करती हैं। लेकिन सभी की राय एक जैसी है कि यह मार्केट तेजी से बढ़ रहा है।
भारत की तस्वीर: MarkNtel Advisors के अनुसार भारत का DOOH मार्केट 2024 में लगभग $284 मिलियन (करीब ₹2,350 करोड़) था और 2030 तक $620 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, लगभग 14% CAGR पर। PwC की Global Entertainment & Media Outlook 2025–29 रिपोर्ट बताती है कि भारत का कुल OOH राजस्व 2024 में $568 मिलियन था, जो 13.4% की दर से बढ़ा और 2029 तक $798 मिलियन तक पहुंचेगा। Adonmo के इंडस्ट्री आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल OOH मार्केट (डिजिटल और पारंपरिक दोनों) 2025 में ₹6,500 करोड़ से ऊपर था।
प्रोग्रामेटिक DOOH: जब होर्डिंग बोलने लगे एल्गोरिद्म की भाषा
DOOH की इस क्रांति के केंद्र में है प्रोग्रामेटिक DOOH, यानी ऑटोमेटेड, डेटा-संचालित तरीके से विज्ञापन खरीदना और चलाना। पहले एक बिलबोर्ड बुक करने में 5-7 दिन लगते थे, मैनेजर को फोन, कॉन्ट्रैक्ट साइनिंग, इंतजार। अब प्रोग्रामेटिक DOOH के जरिए उसी जगह पर 24 घंटे से भी कम समय में कैंपेन लाइव हो सकती है।
VIOOH के द्वारा 2026 में किए अध्ययन (1,050 विज्ञापनदाताओं पर) के अनुसार हाल के प्रोग्रामेटिक DOOH खरीदारों में से, पिछले 18 महीनों में औसतन 34% कैंपेन में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा था और यह अगले 18 महीनों में 48% तक पहुंचने का अनुमान है। Google DV360 और The Trade Desk जैसे प्रमुख DSP प्लेटफॉर्म अब OOH इन्वेंटरी को डिजिटल चैनलों के साथ एक ही मीडिया प्लान में खरीदने की सुविधा दे रहे हैं।
भारत की तस्वीर बिल्कुल अलग है। PwC की रिपोर्ट और एक्सचेंज4मीडिया के इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार भारत में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा OOH खर्च का महज 1-2% है। PwC इसके पीछे इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, कॉस्ट-शेयरिंग की चिंताएं और ऐडवर्टाइजिंग Agencies Association of India (AAAI) की formal स्वीकृति का न मिलना बताता है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 में यह आंकड़ा 3-5% तक पहुंच सकता है और 2028 तक 15-20%।
मौसम, ट्रैफिक और वक्त के हिसाब से बदलते विज्ञापन
स्मार्ट DOOH की सबसे रोचक बात यह है कि ये स्क्रीनें आसपास के माहौल को 'पढ़' सकती हैं। इसके कई तरीके हैं:
मौसम आधारित विज्ञापन: जैसे ही तापमान एक तय सीमा से ऊपर जाता है, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम का विज्ञापन चल पड़ता है। बारिश होते ही छाते या रेनकोट की ब्रैंड दिखने लगती है। Aperol ने एक कैंपेन में यह तय किया कि उनका विज्ञापन केवल तभी दिखे जब तापमान 19°C से ऊपर हो, और वह भी गुरुवार से रविवार, दोपहर 1 बजे से रात 8 बजे के बीच। Rain-X ने कनाडा में बर्फ, बारिश और ओले के लिए अलग-अलग क्रिएटिव तैयार किए जो मौसम के हिसाब से अपने आप बदल जाते थे। Dulux पेंट ने मौसम-ट्रिगर कैंपेन के जरिए अपने स्टोर में 130% अधिक ट्रैफिक दर्ज किया।
ट्रैफिक और समय आधारित विज्ञापन: सुबह की भीड़ में कॉफी का विज्ञापन, दोपहर में फास्ट फूड स्पेशल, शाम को मनोरंजन। हाईवे पर ट्रैफिक जाम में प्रीमियम ब्रैंड विज्ञापन, मेट्रो स्टेशनों पर सुबह की सवारी में फिनटेक ऐप। EMARKETER के AI in OOH FAQ (मई 2026) के अनुसार AI अब स्पोर्ट्स स्कोर्स, लोकल इवेंट्स और ट्रैफिक कंडिशंस के आधार पर contextual creative selection करता है।
लोकेशन और इवेंट आधारित विज्ञापन: मैच वाले दिन स्टेडियम के आसपास लगी स्क्रीन पर स्पोर्ट्स ड्रिंक के विज्ञापन दिखने लगते हैं। वहीं मॉल के अंदर लगे डिजिटल कियोस्क लोगों को उसी समय चल रहे ऑफर्स और डील्स दिखाते हैं। Amazon जैसे ब्रांड भी अब रियल-टाइम ऑफर्स दिखाकर ग्राहकों को तुरंत खरीदारी के लिए आकर्षित कर रहे हैं।
