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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, कैसे एक परिवार की जागीर बनकर रह गया है श्रीलंका

भारत के खूबसूरत पड़ोसी सिंहल द्वीप से आ रही खबरें चिंता में डालने वाली हैं। हिन्दुस्तान के साथ साझी विरासत बांटने वाले श्रीलंका की अनेक चिंताएं भी भारत के समान हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत के लिए चेतावनी हैं श्रीलंका के दुर्दिन

भारत के खूबसूरत पड़ोसी सिंहल द्वीप से आ रही खबरें चिंता में डालने वाली हैं। हिन्दुस्तान के साथ साझी विरासत बांटने वाले श्रीलंका की अनेक चिंताएं भी भारत के समान हैं। फर्क यह है कि भारत की अपनी आंतरिक चुनौतियों और चिंताओं के बीज इसी देश की जमीन में छिपे हैं। लेकिन श्रीलंका में ऐसा नहीं है। वहां एक तीसरे देश चीन ने आराम से रह रहे इस देश के सुखों में आग लगा दी है। 

भले ही तात्कालिक तौर पर श्रीलंका की बदहाली का कारण राजपक्षे - कुनबे की नीतियां दिखाई दे रही हैं, पर हकीकत यही है कि चीन की विस्तारवादी और अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए दूसरे देशों को ऋण-जाल में फांसने की नीति ने इन राष्ट्रों का कबाड़ा कर दिया है। आज श्रीलंका की तबाही के पीछे चीन के खतरनाक मंसूबे हैं। 

राजपक्षे खानदान ने उसके शिकंजे में उलझकर अपने देश को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। पड़ोसी होने के नाते भारत एक सीमित भूमिका ही निभा सकता है। अंतत: अपना घर तो श्रीलंका को ही ठीक करना होगा।

आज का श्रीलंका असल में एक परिवार की जागीर बनकर रह गया है। राजपक्षे परिवार के जो सदस्य हुकूमत संभाल रहे हैं, उनके बारे में जानेंगे तो दंग रह जाएंगे। गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति और महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री हैं। देश के गृह मंत्री सबसे बड़े भाई चमल राजपक्षे और उनका बेटा शाशेन्द्र राजपक्षे कृषि मंत्री हैं। छोटे भाई बासिल राजपक्षे वित्त मंत्नी हैं और नमल राजपक्षे खेल मंत्नालय संभाल रहे हैं। करीब सवा दो करोड़ की आबादी वाले इस देश की धरती में सरकार के लायक प्रतिभाओं का अकाल है। 

कम से कम राजपक्षे परिवार की सरकार में भागीदारी को देखकर तो यही लगता है। महिंदा राजपक्षे लिट्टे का विनाश करने के बाद देश में एक नायक की तरह उभरे थे, लेकिन आज वे खलनायक बन चुके हैं। आम आदमी से लेकर देश के जानकार तक यह मानते हैं कि वित्त और कृषि मंत्रालयों की दुर्दशा के लिए राजपक्षे बंधु ही जिम्मेदार हैं। मगर खुद महिंदा राजपक्षे भी इसके लिए कम दोषी नहीं हैं 

नाकारा मंत्रियों के कारण देश गड्ढे में जाता रहा। कोरोना काल में दोहरी मार पड़ी और इसके बाद चीन का कर्ज चुकाने में श्रीलंका बर्बाद हो गया।  

चीन के कर्ज जाल में उलझने की गाथा के लिए कुछ अतीत कथाएं जानना बेहतर होगा। लिट्टे का सफाया करने के बाद महिंदा राजपक्षे चीन की गोद में बैठ गए थे। उन्हें लगता था कि लिट्टे की जड़ें तमिलनाडु में हैं इसलिए भारत समर्थन नहीं देगा। इस बात में सच्चाई भी थी। चीन की मदद से लिट्टे का सफाया हुआ तो उपकृत राजपक्षे ने हंबनटोटा बंदरगाह चीन को सौंप दिया। 

