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पतंजलि बनाम डाबर: च्यवनप्राश विज्ञापन विवाद अब दिल्ली हाई कोर्ट डिवीजन बेंच पहुंचा
पतंजलि आयुर्वेद (Patanjali Ayurved Ltd.) ने दिल्ली हाई कोर्ट की एकल पीठ के उस पहले आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया है
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago
पतंजलि आयुर्वेद (Patanjali Ayurved Ltd.) ने दिल्ली हाई कोर्ट की एकल पीठ के उस पहले आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें कंपनी को अपने पतंजलि स्पेशल च्वनप्राश (Patanjali Special Chyawanpras) विज्ञापनों के कुछ हिस्से प्रसारित करने से रोका गया था।
3 जुलाई को, दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने Dabur India Ltd. (Dabur Chyawanprash की निर्माता कंपनी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए विज्ञापनों में prima facie (प्रथम दृष्टया) उत्पाद की निंदा का मामला पाया। कोर्ट ने कहा कि बाबा रामदेव द्वारा सुनाए गए इन विज्ञापनों से यह प्रभाव बनता है कि केवल पतंजलि ही च्यवनप्राश बनाने के लिए आवश्यक आयुर्वेदिक या वैदिक ज्ञान रखता है।
न्यायाधीश ने रेखांकित किया कि च्यवनप्राश बनाने के लिए निर्माताओं के पास ऐसा ज्ञान होना कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। आदेश में पतंजलि को निर्देश दिया गया कि विज्ञापन प्रसारित करने से पहले कुछ पंक्तियों को हटाए या संशोधित करे, जिनमें शामिल थीं:
जब केवल 40 जड़ी-बूटियों से बना साधारण च्यवनप्राश मिलता है, तो उससे क्यों संतुष्ट हों?
जिन्हें आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान ही नहीं है … वे असली च्यवनप्राश कैसे बना पाएंगे?
तो फिर साधारण च्यवनप्राश क्यों?
इन संशोधनों के बाद कोर्ट ने कंपनी को अपना कैंपेन जारी रखने की अनुमति दे दी।
मामले का इतिहास
विवाद तब शुरू हुआ जब Dabur ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक वाणिज्यिक वाद (CS(COMM)1195/2024) दायर किया, यह आरोप लगाते हुए कि पतंजलि के च्यवनप्राश विज्ञापन उसके प्रमुख उत्पाद और पूरी श्रेणी की निंदा करते हैं। Dabur ने तर्क दिया कि इस अभियान से यह संकेत मिलता है कि अन्य निर्माता पारंपरिक तरीके से च्यवनप्राश बनाने के लिए आवश्यक ज्ञान या प्रामाणिकता नहीं रखते।
याचिका पर कार्यवाही करते हुए, जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने 3 जुलाई का अंतरिम आदेश पारित किया और पतंजलि को आपत्तिजनक पंक्तियां हटाने के निर्देश दिए।
हालांकि, पतंजलि का कहना था कि उसके विज्ञापनों में कहीं भी Dabur का नाम नहीं लिया गया है और अब कंपनी इसी तर्क पर अपील में जोर दे रही है। यह मामला डिवीजन बेंच- जस्टिस सी. हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला के समक्ष सुना जा रहा है।
मामले के केंद्र में प्रतिस्पर्धी विज्ञापन और निंदा के बीच संतुलन है। जहां एकल पीठ के आदेश ने इस संभावना को रेखांकित किया कि विज्ञापनों में प्रतिद्वंद्वियों को “ordinary” या “inauthentic” बताकर उपभोक्ताओं को गुमराह किया जा सकता है, वहीं अब अपील यह परखेगी कि ये प्रतिबंध कितने मजबूत हैं।
इस मामले के नतीजे पर FMCG कंपनियां और विज्ञापनदाता बारीकी से नजर रख रहे हैं, क्योंकि यह तय कर सकता है कि तुलनात्मक विज्ञापन में ब्रांड कितनी दूर तक जा सकते हैं, खासकर जब प्रामाणिकता और परंपरा को बिक्री के बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
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