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न्यायपालिका में जनता का विश्वास बने रहना चाहिए: रजत शर्मा
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर किया गया है लेकिन उन्हें वहां कोई न्यायिक काम नहीं दिया जाएगा। दिल्ली फ़ायर सर्विस के चीफ़ का बयान भी रिकॉर्ड किया।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 10 months ago
रजत शर्मा, इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवन्त वर्मा के घर में नोटों से भरी बोरियों के मामले में FIR दर्ज करने की याचिका पर आज सुनवाई करने से इंकार कर दिया। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वस भूयां की पीठ ने इसे समयपूर्व बताते हुए कहा कि जांच समिति का काम पूरा होने के बाद ही मुख्य न्यायाधीश फैसला करेंगे कि आगे क्या कार्रवाई की जाय।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर किया गया है लेकिन उन्हें वहां कोई न्यायिक काम नहीं दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति ने दिल्ली फ़ायर सर्विस के चीफ़ का बयान भी रिकॉर्ड किया। दिल्ली पुलिस के उन आठ कर्मचारियों के फ़ोन ज़ब्त कर लिए गए, जो 14 मार्च की रात को आग लगने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले पर पहुंचे थे।
इन्हीं पुलिसवालों में से एक ने उस रात स्टोर रूम में नोटों से भरी जली हुई बोरियों का वीडियो बनाया था। तुग़लक़ रोड थाने के SHO का मोबाइल फ़ोन भी ज़ब्त कर लिया गया। जस्टिस वर्मा का बंगला तुग़लक़ रोड थाने के इलाके में आता है। जस्टिस वर्मा का पक्ष रखने के लिए उनके वकील भी जांच समिति के सामने पेश हुए। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के लिए जस्टिस वर्मा के केस को हैंडल करना तलवार की पैनी धार पर चलने जैसा है। एक तरफ उन्हें ये सुनिश्चित करना है कि लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा बना रहे। इसके लिए इस केस की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है।
दूसरी तरफ न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कायम रखने की चुनौती है। इसीलिए जांच किसी दूसरी एजेंसी को नहीं दी जा सकती। तीसरी बात है, राजनीतिक दबाव। संसद में कहा गया कि जज के यहां से कैश मिला है, उसकी जांच लोकपाल को क्यों नहीं सौंपी जा सकती? कांग्रेस के एक नेता ने इस मामले में कानून मंत्री से संसद में बयान देने को कहा है। NJAC को नए रूप में जीवनदान देने की बात भी चल रही है।
एक और चुनौती है जस्टिस वर्मा के ट्रांसफर को लेकर। इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों ने इसे बड़ा मसला बनाया है और उनकी बात न्यायोचित भी लगती है कि एक जज, जिस पर आरोप लगे हैं, उसे उसके पैरेंट कोर्ट में कैसे भेजा जा सकता है? इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए इन सारी बातों के बीच में संतुलन बनाए रखना मुश्किल काम है। मुझे लगता है, चाहे जो भी करना पड़े, न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा कायम रहना चाहिए। एक जज की वजह से सारी व्यवस्था से विश्वास नहीं उठना चाहिए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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