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मीडिया की भी बनानी चाहिए चेकलिस्ट...

हमें कुछ मुद्दों की असलयित को समझना है। अकसर जब हम सिर्फ एक ही कोण...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

पी.के. खुराना

वरिष्ठ पत्रकार ।।

मीडिया की चेकलिस्ट

हमें कुछ मुद्दों की असलयित को समझना है। अकसर जब हम सिर्फ एक ही कोण से चीजें देखते हैं तो हमारा विश्लेषण अधूरा रह जाता है। गुजरात में सरदार पटेल की मूर्ति को लेकर चल रहा विवाद नया नहीं है, लेकिन क्या हम इसके हर पक्ष को देख पा रहे हैं? क्या मीडिया में कार्यरत हमारे साथी इसे समग्रता में देख पा रहे हैं या हमें कुछ और गहराई में जाने की आवश्यकता है?

सरदार पटेल की मूर्ति पर कुछ और चर्चा से पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य को समझना आवश्यक है। भारतीय मूल के अमेरिकी सर्जन डॉ. अतुल गवांडे की पुस्तक ‘द चेकलिस्ट मेनिफेस्टो’ में चेकलिस्ट की महत्ता को विस्तार से रेखांकित किया गया है। किसी भी काम में गलतियों से बचने के लिए चेकलिस्ट एक बहुत साधारण दिखने वाला असाधारण कदम है। वस्तुत: यह इतना साधारण नज़र आता है कि हम अकसर इसकी महत्ता की उपेक्षा कर देते हैं। यह सच है कि अकसर डॉक्टरों पर काम का बहुत बोझ होता है और जटिल ऑपरेशनों में उन्हें तुरंत-फुंरत निर्णय लेना होता है। दबाव की उन स्थितियों में भूल हो जाना या गलती हो जाना आम बात है। लेकिन एक छोटी-सी भूल अथवा गलती किसी रोगी की जान ले सकती है। इंसान के रूप में हम गलतियों के पुतले हैं, अत: गलतियों की रोकथाम हमारे लिए सदैव से एक बड़ी चुनौती रही है। डॉ. गवांडे का कहना है कि वे इस बात में रुचि ले रहे थे कि लोग असफल क्यों होते हैं, समाज का पतन क्यों होता है, और इसकी रोकथाम कैसे की जा सकती है। 

‘द चेकलिस्ट मेनिफेस्टो’ पूर्ण विस्तार से बताती है कि यदि डॉक्टर लोग काम की पूर्णता और शुद्धता, यानी, ‘कॉग्नीटिव नेट’ का पालन करते हुए जटिल ऑपरेशनों से पहले चेकलिस्ट बना लें तो केवल स्मरणशक्ति पर निर्भर रहने के कारण होने वाली भूलों से बचा जा सकता है और कई कीमती जानें बचाई जा सकती हैं। उनके इस विचार को विश्व के आठ अलग-अलग अस्पतालों में टेस्ट किया गया और यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया कि उन अस्पतालों में ऑपरेशन के बाद की मृत्यु दर में 50 प्रतिशत तक की कमी आ गई। पचास प्रतिशत! यह एक दुखदायी परंतु कड़वा सच है कि अस्पतालों में होने वाली मौतों का 50 प्रतिशत डॉक्टरों की छोटी-छोटी भूलों और गलतियों से होता है और इन गलतियों अथवा भूलों की रोकथाम करके बहुत से रोगियों की जानें बचाई जा सकती हैं।

डॉ. गवांडे ने दो और महत्वपूर्ण बातें कही हैं। अमेरिका के कनेक्टिकट में स्थित हार्टफोर्ड अस्पताल में लगभग 50 वर्ष पूर्व लगी एक आग के बाद लोगों ने डॉक्टरों अथवा अस्पताल प्रबंधन पर दोष मढ़ने के बजाए बार-बार आग लगने के कारणों का पता लगाने का प्रयत्न किया तो अस्पताल में प्रयुक्त पेंट और सीलिंग की टाइलें अग्निरोधक नहीं थे और आग लगने की अवस्था में लोगों को बाहर निकालने की प्रक्रिया भी दोषपूर्ण थी। इन परिणामों के बाद एक विस्तृत चेकलिस्ट बनी और अमेरिका में अस्पतालों के भवन निर्माण के नियमों में आवश्यक परिवर्तन किये गये। दूसरी, और उससे भी कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि गलतियों की रोकथाम न की जाए तो समय बीतने के साथ-साथ हम जीवन में गलतियों और भूलों को जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार करना आरंभ कर देते हैं। किसी कोर्स की पुस्तक संभावित गलतियों का जि़क्र नहीं करती, कोई अध्यापक किसी कक्षा में गलतियों से बचने के तरीकों पर बात नहीं करता, और यहां तक कि जानलेवा गलतियां भी सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। चेकलिस्ट की सहायता से हम उन गलतियों से बच सकते हैं। डॉ. गवांडे के इस अनुभव में मैं सिर्फ इतना जोड़ना चाहूंगा कि जीवन के हर क्षेत्र में चेकलिस्ट का महत्व है। नौकरी में, व्यवसाय में, प्रशासन में, यात्रा में, हर जगह चेकलिस्ट का महत्व है और यदि हम इस छोटी-सी सावधानी का ध्यान रखें तो हम बहुत सी अनावश्यक गलतियों और असफलताओं से बच सकते हैं।

