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मिस्टर मीडिया: एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है
इस माहौल में कुछ अखबारों, चैनलों और उनके एंकर्स-पत्रकारों ने जो भूमिका निभाई है, उनका तहे दिल से शुक्रिया और सलाम! चैनल की नीति के खिलाफ जाकर सच के साथ खड़ा होना कोई आसान नहीं है
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
एक हफ्ते से उन्नाव कांड सुर्खियों में है। सभ्य और शिक्षित होते भारतीय समाज का कलंकित और क्रूर चेहरा। मध्यकाल की बर्बर कथाएं अपने दानवीय-विकराल रूप में एक बार फिर सामने हैं। दुष्कर्म पीड़िता सड़क दुर्घटना के बाद से बेहद गंभीर हालत में जीवन-मौत से जूझ रही है। अपने पिता, मौसी, चाची, प्रत्यक्षदर्शी गवाह को खो चुकी है। एडवोकेट चाचा जेल में हैं। उनकी जगह नया वकील भी गंभीर रूप से घायल। लोकतंत्र के रक्षक बने हिंसक भेड़ियों से अब कौन टकराने का साहस कर सकता है? कार्य पालिका, न्यायपालिका, विधायिका के बाद पत्रकारिता पर हमला बोलते सामंत अपने नए अवतार में दिखाई दे रहे हैं। इस माहौल में कुछ अखबारों, चैनलों और उनके एंकरों-पत्रकारों ने जो भूमिका निभाई है, उनका तहे दिल से शुक्रिया और सलाम! चैनल की नीति के खिलाफ़ जाकर सच के साथ खड़ा होना कोई आसान नहीं है। मगर इसी मीडिया में अनेक समाचारपत्र और खबरिया प्रसारक इस मामले पर जिस तरह हथियार डालते नजर आए हैं, वे हमारे भीतर की स्याह और शर्मनाक तस्वीर भी उजागर करते हैं। इस तरह की पत्रकारिता से हम गणतंत्र के गुण नहीं गा सकते।
बेहमई कांड कौन भूल सकता है? फूलन देवी का राइफल लेकर चंबल के बीहड़ों में उतर जाना किसका परिणाम था? उसके साथ यातनाओं का लोमहर्षक सिलसिला आजादी के बाद जवान होते हिन्दुस्तान को हिला गया था। उन दिनों टेलिविजन नहीं था, पर प्रिंट माध्यम ने अपने दम पर हुक़ूमत को कठघरे में खड़ा कर दिया था। बाद में उसी फूलन की आंखों में चर्चा के दरम्यान हिंसक प्रतिशोध के शोले मैंने कई बार भड़कते देखे। मीडिया में इन शोलों से चिंगारियां भी निकलीं। लेकिन कभी भी उसे देखकर बेहमई कांड पर नफरत नहीं जगी। यहां इस उल्लेख की मंशा यह है कि 2019 के मुल्क में भी अगर फूलन की तरह अत्याचार दोहराए जाते हैं तो मीडिया कैसे तटस्थ और गूंगा बना रह सकता है। ऐसे में पत्रकारिता का धर्म पीड़िता के हक में खुलकर सामने आने का है। यकीन के साथ कह सकता हूं कि सारे सीधे और परिस्थितिजन्य सुबूत आंखों के सामने नष्ट होते दिखाई दे रहे हैं। अपराधी साफ बच निकलें तो ताज्जुब मत कीजिएगा। जरा निर्भया कांड को याद कीजिए। यह पत्रकारिता ही थी, जिसने उस समय सबसे बड़ा इंसानियत का धर्म निभाया था। यह समय पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जा रही अखबारनवीसी के सिद्धांतों को जेहन में लाने का नहीं है ।
इस अवसर पर उस सरकारी और गैर सरकारी मीडिया को कोसना ही होगा, जो पुछल्ले की तरह बेमन से उन्नाव कांड के समाचार दिखा रहे हैं। इनमें ब्रॉडकास्ट माध्यम भी शामिल हैं। इन पर उन्नाव कांड के समाचार सुनकर या देखकर कोफ्त होती है। उनसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि एक बार आईने के सामने खड़े होकर देखिए। उसमें आपके परिवार की ही बहन-बेटियों की तस्वीर नजर आए तो समझिए कि आपकी भूमिका सत्य के साथ खड़े होने की नहीं है। महात्मा गांधी अपने को पूर्णकालिक पत्रकार कहते थे। वे आधी सदी तक पत्रकारिता करते रहे। उनके संपादक का धर्म सत्याग्रह ही था। अर्थात सच के साथ खड़े होने का आग्रह। एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है। दिल की गहराइयों से अदम गोंडवी का स्मरण कर लीजिए। आधी शताब्दी पहले की वेदना आज भी उतने ही तीव्र ताप का अनुभव कर रही है। समाज का क़र्ज उतारिए मिस्टर मीडिया!
जिस्म क्या है,रूह तक सब कुछ खुलासा देखिए/आप भी इस भीड़ में घुसकर तमाशा देखिए/ जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिजाज/ उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए/
जल रहा है देश, ये बहला रही है कौम को/ किस तरह अश्लील है संसद की भाषा देखिए/ मत्स्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार/ दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिए।
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