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‘मीडिया के लिहाज से सामान्य रहा 2022, नए साल पर उठाने होंगे कई बड़े कदम’

वर्ष 2022 को यदि हम मीडिया की दृष्टि से देखें तो मैं ऐसा समझता हूं कि यह सामान्य रहा। असामान्य नहीं था। सामान्य इसलिए था, क्योंकि मीडिया की जो भारत में जरूरत है, उस दृष्टि से कोई नई पहल नहीं हुई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

राम बहादुर राय।।

वर्ष 2022 को यदि हम मीडिया की दृष्टि से देखें तो मैं ऐसा समझता हूं कि यह सामान्य रहा। असामान्य नहीं था। सामान्य इसलिए था, क्योंकि मीडिया की जो भारत में जरूरत है, उस दृष्टि से कोई नई पहल नहीं हुई है। चाहे वह सरकार के स्तर पर हो, मीडिया के स्तर पर हो अथवा मीडिया संस्थानों के स्तर या पत्रकारों के स्तर पर हो। इसलिए हम 2022 को एक यादगार वर्ष नहीं मान सकते हैं। इसे सामान्य वर्ष माना जा सकता है। जो आता है और निकल जाता है।

जब इतिहास का कोई विद्यार्थी 2022 को मीडिया की दृष्टि से देखेगा और जानने की कोशिश करेगा कि कैसा रहा? तो यदि मान लीजिए कि वह दो हिस्से बनाकर एक हिस्से में यादगार वर्ष और दूसरे में सामान्य वर्ष को रखे, तो कह सकते हैं कि वह इसे दूसरे हिस्से में रख सकता है। मेरा मानना है कि वर्ष 2022 को यादगार वर्ष बनाया जा सकता था, बशर्ते कोई नई पहल होती। उदाहरण के लिए बहुत सालों से हम यह कहते रहे हैं कि मीडिया के नियमन के लिए पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय में जो भी संस्थान भारत में बने, उन संस्थानों को फिर से आज के संदर्भ में प्रासंगिक बनाए जाने की जरूरत है।

यह ऐसा विषय है, जिस पर करीब 12-14 साल से हम लोग प्रयास करते रहे हैं, लेकिन हमें इस दिशा में सफलता नहीं मिली है और मीडिया के स्तर पर भी यानी मीडिया में जो शामिल हैं, उन्होंने भी इसे बहुत बड़ा इश्यू नहीं बनाया या यूं कहें कि नहीं बना सके। उदाहरण के लिए प्रेस काउंसिल की बात करें तो इसका एक इतिहास है। मीडिया में रजिस्ट्रेशन का एक इतिहास है। इसी तरह जो पत्रकार भारत सरकार या राज्य सरकार में मान्यता प्राप्त होते हैं, उनकी एक पद्धति बनी हुई है। इस प्रकार से पत्रकारों के लिखने-पढ़ने की स्वतंत्रता का भी जो प्रश्न है, वह भी इन संस्थाओं से नियंत्रित होता है, लेकिन आज ये संस्थाएं भी करीब-करीब मृतप्राय: हो गई हैं।

उदाहरण के लिए- 1952 में जब पहली पार्लियामेंट बैठी और 13 मई 1952 को पार्लियामेंट के संयुक्त अधिवेशन को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संबोधित किया। तो उन्होंने उसमें एक लाइन जो बोली, वह देश को एक तरह का आश्वासन था, जिसे उस समय की सरकार ने पूरा भी किया। उन्होंने कहा था कि प्रेस के लिए कैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए, इसके लिए सरकार द्वारा एक प्रेस कमीशन गठित किया जाएगा। इसके बाद प्रेस कमीशन बना और उस कमीशन की रिपोर्ट पर प्रेस काउंसिल बनी। प्रेस कमीशन की रिपोर्ट पर ही अखबारों/पत्र-पत्रिकाओं के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था बनी। उसके बाद 1977 में दूसरा प्रेस कमीशन तब बना, जब मोरारजी देसाई की सरकार आई, क्योंकि आपातकाल के दौरान मीडिया पर तमाम पाबंदियां लगाई गई थीं, नागरिक स्वतंत्रता का हनन हुआ था। इसलिए मीडिया के लिए फिर से प्रेस कमीशन की जरूरत महसूस की गई और मोरारजी देसाई की सरकार में दूसरा प्रेस आयोग गठित हुआ। हालांकि, यह प्रेस आयोग अपना पूरा कार्यकाल पूरा करता, उससे पहले ही मोरारजी देसाई की सरकार चली गई।