Blindspot के मुताबिक, मौसम के हिसाब से बदलने वाले DOOH विज्ञापनों को लोग ज्यादा याद रखते हैं। कंपनी का दावा है कि ऐसे विज्ञापनों में ब्रैंड रिकॉल करीब 90% तक पहुंच जाता है, जबकि सामान्य स्थिर विज्ञापनों में यह करीब 65% रहता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि करीब 80% लोग उन विज्ञापनों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो उनके आसपास की स्थिति या माहौल से जुड़े होते हैं।
फेस डिटेक्शन और ऑडियंस एनालिटिक्स: होर्डिंग जो 'देखती' है
DOOH में अब AI आधारित ऑडियंस डिटेक्शन तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इसके जरिए डिजिटल स्क्रीन के आसपास मौजूद लोगों की अनुमानित उम्र, जेंडर या भीड़ के प्रकार को समझकर विज्ञापन बदले जाते हैं। इस तकनीक में आमतौर पर कैमरों और सेंसर की मदद ली जाती है, लेकिन कंपनियों का कहना है कि इसका मकसद किसी व्यक्ति की पहचान करना नहीं, बल्कि ऑडियंस पैटर्न को समझना होता है।
यह तकनीक फेशियल डिटेक्शन कहलाती है, जो फेशियल रिकग्निशन से अलग मानी जाती है। फेशियल रिकग्निशन किसी व्यक्ति की पहचान करने और डेटा सेव करने से जुड़ी होती है, जबकि फेशियल डिटेक्शन केवल सामने मौजूद लोगों की अनुमानित जनसांख्यिकीय जानकारी समझने की कोशिश करती है।
उदाहरण के तौर पर, कुछ कंपनियां टैबलेट स्क्रीन और डिजिटल डिस्प्ले के जरिए यह समझने की कोशिश करती हैं कि सामने किस तरह की ऑडियंस मौजूद है, ताकि उसी हिसाब से विज्ञापन दिखाए जा सकें।
इसके अलावा Affectiva और Hume AI जैसी कंपनियां अब इमोशन AI तकनीक पर भी काम कर रही हैं। यह तकनीक चेहरे के हावभाव के आधार पर लोगों की प्रतिक्रिया समझने में मदद करती है, ताकि विज्ञापनों को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।
MarketsandMarkets की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक इमोशन डिटेक्शन और रिकग्निशन मार्केट के 2026 तक 37.1 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। वहीं Fortune Business Insights के मुताबिक यह मार्केट 2025 में 42.83 अरब डॉलर का था और आने वाले वर्षों में इसके और तेजी से बढ़ने की संभावना है।
क्या DOOH अब डिजिटल जैसा Measurable हो गया?
DOOH की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा यह रही है कि इसे मापना मुश्किल था। ऑनलाइन विज्ञापन में क्लिक, इंप्रेशन, कन्वर्जन, सब कुछ सटीक आंका जा सकता है। होर्डिंग के साथ यह सुविधा नहीं थी।
IAB ने जुलाई 2025 में DOOH Measurement Guide जारी की थी, जिसका मकसद डिजिटल आउट-ऑफ-होम विज्ञापनों के लिए एक जैसे मापन मानक तय करना है। हालांकि, इसका इस्तेमाल अभी शुरुआती स्तर पर ही है।
Broadsign के एक सर्वे के मुताबिक, ज्यादातर विज्ञापनदाता उन DOOH प्लेटफॉर्म्स में ज्यादा निवेश करना चाहते हैं, जहां डायनेमिक और कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से विज्ञापन दिखाने की सुविधा हो।
भारत में भी OOH इंडस्ट्री तेजी से तकनीक अपना रही है। Indian Outdoor Advertising Association (IOAA) ने 2024 में GPS आधारित ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम शुरू किया था। इसका उद्देश्य देशभर में OOH विज्ञापनों की पहुंच और दर्शकों को बेहतर तरीके से मापना है।
हालांकि, इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी एक समान मापन प्रणाली की कमी है। अलग-अलग कंपनियां विज्ञापनों की पहुंच और प्रभाव को अलग-अलग तरीके से मापती हैं, जिससे पूरे बाजार के लिए एक कॉमन स्टैंडर्ड बनाना मुश्किल हो रहा है।
प्राइवेसी की चिंता: क्या 'स्मार्ट' होर्डिंग हमें देख रहे हैं?
