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जयंती विशेष: जब पत्रकार के निशाने पर आए मकबूल फिदा हुसैन

मकबूल फिदा हुसैन एक ऐसे कलाकार थे जिन्हें तारीफों के साथ-साथ आलोचनाएं भी झोली भरके मिली...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 

मकबूल फिदा हुसैन एक ऐसे कलाकार थे जिन्हें तारीफों के साथ-साथ आलोचनाएं भी झोली भरके मिली। वह चर्चित भी रहे, और विवादित भी। एक चित्रकार के तौर पर उनका कोई सानी नहीं था, इसीलिए उन्हें हिन्दुस्तान का पिकासो भी कहा जाता था। कहने वाले यहां तक कहते हैं कि हुसैन साहब की खींची हुईं रेखाएं बेजान कलाकृति में भी जान डाल देती थीं।

 17 सितम्बर, 1915 जन्मे हुसैन को एक कलाकार के तौर पर सबसे पहले 1940 के दौरान ख्याति मिली। 1952 में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी ज्युरिक में आयोजित की गई। इसके बाद उनकी कलाकृतियों की कई प्रदर्शनियों यूरोप और अमेरिका में स्थान मिला। हुसैन ने भले ही खाली कैनवास में रंग भरे, लेकिन फिल्मों की रंगीन दुनिया भी उन्हें बेहद प्रभावित करती थी। 1967 में उनकी बनाई पहली फिल्म को अंतरराष्ट्रीय पर्दे पर ख्याति मिली। ‘थ्रू द आइज ऑफ ए पेंटर’ को बर्लिन फिल्म महोत्सव में गोल्डन बीयर पुरस्कार से नवाजा गया था। उन्होंने माधुरी दीक्षित को लेकर फिल्म 'गजगामिनी' भी बनाई, हालांकि ये फिल्म उनकी पेंटिंग की तरह सुर्खियां नहीं बंटोर सकी।

हुसैन की कलाकृतियों में जहां नयापन होता था, वहीं हिंदू देवी-देवताओं के चित्रों को भी वह अपने हिसाब से कैनवास पर उकेरते रहते थे। इस वजह से उन्हें हिंदू संगठनों, आम लोगों के साथ-साथ मीडिया के एक वर्ग का भी विरोध झेलना पड़ा। उन्हें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की नग्न तस्वीरें बनाने के लिए कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था।

हुसैन ने 1970 में ये पेंटिंग तब बनाई थी और 'विचार मीमांसा' नामक पत्रिका ने साल 1996 में उसे छापा, जिसका शीर्षक था, मकबूल फिदा हुसैनः पेंटर या कसाई।

 2006 में, ‘इंडिया टुडे’ में ‘आर्ट फॉर मिशन कश्मीर’ एक विज्ञापन छपा था, जिसमें हुसैन की एक पेंटिंग बनी थी। इस पेटिंग में भारत के मानचित्र पर एक नग्न महिला बनी थी। महिला के पूरे जिस्म पर भारत के राज्यों के नाम थे। इसके बाद तो उनके खिलाफ हिंदूवादी संगठनों का गुस्सा भड़क गया था। हिंदू जागृत्ति समिति और विश्व हिंदू परिषद् (वीएचपी) ने इसे अश्लील करार देते हुए हुसैन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

इसी विषय पर उन्हें पत्रकार तेजपाल सिंह धामा के विरोध का भी सामना करना पड़ा था। मकबूल फिदा हुसैन ने एक पत्रकार वार्ता आयोजित की थी, जिसमें धामा भी मौजूद थे। धामा साहित्य और संस्कृति में विशेष रुचि रखते हैं। उन्हें कई साहित्यिक एवं सामाजिक पुरस्कारों से भी नवाजा गया है। उन्होंने हैदराबाद से प्रकाशित स्वतंत्र वार्ता, दिल्ली से प्रकाशित दैनिक विराट वैभव एवं दैनिक वीर अर्जुन के लिए लंबे समय तक काम किया है। उनकी कई किताबें भी बाजार में आ चुकी हैं। धामा ने पत्रकार वार्ता में हुसैन से उनकी भारत माता की विवादित पेंटिंग को लेकर सवाल जवाब किए और बात इससे कहीं ज्यादा बढ़ गई। अश्लील पेंटिंग के विरोध में हुसैन के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों से आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे और कोर्ट में हाजिर नहीं होने के चलते उनके खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी हुए। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हुसैन पर लगे आरोपों को यह कहकर खारिज कर दिया था कि पेंटिंग एक कलाकृति मात्र है। 

अपने घर पर हुए हमले, लगातार मिल रहीं धमकियों और आलोचनाओं के बीच 2006 में हुसैन भारत छोड़कर लंदन चले गए थे। 2010 में उन्हें कतर की नागरिकता मिल गई और वो वहीं बस गए। 9 जून 2011 को लंदन में उनका निधन हो गया। मकबूल फिदा हुसैन को 1973 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था, और 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया था। 1991 में उन्हें पद्म विभूषण से भी नवाजा गया था। 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया था। क्रिस्टीज ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमेरिकी डॉलर में बिकी थी, इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए थे। 

 


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