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संघ नई शताब्दी में अपने को कितना बदलेगा: आलोक मेहता

संघ को हिन्दू राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संगठन के रूप में जाना जाता है। 27 सितंबर 1925 को डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने विजया दशमी के दिन इसकी स्थापना की थी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 4 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस विजया दशमी (2 अक्टूबर) से अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है और आने वाले दशकों–शताब्दी के लिए राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय अभियान चलाने जा रहा है। सचमुच संघ ने समय और चुनौतियों के साथ अपने को बदला है, लेकिन हिंदुत्व के विचारों और भारतीय संस्कृति की प्रतिबद्धता में कोई परिवर्तन नहीं किया है।

संघ को हिन्दू राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संगठन के रूप में जाना जाता है। 27 सितंबर 1925 को डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने विजया दशमी के दिन इसकी स्थापना की थी। आज इसे विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जा रहा है। संघ स्वयं एक करोड़ सदस्य होने का दावा करता है। साथ ही यह देश की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का मातृ संगठन भी माना जाता है। इसलिए वर्तमान दौर में न केवल भारतीय समाज बल्कि विश्व समुदाय भी इसके कामकाज और भविष्य की ओर ध्यान दे रहा है।

संघ की छवि एक मजबूत वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति के रूप में स्थापित है। दशकों से चलती शाखाएँ, अनुशासित स्वयंसेवक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यक्रम संघ को विशिष्ट पहचान देते हैं। किंतु समय के साथ उसे अपनी छवि और विचारधारा में लचीलापन भी दिखाना पड़ा है। गणवेश बदलने से लेकर विचारों में लचीलापन लाने तक, संघ ने यह सिद्ध किया है कि वह समय के साथ चलने को तैयार है।

संघ की असली ताकत उसकी शाखाओं में निहित है। भारत के हज़ारों गाँवों, कस्बों और शहरों में प्रतिदिन लगने वाली शाखाएँ संघ का आधार स्तंभ हैं। पिछले दशक में शाखाओं की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। आँकड़ों के अनुसार, 2014 से 2024 तक लगभग 30% नई शाखाएँ शुरू हुईं। 2016 में गणवेश में बदलाव हो या 2025 के शताब्दी वर्ष की रणनीति—आज का संघ बदला हुआ है। यह बदलाव ड्रेस तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों, शाखाओं के स्वरूप, सरकार से संबंध और अपनी भूमिका तक फैला है।

भविष्य की पीढ़ी यह तय करेगी कि क्या यह शक्ति समावेश, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की वाहक बनेगी या केवल अनुशासन, एकरूपता और नियंत्रण तक सीमित रह जाएगी।

मई 1977 में मैंने 'जनता पार्टी के सहअस्तित्व का सवाल' विषय पर संघ के वरिष्ठ नेता नानाजी देशमुख का पहला इंटरव्यू किया था। नानाजी ने कहा था कि संघ और जनसंघ समाजवादियों के विचारों से मिलते हैं। उनका कहना था—“संघ और जनसंघ सदा समतावादी समाज और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के पक्षधर रहे हैं। जनकल्याण के लिए हमारे कार्यक्रम किसी भी दृष्टि से कम क्रांतिकारी नहीं रहे।”

तब भी संघ को लेकर पुराने कांग्रेसियों और समाजवादियों के मतभेद की चर्चाएँ सामने आती रहीं। मैंने संघ पर *गैरसंघी क्या कहते हैं* विषय पर कई नेताओं के इंटरव्यू प्रकाशित किए। समाजवादी खेमे के रबी रॉय और सोशलिस्ट पार्टी से जनसंघ में आए मुस्लिम नेता आरिफ बेग ने माना कि “संघ राजनीतिक संगठन नहीं है और न ही सरकारी काम में हस्तक्षेप करता है।” उस समय आरिफ बेग केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री भी थे।

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता में आने से बहुत पहले, दिसंबर 1963 में *नवनीत* पत्रिका के संपादक को दिए इंटरव्यू में कहा था—“राजनीति की राहें रपटीली होती हैं। इन राहों पर चलते समय बहुत सोच-समझकर चलना पड़ता है। थोड़ा सा असंतुलन भी गिरा देता है। इसलिए इन राहों पर संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।” यह बात उनके प्रधानमंत्री रहते सच साबित हुई।

संघ के हर कार्यक्रम का प्रारम्भ इस मंत्र से होता है। 'संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते॥' अर्थात्—“हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें, हमारे मन एक हों, जैसे प्राचीन देवता एक साथ रहते और पूजा करते थे। प्रभु हमें ऐसी शक्ति दे, ऐसा शुद्ध चरित्र दे, ऐसा ज्ञान दे कि यह कठिन मार्ग भी सुगम हो जाए।”

इसी तरह संघ की मुख्य प्रार्थना है। 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्। महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥'
हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा नमस्कार करता हूँ। तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पित हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।

सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरूजी) के समय से लेकर वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत तक, संघ की गतिविधियों में अनेक बदलाव हुए हैं। लगभग 55 वर्ष पहले दिल्ली के झंडेवालान स्थित कार्यालय में पदाधिकारी और प्रचारक बेहद सादगी से रहते थे। भोजन का समय निर्धारित होता था और सब लोग ज़मीन पर बैठकर खाते थे। संघ में कोई औपचारिक सदस्यता फ़ॉर्म नहीं था। प्रचारक केवल रजिस्टर या डायरी में संपर्क लिखते थे। अब संघ के पास साधन-संपन्न समर्थकों का सहयोग, भव्य कार्यालय और आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

आपातकाल के दौरान संघ पर प्रतिबंध लगा, सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन अनेक समर्पित प्रचारक भूमिगत रहकर संदेश पहुँचाते रहे। उन्हीं दिनों गुजरात में नरेंद्र मोदी भी भूमिगत रहकर समाचार सामग्री तैयार करते और जेलों में नेताओं तक पहुँचाते थे। वे उस समय किसी पद पर नहीं थे, केवल स्वयंसेवक थे।

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद लालकृष्ण आडवाणी सूचना प्रसारण मंत्री बने। बाद में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और संघ के आदर्शों के अनुरूप कई सामाजिक व कानूनी बदलावों से भारत को महाशक्तियों की पंक्ति में खड़ा किया। आज सामाजिक-आर्थिक बदलाव से भारत और भारतीयों की प्रतिष्ठा दुनिया में बढ़ रही है। फिर भी कट्टरपंथियों और विदेशी षड्यंत्रों से बचाकर भारत को *सोने का शेर* बनाने के लिए संघ, मोदी सरकार और समाज को आने वाले दशकों तक काम करना होगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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