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अमेरिका का रुख क्यों बदल रहा है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

हालांकि, इन सबके बीच भारत और अमेरिका को ट्रेड डील करनी होगी, जो आसान नहीं है। मामला सिर्फ़ रूसी तेल का नहीं है। भारत ख़रीद कम या ज़्यादा कर सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

भारत और अमेरिका के रिश्तों पर जमी बर्फ कुछ पिघलने लगी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक महीने पहले तक भारत को Dead Economy कह रहे थे, लेकिन अब वे पोस्ट कर रहे हैं कि मोदी मेरे दोस्त हैं और डील में कोई दिक़्क़त नहीं होगी। भारत के कॉमर्स मंत्री पीयूष गोयल भी कह रहे हैं कि नवंबर तक डील हो सकती है। अब सवाल यह है कि अमेरिका का रुख क्यों बदल रहा है?

अमेरिका ने भारत से आने वाले सामान पर 50% टैरिफ़ लगाया हुआ है। इसमें 25% टैरिफ़ Reciprocal है यानी भारत के ज़्यादा टैरिफ़ के जवाब में लगाया गया है, जबकि 25% अतिरिक्त टैरिफ़ रूस से तेल ख़रीदने की वजह से है। भारत इस दबाव में नहीं आया बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन और रूस के राष्ट्रपति से मुलाकात कर अमेरिका को सख्त संदेश दिया।

टैरिफ़ का असर अब अमेरिका पर ही उल्टा पड़ने लगा है। पिछले हफ़्ते दो आंकड़े जारी हुए। अमेरिका में महंगाई दर बढ़कर 2.9% तक पहुंच गई है। कंपनियों ने दूसरे देशों से आने वाले सामान की ऊंची क़ीमत ग्राहकों पर डालनी शुरू कर दी है। कॉफी से लेकर कार तक की क़ीमतें बढ़ रही हैं। वहीं बेरोज़गारी भी बढ़ रही है और नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं। अगस्त में सिर्फ़ 22 हज़ार नौकरियां आईं। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से नई नौकरियों की संख्या लगातार कम हो रही है। कंपनियों ने टैरिफ़ के चलते नौकरी देने से हाथ खींच लिए हैं।

महंगाई और बेरोज़गारी की दोहरी मार ने फेड रिजर्व को भी दुविधा में डाल दिया है। बढ़ती बेरोज़गारी की वजह से फेड रिजर्व ब्याज दरों में कटौती करना चाहता है, लेकिन महंगाई को देखते हुए उसे सावधानी रखनी होगी क्योंकि कटौती से महंगाई और बढ़ सकती है। इस हफ़्ते फेड रिजर्व की बैठक में ब्याज दरों पर फ़ैसला होना है। ब्याज दरों में कटौती भारत के शेयर बाज़ार के लिए अच्छी ख़बर होगी क्योंकि ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशक आम तौर पर भारत जैसे उभरते बाजारों की ओर रुख करते हैं, जहां रिटर्न बेहतर होता है।

हालांकि, इन सबके बीच भारत और अमेरिका को ट्रेड डील करनी होगी, जो आसान नहीं है। मामला सिर्फ़ रूसी तेल का नहीं है। भारत ख़रीद कम या ज़्यादा कर सकता है, लेकिन अमेरिका कृषि और डेयरी उत्पाद भारत में बेचना चाहता है, जो भारत में किसी भी पार्टी की सरकार के लिए मानना मुश्किल है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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