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हिंदी की सेवा करनी है, तो अपना शब्द भंडार समृद्ध कीजिए: जयदीप कर्णिक

हिंदी को लेकर जिस दिन हम यह नजरिया बदलेंगे, सब अपने आप ठीक हो जाएगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

जयदीप कर्णिक

संपादक, अमर उजाला (डिजिटल) ।। 

मेरा मानना है कि हिंदी को लेकर बातें करने का वक्त बहुत पीछे जा चुका है। हमें यहां से वहां पहुंचना है कि हमें हिंदी दिवस मनाने की जरूरत ही न पड़े।

असल में, हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मनाना पड़ रहा है, यही सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। दिक्कत यह है कि हिंदी को लेकर जो व्यावहारिक कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे नहीं उठाए गए। जितनी तेजी से अंग्रेजी शब्द हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में घुसपैठ कर रहे हैं (चाहे मीडिया माध्यमों से हों, चाहे विद्यालयों से) उससे समस्या और बड़ी हो रही है। हम अनजाने में ही अपनी भाषा को खो रहे हैं।

कुछ अच्छे प्रयत्न हुए हैं, सरकारी स्तर पर भी हुए हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि मैं आशावादी व्यक्ति हूं, मुझे विश्वास है कि चीजें बदलेंगी। लोगों को चाहिए कि जब वे एटीएम मशीन से पैसा निकालें, तो भाषा का विकल्प आने पर हिंदी चुनें। जब वेबसाइट खोलते हैं और वहां हिंदी का विकल्प मिलता है, तो उसका प्रयोग करें। ऐसा करने से हिंदी में निवेश करने वालों को प्रोत्साहन मिलेगा। हिंदी में अच्छा काम करने से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। अभी संदेश ये जाता है कि हिंदी का विकल्प देने की आवश्यकता ही नहीं है।

आज पत्रकारिता में अच्छी हिंदी लिखने वालों की जरूरत है। लेकिन जो विद्यार्थी पत्रकारिता पढ़कर आते हैं, उन्होंने विद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंदी उतनी अच्छी तरह नहीं पढ़ी होती। नतीजतन हमें उन्हें पत्रकारिता सिखाने से पहले भाषा सिखानी पड़ती है।

समस्या की शुरुआत यहीं से होती है। गली-गली में खुले कॉन्वेंट स्कूलों ने लोगों के दिमाग में यह भ्रम बैठा दिया है कि अंग्रेजी ही रोजगार की गारंटी है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारतीय भाषाओं में रोजगार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन उन भाषाओं को गहराई से जानने-समझने वाले लोग कम हो रहे हैं। यही वजह है कि भाषा के अच्छे जानकारों की अहमियत और भी ज्यादा हो गई है।

आज न्यूज़ रूम में अच्छे भाषा जानकारों की खोज रहती है। लेकिन अब लोग गूगल पर शब्द ढूंढ लेते हैं, खुद का भाषा ज्ञान अधूरा रह जाता है। यही दोहरा मापदंड है। अंग्रेजी में कठिन शब्द पढ़ते हैं तो गर्व होता है कि हमारी वोकैबुलरी मजबूत हो गई, लेकिन हिंदी में कठिन शब्द पढ़ते हैं तो कहते हैं कि यह क्लिष्ट भाषा है। जबकि भाषा कभी कठिन नहीं होती, हम उसे पढ़ना छोड़ देते हैं।

हमें संस्कृत कठिन क्यों लगती है? क्योंकि हमने उसे पढ़ना छोड़ दिया। यही समस्या हिंदी के साथ भी हो रही है। सबसे पहले हमें अंग्रेजी को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता से निकलना होगा। जिस दिन हम अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों से प्यार करेंगे, उसी दिन हमारे मन का हीनता-बोध खत्म होगा।

हिंदी शब्दों को भी अंग्रेजी की तरह सीखना और समझना चाहिए। जिस दिन हम यह नजरिया बदलेंगे, सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।

मैं सौभाग्यशाली हूं कि मेरी पूरी जिंदगी हिंदी और हिंदी पत्रकारिता की सेवा में बीती है। आगे भी मैं मन, धन, प्राण और प्रण से हिंदी के लिए जीता रहूंगा। क्योंकि जो सभ्यता अपनी भाषा और संस्कृति से कट जाती है, वह लुप्त हो जाती है।

यह भी सच है कि संस्कृति को खत्म करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र चलता है। हम सबको उसके प्रति सावधान रहना होगा। आज हम धीरे-धीरे शब्दों की हत्या सी कर रहे हैं। जब हमारे पास ‘राजनीतिज्ञ’ जैसा सुंदर शब्द है, तो हमें ‘पॉलिटिशियन’ क्यों बोलना चाहिए? जब ‘खेल’ जैसा सुंदर शब्द है, तो हमें ‘स्पोर्ट्स’ क्यों कहना चाहिए?

अगर हम हिंदी शब्दों का प्रयोग छोड़ देंगे, तो हम आने वाले समय में अपनी ही भाषा के शब्दों की हत्या के गुनाहगार बनेंगे। इसलिए मेरा मानना है कि हिंदी की सेवा करनी है, तो उसका शब्द भंडार समृद्ध कीजिए। अंग्रेजी का शब्दकोश लगभग हर घर में है, लेकिन हिंदी का कितने घरों में है?

अमर उजाला में हमने पिछले चार साल से ‘हिंदी हैं हम’ नाम से एक मुहिम चला रखी है। इसमें हम रोज़ एक नया हिंदी शब्द, उसका अर्थ, भावार्थ और कविता में उसका प्रयोग प्रकाशित करते हैं। इससे लोग नए शब्द सीख रहे हैं। मैं खुद भी इससे कई बार नए शब्द सीखता हूं।

यही तरीका अपनाकर हम हिंदी को समृद्ध कर सकते हैं।

भाषा को सहेजना, उसे समृद्ध करना ये सब हमारे साझा सरोकार हैं। जब ऐसा करने लगेंगे तो हिंदी दिवस की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)


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