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‘अतुल लागू के जाने के बाद अब हमेशा रहेगा इस बात का अफसोस’

मित्रता में उम्र के अंतर को अतुल दा ने कभी आड़े नहीं आने दिया

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

प्रिय और वरिष्ठ मित्र अतुल दा यानी कॉमरेड अतुल लागू नहीं रहे। आज सुबह नींद खुलते ही सबसे पहले इसी दुखद मनहूस खबर से रूबरू होना पड़ा। जानलेवा बीमारी कैंसर ने कब उन्हें अपने शिकंजे में जकड़ लिया, उन्हें पता ही नहीं चला और महज एक महीने पहले जब पता चला तो डॉक्टरों ने बताया कि यह पित्ताशय का कैंसर है, जो अब अंतिम चरण में है।

इंदौर में एक प्रतिबद्ध वामपंथी परिवार में जन्मे अतुल दा के पिता कॉमरेड अनंत लागू मध्य प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक थे और उनकी माता जी और भाई-बहन भी पार्टी के विभिन्न मोर्चा संगठनों से जुड़े रहे। खुद अतुल लागू भी पार्टी की गतिविधियों के साथ ही इंदौर की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था अभ्यास मंडल, नर्मदा बचाओ आंदोलन, दाऊदी बोहरा समुदाय के सुधारवादी आंदोलन आदि कई सामाजिक और प्रगतिशील अभियानों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।

वे मुझसे और अन्य कई मित्रों से उम्र में काफी बड़े थे, लेकिन मित्रता में उम्र के अंतर को उन्होंने कभी आड़े नहीं आने दिया। यूं कहें कि अपने से उम्र में छोटे मित्रों के साथ ही उनकी खूब छनती-बनती थी। अपना तो उनसे घरोपा ही था, क्योंकि उनसे जान-पहचान और मित्रता से पहले अपन उनके पिताजी के संपर्क में आ चुके थे। उनके पिताजी पुणे में अपनी जवानी के दिनों में वामपंथी आंदोलन से जुड़ने से पहले आरएसएस से भी थोड़े समय जुड़े रहे थे। उनके साथ बैठकर वामपंथी आंदोलन के पुराने किस्से तो सुनना अच्छा लगता ही था, उससे भी ज्यादा दिलचस्प किस्से वे आरएसएस के पुराने नेताओं के सुनाया करते थे।

अतुल लागू से अपना पहला परिचय 1987 में इंदौर में हुए सुधारवादी बोहरा समुदाय के विश्व सम्मेलन के दौरान हुआ था, जिसका उद्घाटन ख्वाजा अहमद अब्बास ने किया था और जिसके मुख्य कर्ताधर्ताओं में उनके पिताजी कॉमरेड अनंत लागू, वरिष्ठ समाजवादी नेता ओमप्रकाश रावल, मोहन सिंह शाह, अभ्यास मंडल के संस्थापक मुकुंद कुलकर्णी, वरिष्ठ समाजवादी मित्र और पत्रकार सुभाष रानडे के साथ अपन भी एक थे। वही परिचय धीरे-धीरे मित्रता में बदल गया।

अतुल लागू लंबे समय तक पुस्तक व्यवसाय से जुड़े रहे, लेकिन उस व्यवसाय को भी उन्होंने नफा-नुकसान की ज्यादा परवाह किए बगैर एक मिशन या आंदोलन की तरह ही चलाया। उस समय इंदौर में विचार और कथा साहित्य संबंधित किताबों की दो ही दुकानें हुआ करती थीं। एक सर्वोदय साहित्य भंडार और दूसरी अतुल दा की प्रगति पुस्तक भंडार। अतुल दा जब तक पुस्तक व्यवसाय में रहे, हर साल अपने अकेले के दम पर पुस्तक प्रदर्शनी/मेले का आयोजन करते रहे। जब कुछ लालची प्रकाशकों ने मुनाफाखोरी की हदें पार करते हुए पुस्तकों के दाम अनाप-शनाप बढ़ाने शुरू कर दिए, जिसकी वजह से पुस्तकें पाठकों की पहुंच से बाहर होने लगी तो उन्होंने अपने प्रगति पुस्तक भंडार का समापन कर दिया।

मेरे और अन्य कई मित्रों के किताब पढ़ने के शौक को परवान चढ़ाने या यूं कहें कि किताबें पढ़ने की लत लगाने वाले अतुल लागू ही थे। कोई भी नई और अच्छी किताब आती तो वे अपन को उसकी सूचना जरूर देते। पुस्तकें खरीदने की अपनी हैसियत नहीं हुआ करती थी, सो उनकी दुकान यानी प्रगति पुस्तक भंडार ही अपना वाचनालय हुआ करता था। कहने की आवश्यकता नहीं कि वहां अपने चाय-नाश्ते का इंतजाम भी अतुल लागू ही करते थे। नाश्ता भी अपनी फरमाइश के मुताबिक ही होता था। खाली समय में कई किताबें उनकी दुकान से घर पर लाकर पढ़ीं और लौटाईं, कई किताबें खरीदी भीं, उनमें भी ज्यादातर उधारी में, जिनमें से कुछ के पैसे कभी नहीं चुकाए। उधारी में किताब देते वक्त वे भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि बाद में पैसे आने की कोई गारंटी नहीं है। अपन ने भी चुका दिए तो ठीक, अन्यथा उन्होंने कभी याद नहीं दिलाया।

खाने-खिलाने के शौकीन भी वे खूब थे और क्रिकेट, टेबल टेनिस, बेडमिंटन, कैरम आदि खेलों से भी उनका गहरा नाता था। अपन ने उनके साथ इंदौर प्रेस क्लब में खूब कैरम खेला। उनके साथ खेलने में अपना हारना तय मानते हुए भी उनके साथ खेलने में मजा आता था। स्वभाव से तो वे इतने शांत थे कि उन्हें किसी भी बात पर कभी गुस्से में नहीं देखा गया। अगर उनसे कोई नाराज हो जाए तो उसको मनाना उनकी प्राथमिकता में शुमार रहता था। उनके साथ कोई भी किसी तरह की मजाक करने के लिए पूरी तरह आजाद था। कुल मिलाकर वे एक बहुत ही बेहतरीन और अपने नाम के अनुरूप अतुलनीय इंसान थे। उनकी बीमारी की खबर मुझे मित्र चंद्रशेखर शर्मा से मिली थी। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि उनकी बीमारी की खबर मिलने के बाद मैं उनसे न मिल नहीं सका। वे शरीर रूप में भले ही अब नहीं रहे, लेकिन मेरी यादों के झरोखे में वे हमेशा बने रहेंगे। उनके साथ जुडी तमाम यादों को प्रणाम और उनके परिजनों के शोक में खुद को शामिल करते हुए अपनी श्रद्धा के फूल उन्हें समर्पित करता हूं।

(वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की फेसबुक वॉल से)


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