जैसे-जैसे DOOH स्मार्ट होती जा रही है, सवाल उठ रहे हैं, क्या यह हमारी निजता का उल्लंघन है? यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है, और दुनिया भर की सरकारें इस पर कड़े नियम बना रही हैं।
चीन ने अप्रैल 2026 में Personal Information Protection Law के तहत सख्त नियमों का नया रोडमैप जारी किया। इसके तहत Cyberspace Administration of China (CAC), Ministry of Industry and Information Technology (MIIT) और Ministry of Public Security (MPS) ने मिलकर कई अभियान शुरू किए हैं। इनमें इंटरनेट विज्ञापनों और यूजर डेटा के इस्तेमाल पर खास फोकस किया गया है।
नए नियमों में यूजर्स को पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन बंद करने का आसान विकल्प देना और बिना फोन नंबर दिए बेसिक सेवाएं उपलब्ध कराना जरूरी किया गया है। इससे डिजिटल विज्ञापन इंडस्ट्री के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
अमेरिका में Illinois का Biometric Information Privacy Act (BIPA) सबसे सख्त कानूनों में माना जाता है। इसके उल्लंघन के मामलों में Facebook पर 650 मिलियन डॉलर और Google पर 100 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया जा चुका है। वहीं Connecticut में 2026 में एक नया बिल पास हुआ, जिसमें फेशियल रिकग्निशन सिस्टम और लोकेशन डेटा शेयरिंग पर सख्त नियम प्रस्तावित किए गए हैं।
हालांकि, DOOH इंडस्ट्री में ज्यादातर तकनीक फेशियल डिटेक्शन पर आधारित होती है, न कि फेशियल रिकग्निशन पर। कंपनियों का कहना है कि इसमें किसी व्यक्ति की पहचान या डेटा स्टोर नहीं किया जाता।
अब Edge Computing जैसी तकनीक भी तेजी से इस्तेमाल हो रही है। इसमें डेटा को क्लाउड पर भेजने के बजाय उसी डिवाइस पर प्रोसेस किया जाता है, जिससे निजता बेहतर तरीके से सुरक्षित रहती है।
भारत में DOOH: महानगरों से टियर-2 शहरों तक की यात्रा
भारत में DOOH अभी मुख्यतः शीर्ष 12 मेट्रो शहरों में केंद्रित है। Adonmo के अनुसार 2024 तक देश में करीब 1.5 लाख डिजिटल स्क्रीनें थीं, जिनमें से 75% इन्हीं 12 शहरों में थीं। Adonmo के इंडस्ट्री डेटा के अनुसार भारत में DOOH कुल OOH मार्केट का महज 12% है, जबकि अमेरिका में 40% और चीन में 90%।
Mordor Intelligence के अनुसार भारत के OOH इंडस्ट्री में static OOH का 2024 में 68% हिस्सा था, जबकि DOOH सालाना 7.2% की दर से बढ़ रहा है, जो कुल OOH मार्केट वृद्धि से दोगुना है। PwC के अनुसार DOOH भारत में 16.5% CAGR से बढ़ेगा, पारंपरिक OOH के 2% CAGR से आठ गुना तेज, और 2029 तक OOH का 44.1% हिस्सा होगा, जो 2024 में 28.8% था।
बदलाव आ रहा है:
भारत में DOOH की मार्केट साइज को लेकर इंडस्ट्री विशेषज्ञों में मतभेद हैं। Adgully की जनवरी 2026 की in-depth रिपोर्ट के अनुसार DOOH 2024 में कुल OOH खर्च का 28-30% था और 2026 तक 35% से अधिक होने का अनुमान है।
छोटे शहरों तक पहुंचने की चुनौती: एक DOOH face की स्थापना लागत $10,000 से $50,000 के बीच है और बिजली खर्च ऑपरेटिंग कॉस्ट का 20% तक हो सकता है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में बिजली की अनिश्चितता और connectivity की कमी बड़ी बाधा है। फिर भी LED panel की गिरती कीमतें और 5G का विस्तार इस रास्ते को धीरे-धीरे खोल रहे हैं।
AI Creatives: जब मशीन खुद बनाती है विज्ञापन
DOOH का अगला मोर्चा है, AI-generated creatives। अब विज्ञापन डिजाइन करने के लिए हफ्तों की जरूरत नहीं। AI प्लेटफॉर्म रिलय टाइम डेटा (मौसम, ट्रैफिक, स्पोर्ट्स स्कोर्स) के आधार पर खुद-ब-खुद अलग-अलग creative तैयार करते हैं।
डायनेमिक क्रिएटिव ऑप्टिमाइजेशन (DCO) की मदद से अब एक ही कैंपेन के कई अलग-अलग विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं। यानी अलग ऑडियंस, अलग जगह और अलग समय के हिसाब से विज्ञापन अपने आप बदल सकते हैं। JCDecaux ने फरवरी 2026 में एक नया प्लेटफॉर्म लॉन्च किया, जिसकी मदद से 80 देशों में प्रोग्रामेटिक DOOH विज्ञापनों को एक ही सिस्टम से मैनेज किया जा सकता है। इसमें रियल-टाइम बिडिंग, बदलते विज्ञापन और कार्बन रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।
