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यूनिफार्म सिविल कोड राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य में मदद करेगी: सुधीर झा

समान नागरिक संहिता के निर्माण और उसे लागू करने को लेकर केंद्र सरकार धीरे धीरे आगे बढ़ना चाहती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

सुधीर झा (राजनीतिक विश्लेषक)

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान समेत कुछ विधानसभा चुनावों के आते ही देश में यूनिफार्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर से चर्चा में है। इसी सप्ताह मध्य प्रदेश में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका पुरजोर समर्थन करते हुए यह संकेत दिया कि केंद्र सरकार इस मामले को सुलझाने में जुट चुकी है। साथ ही 22वें विधि आयोग ने इस विषय की फिर से जांच करने पर सहमति दी है, जिससे यह मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है।

समान नागरिक संहिता के निर्माण और उसे लागू करने को लेकर केंद्र सरकार धीरे धीरे आगे बढ़ना चाहती है। इसी के तहत उसने संबंधित आयोग के माध्यम से जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक निकायों से राय और सिफारिशें मांगना शुरू कर दिया है। वस्तुत: उत्तराखंड के पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में समान नागरिक संहिता को लागू करने का वादा किया था और दोबारा सत्ता में वापसी की थी। हाल ही में गुजरात की भाजपा सरकार ने भी इसे लागू करने के लिए हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुवाई में एक समिति बनाने का फैसला लिया है। उत्तर प्रदेश और असम के मुख्यमंत्री भी इसे लागू किए जाने की बात दोहरा चुके हैं।

कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण और देश में यूनिफार्म सिविल कोड लागू करना, ये तीन मुद्दे हमेशा से संघ के एजेंडे में रहे हैं और इन्हें भाजपा ने लोकसभा चुनावों के अपने घोषणा-पत्र में शामिल भी किया है। यह 1998 के चुनावों के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भी भाजपा के प्रमुख चुनावी मुद्दों में से एक था। भाजपा के 2019 लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में भी ये मुद्दे शामिल थे। मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में पहले के दो वादों को पूरा कर चुकी है और अब केवल यूनिफार्म सिविल कोड ही बचा है। यह तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा इसे बड़ा मुद्दा बनाएगी और इससे हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होगा। यूनिफार्म सिविल कोड पर मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को शुरू से ही आपत्ति रही है। उनका मानना है कि यह सभी धर्मों पर हिंदू कानून को थोपने जैसा है और इससे मुसलमानों के अधिकारों का हनन होगा। वैसे ट्रिपल तलाक के बाद से ही भाजपा इसे मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में महत्वपूर्ण कदम मान रही है।

समान नागरिक संहिता का प्रविधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत है। इसके तहत कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होंगे, चाहे उनका धर्म, लिंग, जाति आदि कुछ भी हो। शादी से लेकर तलाक, संपत्ति के बंटवारे और बच्चा गोद लेने जैसे मामले में सभी नागरिकों के लिए नियम-कानून एक समान होंगे। चूंकि ये अनुच्छेद राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत आते हैं, इसलिए ये अनिवार्य नहीं हैं। देश में फिलहाल, विभिन्न समुदायों के पर्सनल ला काफी हद तक उनके धर्म और धर्मग्रंथों पर आधारित हैं। हिंदू पर्सनल ला वेदों, स्मृतियों और उपनिषदों जैसे प्राचीन ग्रंथों और न्याय, समानता, विवेक आदि की आधुनिक अवधारणाओं पर आधारित है, जबकि मुस्लिम पर्सनल ला मुख्य रूप से कुरान पर आधारित है। इसी तरह, ईसाई पर्सनल ला, बाइबिल, परंपराओं, तर्क और अनुभव पर आधारित है।

उदाहरण के लिए, भारत में महिलाओं के विरासत संबंधी अधिकार उनके धर्म के आधार पर अलग-अलग हैं। वर्ष 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत हिंदू महिलाओं को अपने माता-पिता से संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार हिंदू पुरुषों के समान ही है। विवाहित और अविवाहित बेटियों के अधिकार समान हैं और महिलाओं को पैतृक संपत्ति विभाजन के लिए संयुक्त कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी गई है। वहीं, मुस्लिम पर्सनल ला द्वारा शासित मुस्लिम महिलाएं अपने पति की संपत्ति में हिस्सा पाने की हकदार हैं। ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों के लिए 1925 का भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू होता है। ईसाई महिलाओं को बच्चों या अन्य रिश्तेदारों के हिसाब से पूर्व निर्धारित हिस्सा मिलता है।

