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'महज कुर्सी बदलते अफसरों को अब यह बात आएगी समझ'

व्यवस्था में बदलाव की दिशा में जब भी कदम उठाए जाते हैं, तो विरोध के स्वर सामने आने लगते हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

पूरन डावर

प्रखर चिंतक एवं विश्लेषक ।।

यूपीएससी: इस फैसले में आशंकाओं से ज्यादा संभावनाएं हैं 

व्यवस्था में बदलाव की दिशा में जब भी कदम उठाए जाते हैं, तो विरोध के स्वर सामने आने लगते हैं। जैसा कि फिलहाल मोदी सरकार के एक फैसले को लेकर हो रहा है। सरकार प्रशासनिक व्यवस्था में अब तक की सबसे बड़ी सर्जरी करने जा रही है, जिसके तहत केंद्रीय लोकसेवा आयोग यानी यूपीएससी पास किए बिना ही योग्य लोगों को बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। इस बदलाव के बाद न सिर्फ सरकारी, बल्कि निजी कंपनियों में काम करने वाले भी मंत्रालय के अहम पदों पर बैठ सकेंगे।

सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने इस संबंध में एक नोटिफिकेशन भी जारी किया है, जिसमें संयुक्त सचिव पद पर नियुक्ति की बात कही गई है और इस नई चयन प्रक्रिया को 'लैटरल एंट्री' नाम दिया गया है। 

अब इस फैसले का विरोध शुरू हो गया है। ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि सरकार संभवत: अपने कदम पीछे खींच ले, वैसे भी चुनावी साल में सरकार के फैसले आगे-पीछे होते रहते हैं। विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि यह पूरी तरह निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कवायद है। अब ऐसे फैसलों पर राजनीति न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। 

कांग्रेस ने तुरंत अपनी प्रतिक्रिया में सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए हैं। उसने पूछा है कि क्या लैटरल एंट्री के नाम पर मोदी सरकार उच्च पदों पर संघ के लोगों और करीबियों को भरने की तैयारी में हैं? विरोधियों का एक तर्क यह भी है कि चूंकि उम्मीदवारों के पास सरकारी व्यवस्था और कार्यप्रणाली की प्रत्यक्ष समझ नहीं होगी, इसलिए उनके फैसले हित को अहित में परिवर्तित कर सकते हैं। उन्हें यह भी आशंका है कि इस तरह की नियुक्ति से विदेशी कंपनियों को फायदा मिल सकता है, क्योंकि उनके अपने अब सरकार में बैठकर काम करने की स्थिति में आ जाएंगे। लिहाजा संभव है कि वो कंपनी के हित के लिए सरकारी नीतियों में बदलाव करें या फिर नई नीतियां विकसित करें। 

ये आशंका पूरी तरह गलत है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। सरकार जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर ऐसे लोगों को नियुक्त करेगी जो निजी क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं। लिहाजा यह मान लेना कि सरकार से जुड़ने के बाद उनका अपनी मूल कंपनी के प्रति मोह, लगाव एकदम से खत्म हो जाएगा, मुश्किल है। जब उच्च पदों पर बैठे सरकारी अधिकारी निजी कंपनियों के मोह से खुद को बचाए नहीं रख पाते तो उन्हें कैसे रोका जा सकता है, जो निजी कंपनियों से ही यहां आ रहे हैं। लेकिन आशंका के साथ-साथ यहां सम्भावना भी है। सम्भावना है बेहतर कार्यप्रणाली की। सरकारी और निजी क्षेत्र में कार्यप्रणाली का ही मुख्य अंतर होता है। लिहाजा यदि निजी क्षेत्र के धुरंधर सरकार से जुड़ेंगे, तो काम की रफ्तार तो तेज होगी ही, उसकी गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। 

यह एक तरह से प्रोफेशनलिज्म को बढ़ावा देने वाला कदम है, जहां नागरिकों को उनकी क्षमता के आधार पर मौका दिया जाएगा। इससे एक तरह से सरकारी महकमों में काम को लेकर प्रतिस्पर्धा निर्मित होगी, क्योंकि पारंपरिक प्रणाली से चुनकर प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बने अधिकारी यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे कि उनका अनुभव और कामकाज निजी क्षेत्र से आने वालों से बेहतर है। यानी काम की रफ्तार खुद ब खुद तेज हो जाएगी। इसके अलावा अब तक महज कुर्सी बदलते आ रहे अफसरों को भी यह समझ आ जाएगा कि अब उन्हें काम करके दिखाना होगा, यदि वह सरकारी ढर्रे को ढाल बनाकर बैठे रहेंगे तो उनका जाना तय है। कुल मिलकर कहा जाए तो इस फैसले में आशंकाओं से ज्यादा संभावनाएं हैं और संभावनाओं के बल पर भी भविष्य का निर्माण होता है।

 


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