वहीं Clear Channel Outdoor के EVP और CMO Dan Levi ने EMARKETER की जनवरी 2026 की रिपोर्ट में कहा कि जैसे-जैसे एजेंसियां अपने प्लानिंग टूल्स में एआई को शामिल कर रही हैं, वैसे-वैसे उन्हें तेजी से बेहतर और काम की जानकारियां मिल रही हैं।
OOH और डिजिटल का संगम: Omnichannel का नया युग
2026 में DOOH का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब यह अकेले काम नहीं करता। अब एक उपभोक्ता सुबह सड़क पर किसी ब्रैंड का होर्डिंग देखता है, फिर दोपहर में उसी ब्रैंड का विज्ञापन उसके मोबाइल पर दिखाई देता है और रात में वही संदेश किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर भी नजर आता है। यानी अब विज्ञापन हर प्लेटफॉर्म पर आपस में जुड़े हुए तरीके से दिखाए जा रहे हैं।
OAAA और Harris Poll की 2024 की एक स्टडी के मुताबिक, 73% लोगों ने कहा कि उन्हें DOOH विज्ञापन पसंद आते हैं। वहीं टीवी विज्ञापनों को पसंद करने वालों की संख्या 50% और ऑनलाइन विज्ञापनों के लिए सिर्फ 37% रही। इसी स्टडी में 76% लोगों ने माना कि OOH विज्ञापन देखने के बाद उन्होंने किसी न किसी तरह की प्रतिक्रिया दी।
चुनौतियां अभी भी बाकी हैं
स्मार्ट DOOH तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।
सबसे बड़ी समस्या मापन की है। अभी तक इंडस्ट्री में ऐसा कोई एक समान सिस्टम नहीं है, जिससे सभी कंपनियां विज्ञापनों का असर एक ही तरीके से माप सकें। भारत में यह समस्या और बड़ी है, क्योंकि यहां प्रोग्रामेटिक DOOH अभी शुरुआती दौर में है।
दूसरी चुनौती यह है कि अभी भी ज्यादातर आउटडोर विज्ञापन पारंपरिक होर्डिंग्स पर ही आधारित हैं। OAAA के मुताबिक, OOH बाजार का बड़ा हिस्सा अब भी स्टैटिक बिलबोर्ड्स का है। यानी एआई और स्मार्ट तकनीक का फायदा फिलहाल सिर्फ डिजिटल स्क्रीन तक सीमित है।
डेटा प्राइवेसी और नियम-कानून भी बड़ी चुनौती बन रहे हैं। चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में डेटा सुरक्षा को लेकर सख्त नियम बनाए जा रहे हैं, जिसका असर एआई आधारित विज्ञापनों पर पड़ सकता है।
भारत में एक और दिक्कत यह है कि OOH इंडस्ट्री काफी बंटी हुई है। यहां हजारों छोटे-छोटे वेंडर्स हैं, अलग-अलग शहरों के अलग नियम हैं और कोई एक केंद्रीय मानक नहीं है। इसी वजह से पूरे देश में एक जैसी तकनीक लागू करना आसान नहीं है।
अब होर्डिंग सिर्फ तस्वीर नहीं रहे
2026 तक आते-आते DOOH ने यह साफ कर दिया है कि अब होर्डिंग सिर्फ दीवार पर लगी तस्वीर नहीं रह गए हैं। अब वे मौसम, ट्रैफिक और आसपास के माहौल के हिसाब से विज्ञापन बदल सकते हैं और सही समय पर सही संदेश दिखा सकते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां स्मार्ट सिटी, मेट्रो और हाईवे तेजी से बढ़ रहे हैं, वहां स्मार्ट DOOH का बाजार भी तेजी से फैल रहा है। हालांकि प्राइवेसी, मापन और तकनीकी ढांचे जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं, लेकिन इंडस्ट्री जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उससे साफ है कि आने वाले समय में आउटडोर विज्ञापन पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और डेटा आधारित होने वाले हैं।
इसके अलावा किसी अनजान ऐप को गैर-जरूरी परमिशन नहीं देनी चाहिए। फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम और सिक्योरिटी सॉफ्टवेयर को भी समय-समय पर अपडेट रखना जरूरी है।
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Samachar4media Bureau
एंड्रॉयड (Android) यूजर्स के लिए सरकार ने नए मालवेयर खतरे को लेकर चेतावनी जारी की है। यह मालवेयर इंस्टाग्राम (Instagram) और फेसबुक (Facebook) पर दिखने वाले विज्ञापनों के जरिए फैलाया जा रहा है। इनमें कुछ खतरनाक ऐप्स को पोर्न या एडल्ट कंटेंट वाले एप्लिकेशन के रूप में पेश किया जा रहा है।
