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सब इंतज़ार में हैं...देखते हैं सरकार किस चैनल की बनती है!
घर से बाहर निकल के तो चुनाव वाला फील आ नहीं रहा। हां, चैनलों पर...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
प्रमिला दीक्षित
वरिष्ठ पत्रकार।।
घर से बाहर निकल के तो चुनाव वाला फील आ नहीं रहा। हां, चैनलों पर चुनाव प्रचार ने गति पकड़ ली है। मोर्चे बांट भी लिए गए हैं और साध भी लिए गए हैं। एक राज्य में रैली करके आप जितनी जनता को संबोधित कर सकते हैं, उससे बड़ा प्लेटफॉर्म तो चैनल हैं ही!
अगर मुझे ठीक से याद है तो परसाईं जी के एक व्यंग्य में कहा गया है-इंटरव्यू दो तरह के होते हैं, एक जब नौकरी को आवेदक की ज़रूरत हो, दूसरा जब खास आवेदक को नौकरी की ज़रूरत हो। तो कोई चैनल अपनी-अपनी कैटेगरी के हिसाब से नेताओं को चेकोस्लोवाकिया की स्पैलिंग पूछकर नेस्तनाबूद कर दे रहे थे तो कोई नाश्ते में क्या पसंद है, पूछकर गदगद हुए जा रहा था।
देश, मुल्क, वतन, राष्ट्र, भारत अब इन शब्दों पर चैनलों की होड़ है और ख़बरों के व्यापार में, बाज़ार में लगभग सबको डपटता हुआ, जब एक 'दूध का धुला चैनल' आया तो वो भी मोदी मोह या टीआरपी मोह को न त्याग सका। ये अलग बात है कि इसी चैनल ने प्रोमो में मीडिया को लेकर जितने भी बुरे भाव या चेहरे दिखाए, सुनते हैं कि टीवी की दुनिया में उन सब हरकतों के प्रणेता, उसके सूत्रधार, इस चैनल के चलाने वाले लोग ही रहे हैं। ख़ैर, जब केजरीवाल राजनीति को बुरा बताकर,राजनीति में आकर, राजनीति कर सकते हैं तो चैनल भी क्यूं नहीं बाक़ी चैनलों को बुरा बताकर, नया चैनल लाकर, ख़बरों का कारोबार कर सकते?
कांग्रेस के मैनीफैस्टो को ‘रिपब्लिक भारत’ ने बिना निष्कर्ष खुलकर कांग्रेस का एक और झूठ घोषित कर दिया। ‘रिपब्लिक भारत’ ने मैनीफैस्टो को झूठ बताया तो ‘ज़ी न्यूज’ ने दो-एक से लीड लेते हुए इसे पाकिस्तान का घोषणा पत्र करार दिया। क्योंकि भारत मां के इन दो सपूत चैनलों में होड़ है खुद को मां का सबसे राष्ट्रवादी बेटा साबित करने की।
‘एनडीटीवी’ की ख़ास बात ये है कि जब न्यूज़ चैनल देखकर आपको लगने लगता है कि दुनिया दो फाड़ हो चुकी है, अब पतन निश्चित है। या तो युद्ध होगा या आत्मसमर्पण, तब ‘एनडीटीवी’ देखकर आपको समझ आता है दुनिया एक सतत गति से ही चल रही है। होने दो हो हल्ला, किसी भी मसले को लेकर ज्यादा भावुक होने की ज़रूरत नहीं है, रात नौ बजे के प्राइम टाइम से पहले।
नेता चैनल पर चीख-चीखकर कह रहे हैं, जनता मन बना चुकी है, लेकिन अलग-अलग चैनल आए दिन अलग-अलग ओपिनियन पोल भी दिखा रहे हैं। शिखर, मुखर, प्रखर, जबर सम्मेलनों की बाढ़ आई है। जनता ओपिनियन पोल से कन्फ्यूज है, कहां जाना है? नेता सम्मेलनों से कन्फ्यूज़ हैं, कहां जाना है?
‘इंडिया टीवी’ पर रजत शर्मा ने मोर्चा संभाल रखा है तो ‘ज़ी’ पर सुधीर चौधरी अपनी फौज के साथ खुद डटे हुए हैं। ‘जी’ और ‘इंडिया टीवी’ सबको घर में लाओ के सिद्धांत पर चल रहे हैं तो ‘आजतक’ कह रहा है चुनाव हैं, खुद ही दसों दिशाओं में बिखर जाओ। ‘आजतक’ का हर एंकर उत्तराखंड से अहमदाबाद तक सड़कों पर उतरा हुआ है। हालांकि, नए चैनलों के नए आइडियाज़ नए ज़ोश के मुकाबले ‘आजतक’ अपने ठेठ खबरिया अंदाज़ पर टिका है, लेकिन परिवर्तन संसार का नियम ही नहीं, समय की दरकार भी होता है। ‘आजतक’ की ये ढर्रे वाली कवरेज कभी कभी उकताती है।
तेजी से आगे बढ़ रहा ‘रिपब्लिक भारत’ कहता है कि चुनाव का नंबर वन चैनल रिपब्लिक भारत .तो ‘ज़ी’ इस एक गोली पर दस तोपें दागता है। 2019 चुनाव मतलब ज़ी न्यूज़, क्योंकि हम देश के लिए एजेंडा चलाते हैं, क्योंकि हम देश के लिए पक्षपात करते हैं, क्योंकि हम सोच राष्ट्रीय रखते हैं आदि आदि...
तू डाल डाल, मैं पात पात वाली इस लड़ाई में वो रैलियों वाला स्लोगन बड़ा याद आता है ‘जो हिंदू हित की बात करेगा वही देश में राज करेगा’। यकीन मानिए, लोग भी कभी-कभी नेताओं की बहस से ज्यादा मज़े चैनलों के इस आपसी दंगल के लेते हैं। और वो भी इंतज़ार में हैं...। देखते हैं सरकार किस चैनल की बनती है!
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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