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तब की सेंसरशिप में डर था, आज इसका नाम बदल गया है: अनुरंजन झा
25 जून 1975. आधी रात को भारत के लोकतंत्र को बिना अंतिम संस्कार के दफना दिया गया था। प्रेस की आजादी, नागरिकों की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही- सबकुछ एक सिग्नेचर से ‘निलंबित’ कर दिया गया।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago
अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार ।।
“जब अखबारों में आलू-बैंगन छपा करते थे”
(Emergency Then, Algorithms Now: Journalism in Two Shades of Silence)
25 जून 1975. आधी रात को भारत के लोकतंत्र को बिना अंतिम संस्कार के दफना दिया गया था। प्रेस की आजादी, नागरिकों की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही- सबकुछ एक सिग्नेचर से ‘निलंबित’ कर दिया गया। लेकिन उससे भी गहरी चुप्पी तब महसूस हुई जब अखबारों के पन्नों पर खबरों की जगह रेसिपियां छपने लगीं।
“How to cook a potato-and-brinjal curry?” जी हां, यही एक दिन की लीड स्टोरी थी, क्योंकि हर असली खबर दिल्ली दरबार के एक सरकारी अफसर के पास पहले जांच के लिए जाती थी। और जब कुछ छपाने को न बचे, तो पत्रकारों ने व्यंजन विधियों से अखबार के कॉलम भरे। यह भारत की उस प्रेस की तस्वीर थी, जिसने कभी स्वतंत्रता संग्राम में आवाज दी थी।
लेकिन क्या 50 साल बाद हम वाकई उस दौर से बहुत दूर आ गए हैं?
आज प्रेस सेंसरशिप का सामना नहीं करता- कम से कम सीधे कागज पर लाल स्याही से नहीं, लेकिन जो भय तब ऊपर से थोपा गया था, वो अब भीतर पैबस्त है। पत्रकार सवाल पूछने से पहले चैनल की पॉलिसी, ब्रॉडकास्टिंग पार्टनर, मालिक की राजनीतिक पसंद और ट्रोल आर्मी का मूड देखता है।
आज सेंसरशिप का नाम बदल गया है- TRP, algorithm, sponsored content, और “हम न्यूट्रल हैं”। तब की सेंसरशिप में डर था, आज की सेंसरशिप में मुस्कान है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज कोई जबरन चुप नहीं करा रहा, अब हम खुद चुप हो जाते हैं।
1975 में तो खबर रोक दी जाती थी। आज उसे ‘रेटिंग्स’ के नाम पर पीछे धकेला जाता है। तब जेल भेजा जाता था, आज वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से बदनाम किया जाता है। तब रेडियो सरकारी था, आज मीडिया मालिकाना हक में सत्ता बैठी है।
और सबसे त्रासद विडंबना यह है कि 1975 की सेंसरशिप के खिलाफ आवाजें थीं, आज की खामोशी के खिलाफ आवाजें बहुत कम हैं। तब कैदियों ने संविधान को जिंदा रखने की कोशिश की, आज सोशल मीडिया पर ‘मौन समर्थन’ ही बड़ी बात मानी जाती है।
क्या 2025 में फिर से हमें एक “आलू-बैंगन की रेसिपी” छापनी पड़ेगी? शायद नहीं, क्योंकि अब इतना भी करने की जरूरत नहीं। अब तो रेसिपी की भी जगह इंस्टाग्राम रील ने ले ली है और खबरें वहीं तक सीमित हैं, जहां तक कोई बटन क्लिक करे।
इसलिए 25 जून को केवल एक तारीख नहीं समझिए। यह भारतीय पत्रकारिता का आईना है- जो हमें बताता है कि लोकतंत्र एक दिन में नहीं मरता, वह धीरे-धीरे सो जाता है। और जब वह सोता है, तो सबसे पहले अखबार चुप हो जाते हैं।
आज जब हर चैनल बहस से ज्यादा तमाशा और हर हेडलाइन विचार से ज्यादा भय दिखाती है, तब एक बार फिर सवाल उठाना जरूरी है: “Are we really free to report, or just free to scroll?”
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