नेशनल साइबर थ्रेट एनालिटिक्स यूनिट (NCTAU) के मुताबिक, ऐसे कुछ ऐप फोन में वीपीएन इंस्टॉल कर सकते हैं। इसके जरिए हमलावर डिवाइस के इंटरनेट ट्रैफिक को अपने नियंत्रण वाले सर्वर से गुजार सकते हैं। इससे फोन से भेजी या प्राप्त की जा रही जानकारी के उजागर होने का खतरा बढ़ जाता है।
खतरा केवल फर्जी ऐप डाउनलोड करने तक सीमित नहीं है। ऐप इंस्टॉल करने के बाद अगर यूजर उसे जरूरत से ज्यादा परमिशन दे देता है, तो मालवेयर एंड्रॉयड डिवाइस पर व्यापक नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर सकता है। इससे निजी जानकारी के साथ वित्तीय डेटा भी खतरे में पड़ सकता है।
सरकारी चेतावनी के मुताबिक, ऐसे खतरनाक ऐप संवेदनशील जानकारी हासिल करने, संचार को इंटरसेप्ट करने या बिना अनुमति वित्तीय लेनदेन कराने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। खासतौर पर तब जोखिम बढ़ जाता है, जब यूजर किसी अनजान ऐप को सिर्फ उसके बताए कंटेंट तक पहुंचने के लिए व्यापक परमिशन दे देता है।
यूजर्स को सोशल मीडिया विज्ञापनों या अनजान वेबसाइटों से प्रमोट किए जा रहे APK फाइल डाउनलोड करने से बचना चाहिए। खासकर उन ऐप्स से सावधान रहना जरूरी है, जो आधिकारिक ऐप स्टोर पर उपलब्ध नहीं हैं।
इसके अलावा किसी अनजान ऐप को गैर-जरूरी परमिशन नहीं देनी चाहिए। फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम और सिक्योरिटी सॉफ्टवेयर को भी समय-समय पर अपडेट रखना जरूरी है।
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने नई दिल्ली में ‘ज्ञानी अर्थ’ लॉन्च किया, जिसमें एवॉन 3.3 और प्लेक्सस के जरिए एआई को वास्तविक काम से जोड़ा गया है।
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भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन (C. P. Radhakrishnan) ने 28 अगस्त को नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में ‘ज्ञानी अर्थ’ (Gnani Artha) लॉन्च किया। इसे जीएनएएनआई एआई (GNANI AI) ने विकसित किया है और यह एक सॉवरेन एआई स्टैक है।
‘ज्ञानी अर्थ’ में दो प्रमुख तकनीकें शामिल हैं-एवॉन 3.3 (Evon 3.3) और प्लेक्सस (Plexus)। एवॉन 3.3 एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल है, जबकि प्लेक्सस ऐसा प्लेटफॉर्म है, जो एआई की क्षमताओं को वास्तविक दुनिया के काम और संस्थानों से जोड़ने का काम करता है।
लॉन्च के दौरान उपराष्ट्रपति ने कहा कि एवॉन 3.3 और प्लेक्सस का संयोजन भारत के तेजी से मजबूत होते तकनीकी इकोसिस्टम को दर्शाता है। उनके मुताबिक, भारतीय इंजीनियर अब केवल अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल ही नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें खुद विकसित करने की क्षमता भी रखते हैं।
सीपी राधाकृष्णन ने तकनीक के बदलते स्वरूप का जिक्र करते हुए कहा कि कंप्यूटर आने के समय नौकरियां खत्म होने की आशंका जताई गई थी, लेकिन भारत में आईटी क्षेत्र ने बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए। उन्होंने उम्मीद जताई कि एआई भी नए रोजगार और विकास के रास्ते खोलेगा।
उन्होंने भारत में एआई को बढ़ावा देने वाली इंडिया एआई मिशन (IndiaAI Mission) और एआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस जैसी पहलों का भी उल्लेख किया। साथ ही डिजिटल संसद (Digital Sansad) का उदाहरण देते हुए बताया कि एआई के जरिए संसदीय बहस और दस्तावेज कई भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
भारत के डिजिटल भुगतान की पहचान बन चुका UPI 10 साल का हो गया है। एक दशक में इसके ट्रांजैक्शन करीब 13 हजार गुना बढ़े और नेटवर्क 703 बैंकों तक पहुंच गया।
