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एक सामाजिक नायक का अदृश्य होना

वह तीन महीने पहले जनवरी की एक ठंडी रात थी। हम लोग आदिवासी इलाकों में कोरोना का दुष्प्रभाव और सामुदायिक भाव से उसके मुकाबले पर दो डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अलविदा यूसुफ भाई !

वह तीन महीने पहले जनवरी की एक ठंडी रात थी। हम लोग आदिवासी इलाकों में कोरोना का दुष्प्रभाव और सामुदायिक भाव से उसके मुकाबले पर दो डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए मध्यप्रदेश वाले बुंदेलखंड के पिछड़े जिले पन्ना जा रहे थे। विकास संवाद के सौजन्य से युसूफ भाई और उनकी टीम से संपर्क हुआ था। युसूफ भाई पच्चीस-तीस साल से इस बेहद गरीब इलाके में लोगों के उत्थान के लिए काम कर रहे थे। रात बारह साढ़े बारह बजे दमोह से पन्ना के रास्ते में घने जंगल में हम रास्ता भटक गए। वह नेशनल पार्क का क्षेत्र था। युसूफ भाई को फोन किया। उन्होंने पूछा, कोई भी आसपास का पहचान का चिह्न बताइए। वहीं एक बोर्ड मिला। उस पर कुछ लिखा था। हमने वह बता दिया। फिर क्या था यूसुफ भाई ने अनुमान लगा लिया और तब तक फोन पर ही रास्ता बताते रहे, जब तक पन्ना नहीं आ गया। हम उनके भौगोलिक ज्ञान पर हैरान थे। होटल पर यूसुफ भाई और उनकी पूरी टीम खड़ी थी। गरमा गरम भोजन और गरम दूध। रात एक बजे वह भी पन्ना जैसे जिले में। बहरहाल हम फिर तीन बजे तक अगले दिन फिल्म शूट करने पर काम करते रहे।

सुबह सुबह यूसुफ भाई और उनके साथी होटल में थे। हम कोटा-गुंजापुर गांव जा रहे थे। नेशनल पार्क में घने जंगलों के बीच बसा था गांव। जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगा तो सैकड़ों गांव सारे संसार से कट गए थे। यह गांव भी उनमें से एक था। युसूफ भाई यहां कुपोषित बच्चों को स्वस्थ्य बनाने के लिए विकास संवाद के दस्तक मिशन के जरिए पहले से ही काम कर रहे थे। लेकिन कोरोना ने गांव से सब कुछ छीन लिया था। रोज की सब्जी-भाजी से लेकर दवा और कपड़े-किराना तक। युसूफ ने सबसे पहले लोगों को निस्तार के पानी की बरबादी रोकने के लिए प्रेरित किया। निस्तार का पानी याने नहाने, बर्तन-कपड़े धोने से लेकर छोटे छोटे काम में आने वाला पानी। उस पानी को एक नाली के जरिए आंगन में या घर के पीछे-आगे की फालतू जगह तक पहुंचाया। फिर वहां देसी बीज बांटे। देखते ही देखते घर घर में सब्जी बाड़ी लग गई। हर घर अपने काम के लायक सब्जियां उगाने लगा। यही नहीं, वे आपस में सब्जी विनिमय का काम करने लगे। कोई एक टमाटर उगा रहा है तो पड़ोसी को दे रहा है तो दूसरा गोभी दे रहा है, तीसरा मूली उगा रहा है तो चौथा मिर्च और धनिया। इस तरह सारा गांव सामुदायिक रिश्ते की पुरानी डोर में बंध गया। कोई भी पैसा नहीं ले दे रहा था। यूसुफ भाई इसे देखकर बच्चों की तरह खुश होते। हमारे सामने करीब करीब हर घर की महिला या पुरुष ने यूसुफ भाई का अभिवादन किया। इसके बाद तो गांव वालों ने अपनी दास्तान खुद बयान कर दी। उन्होंने उत्साह से अपनी सब्जीबाड़ी दिखाई। मुश्किल यह थी कि पहले पानी बहुत दूर से किसी नाले या झरने से लाना पड़ता था। यूसुफ ने उनका यह काम भी दस्तक देते हुए आसान कर दिया। गांव के लोगों को सामूहिक श्रमदान के लिए प्रेरित किया। उनसे सूखे कुएं गहरे करवाए और पानी के नए स्रोत ( झिर) खोज निकाले। देखते ही देखते कुएं लबालब हो गए। चार-पांच फिट पर पानी हिलोरें ले रहा था। इसके बाद गांव के सूखे पड़े तालाब को गहरा कराया और उसकी तलहटी में जमा जल ऊपर आ गया। गांववालों के चेहरे खिल उठे। एक पुरुष ने कहा, ‘हम तो अनपढ़ ठहरे। हमें ये तरीके पता ही नहीं थे। नाहक इतने साल परेशान हुए। 

