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‘किसी की FB वॉल उसके ही मृत्यु संदेशों से पट जाए, यह तो तुम्हारी कहानियों में संभव था शशि’

अमर उजाला बरेली के सिटी संस्करण में उन दिनों लगातार नए चेहरे आते रहते थे। बहुत से लोग ट्रेनिंग के लिए कुमाऊं ब्यूरो से बुलाए जाते थे। उनकी अच्छी तरह से घिसाई हो, इसके लिए

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

दिनेश श्रीनेत, वरिष्ठ पत्रकार

अमर उजाला बरेली के सिटी संस्करण में उन दिनों लगातार नए चेहरे आते रहते थे। बहुत से लोग ट्रेनिंग के लिए कुमाऊं ब्यूरो से बुलाए जाते थे। उनकी अच्छी तरह से घिसाई हो, इसके लिए सिटी संस्करण में भेज दिया जाता था। सिटी में काम करना सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण था। करीब 12 से 14 घंटों की ड्यूटी, एक-एक मिनट की डेडलाइन को फॉलो करना, हमेशा सांस अटकी रहना कि कौन सी खबर छूट जाए या फोटो कैप्शन में कोई चूक हो जाए। हर रोज के अखबार और छूटी खबरों पर अगले दिन गहन समीक्षा होती थी।

वीरेन डंगवाल उन दिनों अखबार के सलाहकार संपादक थे और इस तानाशाही भरे माहौल में एक उदारवादी चेहरा भी। साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के प्रति उनके मन में खास अनुराग रहता था। वे चापलूसी और दिखावा करने वालों को ताड़ लेते थे और उनका सार्वजनिक रूप से मजाक भी बना देते थे। वे किसे पसंद करते हैं और किसे नहीं यह हमें बहुत बाद में पता लगता था। तो पहाड़ी ब्यूरो से आने वाले नवोदितों के बीच कुछ कवि ह्रदय और वाम आंदोलन से जुड़े युवा भी हमारी टीम का हिस्सा बन जाते थे। एक दिन छोटे कद का बेहद दुबला-पतला शख्स न्यूजरूम में दिखा। पता चला कि उनका नाम शशिभूषण द्विवेदी है और वे यहां डेस्क पर सहयोग करेंगे।

धीरे-धीरे हमें रोजमर्रा के कामकाज के अलावा शशि की साहित्यिक दिलचस्पियां भी पता चलने लगीं। उन्हीं दिनों डंगवाल जी की पहल से एक साहित्यिक सप्लीमेंट शुरू हुआ था। उसका नाम 'आखर' था। मैं उस सप्लीमेंट का प्रभारी था और शशि को मेरा सहयोगी बनाया गया था। नया-नया इंटरनेट आया था। शशीभूषण ने इंटरनेट से कई दिलचस्प साहित्यिक जानकारियां जुटानी शुरू कीं जिसका इस्तेमाल हम 'आखर' में किया करते थे। उन्हीं दिनों इंटरनेट पर एक साहित्यिक पत्रिका निकली थी जिसके संपादक राजेश रंजन थे। जो इन दिनों ऐपल कंपनी में भारतीय भाषाओं के प्रभारी हैं। वहां से हमने राजेंद्र यादव की बेटी के संस्मरण साभार लिए थे। शशि ने मेरे लिए इंटरनेट में एक छोटी सी खिड़की हिंदी साहित्य के लिए भी खोल दी, जो बाद में मेरे बहुत काम आई।

मैंने उन्हीं दिनों शशिभूषण की कहानियां भी पढ़ीं जो मुझे पसंद भी आईं। शशि डेस्क पर थे इसलिए दोपहर में वे घर पर ही रहते थे। बरेली का एक इलाका था, सुभाष नगर जो शहर के दूसरे इलाकों के मुकाबले कुख्यात और सस्ता था। ज्यादातर नए पत्रकार उसी इलाके में रहा करते थे। शशि ने भी वहीं पर एक कमरा ले रखा था। मैं रिपोर्टिंग में था तो अक्सर दोपहर में जब कभी पास में बेसिक शिक्षा विभाग के दफ्तर रिपोर्टिंग करने निकलता तो फुरसत मिलने पर शशि से मिलने चला जाता था। शशिभूषण तब बैचलर थे और उन्होंने बहुत छोटी सी गृहस्थी बसा रखी थी।