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भारत की डिजिटल पेमेंट (Digital Payment) व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने वाला यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface) यानी UPI अब अपने सफर के 10 साल पूरे कर चुका है। 25 अगस्त 2016 को शुरू हुई यह सुविधा आज छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारी लेनदेन तक भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुकी है।
UPI की 10वीं वर्षगांठ के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर इसकी उपलब्धियों को याद किया। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले शुरू हुई UPI व्यवस्था ने भारत की डिजिटल भुगतान यात्रा को नई दिशा दी और इतने बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल देश के लिए गर्व की बात है।
वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) के आंकड़ों से UPI के विस्तार का अंदाजा लगाया जा सकता है। लॉन्च के बाद वित्त वर्ष 2016-17 में इसके जरिए केवल 1.78 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे। वहीं 2025-26 में सालाना लेनदेन की संख्या 24,162 करोड़ से ज्यादा पहुंच गई। यानी लगभग एक दशक के दौरान UPI ट्रांजैक्शन में करीब 13 हजार गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
लेनदेन की संख्या के साथ-साथ UPI के जरिए भेजी गई रकम में भी भारी उछाल आया है। वित्त वर्ष 2016-17 में UPI के माध्यम से करीब 0.07 लाख करोड़ रुपये का भुगतान हुआ था। यह आंकड़ा 2025-26 में बढ़कर लगभग 314 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
जुलाई में बना सबसे बड़ा मासिक रिकॉर्ड
UPI का इस्तेमाल हर महीने नए स्तर पर पहुंच रहा है। मई 2026 में पहली बार एक महीने के दौरान 2,300 करोड़ से अधिक ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए थे। इस महीने कुल 2,320 करोड़ लेनदेन हुए। इसके बाद जुलाई 2026 में UPI ने एक और ऊंचाई हासिल की और 2,366 करोड़ ट्रांजैक्शन दर्ज किए। यह अब तक का सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा है।
44 बैंकों से 703 तक पहुंचा नेटवर्क
UPI के विस्तार का असर इससे जुड़े बैंकों की संख्या में भी दिखाई देता है। शुरुआत के वित्त वर्ष 2016-17 में केवल 44 बैंक इस सिस्टम से जुड़े थे। करीब एक दशक बाद वित्त वर्ष 2025-26 में UPI नेटवर्क से जुड़े बैंकों की संख्या बढ़कर 703 हो गई।
UPI की पहुंच अब भारत की सीमाओं से बाहर भी फैल चुकी है। फिलहाल यह UAE (UAE), फ्रांस (France), भूटान (Bhutan), श्रीलंका (Sri Lanka), नेपाल (Nepal), सिंगापुर (Singapore), मॉरीशस (Mauritius), कतर (Qatar), कंबोडिया (Cambodia), ग्रीस (Greece) और मालदीव (Maldives) समेत 11 देशों में इस्तेमाल किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी UPI की भूमिका तेजी से मजबूत हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) के अनुसार, 2025 में दुनिया भर के रियल-टाइम पेमेंट (Real-Time Payment) ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में UPI की हिस्सेदारी करीब 49 फीसदी रही।
इस तरह सिर्फ 10 वर्षों में UPI भारत की रोजमर्रा की भुगतान व्यवस्था का हिस्सा बनने के साथ वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम के तौर पर भी अपनी पहचान बना चुका है।
विजय चौहान को Havas India में AVP – Digital Media नियुक्त किया गया है। इससे पहले वह एजेंसी में Senior Media Director की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
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विजय चौहान (Vijay Chauhan) को हवास इंडिया (Havas India) में AVP – Digital Media के पद पर पदोन्नत किया गया है। उन्होंने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की।
चौहान इससे पहले हवास इंडिया में Senior Media Director के तौर पर काम कर रहे थे। वह 2023 से एजेंसी के साथ जुड़े हुए हैं और डिजिटल मीडिया, मीडिया प्लानिंग तथा डिजिटल रणनीति के क्षेत्र में अनुभव रखते हैं।