इसके बाद जब इंदिरा गांधी सत्ता में आईं तो उन्होंने उस प्रेस आयोग को पुनर्गठित कर दिया। यानी लोग बदल दिए गए, लेकिन प्रेस आयोग का काम जारी रहा। दूसरे प्रेस आयोग की रिपोर्ट 1982 में आई। 1982 से अब तक मीडिया के बारे में कोई आयोग नहीं बना है, लेकिन तब से लेकर अब तक की मीडिया में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। मीडिया का विस्तार हो गया है। मीडिया के प्रकार बदल गए हैं। मीडिया में टेक्नोलॉजी का प्रवेश इस तरह से हो गया है कि उसके कारण से मीडिया की पहुंच बहुत ज्यादा हो गई है। यानी कुछ अच्छी चीजें भी हुई हैं, लेकिन कुछ ऐसी चीजें भी हुई हैं, जिससे कि मीडिया के बारे में आमजन के दृष्टिकोण में विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठ खड़े हुए हैं। उसका कारण यह है कि आज के दौर में सोशल मीडिया या अन्य तमाम ऐसे प्लेटफॉर्म आ गए हैं कि उन पर क्या लिखा जाता है और क्या पढ़ा जाता है, उसके नियमन की कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं है। हम लोकतंत्र में जीते हैं और चाहते हैं कि लोकतंत्र फले-फूले।

यह मीडिया के हक में है और मीडिया का प्रयास भी है। लेकिन, लोकतंत्र चलता है, नियमन से, नियम से, कानून से और अगर मीडिया के लिए कोई कानून न हो या मीडिया के लिए कोई नियमन न हो तो मीडिया में अराजकता की स्थिति पैदा होती है। पहले प्रिंट था, फिर इलेक्ट्रॉनिक आया और इसके बाद सोशल मीडिया आया। अब जितने बड़े पत्रकार हैं, उनमें से अधिकांश वेबसाइट पर आ गए हैं, अथवा उनका अपना यूट्यब चैनल है और ये स्वागतयोग्य है। लेकिन, इस तरह के तमाम वीडियो चैनल्स से जो अराजकता की स्थिति पैदा हुई है, उसे ठीक करने का काम वर्ष 2022 में हो सकता था। हम इस दिशा में प्रयास करते रहे हैं और चाहते हैं कि वह प्रयास चलता रहे।

मुझे याद है कि एक बार मुझे एक रिसर्च मैगजीन में मीडिया और इसके नियमन के बारे में एक आर्टिकल लिखना था, जिस संबंध में मैं उस समय सूचना प्रसारण मंत्री रहे प्रकाश जावड़ेकर जी के पास गया था। उस समय मैं उनसे यह जानना चाहता था कि क्या भारत सरकार मीडिया काउंसिल बनाने का विचार कर रही है। ऐसे में उनका उत्तर सकारात्मक था। आज हमारे यहां जो प्रेस काउंसिल है, उसके पास ज्यादा अधिकार नहीं हैं। जो अधिकार हैं भी, वो प्रिंट मीडिया के लिए हैं। यही नहीं, उसे नैतिक अधिकार मिला हुआ है, कानूनी अधिकार नहीं मिला हुआ है।

यदि लोकतंत्र में सरकार कोई संस्था बनाए और उसके पास केवल  नैतिक अधिकार हो, तो वह संस्था ऐसी ही होगी, जैसी आज प्रेस परिषद है। प्रश्न यह है कि क्या प्रेस परिषद किसी अखबार को गलत खबर छापने के बावजूद दंडित कर सकती है? चेतावनी दे सकती है? क्या उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह यह कह सके कि आपने जो गलत खबर छापी है, उसे सुधार करके अपने यहां छापिए? ऐसा उसके पास कोई अधिकार नहीं है। मैं ये नहीं कहता कि प्रेस परिषद को पत्रकारों को जेल भेजने का अधिकार हो, यह काम उसका नहीं है। लेकिन, प्रेस परिषद को इतना अधिकार तो होना चाहिए कि वह मीडिया को यह कह सके कि आपने खबर दी है, आपने खबर नहीं दी है। आपने झूठी खबर दी है, आपने अफवाह फैलाई है।