एक अंधेरे से आंगन से ऊपर को सीढ़ियां जाती थीं। आंगन के ऊपर लगी लोहे की ग्रिल को पार करके मैं उनके कमरे में पहुंचता था। हमारी बातचीत का विषय पहले पढ़ी गई किताबें, नई साहित्यिक पत्रिकाएं और साहित्यकारों से जुड़े किस्से होते थे। शशि के पास साहित्यिक बिरादरी से जुड़ी ढेरों सूचनाएं होती थीं। बाद में कभी-कभी मैं और राजेश शर्मा मजाक में कहते थे कि अगर साहित्य के पाठकों के लिए कोई स्टारडस्ट जैसी पत्रिका निकले तो शशिभूषण से बेहतर संपादक कोई नहीं हो सकता। शशि मेरे लिए चाय बनाते थे और हम तीन-चार घंटों तक गपशप करते रहते थे। उनके कमरे की एक खिड़की सुभाष नगर के नाले से लगे विशाल मैदान की तरफ खुलती थी। जब सूरज ढलने लगता तब मैं दफ्तर के लिए रवाना हो जाता। कभी अकेले कभी उनको भी साथ ले लेता था।

शशि अपनी कहानियों पर बहुत मेहनत करते थे। उस समय तक उनका एक संग्रह आ चुका था। यह ज्ञानपीठ से आया था, 'ब्रह्महत्या और अन्य कहानियां'। शशि को अपनी कहानियों मे ऐतिहासिक प्रतीकों के इस्तेमाल का शगल था। वे अक्सर इस बारे में बात भी करते थे। इतिहास से संबंधित अपनी जानकारियों और अध्ययन का इस्तेमाल वे अपने कथानक में करते थे। मुझे उनकी एक कहानी बहुत पसंद थी, जो एक मुसलिम अविवाहित महिला शिक्षिका के बारे में थी। इस कहानी के अलावा उस समय तक प्रकाशित ज्यादातर कहानियों में वे जटिल संरचना वाली कहानियां बुनना पसंद करते थे। मेरी उनसे इस पर बहस होती थी।

मैं कहता था कि उनकी कहानियों का कथ्य अत्यधिक प्रयोगधर्मिता के बोझ से दब जाता है। इसके बावजूद उनकी कहानियां किसी चमत्कार के मानिंद हैं। पात्रों और स्थितियों के प्रति विडंबनात्मक उपहास के भाव में उनकी लेखनी का कौशल झलकता था। उनकी कहानियों मे ऐतिहासिक गाथा या मिथ वर्तमान के नैतिक प्रश्नों के साथ गुत्थमगुत्था हो जाती थी। इसे वे किस्सागोई की शैली में पिरोते थे और बीच-बीच में अपने पाठक से संवाद करते हुए ब्रेख्त की शैली में उसे 'एलिनिएट' भी करते चलते थे। कहानी किसी रोलर-कोस्टर की तरह अतीत से वर्तमान, किस्से से यथार्थ, करुणा से परिहास और हकीकत से फैंटेसी के बीच पाठकों को झुलाती रहती थी।

जब आप उनकी कहानियों को पढ़ते हैं तो वह छोटे कद का चमकती आंखों वाला दुबला-पतला सा शख्स कुछ और ही लगने लगता था। शशिभूषण का ईमानदार मूल्यांकन नहीं हुआ है। शायद इसकी एक वजह यह भी है कि वे बहुतों को नाराज कर देते थे। शराब पीने और बहक जाने के बहुत से किस्से मैंने दूसरों से सुने हैं मगर मैं किसी ऐसी घटना का गवाह नहीं रहा हूं। शशि का तबादला अमर उजाला के नोएडा ऑफिस हो गया। वे वहां गहरे तनाव और फ्रस्ट्रेशन से गुजरे। बाद में वहां के माहौल पर एक अद्भुत कहानी लिखी थी जो अखबारवालों के बीच खूब सर्कुलेट हुई। कादंबिनी पत्रिका जॉइन करने के बाद मैं उनसे दो-तीन बार मिला हूं। मगर उन मुलाकातों में वो शशिभूषण नहीं मिला जिससे मैं अपने न्यूजरूम या सुभाषनगर की गलियों में मिला था।

अभी पिछले बुकफेयर में वे बहुत धज के साथ किसी प्रकाशक के स्टॉल पर आयोजित परिचर्चा में मिले थे। जाने क्यों मुझे हमेशा लगता था कि वो शशि कभी न कभी जरूर मिलेगा और खुलेगा। वह संकोच भरी मुस्कान और परिहास उड़ाती सिकुड़ी आंखों वाला शशि कभी दिल्ली में ओढ़े गए आवरण से निकलकर बाहर आ ही जाएगा। मगर आज जो हुआ वह किस कदर अप्रत्याशित और एबरप्ट था। ठीक उनकी कहानियों की तरह। किसी ने उन्हें टैग कर रखा था, सिर्फ यह लिखकर कि "कह दो कि यह झूठ है!" मैंने क्लिक किया और उनकी वॉल पर चला गया जो श्रद्धांजलि संदेशो से भरी थी।

"किसी की खुद की वॉल उसके ही मृत्यु संदेशों से पट जाए। शशि यह तो तुम्हारी कहानियों में संभव हो सकता था... मैं स्तब्ध हूं और मन बोझिल है। कुछ अधूरा छूट गया था तुम्हारे साथ जिसकी टीस हमेशा रहेगी।"

(साभार: फेसबुक वाल से)


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