हवास इंडिया में शामिल होने से पहले चौहान ने करीब पांच साल बीसी वेब वाइज (BC Web Wise) के साथ काम किया। इससे पहले वह डिजिटल स्ट्रिंग्स (Digital Strings), मैडिसन कम्युनिकेशंस (Madison Communications) और कस्टमर सेंट्रिया (Customer Centria) जैसी कंपनियों से भी जुड़े रहे हैं।
नई भूमिका में चौहान की जिम्मेदारियों में डिजिटल मीडिया से जुड़े काम और रणनीतिक पहल को आगे बढ़ाना शामिल होगा। उनका अनुभव मीडिया प्लानिंग और डिजिटल स्ट्रैटेजी के क्षेत्र में रहा है।
फ्लिपकार्ट में वरिष्ठ नेतृत्व स्तर पर दो बड़े बदलाव होने जा रहे हैं। बिजनेस फाइनेंस और सप्लाई चेन से जुड़े दो अधिकारी अपने पद छोड़ेंगे।
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ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट (Flipkart) में वरिष्ठ नेतृत्व स्तर पर एक बार फिर बदलाव देखने को मिल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी के दो वरिष्ठ अधिकारी गुंजन भारती (Gunjan Bhartia) और अमेर हुसैन (Amer Hussain) अपने मौजूदा पदों से हटने वाले हैं। दोनों अधिकारियों ने हाल ही में फ्लिपकार्ट जॉइन किया था और उनके जाने से कंपनी के नेतृत्व में एक और बदलाव जुड़ जाएगा।
गुंजन भारती वर्तमान में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट- बिजनेस फाइनेंस के पद पर हैं। उन्होंने दिसंबर 2025 में फ्लिपकार्ट के साथ अपनी पारी शुरू की थी। वहीं, अमेर हुसैन जनवरी 2026 में कंपनी से जुड़े थे और वह ग्रॉसरी एवं मिनट्स कारोबार के लिए सप्लाई चेन के वाइस प्रेसिडेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
इन दोनों अधिकारियों का जाना ऐसे समय हो रहा है, जब फ्लिपकार्ट ग्रुप में पिछले कुछ महीनों के दौरान कई वरिष्ठ स्तर के बदलाव हुए हैं। मिंत्रा (Myntra) की सीईओ नंदिता सिन्हा (Nandita Sinha) फ्लिपकार्ट से निकलकर स्विगी (Swiggy) के इंस्टामार्ट कारोबार से जुड़ी हैं। वहीं, फ्लिपकार्ट के पुराने अधिकारी अंकित जैन (Ankit Jain) ने भी स्विगी में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट-ऑपरेशंस का पद संभाला है।
इसके अलावा फ्लिपकार्ट ग्रुप के सीएफओ श्रीराम वेंकटरमण (Sriram Venkatraman) भी अपना पद छोड़ चुके हैं। कंपनी में ये बदलाव ऐसे वक्त हो रहे हैं, जब फ्लिपकार्ट का फोकस मुनाफे को बेहतर करने पर है। इससे पहले मीडिया रिपोर्ट्स में कंपनी के प्रस्तावित आईपीओ (IPO) को आगे खिसकाए जाने की बात भी सामने आई थी।
भारत में साइबर ठगी के खिलाफ सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। अधिकारियों ने Google से उसके Firebase प्लेटफॉर्म पर होस्ट की गई कम से कम 57 वेबसाइट्स और डेटाबेस को हटाने का आदेश दिया है।
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भारत में साइबर ठगी के खिलाफ सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। अधिकारियों ने Google से उसके Firebase प्लेटफॉर्म पर होस्ट की गई कम से कम 57 वेबसाइट्स और डेटाबेस को हटाने का आदेश दिया है। सरकार का कहना है कि इनका इस्तेमाल लोगों को बड़े बैंकों के नाम पर ठगने, मोबाइल से संवेदनशील जानकारी चुराने और मैलवेयर फैलाने के लिए किया जा रहा था।
Reuters की ओर से देखे गए तीन सरकारी नोटिस के मुताबिक, Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) ने सिर्फ अगस्त महीने में Firebase पर मौजूद कम से कम 57 वेबसाइट्स और डेटाबेस को हटाने के निर्देश दिए।
बड़े बैंकों की फर्जी वेबसाइट बनाकर हो रही थी ठगी
जिन वेबसाइट्स की पहचान की गई, उनमें से कम से कम सात वेबसाइट्स प्रमुख भारतीय बैंकों की नकल करती थीं। इनमें State Bank of India (SBI), ICICI Bank और Axis Bank जैसे बैंकों के नाम का इस्तेमाल किया गया था।
इन फर्जी वेबसाइट्स के जरिए लोगों से बैंकिंग और दूसरी संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश की जा रही थी। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ वेबसाइट्स का इस्तेमाल चोरी किए गए क्रेडिट कार्ड डिटेल्स, OTP और दूसरी निजी जानकारी इकट्ठा करने के लिए भी किया जा रहा था।
