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गूगल की कड़ी सर्च पॉलिसी से डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स को भारी नुकसान

भारत और दुनियाभर के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एक बड़े संकट का सामना कर रहे हैं, क्योंकि Google ने अपनी सर्च इंडेक्सिंग (Search Indexing) नीतियों को कड़ा कर दिया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 year ago

कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर व ग्रुप एडिटोरियल इवेन्जिल्सिट, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत और दुनियाभर के डिजिटल डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एक बड़े संकट का सामना कर रहे हैं, क्योंकि Google ने अपनी सर्च इंडेक्सिंग (Search Indexing) पॉलिसीयों को कड़ा कर दिया है। यह बदलाव उन पब्लिशर्स के लिए खतरा बन सकता है, जो अपनी आमदनी के लिए विज्ञापन-आधारित मॉडल पर निर्भर हैं।

गूगल ने मार्च 2024 में अपनी ‘कोर अपडेट्स और नई स्पैम पॉलिसी’ जारी की थीं, जिसमें उन वेब पेजों की इंडेक्सिंग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जो स्पॉन्सर्ड कंटेंट, प्रोडक्ट रिव्यू और SEO रैंकिंग के लिए कूपन का इस्तेमाल करते हैं। इस पॉलिसी के बाद, Forbes, Wall Street Journal और CNN जैसे दुनिया के शीर्ष डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स की सर्च विजिबिलिटी (खोज में दिखने की क्षमता) हाल के महीनों में काफी गिर गई है। कई भारतीय न्यूज पब्लिशर्स के ट्रैफिक में भी बीते छह महीनों में 25-30% की गिरावट देखी गई है।

सर्च विजिबिलिटी एनालिटिक्स फर्म Sistrix के अनुसार, इस गिरे हुए ट्रैफिक का वैश्विक स्तर पर कुल मूल्य कम से कम 7.5 मिलियन डॉलर (करीब 62 करोड़ रुपये) आंका गया है।

इन न्यूज पब्लिशर्स पर आरोप है कि वे थर्ड-पार्टी वेंडर्स के साथ मिलकर राजस्व उत्पन्न कर रहे थे। ये वेंडर्स इन पब्लिशर्स के लिए उनके डोमेन पर उनके ब्रांड नाम का उपयोग करते हुए संबद्ध व्यवसाय संचालित करते थे। इसमें भुगतान किए गए कंटेंट, उत्पाद समीक्षाएं, कूपन आदि शामिल थे।

 प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी अखबारों के डिजिटल हेड्स ने हमारी सहयोगी वेबसाइट 'एक्सचेंज4मीडिया' को बताया, "डिस्काउंट कूपन और प्रायोजित लेख पिछले कुछ वर्षों में हमारे ट्रैफिक और राजस्व का एक प्रमुख स्रोत रहे हैं। प्रायोजित कंटेंट हमारी कुल डिजिटल आय में 30 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता था और कूपनों का योगदान 5-7 प्रतिशत था। इस तरह के कंटेंट को इंडेक्स करने पर प्रतिबंध लगने का मतलब है कि हम अपनी एक-तिहाई आय खोने के खतरे में हैं।"

'एक्सचेंज4मीडिया' को पता चला है कि जो मीडिया हाउस इन नई पॉलिसी का बार-बार उल्लंघन कर रहे हैं, उन्हें जुर्माने का नोटिस दिया गया है। यह झटका ऐसे समय में आया है जब प्रकाशक पहले से ही सर्च इंजनों द्वारा प्रदान किए गए एआई-ओवरव्यू के कारण ट्रैफिक में गिरावट से जूझ रहे हैं।

प्रभाव डालने वाले अपडेट

5 मार्च 2024 को, गूगल ने अब तक का सबसे लंबा और बड़ा कोर अपडेट और स्पैम पॉलिसी के अपडेट लॉन्च किया। इस अपडेट को पूरा होने में 52 दिन लगे और यह 19 अप्रैल को समाप्त हुआ। इन बदलावों के तहत, गूगल ने उन वेबसाइटों की रैंकिंग को काफी हद तक घटा दिया, जिन्हें उसने यह मानते हुए पहचाना कि वे वास्तविक पाठकों को मूल्य प्रदान करने के बजाय सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO) पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही थीं।

इस अपडेट की व्यापकता को गूगल के अपने ब्लॉग से समझा जा सकता है। “मार्च 2024 का कोर अपडेट हमारे सामान्य कोर अपडेट की तुलना में अधिक जटिल है, क्योंकि इसमें कई कोर सिस्टम में बदलाव शामिल हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि हम कंटेंट की उपयोगिता की पहचान कैसे करते हैं, इसमें एक नया विकास हुआ है।”