एक महिला रूपकला (अगर मुझे ठीक नाम याद है) ने बताया कि महिलाओं के कपड़े पास के कस्बे या पन्ना से सिलाई और खरीदे जाते थे। युसूफ भाई ने दस्तक केंद्र के जरिए मशीन दिलाई। सिलाई सिखवाई और गांव की संकोची, घूंघट की ओट में रहने वाली महिलाओं के लिए फूलवती जैसे फरिश्ता बन गई। गांव में जवान लोग कम ही दिख रहे थे। बताया गया कि मजदूरी के लिए मुंबई या दिल्ली में हैं और वहां भी लॉकडाउन में फंस गए हैं। तो युसूफ भाई ने उन्हें मोबाइल दिलाए, सोलर लाइट लगवाई और महिलाओं की पतियों से, पिताओं के बेटों से और बच्चों की अपने पिता से रोज बातचीत का साधन उपलब्ध कराया। जब हम गए तो कई सोलर पैनलों के साथ मोबाइल चार्ज हो रहे थे। यह भी नए भारत की एक तस्वीर थी। शूटिंग से मुक्त हुए तो युसूफ भाई का एक और रूप सामने आया। वे गांव की महिलाओं और पुरुषों के साथ मिलकर हम सब लोगों के लिए भोजन तैयार कर रहे थे। कंडे की आग पर बाटी और देसी हरे बैंगन का भरता। साथ में लहसुन, हरी मिर्च और हरी धनिया की चटनी। संसार की मंहगी से मंहगी भोजन प्लेट उस स्वाद का मुकाबला नहीं कर सकती। भोजन की यह सामग्री यूसुफ भाई की ओर से उपलब्ध कराए गए देसी बीजों से तैयार हुई थी। आज भी वह स्वाद खुशबू के साथ जीभ से लार टपकाने लगता है।

अगले दिन हम एक और गांव विक्रमपुर गए। वहां भी एक एक ग्रामवासी की आंखों में यूसुफ के लिए ठीक वही लाड़ देखा, जो कोई पिता अपने बच्चे से करता है या कोई मां अपने बेटे से करती है। इस गांव की कस्तूरी देवी जन्म से विकलांग थी। अस्सी साल की यह बुजुर्ग घिसटकर चलती थी। यूसुफ ने उसे व्हीलचेयर दिलाई। लॉकडाउन लगा तो उसके भूखों मरने की नौबत आ गई। तीन दिन तक उसने रोटी और नमक खाया। फिर आटा भी खत्म और सब्जी भाजी भी चुक गई। यूसुफ ने इस गांव में भी यही प्रयोग किया। कस्तूरी देवी की पड़ोसिन तुलसा बाई अपने आंगन में लगाए सब्जीबाग से सब्जियां कस्तूरी को पहुंचाने लगीं। गांव को लॉकडाउन में कोई दिक्कत नहीं हुई। सारे लोग यूसुफ मियां के कृतज्ञ थे।