ऑफर का लालच देकर डाउनलोड करवाए जा रहे थे ऐप
जालसाज Android यूजर्स को अलग-अलग तरह के ऑफर देकर अपने जाल में फंसा रहे थे। इनमें नए क्रेडिट कार्ड, रिवॉर्ड रिडीम करने और क्रेडिट लिमिट बढ़ाने जैसे ऑफर शामिल थे। इन ऑफर्स के जरिए यूजर्स को ऐसे मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा जाता था, जो देखने में बैंकिंग ऐप जैसे लगते थे। लेकिन आरोप है कि ये ऐप असल में मैलिशियस सॉफ्टवेयर थे।
ऐप फोन में इंस्टॉल होने के बाद यूजर की संवेदनशील जानकारी को जालसाजों तक पहुंचा सकता था।
PM-KISAN के नाम पर भी बनाया गया ठगी का जाल
एक मामले में जालसाजों ने केंद्र सरकार की PM-KISAN योजना का भी इस्तेमाल किया। लोगों को योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक मदद का लालच देकर एक ऐप इंस्टॉल करने के लिए कहा गया। ऐप को भुगतान का दावा करने के लिए जरूरी बताया गया था।
आरोप है कि ऐप इंस्टॉल होने के बाद वह यूजर के मोबाइल से जानकारी लेकर उसे जालसाजों द्वारा नियंत्रित Firebase डेटाबेस तक भेज सकता था।
Google को लगातार भेजे जा रहे नोटिस
Reuters के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में सरकार ने Firebase से जुड़े मामलों को लेकर Google को दर्जनों नोटिस भेजे हैं।
Google ने कहा है कि उसकी पॉलिसीज फिशिंग, मैलवेयर और वित्तीय धोखाधड़ी जैसी गतिविधियों पर रोक लगाती हैं। कंपनी ने यह भी कहा कि वह I4C समेत कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ मिलकर काम करती है और उनके भेजे गए कंटेंट हटाने के अनुरोधों पर कार्रवाई करती है।
Firebase की लोकप्रियता का फायदा उठा रहे जालसाज
Firebase एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जिसका इस्तेमाल डेवलपर्स ऐप्स और वेबसाइट्स बनाने और उन्हें होस्ट करने के लिए करते हैं। इसमें डेटाबेस जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
भारतीय अधिकारियों का मानना है कि साइबर ठगी करने वाले लोग दूसरे मुफ्त डेवलपमेंट टूल्स से Firebase की तरफ तेजी से बढ़े हैं। इसकी एक वजह प्लेटफॉर्म की मुफ्त सुविधाएं और डेटाबेस क्षमता बताई जा रही है। हालांकि, Firebase का इस्तेमाल सामान्य तौर पर वैध ऐप्स और वेबसाइट्स बनाने के लिए भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। कार्रवाई उन वेबसाइट्स और डेटाबेस के खिलाफ है, जिनके बारे में अधिकारियों ने साइबर ठगी में इस्तेमाल होने की पहचान की है।
भारत में बढ़ रही है ऑनलाइन ठगी की चिंता
सरकार की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब भारत में ऑनलाइन फ्रॉड लगातार बड़ी चिंता बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में भारत में लोगों को कथित ऑनलाइन ठगी के कारण करीब 2.4 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।
बैंकों और सरकारी योजनाओं के नाम पर फर्जी वेबसाइट और ऐप बनाकर लोगों को निशाना बनाना साइबर ठगों के तरीकों में शामिल है। ऐसे में सरकार और साइबर सुरक्षा एजेंसियां फर्जी डिजिटल प्लेटफॉर्म की पहचान कर उन्हें हटाने पर जोर दे रही हैं। Firebase से जुड़ी यह कार्रवाई भी इसी अभियान का हिस्सा है, जिसमें सरकार ने Google से ऐसे प्लेटफॉर्म और लिंक हटाने को कहा है जिनका इस्तेमाल लोगों की वित्तीय और निजी जानकारी हासिल करने के लिए किया जा रहा था।
बैंकों और सरकारी योजनाओं के नाम पर फर्जी वेबसाइट और ऐप बनाकर लोगों को निशाना बनाना साइबर ठगों के तरीकों में शामिल है। ऐसे में सरकार और साइबर सुरक्षा एजेंसियां फर्जी डिजिटल प्लेटफॉर्म की पहचान कर उन्हें हटाने पर जोर दे रही हैं।
Firebase से जुड़ी यह कार्रवाई भी इसी अभियान का हिस्सा है, जिसमें सरकार ने Google से ऐसे प्लेटफॉर्म और लिंक हटाने को कहा है जिनका इस्तेमाल लोगों की वित्तीय और निजी जानकारी हासिल करने के लिए किया जा रहा था।