महिंदा राजपक्षे अगला चुनाव लड़े तो चीन ने उनका पूरा चुनाव खर्च उठाया। लेकिन राजपक्षे हार गए। कभी उनके सहयोगी रहे मैत्रीपाला सिरिसेना राष्ट्रपति बन गए। चंद रोज बाद चीन के दबाव में सिरिसेना ने महिंदा राजपक्षे को फिर प्रधानमंत्री बना दिया। इसके बाद चुनाव में राष्ट्रपति भी राजपक्षे के भाई गोटबाया राजपक्षे बन गए। उपकृत श्रीलंका और चीन के रिश्तों में यह मधुरता कुछ समय पहले तक जारी रही और चीन की आक्रामक विदेश और आर्थिक नीति के शिकंजे में श्रीलंका उलझ गया। 

इसी बीच गलवान घाटी में चीन और भारत के बीच हिंसक संघर्ष हुआ, तो चीन का दबाव बढ़ा। नेपाल और पाकिस्तान खुल्लमखुल्ला भारत के खिलाफ बोलने लगे। लेकिन श्रीलंका ने ऐसा नहीं किया। वजह यह थी कि वह चारों ओर से पानी से घिरा है। यदि चीन उसे अपना अड्डा बनाना भी चाहे तो पहले उसकी नौसेना और वायुसेना को भारत के अधिकार क्षेत्र से गुजरना पड़ेगा। यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होगा। 

भारत की सीमाओं का उल्लंघन होने पर उसे श्रीलंका के खिलाफ कार्रवाई करने से कोई नहीं रोक सकता। यह चीन की मुश्किलें बढ़ा देता। वह अपने मित्र श्रीलंका की कोई सहायता चाह कर भी नहीं कर पाता। नेपाल और पाकिस्तान तो जमीनी तौर पर चीन से जुड़े हैं और वे अपने देश में चीनी सेना को आने की अनुमति दे सकते हैं, पर श्रीलंका कभी ऐसा नहीं कर सकेगा। संभवतया चीन ने अपनी यह मजबूरी समझते हुए बढ़े पैर खींच लिए थे।

श्रीलंका की विदेश नीति में बदलाव की यही वजह थी। उसे अहसास हुआ कि भारत जिस तरह आड़े वक्त पर उसके काम आ सकता है, वैसा चीन नहीं कर सकता। संभवतया इसीलिए श्रीलंका ने विदेश  नीति में बड़े यू टर्न का ऐलान किया। उसने कहा कि श्रीलंका सबसे पहले भारत की नीति अपनाएगा और उसके सामरिक सुरक्षा हितों की रक्षा करेगा। उसने खुलासा करते हुए कहा कि श्रीलंका ऐसा कुछ नहीं करेगा जो भारत की सुरक्षा के लिए हानिकारक हो। श्रीलंका कह सकता है कि बंदरगाह का इस्तेमाल चीन की फौज को नहीं करने दिया जाएगा। भारत उसके लिए सबसे पहले है। अन्य देश उसके बाद।  

इससे बौखलाए चीन ने श्रीलंका से उधारी चुकाने का दबाव बढ़ा दिया। चीन के साथ ऋण की शर्ते नितांत गोपनीय हैं। जानकारों का मानना है कि चीनी बैंकों में श्रीलंका का बहुत पैसा फंसा हुआ है। यह पैसा करीब-करीब डूब चुका है। चीन के ऐसा करते ही श्रीलंका बीते छह महीने में लड़खड़ा गया और दुर्दशा का शिकार हो गया। अब चीन के साथ श्रीलंका के रिश्ते सांप-छछूंदर जैसे हैं। न उसके साथ वह आगे जा सकता है और न पीछे हट सकता है। 

दुनिया ने देख लिया है कि श्रीलंका को ऋण जाल में फांसने वाला चीन इन दिनों उसकी मदद के नाम पर चुप्पी साधे बैठा है और हिन्दुस्तान अतीत के रिश्तों को निभाने की खातिर सहायता में कोई कमी नहीं छोड़ रहा है।

(साभार: लोकमत)


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