आज खबर, झूठी खबर, अफवाह आदि का घालमेल हो गया है। वर्ष 2022 यदि इस दृष्टि से देखा जाए कि क्या इसके बारे में इसके अलावा कोई कदम उठाया गया, तो केवल डिजिटल अथवा सोशल मीडिया को रेगुलेट करने की थोड़ी-बहुत कोशिश भारत सरकार ने की है। लेकिन, यह अपर्याप्त है। मुझे याद है कि 2008 से लेकर 2013-14 तक सात-आठ बार टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी और अन्य कई संस्थाओं ने मीडिया को लेकर जो तमाम प्रश्न हैं, उनके बारे में बाकायदा अध्ययन करके रिपोर्ट दी है। एक प्रश्न मीडिया में नियमन का और दूसरा प्रश्न एकाधिकार (मोनोपॉली) का है। मैं समझता हूं कि ये दोनों ही प्रश्न मीडिया की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। संक्षेप में मैं कहूं तो मीडिया की भूमिका सामान्य नागरिक को सही सूचना देना, उसे अपने मत को बनाने में सहायता करना और कहीं अगर उसके मन में कोई अगर भ्रम है तो उसे दूर करने का काम मीडिया का है।

मेरा मानना है कि मीडिया में अराजकता को दूर करने की कोई कोशिश नहीं हुई है और ये अराजकता मीडिया के विस्तार के साथ-साथ चलती जा रही है। ये लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। दूसरा, मीडिया में एकाधिकार यानी मोनोपॉली भी उतनी ही खतरनाक है। मीडिया में अराजकता और मीडिया में मोनोपॉली लोकतंत्र के लिए और आमजन के लिए घातक हैं। हर पत्रकार को इस पर चिंता व्यक्त करनी चाहिए।

मीडिया में मोनोपॉली से मेरा आशय यह है कि कुछ ऐसे लोग जो टीवी चला रहे हैं, वही अखबार भी चला रहे हैं, वही लोग वेबसाइट्स और वीडियो चैनल्स भी चला रहे हैं। ऐसा दुनिया में दूसरी जगहों पर नहीं है। चाहे अविकसित देश हों, विकासशील देश हों अथवा विकसित देश, वहां इस तरह की मोनोपॉली नहीं है। यानी वहां अगर कोई टीवी चैनल चला रहा है तो उसे अखबार चलाने का अधिकार नहीं है। जबकि, भारत में यदि आपके पास पूंजी है तो आप कुछ भी चला सकते हैं। यह लोकतंत्र के लिए घातक है।

मेरा कहना है कि यदि हम इन दो प्रश्नों के लिहाज से वर्ष 2022 को देखें तो मैं समझता हूं कि आम नागरिकों के स्तर पर, मीडिया के स्तर पर और भारत सरकार के स्तर पर जो पहल होनी चाहिए थीं, वह नहीं हुईं। इसका मुझे तो अफसोस है। यदि हम 2023 की बात करें तो हम लोगों को ये प्रयास करने चाहिए कि दोनों सवाल हल होने की दिशा में बढ़ें। संसद, मीडिया और नागरिकों को इसके लिए कोशिश करनी चाहिए। सरकार से आग्रह करना चाहिए कि वह इन सवालों को प्राथमिकता दें। यह सरकार की प्राथमिकता में है भी और नहीं भी है।

2023 में मीडिया मोनोपॉली टूटनी चाहिए। मीडिया में मोनोपॉली और मीडिया में अराजकता, ये दो ऐसे प्रश्न हैं, जो 2023 में हमारी-आपकी प्राथमिकता में रहने चाहिए। इसके बारे में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था होनी चाहिए। मीडिया काउंसिल जैसी संस्था होनी चाहिए और इस तरह की संस्था की निगरानी में पूरी मीडिया को आना चाहिए। यहां मैं नियंत्रण अर्थात कंट्रोल की बात नहीं बल्कि नियमन यानी रेगुलेशन की बात कर रहा हूं। लोकतंत्र में नियमन होता है, जबकि तानाशाही में नियंत्रण होता है। यहां हम तानाशाही नहीं बल्कि लोकतंत्र की बात कर रहे हैं। मीडिया और लोकतंत्र का संबंध गर्भ और नाल जैसा संबंध है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ’इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र' के अध्यक्ष हैं।)


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