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साल 2022 के कुछ अंधेरे, कुछ उजाले

कोविड-19 के आक्रमण से साल 2022 के खात्मे तक का वक्त बहुत सी उपलब्धियों को धूल-धूसरित करने वाला साबित हुआ है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

शशि शेखर, वरिष्ठ पत्रकार ।।

2022: कुछ अंधेरे, कुछ उजाले

बाइबिल कहती है- ‘यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि वह दिव्य प्रकाश में जी रहा है और अपने भाई या बहन से नफरत करता है, तो वह दरअसल अंधेरे में है... नहीं जानता कि वह कहां जा रहा है, क्योंकि अंधकार ने उसे अंधा कर रखा है।’ चर्चा की शुरुआत के लिए बाइबिल के इस उद्धरण से बेहतर कुछ नहीं हो सकता।

अंधेरा, अलगाव और असहिष्णुता वक्त के इस दौर की पहचान बन चुके हैं। भरोसा न हो, तो देश की सबसे बड़ी पंचायत के शीतकालीन सत्र पर गौर फरमा देखिए। हमारे माननीय सांसद चीन के मुद्दे पर किस अंदाज में उलझे हुए थे! संसद से बाहर हुकूमत करने वाली पार्टी हो या सबसे बडे़ विरोधी दल के नेता, अभी तक एक-दूसरे को चीन का सहयोगी साबित करने में जुटे हैं। इसी रवैये ने हमें सदियों गुलाम बनाए रखा। एक विदेशी ताकत पिछले साठ सालों से हमारी सार्वभौमिकता पर लालची दृष्टि डाले हुए है और हम एकजुट होने के बजाय तू-तू, मैं-मैं कर रहे हैं! इससे चीन कितना खुश होता होगा।

इस साल की शुरुआत ही नफरत से हुई थी। कोरोना की महाबला से हम अभी उबरे न थे कि रूस ने यूक्रेन पर हमला बोल दिया। गुजरे तीन दशकों से युद्ध बीते दिनों की दास्तां बने हुए थे। वे समूची भयावहता के साथ लौट आए हैं।

कोविड-19 के आक्रमण से साल 2022 के खात्मे तक का वक्त बहुत सी उपलब्धियों को धूल-धूसरित करने वाला साबित हुआ है। 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद ऐसा लगने लगा था, जैसे समूची दुनिया एक गांव में तब्दील हो गई है। अगले तीस सालों में गरीबी उन्मूलन के लिए जो काम हुआ, वह इंसानियत के तीन हजार वर्षों से ज्यादा था। अकेले भारत में इस दौरान 40 करोड़ से अधिक लोग निर्धनता की रेखा से ऊपर उठाए गए थे। बाजार की अर्थव्यवस्था ने इस बीच प्राकृतिक दूरियों पर काबू पा लिया था। एक उदाहरण देता हूं। भारत में बना कपड़ा बांग्लादेश के बाजारों में सिला जाता। चीन से आए बटन या जिप उन्हें संपूर्ण करते और यूरोप-अमेरिका के लोग उन्हें धारण किया करते। राष्ट्रीयताओं के सरोकार इन दिनों व्यापक हो गए थे। कोरोना ने तेजी से दौड़ते इस रथ को उल्टी दिशा में दौड़ने के लिए मजबूर कर दिया है।

इस दौरान समूचे विश्व की आपूर्ति श्रृंखला के बाधित होने से दुनिया के बाजारों पर तरह-तरह के संकट मंडराने लगे। कहीं दवाओं की किल्लत थी, तो कहीं कपड़े नदारद। ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा के लिए यह सांघातिक समय साबित हुआ। महामारी के भय से सिर्फ देशों ने नहीं, बल्कि राज्यों, जनपदों और यहां तक कि गांवों ने अपनी सीमाएं बंद कर लीं। नतीजतन, गरीबी उन्मूलन के सारे प्रयास जमींदोज हो गए। जितने लोग निर्धनता की रेखा से ऊपर उठे थे, उससे कहीं ज्यादा फिर से दारिद्रय की गोद में जा बैठने को विवश हुए। पिछले कुछ दिनों से चीन में बरपी कयामत और अमेरिका सहित तमाम मुल्कों में कोरोना के बढ़ते मरीजों ने महामारी जनित विनाश की वापसी की मुनादी शुरू कर दी है। यह साल आगत वर्ष को भय व भुखमरी के नए खतरों की सौगात देकर विदा हो रहा है।

