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मीडिया के लिए कुछ यूं फायदे का सौदा साबित हो सकता है दिल्ली चुनाव
वोटर्स को लुभाने के लिए राजनीतिक दल आउटडोर एडवर्टाइजिंग में नए रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं नए मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा भी लिया जा रहा है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
मार्केट में मंदी से उबरने के लिए विज्ञापनों को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन चुनाव में मीडिया पर विज्ञापन खर्च के मामले में राजनीतिक दल ज्यादा आगे नहीं बढ़ रहे हैं। आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतक दलों द्वारा विज्ञापनों पर 150 से 200 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान हुए खर्च से अब के खर्च का आकलन किया जा सकता है।
‘एसोचैम’ (ASSOCHAM) की रिपोर्ट के अनुसार,पांच साल पहले राजनीतिक दलों द्वारा सभी तरह के अभियानों पर लगभग 200 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। पिछली बार के विधानसभा चुनाव के बाद प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यक्तिगत तौर पर उम्मीदवारों के बजाय विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा ज्यादा और एकमुश्त बड़ा खर्चा किया गया। इसमें भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन पर ज्यादा खर्च किया गया। इस साल 2020 में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है।
‘मैडिसन मीडिया प्लस’ (Madison Media Plus) के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर राजुल कुलश्रेष्ठ का कहना है, ‘राजनीतिक दल आर्थिक रूप से ज्यादा प्रभावित नहीं होते हैं। इन चुनावों में भी इन दलों को अपनी बात लोगों तक पहुंचानी होगी। उन्हें इस तरह की स्ट्रैटेजी अपनानी होगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके। दिल्ली की करीब दो करोड़ जनता तक प्रभावी रूप से अपनी पहुंच बनाने के लिए इन राजनीतिक दलों को मीडिया में भी खर्चा करना होगा।।’
इसके साथ ही कुलश्रेष्ठ का यह भी कहना है, ‘राजनीतिक दलों के अभियानों में जुटे लोगों की संख्या पर मंदी का प्रभाव पडेगा, इसके बावूजद विज्ञापन पर खर्च नहीं रुकेगा। दूसरी तरफ, यही समय है, जब लोग पैसे कमाएंगे।’
आउटडोर एडवर्टाइजिंग ब्रैंड ‘Jcdecaux’ के एग्जिक्यूटिव चेयरमैन प्रमोद भंडूला के अनुसार, ‘इस दौरान बहुत सारी नई चीजें होंगी। उदाहरण के लिए- आम आदमी पार्टी ने तो अपने वोटर्स से बातचीत भी शुरू कर दी है। अपने पॉलिटिकल कैंपेन के लिए उन्होंने सभी प्रकार के माध्यमों को आधार बनाया है। चाहे प्रिंट हो, टीवी हो, रेडियो हो अथवा आउट ऑफ होम (OOH), वे सभी मोर्चों पर काफी आक्रामक रहे हैं। जब एडवर्टाइजिंग की बात होती है तो राजनीतिक दल कोई भी कसर नहीं छोड़ते हैं।’
विशेषज्ञों का कहना है कि आउटडोर, रेडियो, टीवी और प्रिंट में दिए जाने वाले विज्ञापन खर्च में वर्ष 2015 के मुकाबले 10 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है। इस बार के विज्ञापन खर्च के मामले में सोशल मीडिया गेम चेंजर साबित होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा सोशल मीडिया पर कुल विज्ञापन खर्च का 25 से 30 प्रतिशत खर्च किया जाएगा। एक मीडिया बायर के अनुसार, सोशल मीडिया पर विज्ञापन खर्च के मामले में राजनीतिक दल काफी उदार हैं और उन्होंने इस माध्यम के लिए अपने बजट में कम से कम 30 प्रतिशत की वृद्धि की है।
‘Posterscope India’ के डायरेक्टर फेबियन कोवान (Fabian Cowan) के अनुसार, विज्ञापन के लिहाज से पांच साल बहुत लंबा समय है और इस समय में तमाम चीजें काफी बदल चुकी हैं। आज के समय में ऑडियंस तक पहुंच बढ़ाने के लिए तमाम नए मीडिया प्लेटफॉर्म्स आ चुके हैं। ऐसे में इन सब के साथ मिलकर चलने की जरूरत होगी। इससे निश्चित रूप से विज्ञापन खर्च बढ़ेगा।
वहीं, ‘Vizeum’ के सीईओ हिमांक दास (Himanka Das) का कहना है कि जब राजनीतिक दलों द्वारा विज्ञापन खर्च में बढ़ोतरी की बात आती है तो यह सोशल मीडिया से भी प्रेरित होती है, जो कि कम्युनिकेशन का प्रमुख टूल बन चुकी है। खास बात यह है कि इसमें फीडबैक तुरंत मिल जाता है, जो राजनीतिक दलों के लिए सुविधाजनक होता है। हालांकि, कैंपेन के लिए अभी भी पारंपरिक मीडिया यानी ट्रेडिशनल मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसमें इन्वेंट्री नहीं बढ़ती है। उदाहरण के लिए, दिल्ली में आउट ऑफ होम अभी भी स्थिर बना हुआ है, फिर चाहे वह 2015 हो अथवा 2020। दूसरी तरफ सोशल मीडिया काफी आगे बढ़ रहा है और यह स्थिति न सिर्फ लोगों से ज्यादा बातचीत को लेकर है, बल्कि कंटेंट को लेकर भी है, जो लोगों का ध्यान खींच रहा है और राजनीतिक दलों के संदेश को उन तक पहुंचा रहा है।
इसके अलावा, यदि रेडियो की बात करें तो 2015 के चुनाव में जहां इसने काफी अहम भूमिका निभाई थी, आज भी उसने अपनी उतनी ही मौजूदगी दर्ज करा रखी है। इस बार यह आंकड़ा कम से कम 10 प्रतिशत ज्यादा है और दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी लीडर अरविंद केजरीवाल के रेडियो जिंगल्स को इस बार भी मिस करना मुश्किल है।
पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी के बारे में इंडिपेंडेंट पॉलिटिकल कम्युनिकेशंस कंसल्टेंट अनूप शर्मा का कहना है कि इस बार आरोप-प्रत्यारोप लगाने में भी विज्ञापन खर्च ज्यादा होगा। वर्ष 2015 की बात अलग थी, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी को अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करने की चुनौती होगी, वहीं बीजेपी विकास न होने का मुद्दा उठाकर जवाबी हमला करने का प्रयास करेगी।
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