शाम को हम पन्ना लौट आए थे। हमने यूसुफ का ऑफिस देखा। उसकी टीम के सभी लोग उत्साह और ऊर्जा से भरे हुए। सभी पोस्ट ग्रेजुएट और सामाजिक सरोकारों के लिए संवेदनशील। उस ऑफिस की चाय मुझे हमेशा याद रहेगी। चाय पीते पीते युसूफ ने बताया कि पन्ना की उथली हीरा खदानें सारी दुनिया भर में मशहूर हैं लेकिन उनमें काम करने वालों की दर्द भरी कहानी कम लोग ही जानते हैं। उनके फेफड़ों में मिट्टी की सफाई करते समय धूल भर जाती है। उन्हें सिलिकोसिस हो जाता है और चालीस की उमर तक वे यह लोक छोड़ देते हैं। मुझे याद आया कि करीब तीस बरस पहले मंदसौर की स्लेट पेंसिल कारख़ानों में काम करने वालों पर इसी सिलिकोसिस के कहर पर एक फिल्म बनाई थी। वहां तो एक गांव केवल विधवाओं का गांव था। उनके पति खदानों में काम करते हुए सिलिकोसिस का शिकार हो गए थे।

(चित्र यूसुफ भाई के साथ विक्रमपुर में )

बहरहाल ! तो पन्ना के इन श्रमिकों के लिए यूसुफ ने यह लड़ाई लड़ी और जीती। उस पर भी हम फिल्म बनाते, लेकिन इस बार तो हमारा विषय यह नहीं था। हमने यूसुफ भाई से अगली बार का वादा किया और सतना जिले के आदिवासी गांवों के लिए निकल पड़े। इस पूरी यात्रा में मुझे युसूफ भाई एक नायक के रूप में याद आते रहे।

फिल्म पूरी हो चुकी थी। बीच-बीच में उनसे बात भी होती रहती थी। कभी किसी का नाम पूछने के लिए तो कभी कोई आंकड़ा जानने के लिए। इधर सवाल होता और उधर से वॉट्सऐप पर पलक झपकते उत्तर आ जाता। यह फिल्म दरअसल जर्मनी में दिखाई जानी थी। इसलिए यूसुफ भाई अत्यधिक गंभीर थे। कहते थे, ‘सर! एक भी जानकारी गलत नहीं जानी चाहिए। मैं किसी प्रचार की चाहत के कारण यह काम नहीं करता।’

इसके बाद अभी तीन दिन पहले एक दिन फेसबुक पर सुबह-सुबह मनहूस खबर मिली। यूसुफ भाई गांवों को कोरोना से जंग जीतने का मंत्र देते-देते खुद उसके शिकार बन गए। इस गुमनाम नायक को बचाने की कोशिशें हुईं मगर नाकाम रहीं। बारह अप्रैल को कोरोना की जकड़न में आए और अठारह को उससे मुक्त हो गए।

उफ! क्या विडंबना है? इंसान अपने जाने के बाद परिवार को व्यवस्थित करने की योजना बनाने का काम भी पूरा नहीं कर पाता। यूसुफ भाई अपने उस आखिरी सफर पर चले गए, जहां से लौटकर कोई नहीं आता। मुझसे उमर में कई बरस छोटे थे, लेकिन बहुत बड़े काम कर गए यूसुफ भाई। किसी कवि के इस सवाल का उत्तर किसी के पास नहीं है। मैं पूछता हूं तुझसे, बोल मां वसुन्धरे, तू अनमोल रत्न इस तरह लीलती है किसलिए?

विकास संवाद के लिए यकीनन यह बहुत बड़ा सदमा है। सचिन जैन, राकेश मालवीय और उनकी टीम को अब और कई गुना तेजी से काम करना होगा। यही यूसुफ भाई को असली श्रद्धांजलि होगी। वे तो अपनी यह फिल्म नहीं देख सके, लेकिन उनकी यह फिल्म जर्मनी में दिखाई जा रही है। अलविदा युसूफ भाई!

 


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