"जिस तरह हम भरोसेमंद जानकारी की पहचान करने के लिए कई सिस्टम का उपयोग करते हैं, उसी तरह हमने अपने कोर रैंकिंग सिस्टम को बेहतर बनाया है ताकि विभिन्न नवीन सिग्नल और तरीकों का उपयोग करके अधिक उपयोगी परिणाम दिखाए जा सकें। अब केवल एक ही संकेतक या सिस्टम इसका आधार नहीं होगा, और हमने इस बदलाव को समझाने में मदद के लिए एक नया FAQ पेज भी जोड़ा है।"

चूंकि यह एक जटिल अपडेट है, इसका रोलआउट पूरा होने में लगभग एक महीने का समय लग सकता है। यह संभव है कि रैंकिंग में पहले की तुलना में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिले, क्योंकि विभिन्न सिस्टम पूरी तरह अपडेट होकर एक-दूसरे को मजबूत करेंगे। इस अपडेट के लिए क्रिएटर्स को कुछ नया या अलग करने की जरूरत नहीं है, बशर्ते कि वे पहले से ही लोगों के लिए संतोषजनक कंटेंट बना रहे हों।

पिछले साल 5 जून को, गूगल ने अपनी पॉलिसी को और अपडेट किया, जिसमें कहा गया कि वाइट-लेबल सेवाएं जो सर्च रैंकिंग में हेरफेर करने के लिए कूपन को पुनर्वितरित करती हैं, वे उसकी "साइट रेप्यूटेशन अब्यूज पॉलिसी" का उल्लंघन करती हैं। इस अपडेट में यह स्पष्ट किया गया कि प्रकाशनों को दंड से बचने के लिए सीधे व्यापारियों से कूपन प्राप्त करने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए।

एक विशेषज्ञ के अनुसार, FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवालों) के पिछले संस्करण में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि प्रकाशनों को यह बताने की जरूरत है कि वे कूपन कहां से प्राप्त कर रहे हैं। यह बदलाव इसलिए किया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कूपन कंटेंट पाठकों के लिए वास्तविक मूल्य प्रदान करे और केवल सर्च रैंकिंग बढ़ाने की रणपॉलिसी न हो।

इस खबर पर गूगल की प्रतिक्रिया अब तक नहीं मिली थी, जब तक यह स्टोरी फाइल की गई। जैसे ही गूगल की प्रतिक्रिया मिलेगी, कॉपी को अपडेट कर दिया जाएगा।

चुनौतीपूर्ण समय

पब्लिशर्स की डिजिटल राजस्व से जुड़ी समस्या कई स्तरों पर फैली हुई है, जिनमें हर एक की अपनी जटिलताएं हैं। उदाहरण के लिए, एआई (AI) का प्रभाव बहुत बड़ा है, जैसा कि पिछले सप्ताह जारी की गई WARC रिपोर्ट में बताया गया है। रिपोर्ट में SEER Interactive के विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा गया, "AI Overviews (AIOs) से पहले, पब्लिशर्स को गूगल सर्च में ऑर्गेनिक प्लेसमेंट से लगभग 4% क्लिक-थ्रू रेट (CTR) की उम्मीद होती थी। हालांकि, अब गूगल सर्च में 'नो-क्लिक' ट्रेंड बढ़ रहा है, जिसमें 58.5% अमेरिकी सर्च या तो बिना किसी और ऐक्शन के रह जाती हैं या फिर केवल दूसरी सर्च में बदल जाती हैं। सिर्फ एक छोटी संख्या – लगभग 36% सर्च ही ओपन वेब तक पहुंचती हैं।"

AI-संचालित सर्च और गूगल की नई पॉलिसीज का संयुक्त प्रभाव 2024 के दौरान ऑर्गेनिक विजिबिलिटी को कम करने और ऐड इंप्रेशन्स को घटाने का कारण माना जा रहा है।

इसके अलावा, CPM (Cost Per Mille) रेट्स भी सालों से नहीं बढ़े हैं, बल्कि घटे हैं। 1995 में, जब ऑनलाइन विज्ञापन इंडस्ट्री अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी, तब अमेरिका में वेब बैनर विज्ञापनों के लिए CPM दरें औसतन $75 (लगभग ₹3,000 उस समय) थीं।

