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'मिस्टर मीडिया': हादसे सिर्फ़ कवरेज नहीं होते

भीषण दुर्घटना। अमृतसर के लिए नहीं,पंजाब के लिए नहीं,समूचे देश के लिए...

राजेश बादल 7 years ago

राजेश बादल 

वरिष्ठ पत्रकार ।। 

भीषण दुर्घटना। अमृतसर के लिए नहीं,पंजाब के लिए नहीं,समूचे देश के लिए। एक धार्मिक जलसे के श्रद्धालु खड़े-खड़े कट जाते हैं। घरों में हाहाकार मचा हुआ है। कवरेज करने गया हर पत्रकार हिल गया। लेकिन स्क्रीन को देखकर नहीं लगा कि इस शर्मनाक हादसे की ख़बर पूरी परिपक्वता से दिखाई गई। मीडिया के अन्य अवतारों में भी ज़िम्मेदारी का अहसास कुछ कमतर नज़र आया।  

लाशें,कटे हुए अंग, बिखरा ख़ून और धाड़ें मारकर रोते लोग। कई चैनलों ने तस्वीरों को ब्लर करने की अक्लमंदी दिखाई,लेकिन कुछ तो सब कुछ दिखा रहे थे। एकदम साफ। बिना सोचे कि बच्चों पर इनका भी असर पड़ता है। डरावनी फ़िल्म सा एक एक दृश्य बाल मन पर अंकित हो जाता है। वे रात में सो नहीं पाते। चौंक कर उठ जाते हैं। अरसे तक अवचेतन में बच्चों पर इसका असर बना रहता है। अनेक बार उन्हें मनो चिकित्सक के पास ले जाने की नौबत आ जाती है। 

हम बच्चों और किशोरों को हॉरर मूवीज़ दिखाने से क्यों परहेज़ करते हैं? इसी वजह से न? लेकिन टीवी के परदे का आप क्या करेंगे,जो आपके परिवार के एक सदस्य की तरह घर में है। जब भी कोई जघन्य हादसा होता है तो हर इंसान उसके बारे में सब कुछ जान लेना चाहता है। दुनिया इतनी सिमट गई है कि आशंका जगती है। दुर्घटना में कहीं कोई रिश्तेदार तो नहीं था? इस कारण टीवी घरों में बंद नहीं होता। नन्हें दर्शक इसका शिकार बन जाते हैं। खुद मीडियाकर्मियों के घरों में भी यही होता है। टीवी के बाल दर्शकों के प्रति घोर अन्याय। बच्चे बेचारे कहां जाएं?कुछ वैसा ही हाल कि मिलावटी दवा बनाने वाले के घर में भी वही मिलावटी और ज़हरीली दवा बीमार को दे दी जाए। 

हम कहते हैं- संसार की सबसे बड़ी और तेज़ भागती मीडिया इंडस्ट्री भारत में है। पर क्या हम ज़िम्मेदार भी हैं?नहीं! हम ज़िम्मेदारी का सुबूत नहीं दे रहे हैं। अमृतसर ही नहीं,कमोबेश हर दुर्घटना में ऐसा ही होता है। यूरोप और पश्चिम के देशों में आप किसी चैनल में इतनी ग़ैर ज़िम्मेदारी नहीं पाएंगे, लाशें दिखाना तो छोड़ दीजिए,ख़ून की एक बूंद भी परदे पर नज़र नहीं आती। हमारे यहां ख़ून दिखाने के लिए नाट्य रूपांतर हो जाता है। इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है?सवा सौ करोड़ वाले मुल्क़ में माध्यमों की यह स्थिति निश्चित ही हमारे सामाजिक व्यवहार और समझ पर सवाल खड़े करती है।  

अजीब सी बात है कि भारत के सबसे भीषणतम रेल हादसों में शामिल  इस  दुर्घटना पर हमारे माध्यम एक सप्ताह में ही ख़ामोश हो गए। फॉलोअप कथाएं नदारद। मरने वालों का सही आंकड़ा क्या?पता नहीं। दोषी कौन?पता नहीं। रेल विभाग की ग़लती क्या?पता नहीं। राज्य सरकार की ग़लती क्या? पता नहीं। ज़िला प्रशासन की चूक क्या? पता नहीं। आयोजक की ज़िम्मेदारी क्या? पता नहीं। मुआवज़ा घर पहुंचा क्या? पता नहीं। 

क्या हुआ है हमारे मीडिया को?इस सामूहिक हत्याकांड पर सब एकदम ख़ामोश हो गए। ख़बर की तासीर समझने में चूक हुई। खोजी पत्रकारिता को झपकी लग गई। प्रोफेशनल अप्रोच की परिभाषा यह तो नहीं। एक बार संवेदनहीन हो जाएं मगर पत्रकारिता का अपना भी एक धर्म होता है। वह धर्म कहां गया मिस्टर मीडिया?

 


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