आइये, अब मुद्दे की बात करते हैं। सरदार पटेल की मूर्ति के उद्घाटन के बात वहां पर्यटकों का तांता लग गया। इस परिसर में निजी वाहनों को सीधे प्रवेश नहीं मिलता और परिसर के बाहर पार्किंग की कोई सुविधा नहीं है, वाहनों और पैदल पर्यटकों के लिए अलग मार्ग नहीं हैं, प्रतीक्षालय नहीं है, लोगों को तीन-तीन घंटे लाइनों में इंतजार करना पड़ा और अंदर पहुंचते ही उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि कहीं बैठ जाओ, थोड़ा सुस्ताओ, खा-पी लो और फिर आगे बढ़ो। यह दृश्य पूरी तरह से किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म जैसा था। बिलकुल नहीं सोचा गया कि यहां पहुंचना कितना कठिन या आसान है? क्या हम अपनी जनसंख्या विस्फोट को दोष दें, या फिर प्रशासन को दोष दें जिसने विश्व रिकार्ड बनाने वाली मूर्ति बनाते समय पर्यटकों के लिए आधारभूत सुविधाओं का भी ध्यान नहीं रखा। यह ध्यान देने की बात है कि 182 मीटर ऊंची सरदार पटेल की यह मूर्ति विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है।

स्वाभाविक है कि देश-विदेश के पर्यटकों की रुचि इसे देखने में होगी। विश्व रिकार्ड बनाने वाली एक कलाकृति के साथ हम कैसी आयोजना कर रहे हैं? विदेशों से आने वाले पर्यटकों को हम क्या संदेश देना चाहते हैं? यहां आने वाले पर्यटकों के लिए हमारे दिल में कितना सम्मान है? हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद बना यह स्मारक हमें क्या संदेश देता है? क्या हम सिर्फ इस मुद्दे पर अटके रहें कि इस पर लगा पैसा कितने सालों में वापिस आयेगा, या यह भी देखें कि आने वाले पर्यटकों के कारण इस वंचित क्षेत्र में कितने स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलेगा? लब्बोलुबाब यह कि प्रशासन की अपनी चेकलिस्ट होनी चाहिए थी और मीडिया की अपनी। मूर्ति की स्थापना के अतिरिक्त प्रशासन को यह देखना आवश्यक था कि पर्यटकों को यहां तक पहुंचना आसान कैसे बनाया जाए, यहां पहुंच जाने के बाद उन्हें एक अविस्मरणीय अनुभव देने के लिए क्या किया जाए?

यह सच है कि चुनाव में जीत की इच्छा से स्थापित की गई इस मूर्ति को लेकर उठने वाले सवाल वाजिब हैं। इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा घोषित योजनाओं ‘प्रधानमंत्री मुद्रा योजना’, ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते योजना’, ‘अमृत योजना’, ‘हृदय योजना’, ‘नैशनल बाल स्वच्छता मिशन’, ‘प्रकाश पथ’ आदि में से आपने किसका नाम सुना है? प्रधानमंत्री ने हर सांसद को कुछ गांव ‘गोद’ लेने की सलाह दी। खुद उन्होंने सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी के चार गांवों जयापुर, नागपुर, ककरहिया और डोमरी को गोद लिया था। इसका अर्थ है कि विकास के मामले में इन गांवों का विशेष ध्यान रखा जाएगा लेकिन साढ़े चार वर्ष बीत जाने पर भी प्रधानमंत्री की सांसद निधि से इन गांवों के विकास के लिए एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया था। यह सूचना इसी वर्ष जून में एक आरटीआई के माध्यम से प्राप्त हुई है। यह अलग बात है कि अब चूंकि चुनाव की आहट सामने है इसलिए प्रधानमंत्री हजारों करोड़ की योजनाओं की घोषणा कर डालेंगे जिन्हें 2022 तक भी पूरा न किया जा सके!

प्रशासन की चेकलिस्ट की ही तरह मीडिया की चेकलिस्ट भी होनी चाहिए थी जिसमें यह सवाल भी आना चाहिए था कि मूर्ति तो अब लग ही गई है, खर्च जो होना था, हो ही चुका है, इस पर जो बहस होनी थी वह तो तभी शुरू हो गई थी जब मूर्ति की स्थापना की घोषणा की थी, अब मूर्ति लगने के बाद के मुद्दे क्या हैं? क्या मीडियाकर्मियों ने मूर्ति स्थल पर पहुंच कर यात्रियों से बात की? वहां पहुंचने वाले पर्यटकों के अनुभव को जानने समझने की कोशिश की? इस मुद्दे पर चर्चा से पहले आम जनता से उनके सवालों को समझने का प्रयास किया? प्रधानमंत्री जब अपने ‘मन की बात’ कहते हैं तो वे आम जनता से सुझाव मांगते हैं। किसी भी मुद्दे पर चर्चा से पूर्व सवालों और सुझावों के लिए ‘क्राउड सोर्सिंग’ का यह तरीका मीडिया भी अपनाता रहा है। यदि मीडियाकर्मी भी चेकलिस्ट बनाने की आदत डाल लें तो महत्वपूर्ण मुद्दों पर समग्रता में चर्चा करना सुनिश्चित हो जाएगा। यह एक अनिवार्य आवश्यकता है और इसका लाभ उठाया जाना चाहिए।   


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