एक्सपर्ट्स के अनुसार, साल 2000 में भारत में CPM (Cost Per Mille) दरें ₹250 से लेकर ₹1,000 या उससे अधिक तक होती थीं, जो वेबसाइट की लोकप्रियता पर निर्भर करती थीं। लेकिन वर्तमान में भारत में ऑनलाइन बैनर विज्ञापनों के लिए औसत CPM दरें ₹50 से ₹150 के बीच रह गई हैं, जो विज्ञापन के प्रारूप, प्लेटफॉर्म और लक्ष्यीकरण जैसी विभिन्न चीजों से प्रभावित होती हैं।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "CPM दरों में गिरावट का मुख्य कारण ऑनलाइन विज्ञापन स्थानों की भारी वृद्धि है। नए वेब पोर्टल्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से विज्ञापन स्थानों की आपूर्ति बढ़ गई, जिससे पब्लिशर्स के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी और विज्ञापनदाताओं के लिए दरें सस्ती हो गईं।"

स्थिति को और खराब करने वाली बात यह है कि वर्षों से Click-Through Rates (CTR) भी घटी हैं, बजाय बढ़ने के। "ऑनलाइन विज्ञापन के शुरुआती दिनों में CTR बहुत अधिक था, कभी-कभी 40% तक पहुंच जाता था। इसकी वजह यह थी कि इंटरनेट विज्ञापन नई चीज थी और विज्ञापन की अधिकता नहीं थी। लेकिन आज, DVAP (Digital Video Advertising Platform) भी 0.3% CTR को स्वीकार्य मानता है। यह दिखाता है कि समय के साथ विज्ञापन की प्रभावशीलता कैसे घट गई है, जिसका मुख्य कारण विज्ञापन की अधिकता, उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव और 'एड फटीग' (ad fatigue) है," इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है।

एक अन्य विशेषज्ञ ने बताया, "ट्रैफिक में यह गिरावट प्रोग्रामेटिक विज्ञापन को भी प्रभावित कर सकती है, क्योंकि यह पूरी तरह से ट्रैफिक वॉल्यूम पर निर्भर करता है। जब विज्ञापन इंप्रेशंस कम होंगे, तो विज्ञापन से होने वाली कमाई भी कम हो जाएगी, जो उन पब्लिशर्स के लिए बड़ी चिंता की बात है, जो पहले से ही सीमित मार्जिन के साथ काम कर रहे हैं।"

बढ़ती प्रतिस्पर्धा और चुनौतियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि प्रकाशक अब केवल विज्ञापन से वित्तीय स्थिरता हासिल नहीं कर सकते। कई मीडिया संस्थान नई कमाई रणनीतियों की तलाश कर रहे हैं, जिनमें पेवॉल (Paywalls) और प्रीमियम मेंबर्सशिप्स (Premium Memberships), इवेंट होस्टिंग (Event Hosting), ब्रैंडेड कंटेंट (Branded Content) और नेटिव एडवरटाइजिंग (Native Advertising) शामिल हैं।

एक प्रकाशक ने कहा, "डेटा लाइसेंसिंग (Data Licensing) भी एक नया राजस्व स्रोत बन रहा है। कुछ प्रकाशक अपने उपभोक्ता इनसाइट्स (Consumer Insights) को एनोनिमाइज़्ड डेटा सेट्स (Anonymized Data Sets) के रूप में विज्ञापनदाताओं और मार्केटर्स को बेचकर कमाई कर रहे हैं।"

आगे की राह

Dalberg Advisors की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डिजिटल न्यूज कंज्यूमर्स की संख्या 2026 तक 70 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जो विभिन्न प्रारूपों में फैली होगी। भारतीय नागरिकों द्वारा न्यूज कंटेंट देखने में बिताया गया औसत समय 2020 में 44 मिनट प्रतिदिन से बढ़कर 2026 में 49 मिनट होने का अनुमान है, जिसमें डिजिटल न्यूज देखने में बिताया जाने वाला समय मुख्य रूप से इस वृद्धि को बढ़ावा देगा।

डिजिटल प्लेटफॉर्म ने हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में ऑनलाइन न्यूजों की पहुंच को भी आसान बना दिया है, और रिपोर्ट के अनुसार, इसका उपभोग अंग्रेजी न्यूजों की तुलना में 6-8 गुना तेजी से बढ़ने की संभावना है, चाहे वह दर्शकों की संख्या हो या न्यूज देखने में बिताया गया समय।

इन वृद्धि अनुमानों के बीच, यह स्पष्ट है कि डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के लिए विज्ञापन मॉडल में बड़े बदलाव आ रहे हैं।

एक मीडिया एग्जिक्यूटिव ने कहा, "इस नए युग में आगे बढ़ने के लिए, पब्लिशर्स को इनोवेशन अपनाना होगा, ऑडियंस एंगेजमेंट को प्राथमिकता देनी होगी और राजस्व स्रोतों में विविधता लानी होगी। जो लोग तेजी से और रणनीतिक रूप से खुद को अनुकूलित करेंगे, वे इन चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकेंगे और विकसित होते डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में मजबूती से उभरेंगे।" 


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