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संबंधों के लिए जरूरी मर्यादा, विश्वास-धैर्य पूरी तरह नष्ट हो गए: आलोक श्रीवास्तव
हमारे व्यक्तित्व से संबंधों के लिए जरूरी मर्यादा, विश्वास और धैर्य पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, जिससे हमारे आपसी व आत्मीय संबंध दरकने लगे हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
आलोक श्रीवास्तव, लेखक व कवि।
कल ‘आजतक’ के एक पुराने साथी से बात हो रही थी, बता रहे थे, आलोक भाई, इस ट्विटर के चक्कर में कितनी ही दोस्तियां खत्म हो गई। उनकी बात में बहुत क्षोभ था, दर्द था। आपमें से कुछ लोग इसका कारण वैचारिक द्वंद्व मानें शायद! किंतु नहीं, यहां वैचारिकता ही कारण नहीं है। आपको बताऊं या शायद यह आपके संज्ञान में भी हो। मेरा एक पारिवारिक मित्र हुआ करता था, अब वह इस दुनिया में नहीं। हम दोनों के विचार एक दम भिन्न थे, विचारधारा अलग थी, पर हम फिर भी मित्र थे और बहुत अच्छे मित्र थे, इतने कि वह छोटा होने के बावजूद मुझे मेरी गलती पर डांट भी दिया करता था और मैं समझ जाता था कि वाकई गड़बड़ी हो गई है। वह अब नहीं रहा पर मेरा उससे आत्मीय जुड़ाव आज भी है।
उसकी Twitter ID मैं आज भी फॉलो करता हूं। दरअसल, मसला विचारों या विचारधारा का ही नहीं है। यदि ऐसा होता तो अतीत में कई भिन्न विचारधाराओं वाले लोगों, यहां तक कि राजनेताओें के संबंध भी वैसे न होते जैसे अब तक उनकी मिसालें दी जाती हैं। मसला हमारे ‘अहं’ का आन पड़ा है। हमारी ‘अधैर्यता’ का हो गया है।
हमने अपने-अपने अहं को इतनी बुरी तरह लाद लिया है कि वह अब हमसे संभाला नहीं जा रहा। हमारे व्यक्तित्व से संबंधों के लिए जरूरी मर्यादा, विश्वास और धैर्य पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, जिससे हमारे आपसी व आत्मीय संबंध दरकने लगे हैं। हम अपने अलावा किसी को सही मानने को तैयार ही नहीं हैं। संभवतः हमने “अहं ब्रह्मास्मि” अर्थात् “मैं ब्रह्म हूं” का अर्थ “मैं ही ब्रह्म हूं!” लगा लिया है।
इस चक्कर में हम उन आत्मीय रिश्तों को खोते जा रहे दिया हैं जो रिश्ते हमारी मनुष्यता की पहचान हैं और हमारे सामाजिक होने का प्रमाण है। कोई वैचारिकता इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि हम उसके लिए अपने अहं को आगे लाकर, अपनों से ही भिड़ जाएं। मतभेद इतना बढ़ा लें कि वह मन-भेद में परिवर्तित हो जाए।
एक ऐसे समय में जब मनुष्य को बांटना और समाज को पाटना ही लक्ष्य होता जा रहा हो, यह जरूरी है कि हम अपनी चेतना को जागृत रखें, सोच को बड़ा करें और समझ को फैलाएं। हम अपने अहं की नहीं आत्मा की आवाज सुनने में दक्ष बनें। सोचें कि क्या हम वाकई उस पथ पर जा रहे हैं, जो हमें सच्ची मानवता और हमारे प्रणम्य भारतीय संस्कारों की ओर ले जा रहा है? जय हिंद।
कल ‘आजतक’ के एक पुराने साथी से बात हो रही थी, बता रहे थे~ “आलोक भाई, इस ट्विटर के चक्कर में कितनी ही दोस्तियाँ ख़त्म हो गईं.” उनकी बात में बहुत क्षोभ था, दर्द था.
— Aalok Shrivastav (@AalokTweet) July 30, 2023
आप में से कुछ लोग इसका कारण वैचारिक द्वंद्व मानें शायद ! किंतु नहीं, यहाँ वैचारिकता ही कारण नहीं है. आपको बताऊँ या… pic.twitter.com/fQzvgxTEep
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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