नतीजतन, पहले से पसरती आर्थिक असमानता ने नए शिखर छूने शुरू कर दिए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध इस त्रासदी को अगले मुकाम पर पहुंचाने वाला साबित हुआ है। ये दोनों देश संसार की कुल गेहूं आपूर्ति में 30 प्रतिशत और खाद्य तेलों में लगभग 60 फीसदी की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। यही नहीं, रूस यूरोप को ईंधन और ऊर्जा निर्यात करता है। मास्को ने जब हाथ खींचने शुरू किए, तो पहले से डगमगाता यूरोप भीषण मंदी की चपेट में आ गया। इटली में सत्ता-परिवर्तन हो गया और ब्रिटेन में दो प्रधानमंत्रियों को कुरसी गंवानी पड़ी। चार दशकों का रिकॉर्ड तोड़ने वाली महंगाई के बीच ऋषि सुनक ने वहां प्रधानमंत्री का पदभार संभाला। उनकी सत्तानशीनी से भारत में एक तबका मगन है। इससे भारत को क्या लाभ होगा, जवाब अगले साल मिलेगा। युद्ध और टकराव ने इस वर्ष नफरतों के नए बीज बो दिए हैं।

हमने इस साल अपने देश में भी इसका नंगा नाच देखा। 26 मई को ‘टीवी डिबेट’ के दौरान भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा की टिप्पणी ने देश-विदेश के प्रतिक्रियावादियों को मौका दे दिया। इस्लामी मुल्कों ने कूटनीतिक विरोध जताया, तो देश के दस राज्यों में तनाव फैल गया। राजस्थान और महाराष्ट्र में दो व्यक्तियों की हत्या ने सोचने पर विवश किया कि हम आगे बढ़ रहे हैं या मध्ययुग की ओर लौट रहे हैं?

गुजरते साल में एक और आत्मघाती प्रवृत्ति देखने को मिली। सोशल मीडिया में कुछ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे हम उबलते हुए लोग हैं। आए दिन किसी रंग, शब्द या उपक्रम को लेकर प्याली में तूफान उठ खड़ा होता है। शाहरुख खान की फिल्म पठान पर जारी विवाद इसका ताजातरीन उदाहरण है। इससे पहले तमाम फिल्मों, किताबों, लेखों और लेखकों के साथ यही क्रूर बर्ताव हुआ था। ऐसा नहीं है कि किसी वर्ग-विशेष के लोग ही इसका शिकार बन रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले रणवीर कपूर और उनकी गर्भवती पत्नी को उज्जैन से बैरंग लौटना पड़ा था। वे वहां महाकाल के सम्मुख शीश झुकाने गए थे।

इस घृणा से जूझने के लिए साल के उत्तरार्द्ध में कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के साथ प्रशंसनीय पहल की। दुर्भाग्यवश ऐसे सकारात्मक कदम देर में असर डालते हैं, जबकि सोशल मीडिया के अज्ञात ‘सुपारी किलर्स’ विचार की गति से प्रवाद फैलाते हैं। हमें वर्ष 2023 में नफरत और नकारात्मकता के इस सुनियोजित व्यवसाय से जूझना होगा।

इस वर्ष बिरजू महाराज, लता मंगेशकर, बप्पी लाहिड़ी, राहुल बजाज, शिव कुमार शर्मा, राकेश झुनझुनवाला, साइरस मिस्त्री, स्वरूपानंद सरस्वती, राजू श्रीवास्तव, मुलायम सिंह यादव जैसी नामचीन हस्तियों ने इस दुनिया से विदाई दर्ज कराई। ऐसी रुखसती लंबे समय के लिए खालीपन छोड़ जाती है। वे याद आते रहेंगे।

इन झटकों के बावजूद 2022 में कुछ भली खबरें भी आईं। भारत को जी-20 की कप्तानी मिली और वैश्विक आर्थिक संगठनों ने इस वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जताई। हम इस वर्ष 6.9 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर सकते हैं। जब समूची दुनिया डगमगा रही है, तब हिन्दुस्तानी सधे हुए कदमों से आगे बढ़ रहे हैं। आप चाहें, तो हुकूमत और हुक्मरान को बधाई दे सकते हैं।

विज्ञान ने हमें हथियार थमाए, तो कई नेमतें भी सौंपी हैं। कोरोना काल में जितनी जल्दी टीकों का आविष्कार हुआ, वह उम्मीद जगाता है। इसी तरह, ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस’ के क्षेत्र में ‘चैटजीपीटी’ जैसे आविष्कार शिक्षा, पत्रकारिता आदि क्षेत्रों में युगांतरकारी साबित होंगे। यहां मेसी और विश्व कप फुटबॉल की बात न करूं, तो नाइंसाफी होगी। मेसी जैसे लोग मोहब्बत और भाईचारे को बढ़ाते हैं। हमें हिन्दुस्तान के विभिन्न हिस्सों में ऐसे नायक गढ़ने होंगे।

कहने-सुनने को और भी बहुत कुछ है, पर इतने शब्दों में सब कुछ बखान कर देना संभव नहीं, इसीलिए मैंने सिर्फ प्रमुखतम मुद्दों की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया। उम्मीद है, नया साल भरोसे की नई रोशनी लेकर आएगा।

(लेखक दैनिक 'हिन्दुस्तान' के एडिटर-इन-चीफ हैं) 

(साभार: हिन्दुस्तान)


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