वर्ष 1985 में शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'संसद को एक सामान्य नागरिक संहिता की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसा साधन है जो राष्ट्रीय सद्भाव और कानून के समक्ष समानता की सुविधा देता है।' वर्ष 1995 में सरला मुद्गल मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से अनुच्छेद 44 की फिर से समीक्षा करने का अनुरोध किया था, जिसका लक्ष्य पूरे भारत में यूसीसी स्थापित करना था। हालांकि अहमदाबाद महिला एक्शन ग्रुप केस (1997) और लिली थामस केस (2000) में बाद के आदेशों ने स्पष्ट किया कि अदालत ने सरला मुद्गल मामले में सरकार को यूसीसी बनाने का निर्देश नहीं दिया था। अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश में समान नागरिक संहिता जरूरी है। इसमें कहा गया, 'विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग कानून स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अन्यथा हर धर्म को अपने पर्सनल ला के तहत विभिन्न मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार मिल जाएगा।'

इन सबसे अलग, 21वें विधि आयोग ने अगस्त 2018 में माना कि यूसीसी की जरूरत फिलहाल नहीं है, लेकिन कानूनों में भेदभाव और असमानता से निपटने के लिए सभी धर्मों के वर्तमान कानूनों को संशोधित करने की संस्तुति की। आयोग ने कहा था कि यह ध्यान में रखना होगा कि सांस्कृतिक विविधता से इस हद तक समझौता नहीं किया जा सकता कि एक समान कानून बनाने के क्रम में राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता ही खतरे में आ जाए।

यूसीसी लंबे समय से भारतीय राजनीति में एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। हमारे संविधान की शुरुआत से ही यह बहस का विषय है। भारतीय स्वतंत्रता के बाद से अब तक यूसीसी और व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की मांग कई बार उठाई गई है। हालांकि इसे लागू करने में कई चुनौतियां हैं, जिनमें धार्मिक समूहों का विरोध, राजनीतिक सहमति की कमी और कानूनों के भीतर मतभेद शामिल हैं। उत्तराधिकार के मुद्दे को 1985 में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम पर 110वीं रिपोर्ट में भी संबोधित किया गया था, जहां आयोग ने पारसी सहित विभिन्न धर्मों के बीच उत्तराधिकारियों की परिभाषा में बदलाव करने की सिफारिश की थी। हालांकि कई प्रस्तावित बदलावों को धार्मिक समुदायों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा और अधिनियम में संशोधन पारित नहीं हो पाया।

वर्ष 1960 में विधि आयोग की एक रिपोर्ट में ईसाई विवाह और तलाक कानूनों में सुधार की सिफारिश की गई, जिसे ईसाई संगठनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। नवंबर 2019 में नारायण लाल पंचारिया ने संसद में एक विधेयक के रूप में इसे प्रस्तुत किया, लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया। मार्च 2020 में किरोड़ी लाल मीणा फिर से बिल लेकर आए, परंतु इसे संसद में पेश नहीं किया गया। विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार से संबंधित कानूनों में समानता की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी कई याचिकाएं पहले से ही दायर हैं।

यूसीसी एक ऐसा मुद्दा है जिसका असर केवल मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर, खासकर नगालैंड और मिजोरम पर भी होगा। भारत की लगभग 10 करोड़ आदिवासी आबादी में से लगभग 12 प्रतिशत पूर्वोत्तर में रहती हैं। ये विभिन्न जनजातियां अपने रीति-रिवाजों के आधार पर स्वयं के कानूनों का पालन करती हैं। उदाहरण के लिए मेघालय में कुछ जनजातियां मातृसत्तावादी हैं और संपत्ति सबसे छोटी बेटी को विरासत में मिलती है। गारो जनजाति में दामाद अपनी पत्नी के माता-पिता के साथ रहने आता है।

कुछ नगा जनजातियों में महिलाओं को संपत्ति विरासत में लेने या जनजाति के बाहर शादी करने की अनुमति नहीं है। जब यूनिफार्म सिविल कोड बनाने की बात आती है तो सांस्कृतिक प्रथाओं में इन अंतरों पर भी विचार करना होगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूनिफार्म सिविल कोड राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य में मदद करेगी। इसके अलावा, भारत में विभिन्न पारिवारिक कानून व्यवस्थाओं के भीतर कुछ प्रथाएं महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं और इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसे में इस संदर्भ में समग्रता से विचार करना होगा।

साभार - दैनिक जागरण

 

 

 

 


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